🌿 संक्षेप में
क्या आप जानते हैं कि आज दुनिया जिस सस्टेनेबल लाइफस्टाइल (Sustainable Lifestyle) की तलाश कर रही है, उसकी जड़ें हमारे गांवों की पुरानी परंपराओं में पहले से मौजूद थीं? दादी-नानी के देसी नुस्खे, देसी बीजों का संरक्षण, श्रमदान, पत्तल-दोने का उपयोग और सादगीपूर्ण जीवन जैसी परंपराएं न केवल पर्यावरण की रक्षा करती थीं, बल्कि समाज को भी आत्मनिर्भर बनाती थीं।
- 🌱 देसी बीजों से जैव विविधता का संरक्षण
- 💧 तालाब, आहर-पइन और जल संरक्षण की सामुदायिक परंपराएं
- 🤝 श्रमदान से सामाजिक एकता और पर्यावरण संरक्षण
- 🍃 पत्तल-दोने और पुनः उपयोग की संस्कृति
- 🏡 सीमित उपभोग और सादगीपूर्ण जीवन का महत्व
निष्कर्ष: हमारे गांवों की खोती हुई परंपराएं केवल अतीत की यादें नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ भविष्य का रास्ता भी हैं।
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| हमारी गांवों की परंपरागत जीवनशैली पर्यावरण और धरती माँ को बचा सकती है |
📌गांवों की खोती हुई परम्पराएं जो पर्यावरण को बचा सकती है:
📑 Table of Contents
- ➤ प्रस्तावना
- ➤ 1.पत्तल और दोने में भोजन :प्लास्टिक का प्राकृतिक विकल्प
- ➤ 2-गोबर से खाद एवं लिपाई-पुताई
- ➤3.देशी बीजों का संरक्षण:जैव विविधता
- ➤ 4.श्रमदान की परंपरा:सामूहिक जिम्मेदारी
- ➤ 5.मिट्टी के घड़े और सुराही:बिना बिजली के शीतल जल
- ➤ 6.नीम की दातुन और प्राकृतिक स्वच्छता
- ➤ 7.घर के आँगन में औषधीय पौधे
- ➤8.कपड़े के थैले:आज का आधुनिक समाधान,कल का परंपरा
- ➤ 9. सीमित उपभोग और सादगी पूर्ण जीवन
- ➤ निष्कर्ष
- ➤ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल(FAQ)
प्रस्तावना (Introduction)
मैं पढ़ भी रहा था,और आजकल टीवी एवं समाचार पत्र आदि में भी 'सस्टैनबल लाइफस्टाइल'(Sustainable Lifestyle) की चर्चा देखने सुनने को मिलती ही रहती है। संयुक्त राष्ट्र के 'सतत विकास' का पैमाना और उस पैमाने पर ही सभी देश अपने विकास की नीतियां बना रहे है।भारत का LiFE पहल इसी दिशा में एक प्रयास है।
और जीतने भी इस 'सस्टैनबल लाइफस्टाइल' के उपाय है, वे सभी पहले से ही हमारे गांवों की पुरानी परंपराओं में मौजूद थी। आज--प्लास्टिक मुक्त जीवन,जल संरक्षण,जैविक खेती,पुनर्चक्रण (Recycling) और जैविक संपदा संरक्षण की बात होती है,ये सभी हमारे दादा-दादी बिना किसी अभियान के अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाए हुए थे।
इन उपायों को देख सुनकर कभी-कभी हंसी भी आती है। जो लोग उनमें से कुछ उपायों को बचपन में अपने जीवन में जिए है उन्हे हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है कि जिस चीज को हमारे गांवों में लोग अपनी दिनचर्या में शामिल किये थे और जिनको हम लगभग विकास के नाम पर भुला चुके है---उसी को आज पूरी दुनियां उपाय एवं अभियान के रूप में लागू कर रही है,ताकि हमारी पर्यावरण को बचाया जा सके।
हमारे गांवों की ये पुरानी लाइफस्टाइल केवल पर्यावरण के लिए ही नही,बल्कि आत्मनिर्भरता के लिए भी महत्वपूर्ण थी और इससे सभी गांव आत्मनिर्भर रहते थे। इन परंपराओं का झलक --महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग और समग्र कल्याण के संबंध में भी देखने को मिल जाते है।
आज जब पूरी दुनियां में इन उपायों को अपनाने के लिए जागरूकता अभियान आदि चलाया जा रहा है हमारी नई पीढ़ी भी अब आश्चर्य करने पर मजबूर हो गए है और अपनी इस परंपरा एवं विरासत को फिर से याद करने लगे है। इसी कड़ी में आज हम ऐसे ही --'10 ग्रामीण परम्पराएं' जिनके बारे में इस लेख में बात करेंगे। इनको अपनाकर हम अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए इक सुनहरा भविष्य प्रदान कर सकते है।
1.पत्तल और दोने में भोजन :प्लास्टिक का प्राकृतिक विकल्प
पत्तल में भोजन---पत्तल माने,प्लास्टिक का पत्तल नहीं,बल्कि पेड़ों के पत्तों का बना हुआ पत्तल। पहले के शादी-विवाह,उत्सवों भोज,धार्मिक आयोजनों आदि में साल,पलाश और केले के पत्ते से बने पत्तलों का उपयोग होता था।
- पत्तों से बने पत्तल: प्लास्टिक के पत्तल का तो नामों-निशान ही नही था। साल और पलाश के पौधों की पत्तियों से बने हुए पत्तलों से ही पूरा धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि विवाह शादी जैसे आयोजनों में भी यही पत्तल प्रयोग किए जाते थे।
- केले के पत्तियों के पत्तल: छोटे-मोंटे भोज तो केले के पत्तियों से सी संभव हो जाते थे। सभी गांवों में इसीलिए केले के वृक्ष भी लगाए जाते थे की इनकी पत्तियां भी काम की होती थी।
- कमल के पत्ता का पत्तल: गांवों के तालाबों एवं पोखरों में कमल के पत्ते बहुतायत में रहते थे। छोटे भोज जैसे --धान की रोपनी में मजदूरों को भोजन कराना,धान की दवरी आदि के समय में भी ज्यादा मजदूर होते थे उनका भोजन और भी छोटे मोंटे भोज में इनकी पत्तियों के पत्तलों से ही काम हो जाता था।
अब लोग सवाल करेंगे की आखिर इससे क्या लाभ ? और दूसरा सवाल करेंगे की उस समय ज्यादा पेड़-पौधे होते होंगे और कम लोगों को भोजन कराना पड़ता होगा। इसलिए ये संभव था,लेकिन आज के दौर में ये कैसे संभव हो सकता है।
- आज गांव एवं कृषि में मशीनों की भूमिका बढ़ी है: पहले कृषि में मशीनों की कमी रहती थी। सभी काम अधिकतर लोग ही करते थे। और उस समय प्लास्टिक के पत्तल नहीं होते थे। लेकिन किसी को भी खाने के लिए पत्तलों की कमी नहीं होती थी। अतः पहले की तुलना में आज कम ही पतल की जरूरत पड़ती है।
- गांवों में पत्तल की मांग में कमी नहीं: अतः उपरोक्त आधार पर कह सकते है कि पहले की तुलना में आज के समय में गांवों में पत्तल की मांग में ज्यादा वृद्धि नहीं हुई है।और जब पहले इन पत्तलों से ही सारा काम हो जाता था तो आज भी हो जाएगी। बस इसे अपनाने की देर है।
- हरियाली बढ़ेगी: इसी बहाने हरियाली बढ़ेगी और लोग गांवों में साल,पलाश एवं केले के पौधों को लगाना शुरू कर देंगे। हरेक गांव में तालाब और पोखर होगा जिसमें कमल के फूल को लगाया जा सकता है।
➢क्या फायदा होगा:
इससे कई तरह के लाभ होंगे। और सबसे जरूरी पर्यावरणीय लाभ होंगे जैसे --
- पूरी तरह से जैविक: ये पूरी तरह से जैविक एवं प्राकृतिक होती है जो सड़कर मिट्टी में मिल जाती है और मिट्टी को भी खाद बनकर लाभ पहुंचाती है।
- प्लास्टिक के कचरें में कमी: प्लास्टिक का कचरा आज के समय में पूरे देश के लिए सिर-दर्द बना हुआ है। सुप्रीम-कोर्ट में केस् हो रहा है,तो कही इसका MBA की पढ़ाई हो रही है। लेकिन प्लास्टिक के कचरे का समाधान नजर ही नहीं आ रहा है। अब तो ये गांवों और खेतों के साथ मिट्टी की उर्वरता को भी प्रभावित करने लगा है। इस कचरे में कमी आ जाएगी।
- स्थानीय लोगों को रोजगार: इस पत्तों से बने पत्तलों को बनाने में स्थानीय लोगों को रोजगार की प्राप्ति होगी जो प्लास्टिक के पत्तलों के आने से छिन चुकी है।
- पशुओं के लिए भी उपयोगी: हम देखते रहते है और हमारे सामने ही गाय एवं अन्य मवेशी प्लास्टिक को एवं प्लास्टिक के पत्तलों चबा जाती है,जो उनके लिए हानिकारक होती है। लेकिन इन पत्तों के पत्तलों को जितना हो सके खा सकती है हानी नही,बल्कि लाभ और फायदा ही होगा।
- मानव स्वास्थ्य: प्लास्टिक आदि के पत्तलों के उपयोग करने के करण उनमें हानिकारक केमिकल की परत मानव को कई तरह के नुकसान पहुंचाती है। लेकिन इन पत्तों के पत्तलों से कोई नुकसान नहीं होने वाला है।
- प्रदूषण से मुक्ति: इनके उत्पादन में शून्य रासायनिक प्रक्रिया को अपनाया जाता है अतः इसको जलाने पर किसी भी प्रकार का वायु प्रदूषण भी नही होता है।
📌 निष्कर्ष:
- पत्तल और दोने का उपयोग करना अपनी समृद्ध भारतीय संस्कृति की ओर वापस लौटना है। यह आधुनिक युग की उस समस्या (प्लास्टिक प्रदूषण) का प्राचीन और सबसे सटीक समाधान है,जिसे अपनाकर हम अपनी सेहत को भी सुधार सकते है और धरती मां को भी प्लास्टिक के जहर से बचा सकते है
2-गोबर से खाद एवं लिपाई-पुताई
भारतीय ग्रामीण परिवेश में गाय के या भैंस के भी गोबर को कभी कचरा नहीं माना गया,बल्कि इसे --'गो-धन' कहा गया है। आधुनिक विज्ञान भी अब यह माँ चुका है कि गोबर---पर्यावरण,कृषि एवं स्वास्थ्य के लिए 'एक वरदान' के समान है।
पहले हम गोबर से बनने वाली खाद के बारे में समझते है--
1. गोबर से बनने वाली उत्तम खाद:
खेती के लिए गोबर की खाद को सर्वोत्तम माना गया है। जहां रसायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी बंजर होती जा रही है,वही गोबर की खाद मिट्टी को नया जीवन प्रदान करती है। जैसे ---
- पारंपरिक गोबर की खाद: इसमें किसान एक ही गड्ढे में गोबर,बचा हुआ चारा एवं कचरा आदि को इकट्ठा करते है। करीब 4-6 महीनों में ये प्राकृतिक रूप से सड़कर खाद बन जाती है। आमतौर पर इस खाद को खरीफ सीजन से पहले निकाल कर खेतों में डाल दिया जाता है और फिर उसमें भरने की प्रक्रिया 8-10 महीनों तक चलती रहती है।
- मिट्टी की बनावट में सुधार: यह खाद मिट्टी को भुरभुरा बना देती है जिससे पौधों की जड़ों तक हवा आसानी से पहुचती रहती है। चूंकि इसमें गोबर,पौधों और चारा का कचरा एवं राख की मात्रा भी रहती है जो मिट्टी की संरचना को उत्तम बनाती है।
- जल धारण क्षमता: इस खाद की खूबी यह होती है कि इसे मिट्टी में मिलाने से मिट्टी में पानी को सोखने एवं सोख कर रखे रहने की क्षमता बढ़ जाती है। इसके परिणाम से सिंचाई में पानी की कम जरूरत पड़ती है और मिट्टी हमेशा उपजाऊ बनी रहती है।
- पोषक तत्वों का भंडार: इस खाद में नाइट्रोजन,फास्फोरस,पोटैशियम के साथ साथ कई सूक्ष्म पोषक तत्व मौजूद होते है जो पौधों के विकास के लिए जरूरी होते है।
- केंचुआ खाद (Vermicompost): इसमें गोबर को इकट्ठा करके उसमें केंचुआ छोड़ा जाता है और इस केंचुए की मदद से गोबर को जब अपघटित किया जाता है तब इसे केंचुआ खाद या वर्मिकम्पोस्ट भी कहा जाता है।
- ज्यादा ताकत: यह साधारण और पारंपरिक खाद से भी 5-7 गुणा अधिक ताकतवर यानि शक्तिशाली खाद होता है।
- रोग-प्रतिरोधक क्षमता: यह पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देती है और पौधों को महत्वपूर्ण रूप से विकास में योगदान करती है।
यह गोबर की महत्वपूर्ण भूमिका मिट्टी को जीवन प्रदान करने और इसकी उपजाऊ क्षमता को बढ़ाने के लिए है। जिसका उपयोग हमारे परंपरा में सदियों से विकसित और चली आ रही है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है की इससे हमारी खेती रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं रहती है,मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और हमारी खेती में लागत कम आती है जिससे खेती लाभदायक बन जाती है।
गोबर से खाद बनाने और इससे पूरी खेती को करने के बारे में अधिक जानकारी के लिए जरूर पढे ---Zero Budget Natural Farming : क्या सच में 1 गाय से 30 एकड़ खेती संभव है ? जानिए पूरा सच।
अब बात करते है गोबर की दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जिसको जानकार तो विदेशी लोग और देश के भी कई शहरी लोग आश्चर्य करते है। और गोबर का यह प्रयोग हमारे रसोई घर तक है,जहां किसी को बिना हाथ पैर धोए हुए प्रवेश भी नहीं करने दिया जाता है। इस भूमिका को समझते जानते है ---
2. गोबर से लिपाई-पुताई:
ये पुराने समय में ही नहीं,बल्कि आज भी भारत के गांवों में पर्व-त्योहार,पूजा-पाठ और दैनिक जीवनचर्या में भी कच्चे घरों की दीवारों एवं फर्श को गोबर से लीपने की परंपरा है।
भले ही आज गांवों की सभी घरों में LPG गैस चूल्हा नें स्थान ले लिया है। फिर भी एक चूल्हा लकड़ी या उपला जलाने वाला भी मौजूद ही रहता है। और उसपर भी प्रतिदिन कुछ न कुछ भोजन भी जरूर ही बनता है। और इस चूल्हे को प्रतिदिन जलाने से पहले गाय के गोबर से लिपाई-पुताई की जाती है।
हां यह सिर्फ अंध-विश्वास या दिखावा नहीं है जैसा कुछ लोग बोल देते है,बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक करण मौजूद है जैसे ---
- प्राकृतिक कीटनाशक और सेनीटाइजर: गोबर में परचूर मात्रा में --'मैगनीज' और साथ में ही ऐसे 'बैक्टीरियां' होते है जो हानिकारक किटाणुओं,मक्खियों और मच्छरों को दूर रखते है। गोबर से लिपि गई जगह पूरी तरह से बैक्टीरियां-मुक्त एवं स्वच्छ हो जाती है।
- तापमान नियंत्रण: गोबर की लिपाई--'थर्मल-इंसुलेटर' की तरह काम करती है। कच्चे घर जिन्हे गोबर एवं मिट्टी से लिपा जाता है,वे गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते है। यह बिना बिजली के चलने वाले प्राकृतिक 'एयर-कंडीशनर' की तरह काम करता है। अब कई जगह तो शौक से भी इस तरह की दीवारों वाले घर बनाए जाने लगे है।
- सस्ती और टिकाऊ दरार-रोधी कोटिंग: मिट्टी के फर्श और दीवारों में जब गोबर मिलाकर लिपा जाता है तब,गोबर के रेशे मिट्टी को बांधकर रखते है,जिससे फर्श में दरारें नहीं पड़ती है।
- विकिरण से सुरक्षा: पारंपरिक मान्यताओं के साथ कुछ आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भी गाय की गोबर की मोटी परत में कुछ हद तक हानिकारक तरंगों या रेडीशन को सोखने की क्षमता होती है। यानि यह परमाणु खतरों को भी कम करने में सक्षम है।
- मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा: गोबर और मिट्टी की सोंधी खुशबू मानसिक शांति प्रदान करती है। हमारे शस्त्रों में भी गोबर को अत्यंत पवित्र (लक्ष्मी का वास) माना गया है। इसलिए शुभ कार्यों से पहले लिपाई-पुताई की जाती है।
3. आधुनिक समय में इसका महत्व और आर्थिक लाभ:
चुकी कुछ समय पहले इन सब तर्कों को हंसी उड़ाया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ने लगी और वैज्ञानिक रूप से भी इसे सही माना जाने लगा है। और अभी वर्तमान समय में गोबर की स्वीकार्यता तो आश्चर्य जनक रूप से बढ़ गई है।
आज यह गोबर केवल गांवों तक ही सीमित नहीं रह गई है,बल्कि अब इसके कई व्यावसायिक उपयोग तेजी से बढ़ने लगी है,जैसे --
- गोबर पेंट (Vedic Paint): आजकल 'खादी ग्रामोद्योग' और कई संस्थाएं गोबर से 'प्राकृतिक पेंट' बना रही है,जो पूरी तरह से 'केमिकल फ्री' के साथ 'एंटी-बैक्टीरियल' और सस्ता भी होती है।
- बायोगैस (Biogas): गोबर से मिथेन गैस बनाई जाती है,जिसका उपयोग गांवों में खाना पकाने और बिजली बनाने में हो रहा है। इसके बाद बचा हुआ 'स्लरी' खेतों में लिक्विड खाद या इसे सुखाकर सुखी खाद के रूप में की जा रही है। वर्तमान में गोबर गैस को-- CBG (कम्प्रेस्ड बायोगैस) में बदल कर हरेक चीजों में प्रयोग किया जाने लगा है। इसकी अधिक जानकारी के लिए जरूर पढे--कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) क्या है? सब्सिडी,फायदे और प्लांट लगाने की पूरी जानकारी।
- धूपबत्ती और मूर्तियाँ: त्योहारों पर पर्यावरण अनुकूल दीपक,धूपबत्ती और मूर्तियाँ बनाई जा रही है जिसमें प्लास्टिक और केमिकल का कम से कम उपयोग हो रहा है। यही नहीं गोबर आधारित दंत मंजन भी बनाए जा रहे है।
📌निष्कर्ष:
- चाहें खेत में फसल उगानी हो या घर को बीमारियों से बचाना हो,गोबर एक शून्य लागत (Ziro-Cost) और 100% सुरक्षित विकल्प है। 'गोबर से खाद' और 'गोबर से लिपाई' सीधे तौर पर पर्यावरण को बचाने और आत्मनिर्भर बनने के सबसे आसान जरिया है।
3.देशी बीजों का संरक्षण:जैव विविधता
भले ही आज कल यह किताबों एवं पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जा रही है लेकिन--'बीज केवल अनाज नहीं होता,वह आने वाली पीढ़ियों का भविष्य होता है' सदियों से भारतीय गांवों में बिना किसी शब्दावली के ही समझी जाती थी। आज दुनियां भर में जैव विविधता को लेकर चिंताएं जताई जा रही यही की कैसे इसे सुरक्षित किया जाए। लेकिन हमारे किसान सदियों से अपने परंपरा और ज्ञान के सहारें इस जैव विविधता को सँजोये हुए चले आ रहे है।
1. गांवों में बीज खरीदा नहीं,बल्कि बांटा जाता था:
प्राचीन काल से ही गांवों में कभी भी बीज को खरीदना नहीं पड़ता था। जिसके पास बीज नहीं भी होता था वो गांव में ही किसी के यहा से बीज ले लेता था और उसके बदले में जब फसल तैयार हो जाता था तो अगले साल वो उससे प्राप्त बीजों को लौटा देता था।
- बीज विरासत: बीजों का विरासत होता था और कहा जाता था कि --'यह बीज तुम्हारे परदादा के समय से चला आ रहा है' और उस बीज को बचाने की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी की हो जाती थी।
2. किसान खुद होता था 'बीज संरक्षक':
किसान खुद जिस खेत की फसल सबसे मजबूत और स्वास्थ्य होती थी उसे खेत में ही बीज के लिए चुन लेता था। फिर उसको अलग से काटकर बिल्कुल अलग खलिहान में रखा जाता था और अलग से ही बीज निकाल कर फिर उसे ठीक से सुखाया जाता था। गांव के बुजुर्ग कहते थे कि--बीज खेत में ही पहचाना जाता है,खलिहान में नहीं'।
- बीज माताएं: महिलाओं की मुख्य जिम्मेदारी इन बीजों को घरों में सुरक्षित रखने का होता था। उन बीजों को छाँटकर अच्छे बीजों को अलग निकाल कर सुरक्षित रखती थी।
- मिट्टी और गोबर के कोठार: इन बीजों को मिट्टी और गोबर के कोठार में रखा जाता था जिसे ये महिलायें ही घरों में बनाती थी।
3. बीज संरक्षण की पारंपरिक विधियां:
इन बीजों को कीड़ों और अन्य जीवों से बचाने के लिए बिल्कुल बिना किसी रसायनों के प्रयोग के प्राकृतिक और वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था ---
- प्राकृतिक कीटनाशक: बीजों में कीड़ा न लगे इसके लिए उसके साथ नीम की सुखी पत्तियां,कड़वा तेल,सुखी लाल मिर्च और लकड़ी की राख आदि को मिलाया जाता था जो पूरी तरह से जैविक होता था।
- लौकी और कद्दू के खोल: छोटे बीजों और सब्जियों के बीजों को लौकी एवं कद्दू के खोल को सुखाकर उसमें रखा जाता था एवं उसका मुंह मिट्टी से बंद कर दिया जाता था।
- कोठार: ज्यादा बीजों को कोठार और छौड़ में रखा जाता था जिसे मिट्टी से बनाया जाता था।
- बांस की कोठिया: बांस की कोठिया जिसमें धान की पुआल लगाकर और बीच में बीजों को सुरक्षित रखा जाता था।
- बीजों का आदान-प्रदान: आपस में ही बीजों का आदान-प्रदान किया जाता था। जिससे कभी भी बीज खरीदना नहीं पड़ता था और बिना बीज के किसी की खेती नहीं रुकती थी।
4. त्योहारों और संस्कृतियों से जुड़ाव:
इन बीजों से सांस्कृतिक जुड़ाव भी हो गया था। यह हमारी संस्कृति और लोक परंपरा से जुड़ कर धरोहर के रूप में हमे अगली पीढ़ी को जुड़ाव प्रदान करती थी।
- अक्षय तृतियाँ और मकर संक्रांति: अक्षय तृतियाँ और मकर संक्रांति जैसे त्योहारों पर इन बीजों की पूजा की जाती थी। साथ ही प्रति वर्ष खेती शुरू होने से पहले खरीफ के मौसम में---'समहूत' का पूजा होता था जिस दिन भी इन बीजों की पूजा की जाती थी।
- बीज गीत: हमारे गांवों में इन बीजों की बुआई के गीत भी प्रचलित रहे है। इन गीतों को इसकी बुआई के समय में ही इनके नामों के साथ उनकी प्रकृति और बोने के समय का भी जिक्र रहता था।
इस प्रकार से ये बीज जो सदियों से यहां की जलवायु में अनुकूलित हो चुके थे। इनको हरेक वर्ष इस्तेमाल किया जा सकता था और है। परंपरिक और देशी बीजों के बारे में अधिक जानकारी के लिए जरूर पढे ---भारत की "बीज विरासत":NBPGR और कम्युनिटी सीड बैंक के माध्यम से सुरक्षित होता कृषि का भविष्य एवं खरीफ 2026 की पारंपरिक खेती का जादू:लौकी,सेम,भटुआ,भिंडी और कद्दू की देशी बीज बदल देंगे आपकी खेती! जानिए सम्पूर्ण गाइड!।
📌देशी बीजों का महत्व:आज की जरूरत
- हमारे पारंपरिक देशी बीज जलवायु परिवर्तन(Climate Changes),सूखे और बाढ़ को सहने में सक्षम होते थे। उदाहरण के लिए धान की कुछ ऐसी किस्में भी थी जो पानी के बहाव के अंदर भी पड़े रहने पर आदती नहीं थी। जबकि कुछ किस्में कितना भी सूखा आ जाता था वो नहीं सूखती थी। आज 'हाइब्रिड' और GM फसलों से हमारी जैव विविधता खतरे में है,तब इन सांस्कृतिक 'बीज संरक्षण तकनीक' को आधुनिक रूप से फिर से अपनाने की जरूरत है।
4.श्रमदान की परंपरा:सामूहिक जिम्मेदारी
श्रमदान सबसे बड़ा दान होता था ये केवल किताबों और ग्रंथों में नहीं,बल्कि हमारे गांवों में जीवंत रूप से प्रचलित थी। आज भी थोड़ी बहुत मात्रा में कई गांवों में यह प्रचलित और मौजूद है।
आज जब किसी भी सार्वजनिक काम के लिए लोग सरकार की तरफ देखते है---तब तक पहले गांवों में सामूहिक रूप से वो काम शुरू हो जाती थी। इसमें लोग बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के सामूहिक और गांव के लाभ के हित में बिना किसी मजदूरी के काम करते थे।
इसी परंपरा ने सदियों तक --तालाबों को जीवित रखा,रास्तों को चलने योग्य बनाए रखा और सामाजिक एकता को मजबूत रखा।
उस समय गांव में किसी एक व्यक्ति की समस्या पूरी गांव की समस्या मानी जाती थी। इसीलिए सामुदायिक कार्यों में लोग स्वेच्छा से भाग लेते थे। लोग दूसरों के सुख में भी भाग लेते थे और दूसरों के दुख में भी भाग लेते थे। इसलिए कोई दुख में ज्यादा दुखी नहीं रह पाता था और सुख में सभी को आनंद आता था और लोग हमेशा मुस्कराते रहते थे।
1. तालाब और पोखरों की खुदाई:
प्रत्येक गांवों में यह नियम होती थी की बरसात से पहले आपसी सहयोग से मिल जुल कर गांव के तालाबों की सफाई की जाती थी।
- तालाबों की जलकुंभी को निकलकर सफाई किया जाता था।
- तालाब की खुदाई की जाती थी।
- किनारे रास्ते बनाए जाते थे उसकी मरम्मत की जाती थी और फूल,पत्तियां लगाई जाती थी।
- जल निकासी की व्यवस्था मजबूत की जाती थी।
इन तालाबों का उपयोग सार्वजनिक रूप से मवेशियों को पानी पिलाने नहाने और गांव के लोग भी स्नान एवं सफाई में करते थे। सिंचाई में भी इनका मदद मिलता था। और भूमिगत जल का स्तर बढ़ जाता था। तालाब के पास मंदिर और सार्वजनिक उत्सव करने के जगह भी होते थे।
2. पईन और रास्तों की सफाई:
तालाबों से या नहरों से खेतों तक पानी को पहुचाने के लिए पईन होती थी जिसके दोनों किनारे रास्ते होते थे। इन पईनों की सफाई बरसात से पहले मिल कर सामूहिक रूप से की जाती थी। और रास्तों को मजबूत किया जाता था ताकि बरसात के दिनों में आवाजाही में व्यवधान न हो पाए।
3. धार्मिक और सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा:
हरेक गांव में मंदिर,धर्मशाला और अखाड़ा जरूर होते थे। इन सार्वजनिक स्थलों की सफाई सुरक्षा और विकास के काम को मिल जुल कर ही किया जाता था।
- भूमि दान: गांव के रईस लोग जिनके पास ज्यादा भूमि होती थी--स्कूल या सार्वजनिक भवन आदि के लिए जमीन को दान कर देते थे। क्या आज के समय में ये संभव है। लोग तुरंत मुआवजा की मांग करने लगेंगे।
- सार्वजनिक आयोजन: प्रति वर्ष गांवों में पूरा गांव मिलकर सार्वजनिक आयोजन करते थे। जैसे वार्षिक पूजा या वार्षिक खेल आयोजन आदि।
4. शादी-व्याह में सामूहिक जिम्मेदारी:
आज का समय टेंट का समय है। लेकिन गांवों में चाहे कितना भी बड़ा शादी विवाह का आयोजन क्यों न हो किसी टेंट की जरूरत नहीं पड़ती थी। और बिना एक रुपया खर्च किए सभी लोगों की शादी के सभी इंतजाम आसानी से हो जाती थी।
- चौकी तोसक तकियाँ: लोग शादी से एक दिन पहले ही पूरे गांव में घूम कर सभी घरों से चौकी,तोसक,तकियाँ आदि को इकट्ठे कर लेते थे। सभी घरों में इन सार्वजनिक कार्यों में उपयोग के लिए सरप्लस रूप से सुरक्षित रखा रहता था। इन आयोजनों के समय इन्हें निकाला जाता था।
- बर्तन आदि: बर्तन भी शादी से एक दो दिनों पहले ही सभी घरों से इकट्ठा किया जाता था। और शादी बीत जाने के बाद लौटा दिया जात था।
- दही,दूध और राशन: शादी विवाह तो बिना दही के संभव ही नहीं था। अतः शादी के दिन या एक दिन पहले से ही सभी घरों से दही आ जाता था। यहां तक की कई बार ये अगल-बगल के गांवों और रिस्तेदारों के यहां से भी आ जाता था।
- गांव के ही लोग हलवाई और कैटरर: शादी के सभी काम गांव के लोग ही मिलकर करते थे। बिना किसी मजदूरी के ही। गॉव के ही कोई आदमी हलवाई का काम करता था और सभी लोग मिल जुल कर बड़े से बड़े आयोजनों को भोजन खिला देते थे।
इस तरह की सामूहिक जिम्मेदारी जो परंपरा से चली आ रही हो बहुत ही दुर्लभ होती है। आज भी कम या अधिक मात्रा में कई गांवों में शादी विवाह आदि मौकों पर इस तरह की सामूहिक जिम्मेदारी देखने को मिल जाती है।
5. गरीब और जरुरतमन्द की मदद:
यदि किसी करण से किसी गरीब परिवार के घर में किसी प्रकार की मुसीबत आ जाती थी, जैसे आग लग जाना,या रोग में धन बर्बाद हो जाना या गरीब की लड़की की शादी करना आदि। इस मौकों पर पूरा गांव मिलकर उस गरीब परिवार का दर्द और जिम्मेदारी उठाते थे।
- लोग उस गरीब के घर बनाने में मदद करते थे।
- शादी विवाह में मदद करते थे।
- रोग दुख में मदद करते थे।
इस तरह की सामूहिक जिम्मेदारी में कोई भी ग्रामीण परिवार न ही भूखे मरता था और न ही भूखे सोता था। और न ही बिना किसी काम के बेरोजगार ही रहता था।
6. श्रमदान क्यों कमजोर पड़ गया ?
मन में सवाल उठता है कि क्यों ये श्रमदान कमजोर पड़ गया ? क्या कारण रहे होंगे की इतने अनूठे और सबको लाभ पहुंचाने वाले इस सिस्टम को लोग भूलने लगे है। इसके कई करण हो सकते है जिनमें से ---
- बढ़ता व्यक्तिवाद: ये अंग्रेजों के समय से ही हमारे समाज में फुट डालने के लिए शुरू किया गया था। अब लोग 'समुदाय' की जगह 'व्यक्तिगत सुविधा' को ज्यादा महत्व देने लगे है।
- सरकारी योजनाओं पर निर्भरता: धीरे-धीरे समाज को सरकार और सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहने के कारण निर्भरता और भी बढ़ती गई और ये सामूहिक जिम्मेदारी वाली श्रमदान फीकी पड़ती गई।
- पलायन: धीरे-धीरे लोग शहरों की ओर रुख करने लगे और पलायन करने लगे। अब गांवों में बुजुर्गों के साथ-साथ उनका साथ निभाने के लिए युवाओं की कमी हो गई है।
- सामाजिक एकता में कमी: देश में हो रही राजनीति खासकर जातिगत राजनीति नें गांवों की सामाजिक एकता को भी ध्वस्त कर दिया है। इस जातीय और सामाजिक विभाजन को अंग्रेजों ने शुरू किया था जिसे वर्तमान में हमारी राजनीतिक दलों ने इस काम हो आगे बढ़ाना जारी रखा है।
- समय का अभाव: चूंकि पहले एक परिवार में एक लोग कमाते थे और पांच लोग खाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब परिवार में पांच लोग है तो पांचों कमा रहे है फिर भी ठीक से परिवार चलाने में हालत खराब हो जा रही है। अतः अब तो पति-पत्नी दोनों भी कमाने लगे है। यानि समय किसी के पास नहीं है कि सामाजिक कामों के लिए समय निकाला जाय।
लेकिन समय दान और श्रमदान अब फिर से समय आ गया है ये समय की मांग होने वाली है। आज पूरी दुनियां को ये बात समझ आ चुकी है कि जो पूरी दुनियां की मूल समस्या है---उसे किसी सरकार के सहारे पूरी नहीं की जा सकती है,बल्कि ये सामूहिक जिम्मेदारी और सहयोग से ही पूरी की जा सकती है।
यदि इन समस्याओं को उठाकर किसी देश के सरकार के खिलाफ आंदोलन भी होता है तो उस आंदोलन में भाग लेने के लिए लोग सामूहिक समय एवं श्रमदान का योगदान करते ही है। तभी ये आंदोलन सफल होती है और उस देश में सरकार बदल जाती है।
लेकिन मूल समस्या ज्यों की त्यो बनी रहती है। क्यों ? क्योंकि ये सामूहिक समय एवं श्रमदान सृजन के लिए नहीं हुई थी मूल समस्या को दूर करने के लिए नहीं,बल्कि सरकार को दूर करने के लिए हुई थी। यदि यही समय और श्रमदान मूल समस्या को दूर करने में लगती,तो बिना सरकार के ही और बिना सरकार बदले हुए ही समस्या को खत्म किया जा सकता था।
अब इस सामूहिक श्रमदान को जिंदा करने के लिए ---
- हर महिनें मासिक स्तर पर और हर साल वार्षिक स्तर पर 'गांव सेवा दिवस' मनाया जाय।
- पंचायत स्तर पर 'सामूहिक कार्यों की सूची' बनाई जाए।
- स्कूलों में बच्चों को सामुदायिक कार्यों के महत्व को बताया जाय और दिया जाय।
- स्वयं सहायता समूहों और मंडलों को जोड़ा जाय।
- श्रमदान एवं समयदान करने वाले लोगों को 'सार्वजनिक सम्मान' प्रदान किया जाय।
फिर से हम अपनी परंपरा को अपना कर अपनी परंपरा के द्वारा पूरे विश्व को रास्ता दिखा सकते है और पर्यावरण एवं प्रकृति को बचा सकते है।
➢प्रेरक उदाहरण:
आज के समय में इस तरह के कई प्रेरक उदाहरण भी देखने को मिल जा रहे है। राजस्थान में ही--'तरुण भारत संघ' के नेतृत्व में 'राजेन्द्र सिंह' ने राजस्थान के कई गांव के लोगों के सामूहिक नेतृत्व से श्रमदान करके सुख चुकी नदियों और जोहड़ों का पुरनिर्माण एवं पुनर्जीवित कर दिखाया। आज उन्हे--भारत का जल पुरुष' के नाम से जाना जाता है।
5.मिट्टी के घड़े और सुराही:बिना बिजली के शीतल जल
फ्रिज तो अभी आया है और इसके प्रभाव से ज्यादा दुष्प्रभाव देखने एवं सुनने को मिलने लगे है। लेकिन जब फ्रिज नहीं थे तब भी हमारे गांवों में फ्रिज जैसी शीतल लेकिन बिल्कुल प्राकृतिक एवं स्वादिष्ट जल मिलता था। और ये संभव होता था मिट्टी के घड़े एवं सुराही के उपयोग से।
- मिट्टी के घड़े और सुराही:
- यह केवल ठंडा ही नहीं होता था बल्कि औषधि की तरह काम करता था ---
- प्राकृतिक शीतलन का विज्ञान: हम जानते ही है कि घड़े का पानी वाष्पीकरण के सिद्धांत पर ठंडा होता है। अतः यह पराकृतिक रूप से शीतलता प्रदान करती है।
- PH-संतुलन: मिट्टी की प्रकृति 'क्षारीय' होता है जबकि हमारा शरीर और और कई बार हमरी खान-पान 'अम्लीय' होता है। अतः घड़े का पानी हमारी पीएच को संतुलित करता है जिससे हमारा स्वास्थ्य सही रहता है।
- गले और श्वसन तंत्र के लिए सुरक्षित: फ्रीज के पानी से गला खराब हो जाता है और खांसी आदि का सामना करना पड़ता है। जबकि घड़े का पानी बिल्कुल गले के स्वास्थ्य को ठीक करके उसको मजबूती ही प्रदान करता है।
- पाचन शक्ति: ज्यादा ठंडा पानी हमारी पाचन शक्ति को कमजोर कर देती है,लेकिन घड़े का पानी हमारी पाचन शक्ति को मजबूत बनाती है।
- शून्य बिजली,शून्य खर्च: बिजली नहीं लगती अतः खर्च नहीं होती। साथ में फ्रीज को बनाने एवं मरम्मत करने में भी खर्च उठान पड़ता है ये सब घड़े में नहीं करनी पड़ती है।
- शादी में मिट्टी के ग्लास:
- पहले हमारे गांवों में किसी भी शादी,आयोजन,भोज आदि कार्यक्रम में प्लास्टिक के ग्लास का उपयोग नहीं किया जाता था। बल्कि मिट्टी के बनाए गए ग्लास जिसे बिहार में--'भरूका' कहा जाता था--का उपयोग किया जाता था। इसको उसी गांव के कुम्हार भाई के द्वारा बनाया जाता था।
- 100% डिस्पोजेबल: ये 100 मिट्टी में मिल जाता है क्योंकि मिट्टी का ही बना होता है।
- कोई कचरा नहीं: प्लास्टिक जैसा कोई कचरा पैदा नहीं होता।
- कोई केमिकल नहीं: इसको बनाने में किसी प्रकार का केमिकल प्रयुक्त नहीं होता। अतः यह किसी भी प्रकार से स्वास्थ्य या पर्यावरण के लिए नुकसानदायक नही होता था।
आज जब पूरी दुनियां ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रही है और फ्रीज से निकलने वाले 'क्लोरोफ़्लोरो कार्बन'गैसे पर्यावरण को नुकसान पहुचा रही है,तब मिट्टी के यह बर्तन हरित विकल्प साबित हो सकते है। साथ ही यह हमारी स्थानीय कुम्हारों को नई जीवन प्रदान करने वाली भी हो सकती है।
6.नीम की दातुन और प्राकृतिक स्वच्छता
दातुन---कई लोग तो केवल किताबों में ही पढ़ते होंगे। गांवों में लोग सुबह निकलते है और नीम के पेड़ से दातुन तोड़ लेते है। उसमें न प्लास्टिक होती है,न किसी कारखाने में तैयार होती है,न किसी केमिकल की आवश्यकता और न ही पेस्ट की आवश्यकता और न ही पैसे खर्च करने की आवश्यकता।
और तो और न ही पर्यावरण को कोई नुकसान। क्योंकि पेस्ट को बनाने में --सोडियम लूरल सल्फेट,सोडियम बेंजोइट' आदि आदि। न प्लास्टिक कचरा और न ही ब्रश से होने वाले दुष्प्रभाव का खतरा। ऐसे थे हमारे पुरखे !!इसीलिए प्रत्येक घर के आगे एक नीम की पेड़ तो जरूर होती थी।
आज जब सरकार के द्वारा 'चाइनीज नीम' के पेड़ लगाए जा रहे है,तो हमारे बुजुर्ग गाली ही देते है। क्या देश में देशी नीम के पेड़ के बीज नहीं मौजूद है जो 'चाइनीज नीम' के पेड़ लगाए जा रहे है।
एक नीम किसान के कई काम एक साथ कर देते है। नीम की दातुन लोगों को साल भर में कितना पैसा बचा देती है इसका हिसाब नहीं करना है। बल्कि एक साल में प्लास्टिक के ब्रश से कितना नुकसान और डाक्टर एवं दवा पर कितना खर्च करना पड़ रहा है। ऊपर से देश में डाक्टरों की भी कमी होती जा रही है। दांत के डाक्टरों और एक दांत लगवाना हो तो इसका खर्च सुनकर किसान परेशान हो जाता है।
अतः अब फिर से उसी पुरातन परंपरा में लौटने की जरूरत है और इस मार्केटिंग वाले ब्रश पेस्ट की संस्कृति को त्याग देना है। अपने घर में एक नीम का पेड़ केवल दातुन के लिए ही लगा देनी है। और इलाज में होने वाले लाखों रुपयों को बचा लेना है।
7.घर के आँगन में औषधीय पौधे
जिस प्रकार से गांव के हर घर के आगे नीम का पेड़ होता था ठीक उसी तरह से हर घर के भीतर तुलसी और तुलसी जैसे कई औषधीय पौधे लगे होते थे। यह आँगन 'घर का फेफड़ा' और 'घर का प्रथमिक चिकित्सा केंद्र' होता था।
- तुलसी: अंगल के ठीक बीच में तुलसी का चौरा होता था। सर्दी,खांसी,जुकाम और हल्का बुखार हो जाने पर तुलसी का काढ़ा पी लेने से ठीक हो जाता था और बढ़ने की नौबत ही नहीं आती थी। साथ ही शुद्ध हवा और पर्यावरण तुलसी के कारण हो जाता था।
- गिलोय एलोवेरा: गिलोय के बेल को नीम के बेल पर चढ़ा दिया जाता था जिसे नीम गिलोय कहा जाता था। और एलोवेरा तो घर की शोभा बढ़ाने के साथ हमारे चेहरे की भी शोभा को बढ़ा देती थी।
- पुदीना: हर घर में रहती ही थी। खरीदने की जरूरत नहीं और रोज चटनी बनती थी।
- गेंदा,अड़हुल और केला: पूजा के काम आने वाले गेंदा के फूल,अड़हुल और पूजा करने के लिए केले के पौधे आम बात होते थे।
- सम्मी और दूब: सम्मी के पौधे दरवाजों के सामने और दूब अहाते में जरूर मौजूद रहते थे।
- नींबू के पौधे: हर घर में नींबू के पौधे होते थे और शर्बत हो या नींबू के चाय जब चाहे तोड़ लो।
अब तो हर घर में औषधीय पौधे दूर की बात है, अब --'हर घर में आँगन ही नहीं है' तो ये पौधे कहा लगाया जाय। बंटवारे के चलते और भी जगह की कमी हो गई है। संयुक्त परिवार की प्रथा की कमी ने सही में हमारी घर की औषधियों के स्थान को छिन लिया है।
अब पारंपरिक ज्ञान भी नहीं है नई पीढ़ी को इन औषधियों के बारे में। साथ ही रेडीमेड और जल्दी आराम की संस्कृति में काढ़ा कौन बनाने जाए। एक एलोपैथी की गोली खरीद लो और तुरंत आराम।भले ही इसके दुष्परिणाम समझ आए या न आए। अब तो इन गोलियों को भी आदत हो चली है और हर समय काम ही नहीं करती है। तब धीरे धीरे उन औषधीय पौधों की याद आने लगी है।
8.कपड़े के थैले:आज का आधुनिक समाधान,कल का परंपरा
कपड़े के थैले----हां.. हां.. हां !! सुनकर ही हंसी आने लगी है। भला कपड़ा का झोला लेकर कौन बाजार जाएगा। अब तो रंग बिरंग की पॉलिथीन की थैलियां आसानी से मिल जाती है। और इसी सोच ने शहरों की नालियों से लेकर गांवों के खेत खलिहानों को प्लास्टिक के कचरें से भर दिया है।
हमारे पुरखे शान से कपड़े के बने थैलियों को लेकर बाजार जाते थे। और जब तक यह परंपरा जीवित थी ---हमारी नदियां,मिट्टी और जानवर भी सुरक्षित थे।
- बेकार कपड़ा का निर्माण: पुराने समय में घर के बेकार हो चुके कपड़े को घर की महिलायें --कपड़ा का बैग,झोला,दरी,बिछावन--- और भी न जाने क्या क्या बना देती थी। और इन अपशिष्टों से भी काम आनेवाले कई समान बन जाते थे और सालों साल इनका उपयोग किया जाता था।
- दोबारा उपयोग: इन बैगों और झोलों को धो-धो कर दुबारा उपयोग किया जाता था। प्लास्टिक जैसे जल्दी खराब नहीं हो जाते थे।
- प्लास्टिक घातक क्यों: प्लास्टिक --एक प्लास्टिक --मुश्किल से 1-12 मिनट उपयोग में आता है और 500 साल इसके सड़ने में लग जाते है। यह नालों को जाम करता है, पशुओं के पेट में जाकर नुकसान करता है और पर्यावरण को प्रभावित करता है।
इन सभी समस्याओं का समाधान है--अपने पुरखों के दिखाए हुए रास्तों पर चलते हुए अपने और पर्यावरण के लिए 'कपड़े के बैग' और 'झोलों' का इस्तेमाल करना। इसके लिए हमारी अपनी मातृशक्ति को जागृत करने की देर है। बाकी का कम खुद ब खुद हो जाएगा।
9. सीमित उपभोग और सादगी पूर्ण जीवन
ग्रामीण जीवन सीमित उपभोग और सादगी पूर्ण जीवन जीने के अपने मूल सिद्धांत --जितनी जरूरत,उतना उपयोग' पर आधारित था। इसमें किसी भी चीज के दुरुपयोग का कोई स्थान नहीं था। एक एक दानें का महत्व होता था। और ऐसे ऐसे छोटे-छोटे नियम थे जो की 'अपने लिए किसी दूसरे को नुकसान न पहुचे' एवं 'अपना पेट तो कुत्ता भी भर लेता है,इंसान तो दूसरे जीवों का पेट भरता है' के सोच के साथ पूरी प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने पर आधारित था।
हमारे पूर्वजों ने हमेशा --'तेन त्यक्तेन भूँजीथा' (त्याग के समान उपभोग करो) का पाठ पढ़ाया है और इस पर चलने को प्रेरित किया है। इससे क्या क्या हासिल होगा ---
- मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति: हम जितना समान बटोरते है हमारी चिंताएं उतनी ही बड़ी होती जाती है। और हम समान बटोरते है कि हमे शांति मिलेगी और सुख से रहेंगे। ये उल्टा क्यों हो रहा है। क्योंकि समान बटोरने का कोई अंत नहीं है। ये हमें कर्जदार भी बना देगी लेकिन शांति प्रदान नहीं करेगी।
- पर्यावरण की सुरक्षा: कम समान --माने कम कारखानों से बने समान का मांग और घर में बने सामानों से ही जरूरत पूरी हो जाना जो बिल्कुल पर्यावरण की भलाई पर आधारित होती है।
- बिना सोचे समझे खर्च बंद और शांति शुरू: अब खर्च बिना सोचे समझे नहीं किया जाता जिससे फालतू के खर्च नहीं होते और शांति मिलती है एवं पैसा भी बना रहता है।
- प्रकृति के साथ समय: इससे प्रकृति के साथ समय बिताने का मौका मिलता है। लोग सामाजिक कार्यों में लगने लगते है और समय दान एवं श्रमदान भी करने लगते है जिससे शांति मिलती है।
सीमित उपभोग का अर्थ है कि हम अपनी वास्तविक आवश्यकता को समझे और केवल उतना ही उपभोग करें जितना जरूरी हो। इसका मतलब यह नही कि हम विकास और सुविधाओं के विरोधी बन जाए,बल्कि इसका अर्थ है-'संतुलित और जिम्मेदार उपभोग'।
यह जीवन के तीन सिद्धांतों पर आधारित था ---
- आवश्यकता और इच्छा में अंतर समझना।
- वस्तुओं का पूरा उपभोग करना।
- संसाधनों के प्रति सम्मान रखना।
पहले के बुजुर्ग कहते थे---थाली में उतना ही लो,जितना खा सकों'। आज के समय में थाली में खाना छोड़ना फैशन बन गया है। सार्वजनिक समारोहों,भोज और शादियों में तो भोजन की बर्बादी आम बात हो गई है। इसका कितना और कई तरह से नुकसान हो रहा है ये जानने के लिए आप जरूर पढ़ें---भारत में शादियों में भोजन की बर्बादी:आंकड़े,कारण,नुकसान और जागरूकता के साथ उचित समाधान।
आज के विशेषज्ञ अब सादगीपूर्ण जीवन को सबसे अच्छा जीवन मानने लगे है और विशेषज्ञ अब इसे --'Less is More' यानि --'कम में भी बेहतर जीवन' का सिद्धांत के रूप में दुनियां को अपनाने के लिए प्रेरित करने लगे है।
📌 महात्मा गांधी जी ने कहा था कि:
- धरती के पास 'हर इंसान' की 'जरूरत' को पूरा करने के लिए पर्याप्त साधन मौजूद है,लेकिन किसी 'एक इंसान' के 'लालच' को पूरी करने के लिए कुछ भी नहीं है।
निष्कर्ष (Conclusion)
सच कहा जाए तो आज हम जिस आधुनिक एवं विकसित दौर में जीवन को जी रहे है वहां हमने सुविधों के नाम पर पर्यावरण और सेहत दोनों को दांव पर लगा दिया है। ग्लोवल वार्मिंग,प्लास्टिक के पहाड़ और प्रदूषण जनित समस्याओं के हल ढूंढने में आज दुनियां अरबों डॉलर का खर्च कर रही है कि इसका कोई सही रास्ता और समाधान निकल जाए।
जबकि इन सभी समस्याओं का अचूक और सरल समाधान सदियों पहले से ही हमारे गांवों की जीवनशैली में ही मौजूद था। जिसे अब आज के वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ भी स्वीकार करने लगे है,और इन्हे फिर से अपनाने को सही मानने लगे है।
हमारी दादी-नानी के ये सभी नुस्खे --चाहे वे घड़े का पानी हो या कपड़ा का झोला या आँगन में तुलसी एवं औषधीय पौधे --यह कोई पिछड़ापन और अंधविश्वास नहीं था,बल्कि हमारी पर्यावरण और प्रकृति को बचाए रखने का गहरा एवं व्यावहारिक विज्ञान को संजोए हुए था।
अतः पर्यावरण को बचाने के लिए हमें आदि-मानव बनकर जंगलों मे रहने की जरूरत नहीं है,बल्कि परंपरागत रूप से जीवनशैली को अपनाने का एक जागरूक चुनाव करने की जरूरत है। आज 'Eco-Friendly' और 'Sustainable' बनना कोई फैशन नहीं,बल्कि हमारी धरती माँ को अगली पीढ़ी के लिए बचाए रखने का एकमात्र रास्ता है।
इस तरह के बदलाव एक छोटे से कदम से शुरू होता है। और इसकी शुरुआत आज से और अभी से एवं आपके ही द्वारा किया जा सकता है---आप अभी से इस गर्मी में एक कपड़ा का झोला अपने घर के महिला सदस्य से बनवाइए और बाजार में सब्जी लेने इसी झोले को लेकर जाईए।
हां बाजार से कुम्हार भाई के पास से ही --'एक मिट्टी का घड़ा' को भी लेकर आइए और फ्रीज के जगह इस घड़े के पानी को अपनाईए।
'आईए हम साथ मिलकर अपनी विरासत और प्रकृति को संरक्षित,सुरक्षित और पुनर्जीवित करते है'
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:सस्टैनबल लाइफस्टाइल क्या है? ▼
उत्तर:एक ऐसी जीवनशैली जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपभोग किया जाए और ऐसा उपयोग किया जाए की पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे।
प्रश्न 2: देशी बीज क्यों महत्वपूर्ण है? ▼
उत्तर: ये बीज स्थानीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलित होते है और हमारी जैव विविधता को सुरक्षित रखते है। इसका इस्तेमाल हरेक साल किया जा सकता है
प्रश्न 3:क्या मिट्टी के घड़े का पानी सचमुच फ्रीज के पानी से बेहतर होता है? ▼
उत्तर: हां!बिल्कुल। मिट्टी की प्रकृति क्षारीय होती है और पानी के एसीडीक लेवल PH को कम करती है। फ्रीज का पानी ज्यादा ठंडा होने के कारण गले और पाचन संस्थान को नुकसान पहुंचा सकता है। जबकि घड़े का पानी शरीर के तापमान के अनुकूल और केमिकल फ्री होता है।
प्रश्न 4:पत्तल और दोना, प्लास्टिक की तुलना में क्यों बेहतर होता है? ▼
उत्तर:प्लास्टिक को नष्ट होने में 500 से 1000 साल लग जाते है,जबकि पत्तल और दोना 10-15 दिनों में मिट्टी में मिल जाते है। प्लास्टिक में रसायनों का प्रयोग होता है जो पर्यावरण और हमरी सेहत को भी नुकसान पहुचाता है,जबकि पत्तल और दोना 100% पत्तों से बने होते है जो फायदा ही कर सकते है कोई नुकसान नहीं।
प्रश्न 5:हमारे पास आँगन नहीं है तो हम औषधीय पौधे कैसे उगाएं? ▼
उत्तर:अगर आपके घर में पारंपरिक आँगन नहीं है तो क्या हुआ,आप घर के बालकनी में और छत पर भी बालकनी गार्डनिंग और विंडो सील गार्डनिंग करके कई औषधीय पौधों को लगा सकते है।
प्रश्न 6:कपड़े का थैला इस्तेमाल करने से पर्यावरण को सीधा क्या फायदा होता है? ▼
उत्तर: पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार यदि एक व्यक्ति नियमित रूप से एक कपड़े के थैले का इस्तेमाल करता है,तो वह अपने जीवन काल में 6000 से अधिक प्लास्टिक की थैलियों को कचरें के ढेर और समुद्र में जाने से रोकता है।
प्रश्न 7:क्या दादी-नानी के नुस्खे आज की आधुनिक बीमारियों में भी कारगर है? ▼
उत्तर: ददाई-नानी के नुस्खे जैसे--हल्दी में दूध मिलाकर पीना,तुलसी का काढ़ा,नीम का लेप आदि आदि --मुख्य रूप से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करके हमें हमारी लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्याओं से निजात दिलाता है। यह प्राथमिक चिकित्सा और बचाव के लिए बेहतरीन है। हां गंभीर रोगों के लिए डाक्टर के पास जाना चाहिए।
प्रश्न 8:सीमित उपभोग का क्या मतलब है,क्या इसे कंजूसी कहा जा सकता है? ▼
उत्तर: नहीं!सीमित उपभोग का मतलब कंजूसी नहीं होता है। बल्कि यह एक 'समझदारी' होता है। इसका अर्थ है अपनी चाहत और जरूरत के बीच के अर्थ एवं अंतर को समझना।दिखावे के लिए चीजों को बटोरने के बजाय केवल उतना ही चीजों का उपयोग करना जो सार्थक हो और जीवन को तनवमुक्त बनाए।

ok
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