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| Climate Finance for Viksit Bharat 2047 |
प्रस्तावना
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य मे जलवायु परिवर्तन एक ऐसा मुद्दा है जो पूरे विश्व मे पर्यावरणविदों से लेकर सरकारों तक और आम नागरिकों से लेकर बुद्धिजीवियों तक सबको चिंतित और सोचने पर मजबूर कर दिया है।
और इसी चिंता एवं सोच ने जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए विभिन्न मुद्दों और सुझावों के साथ विभिन्न उपायों को भी मिलकर अपनाने का सहमतिपूर्ण रास्ता खोज निकाल है। और इसी कड़ी मे एक नया शब्द उभरकर निकला है "जलवायु वित्त"।
प्रसिद्ध संस्कृत साहित्य "सुभाषित रत्नाकर" की एक प्रसिद्ध उक्ति है की "पृथिव्याम् त्रिणी रत्नानि जलमन्नम सुभाषितम" जिसका अर्थ है की पृथ्वी पर तीन रत्न है -जल,अन्न और सुभाषित(अछे वचन)।
ये उक्ति जल और अन्न के महत्व को रेखांकित करता है। लेकिन वर्तमान वैश्विक जलवायु परिवर्तन के चलते इस अमूल्य जल और अन्न पर संकट के बदल छा गये है।
इसी प्रकार से इषोंपनिषद के अनुसार-
"प्रकृति अपने नियमों से संचालित होती है"।
दूसरे अर्थों मे जब प्रकृति के नियमों से बाहरी छेड़छाड़ और समिश्रण किया जाता है तो वह उस एकमात्र ग्रह पर विनाश का कारण बनता है जहा जीवन मौजूद है।
जलवायु वित्त किसे कहते है
संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाईमेट चेंज (UNFCC) के अनुसार जलवायु वित्त "जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए स्थानीय,राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक,निजी और अन्य वैकल्पिक स्रोतों से प्राप्त ऐसे वित्तपोषण से है जिसका तात्पर्य जलवायु परिवर्तन का शमन और अनुकूल कार्यो का समर्थन देने से है।"
जलवायु परिवर्तन से सम्बन्धित मुद्दों मे
- बढ़ता तापमान,
- वायु प्रदूषण,
- प्रजातियों का विलुप्त होना,
- महासागर का अम्लीकरण,
- प्लास्टिक कचरा संकट
इन्ट्रोडक्शन टू जलवायु वित्त के अनुसार "जलवायु वित्त वह धन है जो ग्रीन्हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने(शमन) और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति लचीलापन बनाने(अनुकूलन) के उदेश्य से शुरू की गई परियोजनाओ का समर्थन करता है।
- इस प्रकार से जलवायु वित्त की दो प्रमुख उपश्रेणिया है "शमन वित्त" और "अनुकूलन वित्त"।
- शमन वित्त वह निवेश है जिनमे उदेश्य होता है वैश्विक कार्बन का उत्सर्जन कम करना। जबकि
- अनुकूलन वित्त का उदेश्य जलवायु परिवर्तन के परिणामों का सामना करना है।
इन्ट्रोडक्शन टू जलवायु वित्त के अनुसार "पेरिश समझौता,क्योटो प्रोटोकाल और कॉनवेक्सन उन सभी पक्षों से जिनके पास अधिक वित्तीय साधन है यह अपेक्षा करता है की वे उन लोगों को वित्तीय सहायकता प्रदान करे जो अधिक संवेदनशील और कम सम्पन्न है।"
"पेरिस समझौते का अनुछेद 9 विकसित देशों के दायित्व की पुष्टि करता है और साथ मे अन्य पक्षों से स्वैक्षिक योगदान को प्रोत्साहन करता है।"
उपरोक्त परिभाषित कड़ियों के अनुरूप वित्तीय तंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जो जलवायु वित्त से संबंधित प्रवधानों को सुविधाजनक बनाने और क्योटो तथा पेरिस समझौतों के उदेश्यों को पूरा करने के लिए स्थापित की गयी है जो विकासशील देशो को वित्तीय संसाधन प्रदान करते है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु वित्त कोष
वैश्विक स्तर पर प्रदान की जानेवाली कुछ प्रसिद्ध नीतिया और कोष इस प्रकार से है --
- वैश्विक पर्यावरण सुविधा: इसे 1992 मे शुरू किया गया था जो कई पर्यावरणीय सम्मेलनों मे वित्तीय तंत्र के रूप मे परिचालन इकाई के रूप मे कार्य किया है।
- हरित जलवायु कोष: सन 2010 में कैनकन में आयोजित "कांफ्रेंस ऑफ़ द पार्टीज" द्वारा स्थापित यह दुनिया का सबसे बड़ा कोष बन गया है। यह 2011 मे यह दुनिया के वित्तीय तंत्र का एक परिचालन इकाई भी बन गया है। यह विकासशील देशों मे क्रांतिकारी जलवायु कार्रवाई मे तेजी लाने के लिए लचीला वित्तपोषण विकल्प और जलवायु निवेश ज्ञान के दृष्टिकोण का उपयोग करता है।
- विशेष जलवायु परिवर्तन कोष: विकासशील देशों के जलवायु अनुकूल कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए 2001 मे इस कोष को स्थापित किया गया था। इसका प्रबंधन वैश्विक पर्यावरण सुविधा द्वारा किया जाता है।
- अल्प विकसित देश कोष: क्योटो प्रोटोकाल के तहत वर्ष 2001 मे अल्प विकसित देशों के जलवायु अनुकूल कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए इसका स्थापना किया गया था। इसका प्रबंधन भी वैश्विक पर्यावरण सुविधा द्वारा किया जाता है।
- अनुकूलन कोष: अनुकूलन कोष एक अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्तपोषण प्रणाली है जिसे 2001 मे "संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कॉन्वेंसन ऑन क्लाईमेट चेंज" के क्योटो प्रोटोकाल के तहत बनाया गया था। यह कोष वर्ष 2007 से चालू हुआ जो विकासशील देशों मे विशिष्ट अनुकूलन परियोजनाओ और कार्यक्रमों को वित्तपोषण प्रदान करता है।
- हानी और क्षति प्रतिक्रिया कोष: वर्ष 2023 मे "कांफ्रेनेस ऑफ द पार्टीज 28" द्वारा स्थापित किया गया यह कोष विकासशील अर्थव्यवस्थों को सहायकता करता है। इसके हिस्से के रूप मे विश्व बैंक को इसके कोष को संचालित करने के लिए आमंत्रित किया गया था।
वित्त पर स्थायी समिति -
सम्मेलन के वित्तीय ढांचे से संबंधित कर्तव्यों को पूरा करने मे "कॉप" का समर्थन करने के लिए 2010 के "कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज 16" मे एक स्थायी वित्त समिति बनाई गई थी। इसका उदेश्य सम्मेलन के भीतर और बाहर जलवायु वित्तपोषण से जुड़े कर्ताओ और परियोजनाओ के बीच संबंधों को मजबूत करना और सहयोग को प्रोत्साहित करना था।
इसका उदेश्य द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सार्वजनिक और निजी साथ ही गैर पारंपरिक स्रोतों सहित सभी प्रकार के वित्तीय स्रोतों से जलवायु वित्त जुटाने और बढ़ाने की सुविधा प्रदान करना था।
जलवायु वित्तपोषण और विकसित भारत @2047 दृष्टिकोण -
भारत सरकार का लक्ष्य जिसे "विकसित भारत" के रूप मे जाना जाता है 2047 तक यानि अपनी स्वतंत्रता के 100 वी वर्षगांठ तक भारत को एक विकसित देश मे बदलना है। इस दृष्टिकोण मे सामाजिक उन्नति,आर्थिक विस्तार,पर्यावरणीय स्थिरता और सुशासन जैसे विषय शामिल है।
जब पर्यावरणीय स्थिरता का इतना महत्वपूर्ण स्थान विकसित भारत 2047 के लिए है तो जलवायु परिवर्तन और उसका वित्तपोषण का महत्व अपने आप बढ़ जाता है। और इस विकसित भारत की परिकल्पना को साकार देने के लिए भारत जलवायु वित्तपोषण के फाइनैन्स को बढ़ते जय रहा है। फिर भी निर्बाध कम-कार्बन संक्रमण के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं है जिससे इस कम के लिए निजी क्षेत्र के निवेश को जुटाना अनिवार्य हो गया है।
- भारत ने अपने 2030 के एनडीसी मे सुधार किया और कॉप 26 मे 2070 तक शून्य उत्सर्जन लक्ष्य घोषित किया है।
- साथ ही भारत ने अगले दस वर्षों मे विकसित देशों से जलवायु वित्तपोषण मे 1 ट्रिलियन डॉलर की मांग की है।
- अपने 2030 के जलवायु शमन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारत को 2.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च करने होंगे।
- वर्तमान मे पहले से ते किए गए अनुमानित वित्तपोषण का 25 प्रतिशत भारत द्वारा ट्रैक किए गए जलवायु निवेशों द्वारा पूरा किया जय सकता है।
- राष्ट्रीय अनुकूलन कोष को भारत ने वर्ष 2015 मे भारत के उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की लागत को पूरा करने के लिए स्थापित किया था जो जलवायु परिवर्तनों के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति संवेदनशील थे।
- अक्षय ऊर्जा परियोजनाओ के लिए प्राथमिकता क्षेत्र ऋण:-इसमे 35 करोड़ तक के बैंक ऋण पर लागू होगा जिसमे उधरकर्ताओ को पवन टरबाईन,माइक्रो हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट,सौर ऊर्जा संचालित जनरटेर,बायोमास आधारित बिजली आदि जैसे परियोजनाओ के लिए दिए जाते है।
ग्रीन डिपॉजिट और ग्रीन बॉन्ड जारी करना -
- ग्रीन डिपॉजिट : एक प्रकार का सावधि जमा है जहा धन को विशेष रूप से पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओ के वित्तपोषण के लिए निर्धारित किया जाता है। जबकि ग्रीन बॉन्ड एक संघटन द्वारा परियोजनाओ के वित्तपोषण या पुनर्वित्त के उदेश्य से जारी की गई ऋण प्रतिभूति है जो पर्यावरण और जलवायु मे सकारात्मक योगदान देती है।
- भारत का पहला ग्रीन बॉन्ड: यस बैंक द्वारा फरवरी 2015 मे 1000 करोड़ रुपये के दस वर्षीय निर्गम के रूप मे जारी किया गया जो लगभग दो बार ओवरसबस्क्राइब हुआ था। इसकी आय को पवन,सोलर और बायोमास जैसे अक्षय ऊर्जा परियोजनाओ मे की गई थी।
- यस बैंक अगस्त 2015 मे एक और 315 करोड़ रुपये के दस वर्षीय निर्गम के साथ इसका अनुगमन किया जिसको पूरी तरह से "अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम" द्वारा सब्सक्राईब किया गया था।
- सतत वित्त समूह:-भारतीय रिजर्व बैंक के भीतर सतत वित्त समूह की स्थापना मई 2021 मे जलवायु संबंधित वित्तीय जोखिम को संसोधित करने और सतत वित्त मे नियामक पहलों का नेतृत्व करने के लिए किया गया था।
- नेटवर्क फॉर ग्रीनिंग ऑफ़ फाइनेंसियल सिस्टम:-एनजीएफएस केन्द्रीय केन्द्रीय बैंकों और पर्यवेक्षकों के बीच एक संघ है जो महत्वपूर्ण सिफ़ारिसों को विकसित करने के लिए काम करता है। आरबीआई 23 अप्रैल 2021 को इस सिस्टम मे शामिल हो गया।
- जलवायु जोखिम सूचना प्रणाली: जलवायु परिवर्तन से जुड़ी डेटा और जोखिमों के आकलन के लिए रिजर्व बैंक ने जलवायु जोखिम सूचना प्रणाली का निर्माण किया।
- सावरेन ग्रीन बॉन्ड: ये ऐसी ऋण प्रतिभूतिया है जिसे केंद्र सरकार के द्वारा अक्षय ऊर्जा,टिकाऊ कृषि,अपशिष्ट प्रबंधन आदि सहित हरित पहलों के लिए धन आँवटन के लिए की गई है। इसे केन्द्रीय बजट 2022-2023 मे जारी किया गया था।
- जलवायु परिवर्तन वित्त इकाई: वर्ष 2011 मे स्थापित वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग के तहत आनेवाला यह संस्थान सभी जलवायु परिवर्तन वित्तपोषण मामलों पर नोडल बिन्दु के रूप मे कार्य करता है।
इस प्रकार से वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर किए गए सभी प्रयासों से यह कहा जा सकता है की जलवायु स्थितियों मे कुछ सुधार हुआ है लेकिन यह सागर मे एक बूँद के समान है। इसके लिए और अधिक प्रयास किए जाने की जरूरत है ताकि भारत के लिए विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों को पूरा किया जा सके।
निष्कर्ष
भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति हमेशा से सजग रहा है। वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के रूप मे जब जलवायु परिवर्तन की चिंताओ से पूरा विश्व जागरूक हुआ और इसके लिए प्रयास करना शुरू किया उससे पहले से ही।
यहाँ तक की पर्यावरण और जलवायु के प्रति सम्मान और इनका संरक्षण का भाव भारत की संस्कृति मे हजारों सालों से विद्यमान है और यह निरंतर चली आ रही है। चूंकि वर्तमान मे भारत विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों को लेकर चल रहा है। उसके लिए भारत ने सतत विकास का लक्ष्य रखा है।
केवल आर्थिक विकास ही नहीं बल्कि पर्यावरण जिम्मेदारियों के साथ विकास। इस क्रम मे बहुत सारी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। जिनमे सबसे बड़ी चुनौती जलवायु वित्त की है। लेकिन सरकार के द्वारा इसपर प्रयास सराहनीय है।
उम्मीद है भारत अपने विकास को रफ्तार देते हुए पर्यावरण आधारित तकनीक और संरचनात्मक ढांचा को विकसित करने मे सक्षम होगा और एक बेहतरीन जलवायु और पर्यावरणीय संरचना पूरे विश्व और अपने आने वाले भविष्य को प्रदान करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1. जलवायु वित्त क्या है?
उत्तर: जलवायु वित्त जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए और आगे जलवायु परिवर्तन न हो उसके लिए उपायों को अपनाने मे होने वाले खर्चों के प्रबंधन से है।
प्रश्न 2. जलवायु वित्त के दो मुख्य स्तम्भ कौन से है?
उत्तर: दो स्तम्भ है -शमन जिसमे ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करना और दूसरा अनुकूलन - जिसमे जलवायु परिवर्तनों के प्रभावों के साथ जीना सीखना।
प्रश्न 3. कोपेनहेगन समझौता जलवायु परिवर्तन से कैसे जुड़ा है?
उत्तर: 2009 के कोपेनहेगन समझौता मे विकसित देशों ने विकासशील देशों को वर्ष 2000 तक जलवायु कार्य के लिए प्रति वर्ष 100 बिलियन डॉलर की सहायता देने का वादा किया था।
प्रश्न 4. जलवायु वित्त के प्रमुख स्रोत क्या है?
उत्तर: इसके स्रोतों मे सार्वजनिक धन,निजी निवेश,द्विपक्षीय और बहुपक्षीय विकास बैंक शामिल है।
प्रश्न 5. भारत को अपनी जलवायु लक्ष्य को हासिल करने के लिए कितना धन राशि की आवश्यकता है?
उत्तर: भारत ने वर्ष 2030 तक राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की आवश्यकता बताई है।
प्रश्न 6. वर्तमान जलवायु वित्त मे क्या चुनौतिया है?
उत्तर: प्रमुख चुनौतियों मे विकसित देशों द्वारा वादे के मुताबिक धन न देना,ऋण आधारित वित्त की मात्रा अधिक होना,और अनुकूलन के लिए बहुत कम हिस्सा मिलना शामिल है।
