📝 लेख का संक्षेप (At a Glance)
- मुख्य विषय: खरीफ सीजन में लौकी, सेम, भटुआ, भिंडी और कद्दू की पारंपरिक खेती।
- देशी बीजों का फायदा: ₹0 की लागत, बंपर पैदावार, सालों-साल खुद का मुफ्त बीज तैयार करने की आजादी।
- स्पेशल तकनीक: बंपर उत्पादन के लिए 3G कटिंग और मचान विधि की पूरी जानकारी।
- खाद और सुरक्षा: 100% प्राकृतिक जीवामृत और नीम-अस्त्र बनाने का घरेलू तरीका।
- समय: जून - जुलाई (बुवाई के लिए सबसे उत्तम महीना)।
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| देशी सब्जियों-लौकी,सेम,भटुआ,कद्दू और भिंडी के खेती और देशी बीज संरक्षण |
📌खरीफ 2026 की पारंपरिक सब्जियों की खेती का जादू:
📑 Table of Contents
- ➤ प्रस्तावना
- ➤ देशी बीज बनाम हाइब्रिड:क्या है असली सच ?
- ➤ 1. देशी लौकी (Bottle Gourd) की उन्नत खेती गाइड
- ➤ 2. पारंपरिक सेम (Flat Beans/Hyacinth Beans) की खेती
- ➤ 3. औषधीय भटुआ या पेठा (Ash Gourd) की खेती
- ➤ 4. देशी भिंडी (Okra) की सदाबहार खेती
- ➤ 5. मीठे देशी कद्दू (Pumpkin-कुम्हड़ा) की खेती
- ➤ देशी बीजों के लिए जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक
- ➤ निष्कर्ष
- ➤ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रस्तावना (Introduction)
देश में खेती-बारी अच्छी होती जा रही है,फसलों और सब्जियों का बंपर उत्पादन बढ़ता जा रहा है और किसानों की मेहनत रंग लाती जा रही है। लेकिन!.. उनमें पारंपरिक फसलों जैसा 'स्वाद' एवं 'ताकत' धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। इतना ही नहीं,रासायनिक खादों,कीटनाशकों और हाइब्रिड बीजों ने हमारे खेतों पर कब्जा कर लिया है।
इसका ही नतीजा है-प्रत्येक साल बीजों पर भारी-भरकम खर्च होना और नई-नई बीमारियों का पैदा होना एवं उसपर भी खर्च होना।
इसलिए यदि आप इस बरसात के मौसम में बंपर पैदावार के साथ कम लागत में अमृत जैसा स्वाद भी पाना चाहते है,तो --'पारंपरिक' यानि 'देशी बीजों' (Heirloom/Open-Pollinated Deeds) को अपनाना बेहतरीन एवं दूरदर्शी फैसला साबित होगा।
इस लेख में हम मुख्य 5 परंपरिक भारतीय सब्जियों--लौकी,सेम,भटुआ,भिंडी और कद्दू के देशी बीजों की खुशबूदार खूबीयां,उनकी वैज्ञानिक खेती के तरीकों और उनके खुद के बीज तैयार करने की पूरी विधि को बारीकी से जानेंगे।
देशी बीज बनाम हाइब्रिड:क्या है असली सच ?
खेती शुरू करने से पहले यह समझना बहुत ही जरूरी है कि आखिर क्यों आज दुनियां भर के कृषि वैज्ञानिक और प्रगतिशील किसान 'दोबारा देशी बीजों' को सहेजने की वकालत कर रहे है। नीचे दी गई तालिका से आप इसकी बुनियादी अंतर को आसानी से समझ सकते है --
देशी बीजों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप इसके पके हुए फल से बीज को निकाल कर दोबारा अगले साल के लिए सुरक्षित रख सकते है। आपको हाइब्रिड बीजों जैसा बार-बार यानि हरेक साल बीजों को खरीदना नहीं पड़ता है।
आज के टॉपिक के अनुरूप इन पांचों देशी बीजों के कुछ खूबियों के बारे में जानकारी प्राप्त करते है। --
- लौकी (Bottle Gourd): बरसात के मौसम में देशी लौकी की बेल बहुत तेजी से फैलती है।
- स्वाद और कोमलता: ये हाइब्रिड के मुकाबले ज्यादा मुलायम एवं रसदार होती है और पकने के बाद भी इसमें एक प्राकृतिक मिठास होती है।
- कम खाद और मजबूर बेल: बिना रासायनिक खाद के इसकी बेल तेजी से फैलती है जो गोबर खाद और केंचुआ खाद में ही बेहतर फसल प्रदान कर देती है।
- तापमान सहने की क्षमता: बरसात के मौसम के तेज तापमान और धूप को यह आसानी से सह लेती है।
- ज्यादा दिनों तक पैदावार और बड़ा साइज: इसका साइज बड़ा से बड़ा हो सकता है जिसमें हाइब्रिड के 3-4 लौकी हो सकती है। साथ ही हाइब्रिड 4-5 बार फसल देने के बाद फलना बंद हो जाता है जबकि देशी लौकी तबतक फलती रहती है जब तक सर्दी का मौसम न बीत जाए--यहां तक की गर्मियों के मौसम तक ये फलती रहती है।
- देशी सेम की विशेषताएं:
- लंबे समय तक पैदावार: हाइब्रिड सेम के पौधे जहां जल्दी ही खत्म हो जाते है,वही देशी सेम की बेल पूरे सीजन यहां तक की ठंड के अंत तक फल देती रहती है।
- बेहतरीन सोंधा स्वाद: देशी सेम में एक प्राकृतिक सोंधा स्वाद और महक होती है। इसकी फलियों में रेशे बहुत अधिक होते है जो इसे विशेष बनाते है और स्वास्थ्य के लिए भी ठीक होते है।
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण: यह दलहन परिवार का पौधा है जो हवा से नाइट्रोजन इकठ्ठा करके मिट्टी को प्रदान करती है। इसमें भी रासायनिक खाद की जरूरत नहीं पड़ती है।
- देशी भटुआ या पेठा:
- अद्भुत भंडारण क्षमता: इसके फल पूरी तरह से पकने के बाद उसके ऊपर मोम जैसी सफेद परत बैठ जाती है जो इसको बिना फ्रिज के भी 6-8 महीनों तक सुरक्षित रखती है।
- औषधीय गुण: आयुर्वेद में भटुआ को --'कूष्माण्ड' कहा जाता है जो पेट की समस्याओं को दूर कर देती है एवं ठंडक प्रदान करती है। इसका मिठाई और जूस बनता है।
- कीटों से सुरक्षा: इसकी पत्तियों और तनों पर बारीक काँटेदार रेशा होता है जो इसको जंगली जानवर एवं कई तरह की हानिकारक कीटों से सुरक्षा प्रदान करती है।
- देशी भिंडी की विशेषताएं:
- पौधों की लंबी उम्र: जहां हाइब्रिड जल्दी ही खत्म हो जाते है,वही देशी भिंडी बहुत लंबी होती जाती है और यह 6-7 फिट ऊंचे झड़ीदार पौधों की तरह बड़ी हो सकती है। इसलिए ये लंबे समय तक फल देती रहती है और ठंड के अंत तक फल प्रदान करती रहती है।
- कम लासा और बेहतरीन स्वाद: देशी भिंडी काटने और पकाने में कम लसेदार होती है और अंदर से बहुत नरम रहती है एवं इसके बीज जल्दी कड़े नहीं होते है।
- लगातार तुड़ाई: इसके पौधों में लगातार नई नई शाखाएं निकलती रहती है और उनमें लगातार फल भी आते रहते है अतः इसकी आप लगातार तुड़ाई करते रहते है।
- देशी कद्दू की विशेषताएं:
- गहरा रंग एवं मीठा स्वाद: ये पकने के बाद गहरा गुदा नारंगी या चटक पीला रंग का होता है। इसमें प्राकृतिक शर्करा और कैरोटीन हाइब्रिड की तुलना में ज्यादा पाई जाती है।
- मौसम के प्रति लचीलापन: इसमें बरसात की मौसम में होने वाले फंगस और जड़ सड़न नहीं होती है और अन्य बीमारियों के प्रति भी प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधी होती है। किसी भी कीटनाशक का जरूरत नहीं पड़ता है।
- मल्टीपर्पज इस्तेमाल: इसके कच्चे फल की सब्जी बनती है,पके फल का हलवा या पेठा बनता है,एवं इसके पत्तों व फूलों के 'पकौड़े' भी चाव से खाए जाते है।
➢ये देशी बीज आपको कहां मिलेंगे ?
- सरकारी संस्थान सबसे भरोसेमंद: आप अपने नजदीकी-'कृषि विज्ञान केंद्र'(KVK) या 'राजकीय बीज भंडार' से संपर्क कर सकते है। वहा भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के द्वारा तैयार की गई देशी किस्म के बीज मिल जाएंगे।
- स्थानीय बीज भंडार: आप अपने इलाके की नामी और पुरानी बीज भंडार पर जाकर सीधे कहें की मुझे --देशी बीज ही चाहिए।
- ऑनलाइन जैविक बीज स्टोर: आप घर बैठे शुद्ध देशी बीज ---'Beelwala' या 'Sahaj Seeds' और 'Organic Bazar' या 'Ugaoo' जैसी वेबसाइट से ऑर्डर करके मांगा सकते है।
(देशी बीजों के बारे मे अधिक विस्तृत जानकारी और इसके महत्व के बारे में जानकारी के लिए जरूर पढे --भारत की "बीज विरासत":NBPGR और कम्युनिटी सीड बैंक के माध्यम से सुरक्षित होता कृषि का भविष्य।)
➢एक छोटा सा सुझाव:
- देशी बीज खरीदते समय पैकेट पर "Open-Pollinated" (OP) या "Non-Hybrid" लिखा जरूर देखें। आप इन्हें सरकारी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), स्थानीय प्रगतिशील किसानों या 'Seedvanam', 'Sahaja Seeds' और 'Beejwala' जैसी भरोसेमंद जैविक बीज वेबसाइटों से ऑनलाइन भी मंगवा सकते हैं।
1. देशी लौकी (Bottle Gourd) की उन्नत खेती गाइड
लौकी (घिया) भारतीय रसोई की एक प्रमुख और बेहद लोकप्रिय सब्जी है। इसके गुणों से सभी परिचित है और इसकी सब्जी भी कई तरह की बनाई जाती है। और सब्जी ही क्यों इसका अन्य भी बहुत सारे व्यंजन बनाए जाते है --जैसे--रायता,बिना मसाला वाला सब्जी,खीर और पकौड़ी आदि।
इसके जूस को भी स्वास्थ्य की दृष्टि से पिया जाता है और कई सारी कंपनियां तो अब इसका जूस बनाकर बेचने भी लगी है। लेकिन इसकी हाइब्रिड किस्मों से उत्पादित लौकी भले ही देखने में अच्छी और चमकदार लगे देशी लौकी जैसा रसदार,मीठा स्वाद और स्वास्थ्य प्रद नहीं होती है।
अतः यदि लौकी खाना है,तो केवल देशी लौकी को ही खाना चाहिए अन्यथा नहीं खाना ज्यादा अच्छा है।
1. उन्नत देशी एवं ओपन पॉलिनेटेड किस्में:
इसके इन मुख्य देशी बीज किस्मों का चयन करना चाहिए --
- पूसा समर प्रोलिफिक लॉंग: यह 'भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान' द्वारा विकसित एक बेहतरीन 'ओपन-पॉलिनेटेड' किस्म है जिसके फल लंबे,पतले और हल्के हरे रंग के होते है।
- पूसा समर-प्रोलिफिक राउन्ड: यदि आप गोल लौकी को पसंद करते है,तो यह किस्म सबसे उत्तम है जो छतों,गमलों या ग्रो बॉक्स में भी उगाने के लिए बेहतर होती है।
- बनारसी लंबी लौकी: यह उत्तर भारत की एक मशहूर भारतीय देशी लौकी है जो बहुत ही मजबूत बेल वाली लेकिन उतनी ही कोमल एवं रसिलें फल वाली होती है।
2. जलवायु और मिट्टी की तैयारी:
लौकी के लिए गर्म और आर्द जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है,जो बरसात यानि खरीफ के मौसम में प्राकृतिक रूप से मिलती है।
- मिट्टी का चयन: जलभराव वाली मिट्टी को छोड़कर,अच्छे जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोत्तम होती है। मिट्टी का 'PH 6 से 7' होनी चाहिए।
- खेत की तैयारी: यदि आप बड़े पैमाने पर खेत लगा रहे है,तो आप 2-3 बार अच्छी जुताई करके पट्टा चला देनी चाहिए। यदि घर के पीछे या बगीचे में लगा रहे है,तो 2x2 फिट के गढ़े तैयार करें और उसमें 50% मिट्टी के साथ 50% गोबर की खाद या केंचुआ खाद को डालकर मिला दे।
3. बीजोपचार:रोगों से सुरक्षा का कवच:
सीधे बोने से पहले बीजोपचार जरूर कर ले। इसके लिए बीजों को 4-5 घंटे तक ताजे देशी गाय के मूत्र में भिंगोकर रखे या थोड़े से पानी में हल्दी एवं हिंग मिलकर बीजों को भिंगो कर रख दे।इसके बाद इसको छाया में सुखाकर तब बुआई करे।
4. बुआई की विधि एवं पौधों की दूरी:
बरसात के मौसम में कतार से कतार की दूरी 2.5 से 3 मीटर और पौधों से पौधों के बीच की दूरी 60 से 75 सेमी रखनी चाहिए। प्रत्येक गड्ढे में 1 इंच की गहराई पर 2-3 बीजों को बोए। जब पौधे थोड़े बड़े हो जाए तो उसमें से केवल एक या दो स्वास्थ्य पौधों को रखे एवं बाकी को हटा दे।
5. मचान विधि-बरसात की संजीवनी:
बरसात के मौसम में कभी भी लौकी की बेल को जमीन पर नहीं फैलाना चाहिए। जमीन में नमी होने के करण पत्तों और तनों में फंगस लग सकती है और फसल खराब हो सकती है।
- बांस की लकड़ी और प्लास्टिक या लोहे के पतले तारों की सहायता से जमीन से 6 फिट ऊपर मचान बनानी चाहिए।
- जब बेल 2 फीट की हो जाए तब उसे सूती धागों की मदद से उस मचान पर चढ़ा देनी चाहिए। इससे फल हवा में लटकता रहता है और बिल्कुल सीधा,स्वास्थ्य एवं दाग धब्बों से मुक्त रहता है।
6. ज्यादा फल पाने का सीक्रेट-3G कटिंग तकनीक:
देशी लौकी में शुरुआत में केवल नर फूल ही आते है,जिनमें फल नहीं बनते है। इसलिए मादा फूल पाने के लिए एवं बेल को और भी घना बनाने के लिए --3G कटिंग सबसे असरदार तरीका होता है ---
- 1G कटिंग: मुख्य बेल जब लगभग 7-8 फिट लंबी हो जाए और मचान पर पहुच जाए तो उसके सबसे आगे वाली ऊपरी हिस्से को 2 इंच तक काट दे।
- 2G कटिंग: इसके बाद मुख्य तने से कई नई शाखाएं निकलेगी और जब ये शाखाएं भी 2-3 फिट की हो जाए तो इसके सबसे आगे के ऊपरी हिस्से को काट देनी चाहिए।
- 3G परिणाम: अब इन कटी हुई शाखाओं से जो तीसरी पीढ़ी की बेलें निकलेगी उनमें लगभग 90% मादा फूल आएगी और आपकी लौकी की बेल लौकी से पट जाएगी।
7. अगले साल के लिए घर पर बीज कैसे बचाएं:
लौकी का देशी बीज को तैयार करना बहुत ही आसान है। सीजन के मध्य में जब आपकी लौकी की बेल सबसे ज्यादा स्वास्थ्य हो उसी समय एक मजबूत,स्वास्थ्य और लंबी मोटी रोगमुक्त लौकी को चयन करके छोड़ देनी चाहिए। और उसमें कोई निशान जैसे लाल कपड़ा आदि को बांध देनी चाहिए ताकि गलती से भी उसको तोड़ा न जाए।
- उस लौकी को सब्जी के लिए न तोड़े और बेल पर ही रहने दे।
- जब यह लौकी पककर पीली फिर सुख कर भूरी हो जाए और हिलाने पर अंदर से बीजों की खड़खड़ाने की आवाज आए तब उसे तोड़ देनी चाहिए।
- अब उसको फाड़कर बीजों को अंदर से बाहर निकल ले।
- इन्हे 2 दिनों तक धूप में सुखाकर फिर नीम के पाउडर या राख में लपेटकर किसी सीसे या कांच की एयर टाइट डिब्बे या जार में पैक करके रख ले।
अब ये बीज आप अगले साल उपयोग में ले सकते है या किसी को दे भी सकते है और आप चाहे तो मार्केट में बेच भी सकते है।
2. पारंपरिक सेम (Flat Beans/Hyacinth Beans) की खेती
आज भी ग्रामीण इलाकों में सेम की बेल घरों की छतों, छप्पर या बाड़ों पर चढ़ी हुई देखने को मिल जाती है।ये पारंपरिक सेम होती है और जून जुलाई में उगती है एवं सर्दियों के शुरूआत में ही फलों से लद जाती है।
ये प्रोटीन से भरपूर होती है एवं प्राकृतिक रूप से धरती को नाइट्रोजन प्रदान करती है।ये फाइबर से भी भरपूर होती है और पूरी तरह से जैविक होती है।कोई खास रसायनिक खाद की जरूरत उत्पादन के लिए नहीं पड़ती है।
1 उन्नत देशी किस्में:
इसकी मुख्य उन्नत देशी बीज है
- पूसा सेम 2, और पूसा सेम 3: यह राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत देशी सेम के बीज है।इसकी फलियां हरी, चपटी और अत्यधिक कोमल होती है।
- काशी हरित: यह भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) द्वारा विकसित किस्म उत्तर एवं मध्य भारत के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
- स्थानीय सफेद बैंगनी सेम: ये सेम की किस्म स्थानीय स्तर पर मिलती है जो सफेद होती है और इसका किनारा बैंगनी रंग का होता है।इसका स्वाद बहुत ही लाजवाब होता है।
2. भूमि की तैयारी और इसका जादुई गुण:
सेम को किसी भी सामान्य मिट्टी में उगाया जा सकता है लेकिन बलुई दोमट मिट्टी ज्यादा अच्छी रहती है।
- मिट्टी सुधारक विशेषता: सेम लैम्युमिनेसी यानी दलहन परिवार का पौधा है जो राइजोबियम बैक्टीरिया के माध्यम से हवा से ही नाइट्रोजन को सोखकर जमीन को प्रदान करती है।इस तरह से वहां के मिट्टी को उपजाऊ बना देती है और वहां की मिट्टी में यूरिया की जरूरत नहीं पड़ती है।
3. बुआई की विधि एवं मचान का सहारा:
इसकी बुआई की बात की जाए तो
- दूरी: कतार की दूरी 1.5 से 2 मीटर तक रखनी चाहिए और पौधों से पौधों के बीच की दूरी 50 से 60 मीटर रखनी चाहिए।बीजों को 1 से 1.5 इंच गहराई में बोना चाहिए।
- सहारा देना: इसकी बेल भारी, झाड़ीदार और लंबी बढ़ती है अतः जब पौधा 1 फिट से अधिक का हो जाए तब मचान बनाकर सुतली के धागों और बास एवं लकड़ी की मदद से मचान पर चढ़ा देनी चाहिए।
4. बीज संग्रहण की विधि:
जब ठंड के मौसम के अंत में सेम के बेल पर फलियां सूखकर पीली सफेद होने लगे तब उन्हें तोड़कर रख ले।फिर फलियों में से बीजों को निकालकर छाया में अच्छी तरह से सूखा ले और इसे सुरक्षित रूप से पैक करके डब्बा में रख दे। यह अगले साल बोने के काम में आएगी।
3. औषधीय भटुआ या पेठा (Ash Gourd) की खेती
भटुआ जिसे सफेद कद्दू या भूरा कुम्हड़ा और 'ऐस-गार्ड' भी कहा जाता है पोषक तत्वों का खजाना होता है। आयुर्वेद में इसकी बहुत सारी खूबियां बताई गई है। इसके देशी फलों को घर के किसी भी कोने में कैसे भी रख दीजिए ये खराब नहीं होती है।
1. उन्नत देशी किस्में:
इसकी उन्नत देशी किस्में है --
- काशी धवल: इसके फल माध्यम से बड़े आकार के और बेलनकार होते है जिसमें गूदों की मात्रा अधिक होती है।
- पूसा उज्ज्वल: पेठा मिठाई बनाने और जूस निकालने के लिए यह देश की सबसे लोकप्रिय देशी किस्म है।
2. जलवायु,बुआई और 'मदर अर्थ' फार्मूला:
भटुआ को गर्म और माध्यम बारिश वाले मौसम की जरूरत होती है और जून जुलाई के महीनों में इसे सीधे गड्ढे में बोया जाता है।
- गड्ढों का निर्माण: इसके लिए, 2x2 फिट के थाले बनाए और इसमें गोबर की खाद के साथ लकड़ी की राख जरूर मिलाए जिसका पोटैशियम भटुआ के छिलकों को सख्त और मजबूत बनाता है।
- बीज बोना: प्रति थाल 3-4 बीजों को बोना चाहिए और अंकुरण के बाद केवल दो बीजों को ही बढ़ने देनी चाहिए।
3. छिलके का राज और फल तुड़ाई:
देशी भटुआ की सबसे बड़ी विशेषता इसका फल पकने का संकेत होता है। जब फल पूरी तरह से पक जाता है,तो उसके हरे छिलके के ऊपर एक घने सफेद मोम की परत चढ़ कर उभर जाती है।
- जब यह सफेद परत पूरी तरह गाढ़ी हो जाए और फल के जड़ का डंठल सूखने लगे तब इसे तोड़ लेनी चाहिए।
- विशेषता: इस प्राकृतिक मोम की परत के करण इसके अंदर की नमी बाहर नहीं निकलने पाती है और बाहर के बैक्टीरियां भी अंदर नहीं आ पाते है। इसी करण देशी भटुआ बिना फ्रिज के भी 6-8 महीनों तक बिल्कुल ताजी बनी रहती है।
4. बीज सहेजने का तरीका:
पके हुए भटुओं को बीच से काटें और बीजों के ऊपर लगे हुए चिपचिपे गूदे को निकाल कर साफ करके इसे पानी से धोकर अच्छे से धूप में 3-4 दिनों तक सूखा लीजिए और अगले साल उपयोग के लिए सुरक्षित रख दीजिए।
4. देशी भिंडी (Okra) की सदाबहार खेती
भिंडी --देशी भिंडी स्वाद,कोमलता और लंबे समय तक फल प्रदान करने वाली होती है। बरसात के दिनों की देशी भिंडी लंबी लंबी झाड़ियों के समान हो जाती है,लेकिन खूब फल प्रदान करती है। इसके किस्मों के बारे में देखते है --
1. उन्नत देशी किस्में:
- अर्का-अनामिका: यह 'भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) द्वारा विकसित एक बहुत ही लोकप्रिय देशी भिंडी की किस्म है। यह बरसात में होने वाले पीले मोजेक वायरस के प्रति भी सहनशील होती है।
- पूसा ए-4: इसके फल आकर्षक हरे,कम लसदार और पांच धारियों वाले होते है।
2. मिट्टी और बुआई का सटीक तरीका:
भिंडी के लिए जल-निकासी का बहुत अच्छा होना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि जड़ों में पानी जमा होने से पौधे पीला होकर सड़ने लगते है।
- बुआई की दूरी: खरीफ सीजन में देशी भिंडी ज्यादा लंबा और झाड़ीनुमा होता है अतः इसलिए कतार से कतार की दूरी 60 सेमी और पौधों से पौधों की दूरी 30 सेमी होती है।
- मेड़ विधि: बरसात में भिंडी को हमेशा मेड़ बनाकर उसके ऊपर बोना चाहिए। इससे जरूरत से ज्यादा पानी नालियों से बाहर निकल जाता है और पौधें सड़ने से बच जाती है।
3. देशी भिंडी की अनूठी खूबियां:
- कम लस होना: देशी भिंडी को काटते समय या पकाते समय इसमें चिपचिपाहट बहुत कम होता है। जिससे सब्जी खिली खिली बनी रहती है।
- लगातार फुटाव: इसके मुख्य तनें को ऊपर से थोड़ा काट दिया जाए तो ये नीचे से नई शाखाएं निकलते रहता है और नवंबर दिसंबर तक फल प्रदान करता रहता है।
4. किट प्रबंधन:नीम का अचूक उपाय:
बरसात के दिनों में भिंडी पर रस चूसने वाले कीड़ों,और फल छेदक का जबरदस्त हमला होता है।
- नीम के तेल: इससे बचाव के लिए हर 10 दिनों पर 'नीम तेल' 5 एमएल/प्रति लीटर में थोड़ा शोप मिलाकर शाम के समय में पौधों पर छिड़काव करे। यह पूरी तरह से जैविक है।
- जैविक कीटनाशक: घर पर ही --देशी गाय के मूत्र में हरा मिर्च,धतूरा,मदार नीम के पत्तों और लहसुन को पीसकर मिलाकर आग पर पकाएं और जब आधी से अधिक जलकर रह जाए तब उसे ठंडा करके छान ले और पानी मिलकर छिड़काव कर दे। बहुत काम करती है और पूरी तरह से जैविक भी है।
5. खुद का बीज कैसे बनाएं:
यह भी बिल्कुल आसान है। फसल के अंतिम चरण में सबसे स्वास्थ्य पौधों की पहली 2-3 भिंडियों को पौधों पर ही छोड़ दे और जब वे पूरी तरह से सुख कर भूरी हो जाए एवं फटने लगे तब उन्हे तोड़ ले। अब उसका बीज निकल कर सुखाकर अच्छे से सुरक्षित अगले साल के लिए रख ले।
5. मीठे देशी कद्दू (Pumpkin-कुम्हड़ा) की खेती
भारतीय संस्कृति और पारंपरिक खान-पान में कोंहड़ा यानि कद्दू का अपना एक विशेष स्थान प्राप्त है। चाहे 'छठ पूजा' का पावन पर्व हो या कोई मांगलिक उत्सव या भंडारा,बिना कद्दू के मीठे सब्जी के बिना हर आयोजन अधूरी ही रह जाती है।
हाइब्रिड कद्दू इस मामले में बेकार साबित हो जाते है। इसके लिए देशी कद्दू ही चाहिए होता है। साथ ही इसके फूलों के पकौड़े भी बहुत ही मजेदार होते है।
1. कद्दू की उन्नत देशी किस्में:
- अर्का-चंदन: भारतीय बागवानी संस्थान द्वारा विकसित यह देशी किस्म कस्तूरी जैसी मिट्ठी खुशबू और विटामिन A की भरपूर मात्रा से युक्त होती है।
- पूसा विश्वास और पूसा विकास: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की ये दोनों ही किस्में खरीफ के मौसम के लिए अत्यंत अनुकूल होती है। इसके फल गोल चपटे होते है और बेल खूब फल प्रदान करती है।
2. गड्ढे तैयार करने की वैज्ञानिक विधि:
कद्दू के बेल बहुत भारी होती है और इसके फल भी 5-10 किलो या उससे भी अधिक की होती है। इसलिए इसके पौधों को शुरुआती दौर में ही भारी पोषण की जरूरत होती है।
- गड्ढों का आकार: बुआई के लिए 2.5 x 2.5 फिट चौड़े और 1.5 फिट गहरें गड्ढे को खोदकर तैयार कर ले।
- मिट्टी का मिश्रण: गड्ढे की नकली गई मिट्टी में 15-20 किलोग्राम गोबर की खाद,2 किलोग्राम केंचुआ खाद और 250 ग्राम नीम की खली को मिला दे।
3. बुआई और बेल का फैलाव:
- दूरी: चूंकि इसकी बेलें काफी दूर तक फैलती है अतः इसकी दो गड्ढों के बीच की दूरी 4-6 फिट तक की होनी चाहिए।
- बुआई: प्रत्येक गड्ढे में 1 इंच की गहराई में 4-5 बीजों को बोए और जमनें के बाद उसमें से केवल दो बीजों को बढ़ने दे और बाकी दो को नष्ट कर दे।
- मचान,छत या जमीन: कद्दू के फलों को मचान,छत या जमीन पर भी उगाया जा सकता है। यदि जमीन पर फले तो फलों के नीचे सुखी घास या पुआल बिछा देनी चाहिए ताकि गीली मिट्टी के संपर्क में न आने पाए।
4. पके फल की पहचान और बीज को सहेजना:
कच्चे कद्दू का रंग हरा होता है और जैसे जैसे ये पकने लगता है इसका रंग पीला और गहरा मटमैला एवं भूरा नारंगी रंग का होने लगता है।
- पकने का पहचान: जब इसका रंग पीला नारंगी हो जाए और फल के डंठल सूखा होने लगे तब ये पक चुका होता है। अब इसका फल को तोड़कर 5-6 महीनों तक आसानी से घर में रखा जा सकता है।
- बीज संग्रह: पूर्ण रूप से पके कद्दू को काटने के बाद अंदर से बीजों को बाहर निकल कर रख ले। इसे धूप में 3-4 दिनों तक सुखाकर सुरक्षित रख ले।
देशी बीजों के लिए जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक
देशी बीजों की असली ताकत तब होती है जब उसकी पैदावार देशी और पूर्ण रूप से जैविक माहौल और खाद पानी से हो। इसके लिए नीचे दो सबसे आसान और असरदार खाद एवं कीटनाशक बनाने की विधि दी गई है जिन्हे जरूर तैयार कर ले --
1. जीवामृत-पौधों के लिए टॉनिक:
यह मिश्रण पौधों के विकास को तेज रफ्तार प्रदान करता है और मिट्टी के मित्र केंचुओं को भी सक्रिय कर देता है --
- सामग्री: आप 10 किलो देशी गाय का गोबर,5-10 लीटर गोमूत्र,1 किलो पुराना गुड़,1 किलो किसी भी दाल का बेसन और 200 ग्राम पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे का मिट्टी।
- बनाने की विधि: सभी सामग्रियों को 200 लीटर के ड्रम में पानी में अच्छी तरह से मिश्रित कर के मिला ले। इसे 5-7 दिनों तक छाव में रखे और रोज लकड़ी की डंडे से मिलाते रहे। अब आपका जीवामृत तैयार है इसे हर 15 दिनों में अपने फसलों को दे।
2. नीम-अस्त्र-कीटों का काल:
बरसात के दिनों में बेल वाली फसलों पर पतियों खाने वाले कीड़े,लाल भृंग और रस चूसक कीटों का हमला होते रहता है। इससे बचने के लिए रासायनिक जहर की जगह इसे बनाए --
- बनाने की विधि: 10 लीटर पानी में 5 किलो नीम की पत्तियों को कूटकर डाले और इसमें 2 लीटर गोमूत्र,500 ग्राम गाय का गोबर को मिला दे। इस मिश्रण को 48 घंटे तक सड़ने दे और फिर कपड़े से छान लीजिए।
- प्रयोग: इस 10 लीटर अर्क को, 100 लीटर पानी में मिलाकर फसलों पर स्प्रे कर दे। यह सभी प्रकार के हानिकारक फंगस और कीड़ों को दूर भगा देता है।
(जीवामृत एवं नीमास्त्र बनाने की, विस्तृत विधि और अधिक विस्तार से जानकारी के लिए जरूर पढे--Zero Budget Natural Farming : क्या सच में 1 गाय से 30 एकड़ खेती संभव है ? जानिए पूरा सच)
निष्कर्ष (Conclusion)
खरीफ 2026 किसानों के लिए अपनी पारंपरिक खेती की तरफ लौटने का सुनहरा मौका है क्योंकि यह समय की मांग है कि अब लोग अपनी देशी किस्म की फसलों और खासकर सब्जियों को प्राथमिकता देने लगे है। क्योंकि ये सभी हमारी भारतीय जलवायु और संस्कृति के साथ सदियों से जुड़ी हुई अनुकूलित और ढली हुई है, जो हमे हमेशा लाभ ही पहुचाएगी।
यही रास्ता भी है महंगे हाइब्रिड बीजों से बचने का और महंगे उर्वरक एवं कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाले खर्च के साथ स्वास्थ्य नुकसान से बी बचाव का। अतः हम आशा करते है कि आप जरूर इन पांचों मे से कोई न कोई एक देशी सब्जियों का खेती जरूर करेंगे।
यदि इससे संबंधित और भी कुछ विशेष जानकारी प्राप्त करनी हो तो बिना किसी संकोच के ही आप कमेन्ट बॉक्स में जरूर लिख कर बताए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:क्या, देशी बीजों में हाइब्रिड के मुकाबले बहुत कम पैदावार होती है? ▼
उत्तर:शुरुआती एक दो तुड़ाई में भले ही हाइब्रिड आगे दिखे लेकिन उसके बाद पूरे सीजन के कुल पैदावार को देसखे तो देशी बीज हाइब्रिड की तुलना मे बराबर या उससे अधिक ही पैदावार प्रदान करते है कम नहीं करते है।
प्रश्न 2: क्या हम इन बीजों को गमलों या होम गार्डन में उगा सकते है? ▼
उत्तर: हां!भिंडी को छोड़कर बाकी चारों बेल वाली फासले है। आप इसहे कम से कम 18x 18 या 24 x24 के ग्रो बॉक्स में अच्छी जैविक मिट्टी भरकर और मचान का सहारा देकर अपने छत पर उग सकते है।
प्रश्न 3:शुद्ध और प्रमाणित देशी बीज कहां से खरीदे जा सकते है? ▼
उत्तर: संबसे बेहतर और सस्ता आपके जिले के कृषि विज्ञान केंद्र या सरकारी बीज भंडार है जहा से आप खरीद सकते है। इसके अलावा आप ऑनलाइन जैविक बीज कंपनियों जैसे--Sahaja Seeds, Beejwala या Organic Bazar की आधिकारिक वेबसाइट से ऑनलाइन भी मंगा सकते हैं।
प्रश्न 4:खरीफ 2026 मे लौकी,सेम,भटुआ,कद्दू और भिंडी की बुआई का सबसे सही समय कब हो सकता है? ▼
उत्तर:इन फसलों की बुआई सामान्यतया जून से जुलाई के बीच मानसून की पहली बारिश के बाद करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। समय पर बुआई करने से अंकुरण अच्छा होता है और फसल अच्छी पैदावार देती है।
प्रश्न 5:क्या किसान अपने खेत से देशी बीज तैयार कर सकते है? ▼
उत्तर:हां! किसान स्वास्थ्य और अच्छे से पके हुए पौधे में से पके फलों को छाँटकर रख दे। और जब वो पूरी तरह से पककर टियर हो जाए उसे तोड़कर फल से बीजों को निकल कर उसे 3-4 दिनों तक अच्छी तरह से सूखा कर सुरक्षित रख ले। अब आपका बीज तैयार है अगले साल बीओने और फसल देने के लिए।
प्रश्न 6:खरीफ 2026 में इन पारंपरिक सब्जी की खेती को किसानों के लिए लाभदायक क्यों माना जा रहा है? ▼
उत्तर: लौकी,सेम,भटुआ,कद्दू और भिंडी की मांग शहरों एवं गावों दोनों जगह सामान्य रूप से होती है। देशी बीजों की कम लागत, बढ़ती जैविक उत्पादों की मांग, तथा स्थानीय बाजारों में अच्छे दाम मिलने के कारण ये फसलें खरीफ 2026 में किसानों के लिए आय बढ़ाने का अच्छा अवसर प्रदान कर सकती हैं।
प्रश्न 7:भटुआ को खरीफ फसल मे शामिल करने के क्या लाभ है? ▼
उत्तर: भटुआ पोषक तत्वों से भरपूर हरी सब्जी है। यह कम लागत में उगाई जय सकती है और जैविक बाजार की बढ़ती मांग में इसकी भी मांग बढ़ती जा रही है। साथ ही इसका उपयोग पेठा उद्योग में होने के करण और मांगलिक पूजा पाठ में भी होने के करण मांग बढ़ती जा रही है जो किसानों के लिए लाभदायक सौदा साबित हो सकती है।
प्रश्न 8:देशी बीजों के मुख्य लाभ क्या है? ▼
उत्तर: देशी बीजों के मुख्य लाभ है--स्थानीय जलवायु के प्रति अनुकूलित होना,रोगों एवं कीटों के प्रति बेहद सनशील,कम लागत में खेती संभव,अगले वर्ष के लिए बीज सुरक्षित किया जा सकता है,स्वाद एवं पोषण अधिक मिलता है,जैविक खेती के लिए उपयुक्त और सूखा एवं अधिक वर्ष के प्रति सनशील होता है।
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