📌 संक्षेप में (Quick Summary)
- मुख्य विषय: खरीफ सीजन 2026 में किसानों की आमदनी बढ़ाने वाली 5 सबसे मुनाफेदार फसलें और उनकी खेती के गुप्त नियम।
- टॉप 5 फसलें: बासमती धान, हाइब्रिड मक्का, अरहर दाल, सोयाबीन, और प्रीमियम तीखी मिर्च (गुंटूर/तेजा)।
- सफलता की 3 मुख्य बातें: जलभराव से बचाव के लिए उन्नत बेड (Raised Bed) और प्लास्टिक मल्चिंग का प्रयोग।
- रस चूसक कीड़ों से बचाव के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) और स्टिकी ट्रैप। पारंपरिक मंडियों के बजाय e-NAM पोर्टल के जरिए सीधे सही बाजार भाव पर बिक्री।
- अपेक्षित लाभ: आधुनिक ड्रिप और वैज्ञानिक प्रबंधन से मिर्च जैसी फसलों में प्रति एकड़ ₹1.5 लाख से ₹3 लाख तक का शुद्ध मुनाफा संभव है।
![]() |
| इस खरीफ सीजन में करें--बासमती चावल,मक्का,सोयाबीन,अरहर दाल और तीखी मिर्च की खेती |
📑 Table of Contents
- ➤ प्रस्तावना(Indroduction)
- ➤ 1. बासमती धान (Premium Basmati Rice): खुशबू भी और बंपर मुनाफा भी
- ➤ 2. हाइब्रिड मक्का (Hybrid Maize): औद्योगिक मांग से चमकेगी किस्मतष्य
- ➤ 3. अरहर दाल (Pigeon Pea): कम पानी में सोने जैसी कमाई
- ➤ 4. सोयाबीन (Soybean) पीला सोना जो बदल देगा किस्मत
- ➤ 5.लाल तीखी मिर्च (Premium Chilli/Guntur Chilli)
- ➤ खरीफ की टॉप फसलों का तुलनात्मक चार्ट
- ➤ आधुनिक तकनीक: जो मुनाफे को कर देगी दोगुना
- ➤ सरकारी योजनाएं:जिनका उठाएं पूरा लाभ
- ➤ निष्कर्ष
- ➤ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQ
प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय कृषि में, खरीफ के सीजन का अपना एक अलग ही महत्व है। यह सीजन पूरी भारतीय कृषि और किसानों के लिए रीढ़ के समान है। और मानसून की पहली बारिश की बौछार के साथ ही किसानों के चेहरे पर रौनक आ जाती है और खेतों में हलचल की शुरुआत भी हो जाती है।
इस सीजन को लाभदायक बनाने के लिए पहले के पारंपरिक --'धान एवं मक्का' की खेती से आगे निकलकर बदलते समय एवं जलवायु परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए बाजार की मांग के अनुसार कौन सी फसल और कौन सी किस्म उगानी चाहिए,ये सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
इसी सवाल का जबाव --सफल और प्रगतिशील किसान जो 'फसल विविधीकरण'(Crop-Diversification) को अपनाने के लिए भी हमेशा तैयार रहते है,उनके लिए 5 ऐसी ही फसलों के बारें में जानकारी इस लेख में प्रदान की जा रही है,जो आपकी खेती को दुगुनी लाभदायक बना देगी।
फसलों के साथ-साथ उसकी उन्नत किस्में,उगाने का वैज्ञानिक तरीका,खाद-पानी प्रबंधन एवं प्रति एकड़ होनेवाली शुद्ध कमाई के गणित को भी आसानी से समझेंगे। तो शुरुआत करते है और एक-एक फसलों के बारे में जानकारी को प्राप्त करते है ---
1 बासमती धान (Premium Basmati Rice): खुशबू भी और बंपर मुनाफा भी
आज भी बिहार,उत्तर प्रदेश एवं अन्य जगहों के किसान अपने खाने भर के धान के बाद जो अधिक धान मुनाफा के लिए उगाते है --उसमें मोटा धान जैसे 'मिनी मंसूरी' आदि को ही प्राथमिकता देते है। लेकिन किसान भाइयों को हमेशा शिकायत भी रहती है कि उन्हे अपने उगाए गए धान का सही बाजार भाव ही नहीं मिलता है।
इसके लिए उन्हे सरकारी मंडियों में 'न्यूनतम समर्थन मूल्य'(MSP) को पाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।इसका बेहतरीन समाधान और आजमाया हुआ उपाय है --'बासमती धान'(premium Basmati Rice) की खेती।जिसकी मांग न केवल भारत के घरेलू बाजार में है,बल्कि खाड़ी देशों,यूरोप और अमेरिका में भी इसकी डिमांड और भारी मात्रा में निर्यात मूल्य है।
उन्नत किस्में (Top Varieties):
बासमती धान की खेती के लिए 'भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान' (IARI) ने कई बेहतरीन किस्में विकसित की है,जिनमें से आपके लिए सबसे लाभदायक ये किस्में हो सकती है --
- पूसा बासमती 1121: यह दुनियां का सबसे लंबा चावल देने वाली किस्म है जिसका बाजार भाव हमेशा ऊंचा ही रहता है। और इसे बेचने एवं अच्छा बाजार भाव और लाभ प्राप्त करने में दिक्कत भी नहीं होती है।
- पूसा बासमती 1509: यह किस्म मात्र 115 से 120 दिनों में पककर तैयार हो जाती है जो कम पानी और 'अल नीनो' के साल में अच्छी साबित हो सकती है। इसको उगाने से किसान 'रबी' की फसल को भी समय पर उगा सकते है।
- पूसा बासमती 1692: यह 1509 का ही सुधरा हुआ रूप है जो प्रति एकड़ 20 से 25 क्विंटल तक की बंपर पैदावार देने की क्षमता रखता है। यह सबसे उचित रहेगा इस खरीफ सीजन के लिए।
- पूसा बासमती 1885 और 1847: ये किस्में 'झुलसा' (Bacterial Blight) और 'ब्लास्ट' रोगों के लिए प्रतिरोधी है,अतः इसमें कीटनाशकों का खर्च बेहद कम हो जाता है। जीन किसान भाइयों के खेत में ये रोग होते है वे इन किस्मों का उपयोग जरूर करें।
वैज्ञानिक खेती की विधि (Scientific Cultivation):
अब बात करते है इसकी उन वैज्ञानिक विधियों की जिसके अनुसार खेती करने से लागत कम और मुनाफा ज्यादा हो सकता है --
- नर्सरी प्रबंधन: जून के पहले से दूसरे सप्ताह में इसकी 'नर्सरी' तैयार करें ताकि बेहतर उत्पादन हो। आप एक एकड़ की रोपाई के लिए 5 से 6 किलोग्राम प्रमाणित बीज का नर्सरी डालें। और बीज नर्सरी डालने से पहले 'कवकनाशी' (Fungicide) से उपचारित जरूर कर ले।
- रोपाई का सही समय: जब पौधा 21 से 25 दिनों का हो जाय,तब मुख्य खेत में रोपाई करनी चाहिए। रोपाई में पौधों की दूरी 15 सेमी और कतार की दूरी 20 सेमी रखनी चाहिए।
- पानी का प्रबंधन: बासमती धान को हर समय पानी में डुबाकर रखने की आवश्यकता नहीं होती है। हां खेत में नमी को बनाए रखनी चाहिए। साथ ही पकने से 15 दिन पहले से ही खेत से पानी पूरी तरह निकाल देनी चाहिए। इससे दानों की क्वालिटी बहुत शानदार हो जाती है।
लागत और शुद्ध मुनाफे का गणित (Cost & Profit Economics):
अब हम असली विषय लागत और मुनाफे के बारे में समझते है। जो हमें इसकी खेती करने के लिए प्रोत्साहित करेगी --
- प्रति एकड़ लागत: बीज,जुताई,रोपाई,खाद,सिंचाई और कटाई कुल मिलाकर 15,000 से 18,000 तक का लागत प्रति एकड़ बैठता है।
- पैदावार: वैज्ञानिक तरीकों से और बताए गए बीजों की किस्मों की खेती करने पर प्रति एकड़ 20 से 24 क्विंटल तक का उपज आसानी से मिल जाता है।
- बाजार भाव और मुनाफा: बासमती धान का बाजार भाव आमतौर पर --3,500 रुपये से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहता है। यदि हम औसत भाव 4,000 रुपये मान ले और उपज 22 क्विंटल प्रति एकड़ मान ले,तो --22 x4,000=88,000 कुल इंकम। और इसमें लागत घटाने के बाद --88,000-18,000=70,000 प्रति एकड़ का इंकम प्राप्त हो सकता है।
➠ विशेष किसान टिप्स:
बासमती धान में अत्यधिक नाइट्रोजन (यूरिया) का इस्तेमाल न करें। ज्यादा यूरिया डालने से पौधों की लंबाई जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है और फसल गिर जाती है,जिससे चावल की सुगंध एवं गुणवत्ता दोनों खराब हो सकता है।
2 हाइब्रिड मक्का (Hybrid Maize): औद्योगिक मांग से चमकेगी किस्मत
अब अगली फसल है मक्का जिसे "अनाजों की रानी" कहा जाता है। पिछले कुछ वर्षों से मक्के की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।क्योंकि यह अब इंसानी भोजन के साथ साथ "पोल्ट्री फीड (मुर्गी दाना) उद्योग,स्टार्च मिलो और सरकार की "इथेनॉल ब्लीडिंग नीति में भी प्रयोग की जाने लगी है।
सरकार पेट्रोल में मक्के से बनी इथेनॉल पर बहुत जोर दे रही है,जिसके चलते मक्के के खरीददार खेत से ही मक्का को उठाने को तैयार है।साथ ही अच्छी कीमत और भविष्य में और भी मांग बढ़ने की संभावना है।
मक्के की उन्नत किस्में (Top Varieties):
मक्के की अधिक पैदावार के लिए हमेशा हाइब्रिड (संकर) किस्म के बीजों का चयन करना चाहिए जिनमें --
- डीकेसी 9108 और डीकेसी 9208:(Monsanto/Bayer): ये किस्में सुखा और अत्यधिक गर्मी को सहन करने में सक्षम है।साथ ही इसके दाने कड़े एवं चमकीले होते है जिससे कीमत अच्छी मिलती है।
- पायनियर 3396 और 3401: यह किस्म मध्यम से लेकर भारी मिट्टी में उपज के लिए और बंपर पैदावार के लिए बढ़िया किस्म है।
- सिजेंटा एनके 6240: यह किस्म देश के अधिकांश हिस्मों में बोई जानेवाली और सबसे लोकप्रिय किस्म है जो बीमारियों के लिए बेहद प्रतिरोधी है।
खेती की तकनीक:
यदि वैज्ञानिक तरीके से और बारीकी से ध्यान रखकर मक्के की खेती की जाय,तो इसका अच्छा उत्पादन एवं लाभ उठाया जा सकता है,जिसकी विधि इस प्रकार से है
- बुआई का समय और तरीका: जून के मध्य से जुलाई के पहले सप्ताह तक का समय इसकी बुआई के लिए सर्वोत्तम समय होता है।
- मेड़ बनाकर: मक्के की बुआई हमेशा "मेड़ (Ridge) बनाकर ही करनी चाहिए।इससे भारी बारिश के समय पानी तनों के पास नहीं रुकता है और फसल सड़ने से बच जाती है।
- बीज दर: एक एकड़ के लिए 7 से 8 किलोग्राम हाइब्रिड बीज की आवश्यकता होती है। लाइन से लाइन की दूरी 60 सेमी और पौधों से पौधों की दूरी 20 सेमी रखनी चाहिए।
- उर्वरक प्रबंधन: मक्का एक भारी पोषक खुराक वाली फसल है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम के साथ साथ "जिंक सल्फेट" देना बहुत जरूरी होता है।जिंक की कमी से मक्के की पत्तियां सफेद होने लगती है,जिससे पैदावार घट जाती है।
लगात और शुद्ध मुनाफे का गणित:
अब आते है सबसे महत्वपूर्ण टॉपिक लागत और मुनाफे पर जिसके बिना पूरी जानकारी अधूरी रह जाएगी
- प्रति एकड़ लागत: जुताई, हाइब्रिड बीज,खाद और लेबर कॉस्ट को मिलाकर करीब 12,000 से 14,000 प्रति एकड़ खर्च होते है।
- पैदावार: लागत के बाद पैदावार की जानकारी से ही लाभ और मुनाफा मालूम होगा। अच्छी हाइब्रिड किस्में प्रति एकड़ 25 से 30 क्विंटल तक पैदावार देती है।
- बाजार भाव और मुनाफा: मक्के का "न्यूनतम समर्थन मूल्य" (MSP) और बाजार भाव 2,000 से 2,300 रुपया प्रति क्विंटल के आस पास रहता है।
- यदि हम 2,100 का औसत भाव पकड़ के हिसाब निकाले तो 28 x 2100 = 58,800 कुल मूल्य प्राप्त होगा। इसमें से लागत को घटा दिया जाए तो 58,800 - 13,000 = 45,000 शुद्ध मुनाफे को प्राप्त कर सकते है।
इस प्रकार से इस सीजन में मक्का का खेती करना एक दूरदर्शी किसान के लिए लाभदायक सौदा हो सकता है।
➠ विशेष किसान टिप्स:
- यदि आप साधारण मक्के की जगह स्वीट कॉर्न (Sweet Corn)या बेबी कॉर्न (Baby कॉर्न) को उगाकर इसको अपने नजदीकी बाजार एवं होटलों आदि में सप्लाइ करते है,तो यह मुनाफा सीधे दोगुनी होकर 80,000 से 90,000 प्रति एकड़ तक पहुंच जाएगी।
3 अरहर दाल (Pigeon Pea): कम पानी में सोने जैसी कमाई
भारत में दालों की खपत सबसे अधिक होती है और उसमें भी अरहर की दाल तो हर घर की पहली पसंद होती है। कुछ समय से दलों की कीमत लगातार आसमान को छु रही है,जिससे सरकार भी दालों के उत्पादन पर विशेष ध्यान और बढ़ावा दे रही है।
अरहर की जड़े गहराई तक जमीन में अंदर जाती है अतः यह सूखे की स्थिति में भी पैदावार के लिए बेहतर होती है। यही नहीं,इसकी जड़े प्राकृतिक रूप से हवा से नाइट्रोजन को सोखकर मिट्टी को प्रदान करती है,जिससे मिट्टी उपजाऊ होती है और उसका ताकत बढ़ता है।
अरहर की वैज्ञानिक खेती निम्न प्रकार से करनी चाहिए --
उन्नत किस्मों का चयन (Top Varieties):
पारंपरिक अरहर पकने और तैयार होने में 200 से 250 दिनों का समय लेती थी,लेकिन अब वैज्ञानिकों नें कम दिनों में तैयार होने वाली फसल किस्मों को विकसित कर दिया है,जिससे अब किसान एक साल में ही खेतों में दो से अधिक फसल उगा सकते है। मुख्य किस्में ये है --
- पूसा अरहर 16: यह क्रांतिकारी किस्म मात्र 120 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। पौधा छोटा और सीधा होता है,जिससे इसकी कटाई कम्बाइन हार्वेस्टर से भी की जा सकती है।
- आईसीपीएल-87 (प्रगति): यह भी 120 से 130 दिनों में पककर तैयार होने वाली किस्म है।
- बहार और 'टाइप-21': यह मध्यम अवधि की किस्में है जो उत्तर एवं मध्य भारत के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
यदि आप उपरोक्त फसल किस्मों का चयन करते है,तो निश्चय ही आपका पैदावार अच्छा होगा और कमाई बढ़ाने में विशेष रूप से लाभदायक होगा।
सह-फ़सली खेती (Intercropping:
ये अरहर की खेती का मुख्य विशेषता है। आप अरहर की खेती से अधिकतम लाभ लेने के लिए --'सह फसली खेती' को जरूर अपनाए। चूंकि शुरुआती 60 दिनों में अरहर की बढ़त धीमी होती है,अतः आप इसके दो कतारों के बीच के खाली जगह में --मक्का,सोयाबीन,मूंग या उड़द की बुआई कर सकते है,इससे आप एक ही खर्च में एक ही खेत में दो फसलों को उगाकर अधिक कमाई कर सकते है।
खेती के मुख्य बिन्दु:
अब आपको अधिक उपज के लिए कुछ विशेष बारीकियों और वैज्ञानिक विधियों का ध्यान रखना है ताकि कम मेहनत और लागत में अधिकतम लाभ को प्राप्त किया जा सकें --
- बुआई का समय: जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के 15 दिनों तक सबसे अच्छी रहती है।
- जल निकासी: अरहर के खेतों में पानी का ठहराव बिल्कुल भी नहीं होनी चाहिए। जल भराव से 'उठरा' रोग हो सकता है,अतः हमेशा पानी की निकासी का अच्छा व्यवस्था रखें।
लागत और शुद्ध मुनाफे का गणित:
अब हम इसमें लागत और मुनाफे के बारे में समझते है --
- प्रति एकड़ लागत: कम सिंचाई और कम खाद के चलते इसकी खेती में लागत भी कम ही आती है। और ये कुल मिलाकर प्रति एकड़ 10,000 से लेकर 12,000 तक की लगत होती है।
- पैदावार: यदि आप उपरोक्त बताए गए बीज किस्मों को उगाते है,तो प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल अरहर की पैदावार प्राप्त हो जाती है।
- बाजार भाव और मुनाफा: अरहर का बाजार भाव तो हमेशा ऊंचा ही बना रहता है,क्योंकि इसकी मांग ही हमेशा बढ़ी रहती है। ये भाव आमतौर पर 7,500 से 9,000 रूपयां प्रति क्विंटल होती है। यदि हम औसत पैदावार 9 क्विंटल और औसत भाव 8,000 प्रति क्विंटल मान ले तो कुल आय ---8000 x 9 =72,000 (कुल आय)।
- मुनाफा- 72000 - 12000 =60,000 हजार कुल मुनाफा अरहर से। एवं करीब 15,000 का मुनाफा सह फसली खेती के रूप में अन्य फसलों के उगाने से भी प्राप्त हो जाती है। अतः कुल मुनाफा --60,000+15,000=75,000 प्रति एकड़ का हो जाता है।
पहले के समय में, हर घरों में थोड़ा-बहुत अरहर की खेती होती ही थी,जिससे घर के उपभोग के लिए दालों को नहीं खरीदना पड़ता था। लेकिन अब बहुत लोग ऐसा करना छोड़ दिए है, और दालों को पूरी तरह से खरीदकर ही खाते है। अतः विशेष सलाह है कि यदि आप रहर की खेती नहीं भी करते है,तो भी घरेलू उपयोग के लिए थोड़ी मात्रा में जरूर इसकी खेती करें।
इससे आपको दाल खरीदना नहीं पड़ेगा,और आप उत्साहित होकर अगले साल से अरहर की खेती भी करना चालू कर देंगे।
4 सोयाबीन (Soybean) पीला सोना जो बदल देगा किस्मत
मध्य प्रदेश,महाराष्ट्र,राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में -इस 'पीला सोना' की खेती की जाती है,जो अपने आप में तिलहन भी है एवं दलहन भी है। इसमें 40% से अधिक प्रोटीन एवं 20% से अधिक तेल पाया जाता है।
सोयाबीन की, तेल की घरेलू मांग एवं इसका तेल निकलने के बाद बचने वाले कचरे --जिसे 'डी ऑइल्ड केक' कहा जाता है--इसका विदेशों में भरी मांग हमेशा बना रहता है। यही कारण है कि सोयाबीन एक नगदी फसल के रूप में अपना स्थान बना चुका है।
अब हम, इसकी वैज्ञानिक खेती एवं बारीकियों के बारें में समझते हुए सबसे पहले इसकी किस्मों के बारे में समझते है --
उन्नत किस्में (Top Varieties):
सबसे पहले, निम्नलिखित उन्नत किस्मों का चयन करनी चाहिए --
- जेएस 20-34: यह आज के समय की सबसे लोकप्रिय एवं 85 से 90 दिनों में तैयार हो जाने वाली किस्म है। कम अवधि के कारण, कम बारिश और बारिश या मानसून जल्दी चली जाने पर भी इसकी पैदावार अच्छी हो जाती है।
- जेएस 20-29 एवं जेएस 20-69: ये दोनों किस्में, रोग प्रतिरोधी किस्में है और साथ ही अधिक पैदावार भी प्रदान करती है।
- मैक्स 1407 (Macs 1407): यह भी नई किस्म है जो कीड़ों और रोगों के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी होती है। साथ ही इसकी फलियां चटकती भी नहीं है।
- एनआरसी 138 एवं 142: यह "भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान-इंदौर" के द्वारा विकसित उन्नत किस्म है,जो अच्छी पैदावार के साथ रोग प्रतिरोधी भी है।
सफल खेती की तकनीक:
अब बारीकी से इन मुख्य तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए --
- बीजोपचार: सोयाबीन में फफूंद जनित रोग बहुत होता है,इसलिए बुआई से पहले बीजोपचार के लिए --कार्बोक्सी,+थिरम या ट्रैकोडर्मा से उपचारित जरूर कर ले।
- राइजोबियम कल्चर: का टीका जरूर लगाए ताकि जड़ों में गांठे बने एवं हवा से खुद यूरिया सोख सकें।
- बुआई की विधि: सोयाबीन की बुआई--'बीबीएफ पद्धति' (Broad Bed Furrow) से करना सबसे सुरक्षित माना जाता है। इसमें चौड़ी मेड़े बनाई जाती है और उसके दोनों ओर नालियां होती है। भारी बारिश होने पर इन नालियों से पानी बाहर निकल जाती है एवं सूखे में इन नालियों का नमी पौधों को मिलता रहता है।
- खर-पतवार नियंत्रण: सोयाबीन का सबसे बड़ा दुश्मन खर-पतवार होता है,अतः बुआई के तुरंत बाद 24-48 घंटों में ही 'पेंडिमेथालिन' का छिड़काव करे और 20 दिनों बाद ही 'इमाजेथपायार' का प्रयोग करे।
लागत एवं शुद्ध मुनाफे का गणित:
इसको समझने के बाद ही असली खेती करने के लिए उत्सुकता बनेगी --
- प्रति एकड़ लागत: बीजोपचार,खाद,खर पतवार नासी एवं कटाई में कुल मिलाकर 12,000 से लेकर 14,000 तक प्रति एकड़ खर्च बैठता है।
- पैदावार: एक एकड़ में कुल 10 से 12 क्विंटल तक की कुल पैदावार हो जाती है।
- बाजार भाव एवं मुनाफा: सोयाबीन का बाजार भाव हमेशा --4500 से 5500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहती है। यदि औसत भाव --5,000 मान ले और उत्पादन 11 क्विंटल मान ले तो कुल आय --5000 x 11=55,000 प्रति एकड़ होती है। इसमे से लागत को घट देते है तो 55000-13000=42000 हजार प्रति एकड़ शुद्ध मुनाफा प्राप्त हो जाता है।
➢ किसान भाई ध्यान दे:
- सोयाबीन की कटाई में कभी भी देरी ना करे। फसल पकने के बाद तुरंत कटाई कर लें,अन्यथा तेज धूप में फलियां चाटकर फट जाती है और दानें खेतों में ही बिखर जाते है,जिससे नुकसान हो सकता है।
5.लाल तीखी मिर्च (Premium Chilli/Guntur Chilli)
खरीफ सीजन में आप पारंपरिक से हटकर आईसी नगदी फसल उगाना चाहते है जो कम क्षेत्र में भी खेती करके लाखों की इंकम दे सकती है,तो आपके लिए सबसे बेहतर है--'तीखी मिर्च' (Premium Chilli) की खेती। भारत इसका सबसे बड़ा उत्पादक,उपभोक्ता एवं निर्यातक भी है।
घरेलू रसोई से लेकर मसाला उद्योग एवं विदेशों में भी इसकी बहुत भारी मांग हमेशा बनी रहती है। इसकी वैज्ञानिक खेती के तरीका इस प्रकार से है ---
लोकप्रिय किस्में जो देगी अधिकतम लाभ:
बाजार में मिर्च की कीमत दो मुख्य चीजों से तय होती है --'तीखापन' (Capsaicin content) एवं लाल रंग' (Colour Value)। इसके आधार पर मुख्य किस्में जो लाभदायक होगी --
- गुन्टूर मिर्च: आंध्र प्रदेश का गुन्टूर इलाका अपनी 'तीखी मिर्च' के लिए पूरी दुनियां में मशहूर है। इसकी --'Guntur Sannam' (S-4) किस्म की मांग निर्यात के लिए भी बहुत ज्यादा होती है। यह बेहद तीखी एवं गहरा लाल रंग की होती है। ये बेहतर किस्म होगी।
- तेजा मिर्च (Teja Chilli): ये मिर्च अपने 'तीखेपन' के लिए मशहूर तो है ही,इसकी मांग विदेशी बाजारों खासकर चीन में बहुत ज्यादा होती है और साथ में ही इसकी कीमत हमेशा अन्य मिर्च की तुलना में ज्यादा ही रहती है।
- बायदगी मिर्च (Byadgi Chilli): भले ही यह कर्नाटक की मिर्च है,लेकिन पूरे भारत में खरीफ के सीजन में किसान इसको उगाते है। यह तीखी थोड़ी कम होती है, लेकिन इसका लाल रंग इतना गहरा होता है कि मसलों के रंग बनाने वाले उद्योगों में इसे हाथों-हाथ खरीदा जाता है।
- प्रमुख हाइब्रिड किस्में: प्राइवेट कंपनियों की हाइब्रिड किस्में जैसे--सीजेंटा की 5531,महिकों या नामधारी की भी हाइब्रिड किस्में है जो पैदावार एवं रोग प्रतिरोधी होती है। लगाया जा सकता है।
इन बीज किस्मों का आप अपने अनुसार चयन कर सकते है। यदि आप पहली बार खेती कर रहे है,तो गुन्टूर या तेज मिर्च की किस्मों का चयन करे।
मिर्च की खेती के मुख्य तरीकें:
खरीफ के मौसम में मिर्च को उगाना बेहद फायदेमंद तो है,लेकिन इसके लिए कुछ विशेष तकनीक एवं सावधानियों की आवश्यकता होती है जिसकी जानकारी इस प्रकार से है --
- नर्सरी प्रबंधन: मिर्च के बीजों को भी सीधे खेत में नहीं बोया जाता है,बल्कि इसकी भी पहले नर्सरी लगाई जाती है --
- समय: मई के आखिरी सप्ताह से लेकर जून के मध्य तक नर्सी को दाल देनी चाहिए। ताकि जुलाई में मुख्य खेत की रोपाई की जा सके।
- उन्नत तरीका: पारंपरिक क्यारियों के बजाय 'प्रो-ट्रे (Pro-Trays)' में 'कोकोपीट' का उपयोग करके नर्सरी के पौधों को तैयार करनी चाहिए। इससे पौधों की जड़े मजबूत बनती है और रोपाई के समय मरती नहीं है।
- मुख्य खेत की तैयारी एवं रोपाई: जब नर्सरी के पौधे पुष्ट एवं तैयार हो जाते है और ये कम से कम 21 दिनों के बाद हो जाते है,तब इसकी मुख्य खेतों में बुआई करनी चाहिए --
- बेड पद्धति (Raised Bed): खरीफ में मिर्च लगाने का सबसे बड़ा तरीका यह है कि इसे समतल खेत में न लगाए। हमेशा उन्नत बेड बनाकर इसकी रोपाई करनी चाहिए। इससे भारी बारिश होने से जल भराव नहीं होता है एवं 'जड़ सड़न रोग' भी नहीं होता है।
- प्लास्टिक मल्चिंग (Plastic Mulching): बेड के ऊपर 25-30 माइक्रोन की प्लास्टिक मल्चिंग फिल्म जरूर लगाए जिससे बारिश के कारण मिट्टी के बहने को रोक देती है एवं खर-पतवार को भी नहीं उगने देती है और मिट्टी में नमी को बनाए रखती है।
जल और पोषण प्रबंधन:
मिर्च एक आईसी फसल है जिसमें हमेशा नमी भी होनी चाहिए लेकिन ज्यादा पानी भी इसके लिए जहर के समान हो जाती है। अतः --
- टपक सिंचाई (Drip Irrigation): मिर्च के लिए 'ड्रिप सिंचाई पद्धति' वरदान के समान होती है। इससे हर पौधों की जड़ों में बूंद-बूंद पानी जाता रहता है। (ड्रिप सिंचाई पद्धति के लिए विस्तार से पढे --कम पानी मे बंपर पैदावार:किसान भाई ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर कैसे पाए 90% तक सब्सिडी)
- फर्टिगेशन (Fertigation): इसमें ड्रिप सिंचाई के मध्यम से ही घुलनशील खाद सीधे पौधों की जड़ों में देने से खाद और पानी की लागत 30% कम हो जाती है एवं पैदावार दुगुनी बढ़ जाती है। मिर्च में 'कैल्शियम' एवं 'बोरॉन' का उपयोग जरूर करे। इससे फूल झड़ते भी नहीं एवं मिर्च चमकदार हो जाती है।
(फर्टिगेशन को विस्तार से जानने के लिए जरूर पढे--फर्टिगेशन क्या है ? इस तकनीक का सफल उदाहरण और भारत में इसका भविष्य क्या है? पूरी जानकारी)
किट एवं रोग प्रबंधन:
मिर्च की खेती में सबसे बड़ी चुनौती इसमें लगने वाले कीड़े एवं वायरस है। खरीफ की उमस में इसका खतरा और भी बढ़ जाता है। अतः --
- चुरड़ा-मुरड़ा रोग (Leaf Curl Virus): इसमें मिर्च की पत्तियां ऊपर या नीचे की तरफ मुड़ जाती है और पौधा झाड़ी जैसा हो जाता है। यह वायरस सफेद मक्खी एवं थ्रीप्स जैसे रस चूसक कीड़ों के कारण फैलती है।
- बचाव: खेत के चारों तरफ मक्के या ज्वार के 2-3 लाइनें लगाए एवं पीले और नीले चिपचिपे जाल प्रति एकड़ 20-25 की संख्या में लगाने से राहत रहती है। नीम की तेल का छिड़काव शुरुआती कीड़ों एवं एसीटमाईप्रिड का छिड़काव करना चाहिए।
- हाईबैक और फल सड़न: बारिश के मौसम में मिर्च काली होकर सड़ने लगती है। इससे बचाव के लिए --'कॉपर आक्सीक्लोराइड' या 'कार्बेंडाजिम' जैसी फफूंद नाशी का समय पर छिड़काव करें।
कमाई एवं बाजार का गणित:
मिर्च की खेती को 'हाई रिस्क-हाई-रिटर्न' (ज्यादा जोखिम-ज्यादा मुनाफा) वाला फसल माना जाता है।
- लागत प्रति एकड़: लागत--बीज,मल्चिंग,ड्रिप,खाद और मजदूरी मिलाकर 60,000-80,000 तक।
- औसत पैदावार: सुखी लाल मिर्च 15-20 क्विंटल और हरी मिर्च 80-100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
- औसत बाजार भाव: 15,000 से 25,000 प्रति क्विंटल औसत मूल्य सुखी लाल मिर्च का रहता है।
- सकल आय: इस तरह कुल आय 2.5 लाख से 4 लाख प्रति एकड़ तक की हो जाती है।
- शुद्ध मुनाफा (Profit): प्रति एकड़ 1.7 लाख से लेकर 3.2 लाख तक शुद्ध मुनाफा हो सकता है।
➠ स्मार्ट टिप्स:
- यदि आपके पास लेबर(मजदूरों) की कमी है,तो आप सुखी मिर्च के बजाय हरी तीखी मिर्च की तुड़ाई करके सीधे स्थानीय मंडियों में बेच सकते है। वही अगर आपके पास सुखाने की अच्छी जगह और साधन है,तो मिर्च को सुखाकर उसकी ग्रेडिंग करके बेचने पर दोगुना मुनाफा मिलता है।
अपने क्षेत्र जगह और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खरीफ की इन पांचों फसलों का चुनाव करके आप इसकी खेती से बंपर लाभ कमा सकते है।
खरीफ की टॉप फसलों का तुलनात्मक चार्ट
आपकी सुविधा के लिए नीचे एक सारणी दी गई है,जिसके मध्यम से आप अपनी बजट एवं संसाधनों के हिसाब से तुलनात्मक अध्ययन कर सकते है कि कौन सी फसल की खेती आपके लिए सबसे सही रहेगी ---
इस खरीफ सीजन में परंपरा से थोड़ा हटकर सोचने की जरूरत है। और दिए गए तुलनात्मक चार्ट के सहारे अपने लिए किसी विशेष फसल का चुनाव करना है और उसकी खेती करके लाभ उठाना है। हां खेती करने के साथ ही अपनी मिट्टी की जांच जरूर करवा ले ताकि कौन सी उर्वरक डि जाय इसकी सही जानकारी प्राप्त हो जाएगी।
आधुनिक तकनीक: जो मुनाफे को कर देगी दोगुना
फसल का चुनाव तो केवल पहला कदम है। आपकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप फसल प्रबंधन कैसे करते है। यदि आप आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग करते हुए इन 7 मुख्य बातों का विशेष ध्यान रखते है,तो जरूर आपकी सफलता कदम चूमेगी --
1. उन्नत एवं प्रमाणित बीजों का चयन:
एक कहावत है कि --'जैसा बोवोगे,वैसा काटोगे' यह खेती में ही सबसे फिट बैठती है,क्योंकि हम जैसा बीज डालेंगे वैसा ही फसल हमें प्राप्त होती है।अतः हमें --
- हमेशा प्रमाणित बीजों का उपयोग: विश्वसनीय केंद्रों,कृषि विश्वविद्यालयों और विश्वसनीय कंपनियों के केवल प्रमाणित बीजों का उपयोग करें। सस्ते के चक्कर में किसी भी तरह के बीजों का चयन न करे।
- जलवायु के अनुकूल: अपने क्षेत्र की जलवायु,मिट्टी और स्थानीय सुविधाओं के अनुकूल ही बीज किस्मों का चयन करें। जैसे आपके क्षेत्र में पानी की कमी है,तो कम पानी और कम दिनों में तैयार होने वाली फसल बीजों का चयन करें।
- बीज उपचार: ये देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर---शुरुआत में ही बीमारियों और फफूंद का नाश हो जाने से रोगों में 80% तक की कमी आ जाती है। अतः बीजोपचार जरूर करे।
2. मिट्टी का परीक्षण और संतुलित पोषण:
मिट्टी की जांच जरूर कराए ताकि मालूम चल सके की आपकी मिट्टी में किस पोषक तत्वों की सबसे ज्यादा जरूरत है और किसकी जरूरत नहीं है। अभी तो देश में 'खेत बचाओं अभियान' के मध्यम से भी मिट्टी जांच पर जोर दिया जा रहा है।
- सॉइल हेल्थ कार्ड: इस सीजन की शुरुआत में ही अपने खेत की मिट्टी की जांच करा ले।
- संतुलित उर्वरक प्रबंधन: नाइट्रोजन,फास्फोरस,पोटाश के सही अनुपात-4:2:1 को अपनाए एवं सल्फर और जिंक जो पैदावार को 15-20% तक बढ़ा देता है,उपयोग जरूर करें।
- जैविक खाद: रासायनिक खादों के साथ ही गोबर की सड़ी हुई खाद,केचुए की खाद यानि वर्मिकम्पोस्ट एवं नीम की खली के साथ साथ जीवामृत आदि को भी बनाकर दे।
(आप अपनी खेती को और अधिक लाभदायक बनाने के लिए यह लेख ---Zero Budget Natural Farming : क्या सच में 1 गाय से 30 एकड़ खेती संभव है ? जानिए पूरा सच--जरूर पढ़े,जिसमें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने एवं खेती को लाभदायक बनाने के सही उपायों की जानकारी है।)
3. जल प्रबंधन एवं जल निकासी:
खरीफ सीजन पूरी तरह से मानसून पर निर्भर करता है। और इस सीजन में पानी की कमी से ज्यादा खतरा 'जलभराव' से होता है। अतः अच्छी जल प्रबंधन नीति होनी चाहिए --जो दिए गए टेबल से समझने में आपको मदद जरूर करेगी --
➢निकासी नाली: निकासी नाली को बुआई से पहले ही खेत के चारों तरफ से बना लेनी चाहिए,ताकि ज्यादा बारिश होने पर जल भराव न होने पाए और आसानी से पानी का निकासी हो जाय।
➢आधुनिक सिंचाई: मिर्च एवं मक्के की फसलों में ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई पद्धति का प्रयोग करें,इससे पानी की बचत के साथ साथ सही पोषक तत्व पौधों की जड़ों को ही प्राप्त हो जाता है।
4. सही समय पर बुआई:
खरीफ के फसलों में बुआई के समय का बहुत ही बड़ा महत्व होता है। यदि बुआई में 15 दिनों की देरी हो जाय तो उपज में 30% तक की कमी हो जाती है।
- मानसून का पूर्वानुमान: भारतीय मौसम विभाग (IMD) के सूचनाओं पर हमेशा ध्यान देते रहे,पहली बारिश के बाद बुआई कर दे।
- तापमान: खरीफ खासकर मक्के एवं सोयाबीन के अंकुरण के समय तापमान का होना जरूरी होता है इसलिए इनकी बुआई जून मध्य से लेकर जुलाई प्रथम सप्ताह तक कर दे।
5. एकीकृत किट एवं रोग प्रबंधन:
खरीफ का मौसम गर्म एवं उमस भरा होता है,जिससे फफूंद एवं वायरस आदि का प्रकोप होते रहता है। इसके लिए पारंपरिक कीटनाशकों के अंधाधुंध छिड़काव के जगह 'एकीकृत किट प्रबंधन' की नीति को अपनाए --
- फेरोमॉन ट्रैप एवं लाइट: खेतों मे लाइट एवं 4-5 फोरोमैन ट्रैप लगाने से यह कीटों की नर प्रजातियों को आकर्षित करती है और वे मर जाते है जिससे उनकी आबादी बढ़ने से रुकती है।
- मित्र कीटों का संरक्षण: ये हानिकारक कीटों को खा जाते है अतः इन्हे बचाने के लिए ज्यादा रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से बचना चाहिए।
- सही कवकनाशी: हमेशा प्रमाणित कृषि विशेषज्ञ के अनुसार लक्षित फफूंदनाशी का ही छिड़काव करें।
6. खर-पतवार नियंत्रण:
खर-पतवार फसल के सबसे बड़े दुश्मन होते है जो खरीफ के मौसम में बारिश आदि के चलते आसानी से उगते है। ये मिट्टी से 30-40% तक पोषक तत्वों एवं नमी को सोख लेते है,जिससे मुख्य फसल कमजोर हो जाती है। अतः इससे बचाव के लिए --
- क्रिटिकल पीरियड: फसल के शुरुआत के 20-45 दिन खर-पतवार की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण होते है। इन दिनों में सबसे बढ़िया से इनका विनाश कर दे।
- यांत्रिक विधि: रसायनों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ होता है और इसमें मिट्टी में हवा का भी प्रवेश हो जाता है।
- रासायनिक विकल्प: बहुत जरूरी होने पर बुआई के तुरंत बाद एवं बुआई के 20-25 दिनों बाद खर-पतवार नाशी का छिड़काव करें।
7. पोस्ट-हार्वेस्टिंग एवं स्मार्ट मार्केटिंग:
फसल अच्छी उगा लेना आधी जंग जीतने जैसा है--लेकिन उसे अच्छी कीमत पर बाजार में बेच देना पूरी जंग में सफलता होती है। अतः पूरी जंग को जीतने का प्रयास करना उत्तम रहता है,इसके लिए --
- सुखाना एवं ग्रेडिंग करना: धान,मक्का और सोयाबीन को काटने के बाद अच्छी तरह से सूखा लेना चाहिए और इसकी नमी को 12-14% के अंदर रखना चाहिए ताकि बिक्री में दिक्कत न आए। ग्रेडिंग करके छोटे दानों को अलग कर देनी चाहिए क्योंकि बड़े दानों को हमेशा 30% ज्यादा भाव मिलता है।
- ई-नाम (e-NAM) पोर्टल: अपनी उपज को केवल स्थानीय व्यापारियों एवं बिचौलियों को बेचने के चक्कर में न रहे। आप 'राष्ट्रीय कृषि बाजार' e-NAM पोर्टल पर अपने को पंजीकृत कर ले। इससे देश भर के व्यापारियों से ऑनलाइन बोली आपके फसल को मिलेगी।
(e-NAM के बारे में अधिक जानकारी और इसपर कैसे पंजीकृत किया जाय,इसकी जानकारी के लिए आप --2026 मे e-NAM और 'नमो ड्रोन दीदी' योजना से किसानों की आय कैसे बढ़ रही है ? पूरी जानकारी--लेख को जरूर पढ़ ले। )
- भंडारण क्षमता: यदि फसलों की कटाई के बाद बाजार में भाव में मंदी हो तो,अपने फसल को उचित जगह और अच्छे से भंडारण की व्यवस्था जरूर रखे और उसमें भंडारण कर दे। जब बाजार भाव बढ़ जाए तो उसे बेच दे।
उम्मीद है ये जानकारी आपके बहुत ही मदद करेगी। इस जानकारी के लिए 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद',नई दिल्ली में PHD कर रही 'निधि कुमारी' का विशेष योगदान है। और हमारे सभी लेखों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहता है। अतः उनको विशेष रूप से धन्यवाद अर्पित करते हुए विषय को आगे बढ़ाते है।
सरकारी योजनाएं:जिनका उठाएं पूरा लाभ
किसान भाइयों को आधुनिक खेती के लिए जेब से ज्यादा पैसा न खर्च करना पड़े,इसके लिए ---भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के द्वारा चलाई जा रही कई महत्वपूर्ण योजनाओं का लाभ जरूर प्राप्त करनी चाहिए--जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं ये है ---
1. पीएम किसान सम्मान निधि (PM-KISAN):
इसके तहत सालाना --6,000 रुपये सीधे किसान भाइयों को सीधे बैंक खातों में मिलती है। जिससे आप सीजन की शुरुआत में बीज और अन्य जरूरी खरीददारी कर सकते है।
2. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY):
खरीफ फसल के लिए आप केवल --2% प्रीमियम देकर प्रधानमंत्री फसल बीमा करवा सकते है जो बाढ़,सूखा या ओलावृष्टि जैसे आपदाओं में फसल की बर्बादी होने पर पूरी सुरक्षा प्रदान करती है एवं सरकार से मुआवजा मिल जाता है।
3. कृषि यंत्र एवं बीज सब्सिडी योजनाएं:
आप देश के हर जिलों के कृषि विभाग की पोर्टल पर जाकर --कृषि यंत्र,बीज और ड्रिप सिंचाई सिस्टम की सब्सिडी के लिए अप्लाइ कर सकते है। इसका लाभ जरूर उठानी चाहिए।
(कृषि यंत्रों पर सब्सिडी को कैसे प्राप्त करें की अधिक जानकारी के लिए आप जरूर पढे--कृषि यंत्र सब्सिडी 2026:SMAM योजना के लिए जरूरी दस्तावेज और आवेदन कैसे करें ?)
निष्कर्ष (Conclusion)
सही निर्णय ही सफलता की कुंजी होती है और सही निर्णय लेने से पहले उस निर्णय की बारीकियों का सूक्ष्मता से अध्ययन यदि विश्वसनीय स्रोतों से कर लिया जाय तो यह सोने पे सुहागा के समान होती है और सफलता प्राप्त करा देती है। अतः आप इस खरीफ के सीजन में इस पूरी जानकारी को प्राप्त कर एक अच्छी शुरुआत जरूर कीजिए एवं अच्छा लाभ अर्जित कीजिए।
आपको ऊपर के 5 फसलों में से कौन सी फसल बेस्ट लगी है इसको जरूर बताए और उसके लिए और भी कोई बेहतर जानकारी चाहिए तो कमेन्ट बॉक्स में जरूर लिखे।
यदि आप इन फसलों को शुरुआत करते है,तो हमारी शुभकामनाएं हमेशा आपके साथ है और हम और भी जानकारी को अपडेट करते रहेंगे। साथ ही यदि आपके पास कोई और भी बेहतर जानकारी हो तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखे ताकि हमारे अन्य किसान भाई आपकी जानकारी से लाभान्वित हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:खरीफ सीजन के लिए लाभदायक मुख्य फसलें कौन सी है ? ▼
उत्तर:खरीफ सीजन के लिए लाभदायक मुख्य फसलें--बासमती चावल,उन्नत मक्का,अरहर दाल,कपास,सोयाबीन,मूंगफली और तीखी लाल मिर्च जैसी फसलें है जिसे अपने क्षेत्र और जलवायु के अनुसार वैज्ञानिक एवं आधुनिक तरीकों से खेती करने पर बढ़िया लाभ कमाया जा सकता है।
प्रश्न 2: अच्छा लाभ प्राप्त लेने के लिए --बासमती चावल की कौन सी किस्म को उगाना चाहिए? ▼
उत्तर: प्रीमियम बासमती चावल की मांग हमेशा अच्छी रहती है,निर्यात मांग भी रहती है और इसका अन्य धानों की तुलना में दुगुना से अधिक बाजार भाव होता है। अतः इसकी आईसी किस्मों का चयन करना चाहिए जो उपज दर ज्यादा देने के साथ हो रोग प्रतिरोधी हो एवं उगाने में खर्च भी कम आए--इसके लिए आप --पूसा बासमती-1121,पूसा बासमती-1509,जो मात्र 115-120 दिनों में तैयार हो जाती है और 20-25 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार देती है,पूसा बासमती 1692,पूसा बासमती-1885 एवं 1847,इसमें झुलसा एवं ब्लास्ट रोग नहीं लगते है क्योंकि ये इसके प्रति प्रतिरोधी होती है। इन किस्मों को लगानी चाहिए।
प्रश्न 3:क्या मक्का की भी मांग दे में बढ़ रही है और इसकी खेती लाभदायक है? ▼
उत्तर: हां!देश में मक्के की मांग बढ़ती जा रही है--ये अब इंसानी भोजन के अलावा पॉल्ट्री फ़ीड उद्योग,सटार्च मिलों एवं सरकारी की इथेनॉल ब्लेन्डिंग पॉलिसी के करण पेट्रोल में मिलने वाले इथेनॉल को मक्का से बनाने के करण बढ़ रही है। इसकी खेती इसीलिए लाभदायक है कि इसका मूल्य हमेशा अच्छा बना रहता है।
प्रश्न 4:मक्के की मुख्य उन्नत किस्में कौन-कौन सी है? ▼
उत्तर:मक्के की मुख्य उन्नत किस्में है--डीकेसी 9108 और डीकेसी 9208 (Monsanto/Bayer),पायनियर 3396 और 3401,सिंजेंटा एनके 6240:--ये किस्में रोगों के प्रति प्रतिरोधी और सूखा एवं अत्यधिक गर्मी को सहन करने वाले तथा दानें चमकीले और मजबूत होते है। साथ ही मध्यम से भारी मिट्टी में भी अच्छी पैदावार प्रदान करती है।
प्रश्न 5:अरहर दाल की उन्नत किस्में कौन सी है? ▼
उत्तर:अरहर दल की मुख्य उन्नत किस्में है--पूसा अरहर 16,आईसीपीएल 87 (प्रगति),बहार और टाइप-21--है जो पारंपरिक अरहर जो 200-250 दिनों में तैयार होती थी,के तुलना में 120-130 दिनों में ही तैयार हो जाती है एवं इनकी कटाई कम्बाइन हार्वेस्टर से भी की जा सकती है तथा बंपर पैदावार के साथ ही सह फसली खेती के लिए भी उपयुक्त रहती है।
प्रश्न 6:पीला सोना किस फसल को कहा जाता है? ▼
उत्तर: सोयाबीन को पीला सोना कहा जाता है--ये एक आईसी फसल है जो तिलहन भी है और दलहन भी है। सोयाबीन में 40% दाल और 20% तेल पाया जाता है। तेल निकलने के बाद इसके कचरे की भी मांग विदेशों में बहुत अधिक रहती है। जिसके चलते यह लाभदायक नगदी फसल बन गई है।
प्रश्न 7:सोयाबीन की मुख्य उन्नत किस्में कौन कौन सी है? ▼
उत्तर: सोयाबीन की मुख्य उन्नत किस्में है--जेएस 20-34 (JS 20-34)-जो 85-90 दिनों में ही पक जाती है,जेएस 20-29 और जेएस 20-69-रोग प्रतिरोधी एवं अधिक फली देने वाली किस्म,एनआरसी 138 और एनआरसी 142-सोयाबीन अनुसंधान संस्थान,इंदौर द्वारा विकसित किस्म। इनकी खेती लाभदायक रहती है।
प्रश्न 8:मिर्च की सबसे लोकप्रिय किस्म जो अधिक फायदा दे कौन सी है? ▼
उत्तर: मिर्च की सबसे लोपरिय किस्म है--गुन्टूर मिर्च,Guntur Sannam (S4) किस्म की मांग निर्यात के लिए सबसे ज्यादा है।,तेजा मिर्च--जो अपने अत्यधिक तीखेपन के लिए जानी जाती है और विदेशों खासकर चीन में अत्यधिक मांग होती है और ब्याडगी मिर्च--जो कर्नाटक की है एवं तीखापन कम होता है लेकिन बहुत अधिक लाल रंग की होती है जिसके चलते मसलों के रंग बनाने वाले उद्योगों में इसे हाथों-हाथ खरीदा जाता है।
