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| सबसे पुरानी जटिल बीमारी टीबी को जड़ से समाप्त करने का कार्यक्रम NTEP जिसमे निक्षय मित्र की महत्वपूर्ण भागीदारी |
टीबी भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में मानवता की सबसे पुरानी और सबसे जटिल बीमारियों में से एक है।टीबी (Tuberculosis)एक बैक्टीरियल बीमारी है जो Mycobacterium Tuberculosis नामक जीवाणु से होती है। यह मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है।
प्रस्तावना
बस दो दिनों बाद 24 मार्च को ही "विश्व टीबी दिवस" है उससे पहले ही टीबी के बारे मे जानने की जिज्ञासा उत्सुक हो गई। अतः इस विषय पर गहरा अध्ययन करने का मन किया। क्योंकि बचपन से ही टीबी के बारे मे सुनते और देखते आ रहे है। अपने इस अध्ययन और परिचित डाक्टरों से बातचीत करने के आधार पर टीबी के बारे मे लिखने के लिए कलम उठाया हूँ ताकि अपने स्तर से मैं भी टीबी के बारे मे जागरूकता बढ़ाने का प्रयास कर पाऊँ।
प्राचीन भारत और आयुर्वेद मे टीबी
प्राचीन भारत मे टीबी(क्षयरोग) का इतिहास गहरा और संवेदनशील रहा है। आयुर्वेद के सबसे पुराने और प्रमाणिक ग्रंथों,जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता मे,इस बीमारी का विस्तार से वर्णन मिलता है। आयुर्वेद मे टीबी को मुख्य रूप से राजयक्ष्मा के नाम से जाना जाता है।
प्राचीन भारत मे टीबी के बारे मे उपलब्ध विवरणों को संक्षिप्त रूप से निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है -
1. राजयक्ष्मा:रोगों का राजा
आयुर्वेद मे इसे 'राजयक्ष्मा' इसलिए कहा गया क्योंकि प्राचीन मान्यताओ के अनुसार,यह सबसे पहले चंद्रमा (नक्षत्रों के राजा) को हुआ था। इसके अलावा यह शरीर के सभी धातुओ(Tissues) को क्षय कर देता है, इसीलिए इसे 'क्षयरोग' भी कहते है।
2. आयुर्वेद के अनुसार टीबी के चार मुख्य कारण
आचार्य चरक ने 'राजयक्ष्मा' होने के चार प्रमुख कारण बताए है,जो आज के आधुनिक संदर्भ मे भी प्रासंगिक है -
- साहस (Over Exertion): अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक कार्य या व्यायाम करना।
- वेग-संधारण (Suppression of Natural Urges): प्रकृतिक वेगों (जैसे भूख,प्यास,नींद) को रोकना।
- क्षय (Depletion): शरीर मे ओज और धातुओ की कमी (कुपोषण)।
- विषम-अशन (Irregular Diet): गलत समय पर या अनुचित भोजन का सेवन करना।
3. प्राचीन काल मे पहचाने गए लक्षण
प्राचीन आयुर्वेद के ग्रंथों मे इसके 11 विशिष्ट लक्षणों (एकादश रूप) का वर्णन है, जिनमे से प्रमुख है -
- कास (Cough): लगातार खांसी
- ज्वर (Fever): हल्का बुखार बना रहना।
- पार्श्वशूल (Chest Pain):पसलियों और छाती मे दर्द।
- स्वरभेद (Hoarseness): आवाज मे बदलाव।
- अतिसार (Diarrhea): पाचन तंत्र का बिगड़ना।
4. आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति
प्राचीन भारत मे टीबी का उपचार केवल दवाओ तक ही सीमित नहीं था,बल्कि इसके उपचार को एक सर्वांगीण प्रक्रिया (Holistic Approach) माना जाता था। मुख्य रूप से इसके तीन बिन्दुओ को बताना उपयुक्त लगता है जो निम्न प्रकार से है -
- आहार (Diet): बकरी का दूध और घी(अजा-दुग्ध/घृत) को टीबी के लिए सबसे उत्तम माना गया क्योंकि बकरी को टीबी के प्रति प्रतिरोधी माना जाता था।
- जड़ी-बूटियाँ (Herbs): इसमे मुख्य रूप से 'अश्वगंधा और शतावरी" जो शरीर की शक्ति और रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए एवं 'पिप्पली' फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए और 'च्यवनप्राश" धातुओ के पोषण के लिए प्रमुख था।
- रसायन चिकित्सा: इसमे मुख्य रूप से स्वर्ण भस्म और बसंत कुसुमाकर रस जैसी औषधियों का प्रयोग इम्यूनों मॉडल्यूटर के रूप मे किया जाता था।
- हर साल दुनिया भर मे 1.07 करोड़ (10.7 मिलियन) लोग टीबी के चपेट मे आते है।
- लगभग 12 लाख (1.3 मिलियन) लोग प्रत्येक साल इस बीमारी से लोग जान गवां देते है जिनमे HIV से पीड़ित लोग भी शामिल है।
- दुनिया के कुल टीबी मामलों के दो तिहाई हिस्सा केवल 8 देशों मे है -
- भारत (26%)- सबसे अधिक।
- इंडोनेशिया(10%)
- फिलीपींस (6.8%)
- चीन(6.5%)
- पाकिस्तान (6.3%)
- नाईजीरिया
- कांगो
- बांग्लादेश
- 2015 की तुलना मे टीबी से होने वाली मौत मे 90% की कमी करना और टीबी के आने वाले नये मामलों मे 80% की गिरावट करना शामिल है।
- हर साल 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 का थीम है-"Yes! We Can End tb!" (हाँ हम टीबी को खत्म कर सकते है )
1. विश्व मे टीबी का इतिहास
टीबी पूरे विश्व के लिए इंसानियत की सबसे पुरानी बीमारियों मे से एक है। प्राचीन मिस्त्र की मम्मी (Mummies) मे भी टीबी के निशान मिले है, जिनसे पता चलता है की यह रोग हजारों साल पुराना है। यदि टीबी के बारे मे संक्षेप मे नजर दौड़ाया जाय तो मुख्य बिन्दु निम्न है -
- डॉ राबर्ट कोच: ने 24 मार्च 1882 को जो एक जर्मन वैज्ञानिक थे उन्होंने टीबी के बैक्टीरिया Mycobacterium Tuberculosis की खोज की। इसी खोज की याद मे 'विश्व टीबी दिवस' मनाया जाता है।
- 1921 मे पहली बार BCG का टीका इंसानों के लिए उपलब्ध हुआ।
- 1943 मे टीबी पर सबसे ज्यादा प्रभावी एंटीबायोटिक दवा Streptomycin की खोज हुई जिसने टीबी के इलाज का रास्ता खोल दिया।
2. वर्तमान वैश्विक चुनौतियां
बैक्टीरिया का दवाओ के प्रति जिद्दी हो जाना पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। साथ ही टीबी अनुसंधान के लिए पूरी दुनिया को जितना राशि की जरूरत है उसका केवल 25% ही मिल पा रहा है। टीबी को अक्सर "गरीबी की बीमारी" कहा जाता है और अभी भी दुनिया गरीबी भुखमरी जैसे हालातों से जूझ रही है जो टीबी खत्म करने की दिशा मे सबसे बड़ी बाधा है।
भारत मे टीबी नियंत्रण के मुख्य पड़ाव
भारत मे टीबी रोग की लड़ाई सदियों पुरानी है,लेकिन इसे संगठित और सरकारी मिशन के रूप मे विकसित होने मे लंबा समय लगा। इसका इतिहास औपनिवेशिक शासन से लेकर वर्तमान मे 'उन्मूलन लक्ष्य' तक फैला हुआ है। भारत के टीबी नियंत्रण की दिशा मे मुख्य पड़ाव निम्न तरह से है -
1. शुरुआती दौर और सेनीटोरियम युग (1900-1947)
बिसवी सदी की शुरुआत मे टीबी को एक लाईलाज बीमारी और एक कलंक के रूप मे देखा जाता था। वर्ष 1906 मे टीबी के इलाज के लिए भारत मे पहला सैनिटोरियम(खुली हवां और आराम केंद्र) को तिलाउनिया अजमेर मे खोला गया।
वर्ष 1939 मे ट्यूबरकुलोसिस एसोसिएशन ऑफ इंडिया-TAI की स्थापना हुई जिसने टीबी के प्रति जागरूकता और धन जुटाने के लिए टीबी सील अभियान की शुरुआत की।
2. स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय कार्यक्रम (1948-1992)
आजादी के बाद टीबी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन कर उभरी। उसी परिदृश्य मे 1948 मे बीसीजी टीकाकरण का बड़े पैमाने पर परीक्षण शुरू हुआ। मद्रास मे 1956 मे 'किमोथेरेपी सेंटर की स्थापना हुई। यहाँ के शोध ने बताया की टीबी का इलाज घर पर रहकर भी दवाओ से किया जा सकता है,अस्पताल मे भर्ती होने जरूरत नहीं है।
आगे चलकर वर्ष 1962 मे भारत सरकार ने "राष्ट्रीय क्षय रोग कार्यक्रम-NTP" शुरू किया। इसमे जिला स्तर पर टीबी केंद्रों की स्थापना की गई, लेकिन निगरानी के अभाव मे यह कार्यक्रम सफल नहीं हो सका।
3. डॉटस (DOTs) और आरएनटीसीपी (1993-2019)
फिर 1990 के दशक मे टीबी के मामलों को देखते हुए रणनीति को बदला गया और 1993 मे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने टीबी को 'वैश्विक आपातकाल' घोषित किया और भारत ने "संसोधित राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम"(RNTCP) का परीक्षण शुरू किया।
- DOTS: वर्ष 1997 मे DOTS(Directly Observed Treatment, Short-Course) रणनीति लागू की गई जिसमे स्वास्थ्य कार्यकर्ताओ की देख रेख मे मरीजों को दवा खिलाई जाती थी।
- वर्ष 2006 मे पूरे देश को RNTCP के दायरे मे लाया गया, जिससे इलाज की सफलता दर मे सुधार हुआ।
- वर्ष 2012 मे टीबी को "अधिसूचित बीमारी"(Notifiable Disease)घोषित किया गया। यानि निजी डाक्टरों को भी टीबी के मामलों की जानकारी सरकार को देना अनिवार्य कर दिया गया।
4. उन्मूलन की ओर NTEP (2020 से वर्तमान)
भारत ने अब टीबी नियंत्रण से आगे बढ़ाकर टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। वर्ष 2018 मे प्रधानमंत्री ने "टीबी मुक्त भारत अभियान" की घोषणा की और वर्ष 2025 तक भारत को टीबी मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया।
- वर्ष 2020 मे कार्यक्रम का नाम बदलकर राष्ट्रीय क्षयरोग उन्मूलन कार्यक्रम- NTEP कर दिया गया।
- वर्ष 2022 मे "निश्चय मित्र" पहल की शुरुआत की गई ताकि समाज के लोग सीधे मरीजों की मदद कर सके।
1. राष्ट्रीय क्षयरोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP)
सरकार ने पुराने "संसोधित राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम (RNTCP)" का नाम बदलकर 2020 मे "राष्ट्रीय क्षयरोग उन्मूलन कार्यक्रम-NTEP" कर दिया है। इसका मुख्य आधार चार स्तंभों पर टीका हुआ है -
- Detect(पहचान): सभी रोगियों का शीघ्र और सटीक पहचान करना।
- Treat(उपचार): सभी रोगियों को मुफ़्त और गुणवत्तापूर्ण दवाईया उपलब्ध करवाना।
- Prevent(रोकथाम): उच्च जोखिम वाले समूहों मे संक्रमण को फैलने से रोकना।
- Build(निर्माण): मजबूत बुनियादी ढांचे और डिजिटल निगरानी प्रणाली का निर्माण।
2. प्रमुख सरकारी पहल और योजनाए
- प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान: इसे सितंबर 2022 मे शुरू किया गया था। इसमे टीबी रोगियों को सामाजिक और पोषण संबंधी सहायता प्रदान करने के लिए समुदाय को जोड़ना है।
- निक्षय मित्र (Ni-Kshay-Mitra): इसके तहत कोई भी व्यक्ति,संस्था या कॉर्पोरेट किसी टीबी रोगी को गोद ले सकता है और उसे पोषण जांच या व्यावसायिक सहायता प्रदान कर सकता है।
- निक्षय पोषण योजना: टीबी के इलाज के दौरान पोषण के लिए मरीजों को उनके बैंक खाते मे सीधे Rs 1,000 रुपया प्रति माह वित्तीय सहायता दी जाती है।
- निक्षय पोर्टल: यह एक ऑनलाइन डेटा बेस है जो रियल टाइम मे टीबी मरीजों की निगरानी और उनके इलाज के ट्रैक को रिकार्ड करता है।
3. आधुनिक तकनीक और नवाचार
- आर्टिफिसियल इंटेलिजेंसी AI: अब AI आधारित चेस्ट एक्सरे का उपयोग उन मरीजों की पहचान के लिए किया जा रहा है जिनमे लक्षण नहीं दिखते।
- मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स: पारंपरिक जांच के बजाय अब सीबी-नॉट (CB-NAAT) जैसी मशीनों का उपयोग हो रहा है, ड्रग्स रेसिस्टेंट टीबी का भी तुरंत पता लगा लेती है।
- वयस्क बीसीजी टीकाकरण: हाल ही मे 18 राज्यों मे उच्च जोखिम वाले वयस्कों जैसे मधुमेह रोगी या कुपोषित लोग के लिए बीसीजी का टीकाकरण अभियान शुरू किया गया है।
- विश्व का सबसे बड़ा टीबी प्रयोगशाला: भारत मे 9,800 से अधिक तीव्र आणविक परीक्षण सुविधाएं और 107 मान्यता प्राप्त टीबी संवर्धन एवं औषध संवेदनशीलता प्रयोगशालाएं शामिल है। 2,000 AI सक्षम हैंडहेल्ड एक्सरे मशीन लगाई जा रही है।
4. वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ताजा वैश्विक रिपोर्ट 2025 के अनुसार भारत मे 2015 से 2024 के बीच टीबी के मामलों मे 21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। जिससे अब प्रति एक लाख जनसंख्या पर टीबी के मामले 237 से घटकर 187 रह गए है। जो वैश्विक गिरावट 12% का लगभग दोगुना है।
इसी अवधि मे टीबी से होने वाली मृत्यु दर मे भी 25 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है जो प्रति एक लाख जनसंख्या पर 28 से घटकर 21 हो गई है।
इसके साथ ही भारत ने 90% की उपचार सफलता दर हासिल की है जो वैश्विक 88% से अधिक है।
इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए भारत ने इस अवधि मे यानि वर्ष 2015-16 से लेकर 2025-26 के बीच टीबी कार्यक्रमों के लिए वित्तीय आँवटन मे 10 गुण से अधिक का वृद्धि किया गया है।
- टीबी मुक्त पंचायत पहल: वर्ष 2023 मे टीबी मुक्त पंचायत पहल शुरू की गई जिसमे स्थानीय स्वशासन,ग्राम पंचायतों एवं उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों को टीबी उन्मूलन कार्यक्रम मे शामिल किया गया। ग्राम प्रधानों को अपने अधिकार क्षेत्र मे टीबी के परिणामों की जिम्मेदारी लेने को प्रोत्साहन और सामुदायिक जबावदेही तय की गई।
- राजनीतिक नेतृत्व भागीदारी: स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने निर्वाचित प्रतिनिधियों जिनमे संसद से लेकर ग्राम पंचायत स्तर के सदस्यों को टीबी मुक्त भारत अभियान के कार्यक्रमों और लक्ष्यों मे शामिल किया गया। वर्ष 2025 तक 30,000 से अधिक निर्वाचित नेताओ ने इस अभियान मे भाग लिया और सामुदायिक जागरण का साधन बने।
- "जहां रोगी जाता है वहां जाए": चूंकि भारत मे आधा से अधिक रोगी निजी क्षेत्र मे इलाज कराते है इसलिए सरकार का पहल "जहां रोगी जाता है वहां जाए" कार्यक्रम से निजी क्षेत्र को जोड़ा गया जिससे निजी क्षेत्र मे टीबी मामलों की सूचनाओ मे 24 गुना वृद्धि हुई है।
- उप-नैदानिक टीबी: ऐसी स्थिति मे रोगी मे टीबी का कोई लक्षण नहीं दिखता है और न असामान्य लगता है लेकिन टीबी से संक्रमित रहता है और दूसरों को संक्रमित करता रहता है। उन्हे पहचान करने के लिए 2025 मे 100 दिन का टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत 347 जिलों मे 20 करोड़ से अधिक संवेदनशील व्यक्तियों की जांच की गई जिनमे से 28 लाख से अधिक टीबी मामलों का पता चला जिनमे 9 लाख से अधिक बिना लक्षण वाले टीबी रोगी थे।
चुनौतियां
दवा-प्रतिरोधी टीबी भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व मे टीबी उन्मूलन की सबसे बड़ी चुनौतियों मे से एक बनी हुई है। साथ ही भारत मे आज भी कई लोग सामाजिक डर के कारण टीबी के रोग को छुपा कर रखते है जिससे संक्रमण बढ़ने का खतरा हमेशा बना रहता है।
तीसरा सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है जो भारत मे टीबी के कारणों मे से भी एक है और वो है कुपोषण। आज भी भारत मे कुपोषण और भुखमरी मे जीने वाले लोग है,इस सामाजिक और आर्थिक कमजोरी को जब तक दूर नहीं किया जाएगा टीबी हमेशा किसी न किसी को धर दबोचेगी।
--सितंबर 2022 मे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कर कमलों द्वारा शुरू की गई "निक्षय मित्र पहल" ने सामुदायिक भागीदारी को संस्थागत रूप प्रदान किया है। अभी तक 7 लाख से अधिक निक्षय मित्रों ने सामूहिक रूप से टीबी प्रभावित लोगों को 49 लाख से अधिक का पोषण संबंधित वस्तुएं वितरित की है।
--2025 मे युवा मामले और खेल मंत्रालय के सहयोग से इस तंत्र को अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए 'दो लाख से अधिक' "माई भारत स्वयंसेवक" के माध्यम से लोगों को मनोवैज्ञानिक सहायता,अनुपालन परामर्श,और सामुदायिक सहयोग मे शामिल किया गया।
निक्षय मित्र बनने की पूरी प्रक्रिया
निक्षय मित्र बनना बहुत हि नेक पहल है। इसमे आप टीबी के मरीज को पोषण,जांच या व्यावसायिक सहायता प्रदान करके उनके ठीक होने की प्रक्रिया मे सीधे भागीदार बन सकते है।कोई भी बन सकता है "निक्षय मित्र"
यहां निक्षय मित्र बनने की पूरी प्रक्रिया चरण-दर-चरण दी गई है -
1. निक्षय पोर्टल पर पंजीकरण (Registration)
सबसे पहले आप आधिकारिक बेबसाइट पर जाना होगा इसके लिए आपको यहां बेबसाइट का लिंक दिया गया है ताकि आपको ज्यादा खोजना और परेशान नहीं होना पड़े आप सीधे लिंक पर टच करके इसके बेबसाइट पर जा सकते है -
- बेबसाइट: https://communitysupport.nikshay.in पर जाएं।
- वहां "Registration as Ni-Kshay Mitra" बटन पर क्लिक करे।
- अब आप एक व्यक्ति,NGO,कॉर्पोरेट संस्था या राजनीतिक दल के रूप मे पंजीकरण कर सकते है।
2. विवरण दर्ज करे (Filling Details)
पंजीकरण फार्म मे आपको निम्नलिखित जानकारी देनी होगी -
- अपना नाम और संपर्क विवरण(नाम और मोबाईल नंबर)
- आपका आधार नंबर या कोई एक अधकारिक पहचान पत्र
- वह क्षेत्र (राज्य,जिला,तालुका)जहां आप मदद करना कहते है।
3. सहायता का चयन (Selection of Support)
आप तय कर सकते है की आप किस तरह की सहायता देना चाहते है -
- पोषण सहायता(Nutrition Support): आप मरीज को हर महीने पोषण किट दे सकते है।
- अतिरिक्त जांच सहायता: मरीज को हमेशा जरूरी जांच मे सहायता कर सकते है।
- व्यावसायिक सहायता: इसमे आप मरीज को काम सिखाने या रोजगार मे मदद कर सकते है।
4. अवधि और मरीजों की संख्या
- इसमे आप चुन सकते है की आप कितने मरीजों की जिम्मेदारी लेना चाहते है।
- सहायता की न्यूनतम अवधि 6 महीने से लेकर 3 साल तक की हो सकती है।
5. जिला क्षय रोग अधिकारी से संपर्क
आप पंजीकरण के बाद, संबंधित जिले के "जिला क्षय रोग अधिकारी(DTO) से संपर्क करेंगे। वे आपको उन मरीजों की सूची देंगे जिन्हे सहायता की आवश्यकता है। आप सीधे मरीजों से मिलकर या क्षय रोग केंद्र कार्यकर्ता के माध्यम से अपनी सहायता उन लोगों तक पहुचा सकते है।
पोषण किट मे क्या होना चाहिए: सरकार द्वारा अनुशंसित मानक पोषण किट मे आपतौर पर ये चीजे शामिल होती है -
- 3 किलो अनाज (गेहू,चावल)
- 1.5 किलो दाले।
- 1 किलो मूंगफली
- 1 लीटर खाद्य तेल।
- दूध पाउडर या अंडे
- सामाजिक प्रभाव: आपकी छोटी सी मदद से किसी की जान बच सकती है और देश टीबी मुक्त बन सकता है।
- प्रशंसा पत्र: भारत सरकार द्वारा निक्षय मित्रों को उनके सेवा के लिए डिजिटल सर्टिफिकेट या प्रशंसा पत्र भी देती है।
टीबी के खिलाफ यह जंग सिर्फ सरकार या डाक्टरों की ही नहीं है,यह हम सब कि है। एक छोटा सा कदम एक बड़ी जान बचा सकता है।
आप क्या कर सकते है -
1. निक्षय मित्र बने Nikshay Portal पर जाए रजिस्ट्रेशन करे और एक मरीज के पोषण का जिम्मा ले।
2. अगर आपके आस-पास किसी को दो सप्ताह से ज्यादा खांसी है तो उसे तुरंत जांच की सलाह दे।
3. यदि आप पहले से ही किसी सामाजिक सेवा से जुड़े है तो कमेन्ट मे जरूर बताए।
चलो भारत को साथ मिलकर #TBFreeIn2026 मे योगदान दे।
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