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| महर्षि पतंजलि का योगसूत्र ,अष्टांगयोग से समग्र कल्याण की प्राप्ति |
योग, मानव सभ्यता मे भारत का एक सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। क्योंकि, यह सकारात्मक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण प्राप्त करने का एक साधन और मापदंड है। महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग और समग्र कल्याण आठ जुड़े हुए चरणों मे संगठित है जो मानव के बाह्य आचरण से लेकर आंतरिक चेतना तक सकारात्मक प्रभाव प्रदान करता है।
- यह, सही ढंग से जीवन जीने की कला है।
- यह आत्म अनुशासन है जो कल्याण की ओर ले जाता है।
- योग प्रत्येक क्षण प्रसन्न रहने की अवस्था है।
- योग, मन नियमन के माध्यम से किया जाने वाला विशिष्ठ शारीरिक अभ्यास है।
- इसका अभ्यास शरीर,मन और आत्मा के सर्वोच्च सामंजस्य की प्राप्ति मे सहायक है।
योग आत्मबोध है
प्राण, स्वयं के भीतर विद्यमान जीवन ऊर्जा है जिसमे महान शक्ति निहित होता है। और इस प्राण की सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति हमारा मन है।
- प्राण, ही स्वास स्पंदन को उत्पन्न करता है और यही प्राण हृदय की गतिविधि को नियंत्रित करता है।
- प्राण हमारे सभी मानसिक कार्यों और कल्याण के स्रोत की शक्ति केंद्र है।
- अधिक भौतिकता, मे लिप्त होने से यह प्राण ऊर्जा कमजोर होती है और कल्याण को पोषित करने वाली ऊर्जा को संचित नहीं कर पाती है।
- योगिक अभ्यास से यह प्राण ऊर्जा मजबूत बनती है जिससे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली सही कार्य करती है और हमारा कल्याण बढ़ने लगता है।
योग सशक्तीकरण है
योग, का अभ्यास हमे "स्वयं मे विश्वास" प्रदान कराता है क्योंकि यह मन,विचार और कर्मों को सशक्त बनाता है। यह हमे ज्ञान,शुद्धता, सर्वप्रेम,जीवन मे शांति,प्रसन्नता,इच्छाशक्ति और कल्याण जैसे मूल्यों को बढ़ाता है।
- योग हमे 'विनम्र' बनाता है जिससे सद्गुण,स्वस्थ्य और दीर्घायु जीवन मजबूत होता है।
- योग, स्वीकार्यता और सहनशीलता को बढ़ाता है जिससे भावनात्मक और शारीरिक कल्याण प्राप्त होता है।
- योग यह ज्ञान देता है की 'वायु ही आहार' है और इसे हमेशा शुद्ध रूप मे ही लेना चाहिए।
- योग संतुलित आहार को महत्व देता है और बताता है की सकारात्मक स्वास्थ्य के लिए भोजन मे संयम अत्यंत आवश्यक है।
कल्याण क्या है ? जिसकी महत्ता योग मे है
कल्याण, उच्च स्तर के स्वास्थ्य की अवस्था है अर्थात स्वस्थ्य होना और स्वस्थ्य बने रहना ही कल्याण है।व्यक्ति के प्रतिदिन के निर्णय, उसके कल्याण को सकारात्मक या नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
नेशनल वेलनेस इंस्टिट्यूट के अनुसार कल्याण के प्रमुख घटक इस प्रकार है --
- शारीरिक कल्याण: उचित, आहार,दैनिक गतिविधियां,व्यायाम,नींद जल सेवन और शरीर की गतिविधियां इन सबके माध्यम से शारीरिक कल्याण मिलता है।
- मानसिक एवं भावनात्मक कल्याण: यह आत्म-जागरूकता और मनोवैज्ञानिक लचीलापन पर केंद्रित है।
- बौद्धिक कल्याण: इसमें, निर्णय लेने की क्षमता,विवेक,निरंतर सीखना,रचनात्मकता और जिज्ञासा जैसे तत्व शामिल है।
- आध्यात्मिक कल्याण: जीवन के अर्थ और उद्देश्य की खोज,स्वयं से बड़े किसी तत्व से जुड़ाव,अनुष्ठान और जीवन लक्ष्य आध्यात्मिक कल्याण प्रदान करते है।
- व्यावसायिक कल्याण: कार्य, के माध्यम से आय अर्जित करना और उसे खर्च करना।
- सामाजिक कल्याण: आपसी संवाद,प्रियजनों से जुड़ाव और सामुदायिक सहयोग से सामाजिक कल्याण प्राप्त होता है।
- पर्यावरणीय कल्याण: अपने आस-पास के वातावरण के प्रति जागरूक होना और उसका सम्मान एवं संरक्षण करने से प्राप्त होता है।
समग्र कल्याण क्या है ?
समग्र कल्याण, एक व्यापक दृष्टिकोण है जिसमे कल्याण के उपरोक्त सभी घटक समाहित हो जाते है।
- इसमें व्यक्ति को एक सम्पूर्ण इकाई के रूप मे देखा जाता है और उसके सभी आयाम आपस मे जुड़े होते है।
- यह केवल रोगों के अनुपस्थिति तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें संतुलन,आत्म जागरूकता, सजगता,उचित पोषण,व्यायाम और तनाव प्रबंधन जैसे तत्व शामिल है जो दीर्घकालिक कल्याण और आंतरिक शांति प्रदान कराते है।
- 1.यम (नैतिक संयम ): यह उस प्रकार को दर्शाता है जिससे हम संसार से संबंध रखते है। इसमें, पांच नैतिक नियम बताए गये है -अहिंसा ( हिंसा न करना ),सत्य,अस्तेय (चोरी न करना),ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (असंग्रह)। ये मूल्य ईमानदारी,सामाजिक सामंजस्य और सामाजिक कल्याण को बढ़ाते है।
- 2. नियम ( व्यक्तिगत आचरण): यह आंतरिक अनुशासन, और आत्म-विकास के लिए व्यक्तिगत आचरणों से संबंधित है। इनमे शामिल है - शौच (शुद्धता),संतोष,तप (अनुशासन),स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान (उच्च शक्ति के प्रति समर्पित)। ये मानसिक कल्याण को पोषित करते है।
- 3. योगासन: "स्थिरसुखमासनम्, प्रयत्नशैथिल्यं अनंतसमापत्तिभ्याम्" - यह महर्षि पतंजलि का योगासन संबंधी सूत्र है। यानी आसान वह है जो स्थिर और सुखद हो। प्रयास को शिथिल करने से अनंत के साथ एकात्मकता प्राप्त होती है। योगासन से समग्र कल्याण प्राप्त होता है।
- 4. प्राणायाम ( योगिक श्वास जागरूकता): श्वास के प्रति जागरूकता विश्राम और उपचार की कुंजी है। यह शरीर से विषैले तत्वों के निष्कासन,मरम्मत और पुनर्जीवन मे सहायक होती है जिससे तनाव बाहर निकलती है और शांति,सौम्यता एवं मानसिक संतुलन उत्पन्न होता है। यह व्यक्ति कि करुणा और समझ को बढ़ाती है।
- 5. प्रत्याहार ( इंद्रिय संयम ): यह बाह्य और आंतरिक अभ्यास के बीच सेतु है जहां ध्यान बाहरी इंद्रिय से विरक्त होकर भीतर की ओर केंद्रित होता है।
- 6. धारणा ( एकाग्रता ): यह दृष्टिकोण, मानसिक और सामाजिक अनुशासन पर केंद्रित है। इसमें शामिल है जैविक घड़ी के अनुरूप जीवन शैली का अभ्यास,संवाद से हमेशा स्पष्ट, मुक्त ताजा और हमेशा लचीला रहना -इन सबका प्रतिदिन अभ्यास।
- 7. ध्यान (ध्यानाभ्यास): ध्यान, बहुत महत्वपूर्ण है और कई चरणों मे आगे बढ़ती है। एकाग्र ध्यान मे मंत्र ध्यान शामिल हो सकता है,श्वसन ध्यान मे श्वास पर ध्यान केंद्रित होता है,मौन ध्यान मे बिल्कुल मौन का अनुभव, से बढ़ती है। ध्यान आत्मावलोकन और एकाग्रता के अविच्छिन्न प्रवाह की अवस्था है।
- 8. समाधि: यह परम आनंद, और आत्मबोध की अंतिम अवस्था है। इसमें मानव ब्रह्मांड के साथ गहन एकात्मकता का अनुभव प्राप्त करता है।
उपरोक्त योगिक सिद्धांत नींद और समग्र स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालता है जिससे हृदयाघात,रक्तचाप और श्वसन दर मे संतुलन स्थापित होता है,पाचन मे सुधार होता है और रक्त शर्करा को सामान्य बनाए रखता है।
योग, विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय है जो कल्याण को समृद्ध,सशक्त और पोषित करता है।
निष्कर्ष
चूंकि मानव, हमेशा अपने कल्याण के लिए कार्यरत रहता है और हमेशा परेशान रहता है। वह कुछ कल्याण के घटकों को प्राप्त कर भी लेता है, लेकिन समग्र कल्याण को नहीं प्राप्त कर पाता है। वही योग, और खासकर महर्षि पतंजलि का अष्टांगयोग समग्र कल्याण की अवधारणा को पूरी तरह से प्राप्त कराने मे सक्षम है।
अतः हमे समग्र कल्याण को प्राप्त करने के लिए, योग की ओर पुनः बढ़ना होगा और थोड़ा ही मात्रा सही इसे अपने जीवनचर्या मे शामिल करना ही होगा।
मैं आप सबसे आत्मचिंतन करने के लिए आग्रह करता हूं कि "कल्याण का भविष्य बाहरी उपचारों मे नहीं बल्कि जागरूकता,सामंजस्य और आनंद के साथ जीवन जीने की आंतरिक क्षमता मे निहित है जो योग से प्राप्त होती है"। यदि आप सहमत हो तो जरूर कॉमेंट मे बताए !
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs )
प्रश्न 1. महर्षि पतंजलि कौन थे?
उत्तर: महर्षि पतंजलि, प्राचीन भारत के महान ऋषि और योग दर्शन के प्रवर्तक माने जाते है। उन्होंने योग सूत्र (Yoga Sutra) पुस्तक की रचना की थी जिसमे योग के सिद्धांत और अष्टांगयोग का विस्तृत वर्णन मिलता है।
प्रश्न 2. अष्टांगयोग क्या है?
उत्तर: अष्टांगयोग, योग का वह मार्ग है जिनमे आठ अंग होते है-यम,नियम,आसान,प्राणायाम,प्रत्याहार,धरण,ध्यान, और समाधि। इन आठों, चरणों के अभ्यास से मनुष्य का शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है।
प्रश्न 3. अष्टांगयोग, का समग्र कल्याण से क्या संबंध है?
उत्तर: अष्टांगयोग व्यक्ति के शरीर मन और आत्मा को संतुलित करता है। इसके नियमित अभ्यास से तनाव कम होता है,मानसिक शांति मिलती है और जीवन मे संतुलन आता है जिससे व्यक्ति समग्र कल्याण को प्राप्त होता है।
प्रश्न 4. क्या अष्टांगयोग केवल योगाभ्यास तक ही सीमित है?
उत्तर: नहीं अष्टांगयोग केवल शारीरिक योगासन नहीं है। यह एक समग्र, जीवन पद्धति है जो नैतिकता,अनुशासन और मानसिक संतुलन एवं आध्यात्मिक विकास पर भी जोर देती है।
प्रश्न 5. अष्टांगयोग, का अभ्यास रोजमर्रा के जीवन मे कैसे किया जा सकता है?
उत्तर: दैनिक जीवन मे -सत्य,अहिंसा और अनुशासन का पालन करना तथा नियमित योग और ध्यान करना एवं सकारात्मक सोच बनाए रखना अष्टांगयोग को अपनाने के सरल तरीके है।
प्रश्न 6. अष्टांगयोग, मानसिक स्वास्थ्य को कैसे सुधारता है?
उत्तर: प्राणायाम और ध्यान जैसे अभ्यास तनाव,चिन्ता और नकारात्मक विचारों को कम करते है। इससे मन, शांत और एकाग्रचित बनता है जिससे मानसिक स्वास्थ्य सही रहता है।
प्रश्न 7. आधुनिक जीवन, मे अष्टांगयोग क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: आज कल की भागदौड़ भरी जीवन शैली मे अष्टांगयोग शरीर को स्वास्थ्य,मन को शांत, और जीवन को संतुलित बनाने मे मदद करता है। इसीलिए ये आधुनिक समाज के लिए उपयोगी और महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 8. अष्टांगयोग, के आठ कौन कौन से अंग है?
उत्तर: अष्टांगयोग के आठ आंग इस प्रकार से है --
- यम ( नैतिक नियम )
- नियम, (व्यक्तिगत अनुशासन )
- आसान ( शारीरिक मुद्राएं )
- प्राणायाम ( श्वास नियंत्रण )
- प्रत्याहार, ( इंद्रियों का नियंत्रण )
- धारणा (एकाग्रता )
- ध्यान (मेडिटेशन)
- समाधि (आत्मिक एकता )
