📌 संक्षेप में (Quick Summary)
- ZBNF-जिसमें किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जगह देशी गाय के गोबर एवं गोमूत्र पर आधारित खेती करता है जिसमे बाहरी लागत जीरो होती है।
- SPNF-सुभाष पालेकर जी के नाम पर "सुभाष पालेकर नेचुरल फार्मिंग" नामकरण हो गया है।
- इसका उदेश्य-खेती की लागत=0 के करीब। मिट्टी की सेहत=बेहतर। किसान की आय=ज्यादा रसायन=पूरी तरह से बंद
- इसके 4 पिलर-1️⃣ बीजामृत (Beejamrit) 2️⃣ जीवामृत (Jeevamrit)। 3️⃣ आच्छादन (Mulching) 4️⃣ वाफसा (Waaphasa)
- परिणाम:किसानों की कर्जमुक्त खेती+सस्टैनबल और लाभदायक खेती+रसायन रहित खेती+मिट्टी की गुणवत्ता+अच्छा स्वास्थ्य और कैंसर से मुक्ति।
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| पूरी तरह से देशी गाय के गोबर और गोमूत्र आधारित 'शून्य बजट प्राकृतिक खेती'करता किसान |
📑 Table of Contents
- ➤ प्रस्तावना
- ➤सुभाष पालेकर कौन है ? उनका संघर्ष और शोध
- ➤ ZBNF/SPNF का मूल सिद्धांत क्या है ?
- ➤ एक गाय से 30 एकड़ खेती का गणित
- ➤ प्राकृतिक खेती के 4 मुख्य स्तम्भ (The 4 Pillars)
- ➤ प्राकृतिक खेती के अन्य घटक
- ➤ मिश्रित खेती को अपनाए
- ➤ देशी गाय का महत्व
- ➤ आर्थिक लाभ क्या होगा ?
- ➤ निष्कर्ष
- ➤ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQ
प्रस्तावना (Introduction)
वर्तमान आधुनिक समय में जब भी खेती की बात आती है,तो आखों के सामने ट्रैक्टर,महंगी कीटनाशक दवाईयां,और यूरिया एवं डीएपी की बोरियां तैरनें लगती है।यही से मन में सवाल उठता है कि जिस खेती को हम आधुनिक कह रहे है,क्या वह सही में हमारे किसानों को समृद्ध बना रही है ?
सच्चाई इसके बिल्कुल उलट ही है। आज का खेती बाजार की महंगी बीजों,दवाइयों और उपकरणों के बोझ तलें दबा हुआ है और साथ में ऊपर से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति भी कम होती जा रही है। इतना ही नहीं हमारा भोजन भी रसायनों के कारण बीमारियों का घर बनता जा रहा है।
इसी हताश भरे माहौल में और किसानों की समस्याओं का समाधान करने के लिए पद्मश्री सुभाष पालेकर जी की "शून्य बजट प्राकृतिक खेती" (Zero Budget Natural Farming) एक चमत्कार की तरह आई है। उन्होंने दावा किया कि "मात्र एक देशी गाय के सहारे 30 एकड़ जमीन पर सफल खेती की जा सकती है" को पहली बार सुनने पर नामुमकिन सा लगता है।
लेकिन भारत के हजारों सफल किसानों नें इस विधि से खेती करके इसे सच कर दिखाया है। और यह कोई जादू नहीं,बल्कि प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे पालेकर जी ने आधुनिक रूप प्रदान किया है।
आइए जानते है की कैसे 1 गाय आपके 30 एकड़ के साम्राज्य को पूरी तरह से बदल सकती है और आपको समृद्ध बना देती है -
सुभाष पालेकर कौन है ? उनका संघर्ष और शोध
पद्मश्री सुभाष पालेकर भारत के एक प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और किसान है,जिन्हे शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) का जनक माना जाता है। उन्होंने भारतीय खेती को रसायनों के चंगुल से निकालकर फिर से प्रकृति की ओर मोड़ने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है -
- जन्म: महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले के बेलोरा गाँव में हुआ था।
- शिक्षा: उन्होंने कृषि स्नातक की पढ़ाई की थी।
- शुरुआत: उन्होंने शुरुआत में खेती में रसायनों के उपयोग से किया था लेकिन आगे चलकर 1986 से 1995 तक के बीच मे जंगलों की कार्यप्रणाली पर गहरा शोध किया।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती का सिद्धांत:
उन्होंने सिद्धांत दिया कि खेती के लिए बाहर से कुछ भी खरीदने की जरूरत नहीं है। मिट्टी मे पहले से ही सभी जरूरी चीजें मौजूद रहती है। उनके मॉडल के चार मुख्य स्तम्भ है -
- जीवामृत: गाय के गोबर और मूत्र से बना घोल जो मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या को बढ़ाता है।
- बीजामृत: बीजों को बीमारियों से बचाने के लिए उनका प्राकृतिक उपचार।
- आच्छादन: मिट्टी को फसल के अवशेषों से ढकना ताकि नमी बनी रहे और केंचुए सक्रिय हो।
- वाफसा: मिट्टी में हवा और नमी का सही संतुलन बनाना।
प्रमुख उपलब्धियाँ:
- पद्मश्री: खेती में उनके अमूल्य योगदान के लिए वर्ष 2016 मे पद्मश्री का सम्मान प्रदान किया गया।
- नाम परिवर्तन: उनके मॉडल को अब "सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती (SPNF) के नाम से जाना जायेगा।
- वैश्विक प्रभाव: उनके सिद्धांत को देश में कई क्षेत्रों में किसानों ने अपनाना शुरू कर दिया है और उसका लाभ नजर आने लगा है। साथ ही विदेशों में भी चर्चा हो रही है।
उनका मुख्य दर्शन यही है कि "एक गाय से 30 एकड़ खेती" और उनके सिद्धांत को गहराई से जानने के लिए उनके द्वारा रचित दो पुस्तके -
- प्राकृतिक खेती (The Philosophy of spiritual Farming)
- शून्य बजट प्राकृतिक खेती (Zero Budget Natural Farming)
यदि आप इन पुस्तकों को पढ़ ले तो आपका जीवन प्राकृतिक खेती और लाभदायक खेती में बदल जायेगा।
ZBNF/SPNF का मूल सिद्धांत क्या है ?
जीरो बजट प्राकृतिक खेती एक ऐसी खेती पद्धति है,जिसमें किसान बाहरी खर्च यथा खाद,कीटनाशक,बीज और रसायन आदि को शून्य कर देता है और प्रकृति एवं देशी गाय पर आधारित खेती करता है। Zero Budget का मतलब है -"किसान को खेती के लिए बाजार से कुछ भी खरीदना न पड़े"
यानि खेती की सारी जरूरते खेत और गॉव से ही पूरी हो जाए। इसका मुख्य उदेश्य है -
- खेती की लागत = 0 के करीब हो।
- मिट्टी की सेहत = बेहतर हो।
- किसान की आय = ज्यादा हो।
- रसायन = पूरी तरह बंद हो।
यदि इस उदेश्य के साथ खेती की जाएगी तो इन समस्याओं से मुक्ति मिलेगी -
- मिट्टी को बंजर होने से मुक्ति मिलेगी।
- खेती में बढ़ती लागत से मुक्ति मिलेगी।
- किसानों को कर्ज से मुक्ति मिलेगी।
- फसलों की गिरती गुणवत्ता से मुक्ति मिलेगी।
👉इसीलिए शून्य बजट प्राकृतिक खेती को :किसानों को कर्जमुक्त खेती" भी कहा जा रहा है।
यह पद्धति पूरी तरह वैज्ञानिक और व्यवहारिक है क्योंकि देश में हजारों किसान इस विधि से खेती करके एक गाय के सहारे बड़े रकबे में जहर मुक्त और कम लागत वाली खेती कर रहे है।
एक गाय से 30 एकड़ खेती का गणित
श्री सुभाष पालेकर जी के अनुसार एक देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से 30 एकड़ जमीन के लिए पर्याप्त उर्वरक तैयार किया जा सकता है। हां गाय पूरी तरह से स्वदेशी नस्ल की होनी चाहिए जैसे गीर नस्ल की गाय या साहिवाल,हरियानवी,थारपारकर आदि।
उन्होंने जो समझाया उसे संक्षेप में हम इस तरह से समझ सकते है -
1. जीवामृत की शक्ति:
प्राकृतिक खेती का मुख्य आधार जीवामृत है। एक देशी गाय एक दिन में लगभग 10-12 किलो गोबर और 5-10 लीटर मूत्र देती है।
- महिनें का गणित: एक महिनें में लगभग 300 किलो गोबर प्राप्त होता है।
- जरूरत: 1 एकड़ के लिए एक बार में 10 किलो गोबर और थोड़े मूत्र की आवश्यकता पड़ती है।
- सूक्ष्मजीवों का विस्तार: जीवामृत खाद नहीं है,बल्कि एक कल्चर (Culture) है जो मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों और केंचुओ को सक्रिय कर देता है।
2. मुख्य घटक: एक एकड़ के लिए:
30 एकड़ की खेती के लिए आप बारी बारी से निम्नलिखित मिश्रण तैयार करते है -
- गोबर: 10 किलो।
- गोमूत्र: 5-10 लीटर।
- गुड़: 1-2 किलो।
- बेसन: 1-2 किलो।
- मिट्टी: मुठ्ठी भर पीपल के पेड़ के नीचे का मिट्टी।
- पानी: 200 लीटर।
इस 200 लीटर के घोल को 2-7 दिनों तक सड़ाया जाता है फिर सिंचाई के पानी के माध्यम से छिड़काव के साथ माध्यम से खेत में डाला जाता है।
(और भी सहायक उपाय साथ में किये जाते है जिसका विवरण आगे स्वतः मिलेगा। )
प्राकृतिक खेती के 4 मुख्य स्तम्भ (The 4 Pillars)
सुभाष पालेकर जी ने शून्य बजट प्राकृतिक खेती के चार मुख्य स्तम्भ (Four Pillars) की बात की है जो इस पूरी पद्धति की नीव है। ये चार पिलर मिलकर मिट्टी को एक जीवित इकाई में बदल देते है,जिससे बाहर से किसी भी उर्वरक की जरूरत नहीं पड़ती है।
1. जीवामृत (Jeevamrit): सूक्ष्मजीवों का महासागर
जीवामृत इस खेती का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।यह खाद नहीं है बल्कि एक 'कल्चर' है जो मिट्टी में जीवाणुओं को करोड़ों गुण बढ़ा देता है -
- सामग्री और विधि: ठीक ऊपर बताए गए तरीकें से जीवामृत आसानी से घर पर देशी गाय के गोबर और मूत्र के साथ अन्य सामग्री को मिलकर उसे सड़ाकर बनाया जाता है।
- कार्य: मिट्टी में सुप्त अवस्था में पड़े केचुओं और सूक्ष्मजीवों को सक्रिय कर देता है।ये सूक्ष्मजीव मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों को पौधों को ग्रहण करने के रूप मे बदल देते है।
- वैज्ञानिक आधार: गाय के गोबर और मूत्र में करोड़ों बैक्टीरियां होते है। जब हम इसमें गुड़ और बेसन मिलाते है,तो ये उन बैक्टीरिया के लिए भोजन का कम करते है जिससे उनकी संख्या 48 घंटों में कई गुना बढ़ जाती है।
- प्रयोग: इसे हर 15 दिन में सिंचाई के पानी के साथ या सीधे मिट्टी में छिड़काव करके दिया जाता है।
2. बीजामृत (Beejamrit): बीजों का सुरक्षा कवच
खेती की शुरुआत बीज से होती है, और बीजामृत यह सुनिश्चित करता है कि बीज जन्म से ही स्वास्थ्य और रोगमुक्त हो -
- सामग्री और विधि: इसको बनाने के लिए भी देशी गाय की जरूरत पड़ती है और बिल्कुल आसानी से बनाया जा सकता है। इसमे लगने वाली सामग्री है -(1 एकड़ के लिए)
- पानी - 20 लीटर।
- देशी गाय का गोबर - 5 किलो (एक कपड़े में बांधकर)।
- देशी गाय का मूत्र -5 लीटर।
- चूना - 50 ग्राम (बुझा हुआ)।
- खेत की मिट्टी _ एक मुठ्ठी (मेड़ की उपजाऊ मिट्टी)
- विधि:
- गोबर का अर्क: 5 किलो गाय के गोबर को एक कपड़े में बांधकर पोटली बना ले। इस पोटली को 20 लीटर पानी में 12 घंटे के लिए लटका दे ताकि गोबर का सारा अर्क पानी मे मिल जाए।
- मिश्रण: 12 घंटे बाद गोबर की पोटली को हाथ से दबाकर निचोड़ ले और इसे 20 लीटर पानी में 5 लीटर गोमूत्र,एक मुठ्ठी मिट्टी और 50 ग्राम चूना को मिला दे।
- मिलाना: इस मिश्रण को डंडी से अच्छी तरह से मिला दे,अब यह तैयार हो चुका है।
- कार्य: बीज जनित रोगों और मिट्टी में मौजूद फंगस से बीजों की रक्षा करता है। यह बीजों के अंकुरण की दर को भी बढ़ाता है।
- प्रयोग: बुआई से पहले बीजों को इस मिश्रण के घोल से उपचारित किया जाता है। बड़े पौधों की जड़ों को भी रोपते समय बीजामृत के घोल में डुबोया जाता है।
3. आच्छादन (Mulching): मिट्टी का ढक्कन
प्राकृतिक खेती में जमीन को कभी भी नंगा (खुला) नहीं छोड़ा जाता है। मिट्टी को 'ढकना' ही आच्छादन या मल्चिंग कहलाता है।
- कार्य: यह मिट्टी की नमी को उड़ने से रोकता है,खरपतवार (Weeds) को कम करता है और केचुओं के लिए अनुकूल वातावरण बनाता है।
- प्रकार:
- मृदा आच्छादन: खेत की जुताई न करके मिट्टी की ऊपरी परत को बचाना।
- काष्ठ आच्छादन: फसल के अवशेषों (पुआल,घास,डंठल,पत्ते आदि )से जमीन को ढकना।
- सजीव आच्छादन: मुख्य फसल के साथ दलहन (दालें) उगाना,जो जमीन को ढक लेती है और मिट्टी को आक्सीजन भी प्रदान करती है।
- अन्य फायदा: सिंचाई के लिए पानी कम लगता है और मिट्टी में हमेशा नमी बनी रहती है। मिट्टी में सूक्ष्मजीवों और जीवाणुओं की संख्या मे वृद्धि होती है।
4. वाफसा (Waafasa): नमी और हवा का संतुलन
अक्सर लोग समझते है कि पौधों को पानी चाहिए, लेकिन पालेकर जी के अनुसार पौधों को केवल वाफसा (Moisture+Air) चाहिए। आमतौर पर किसान खेत में इतना पानी भर देते है कि मिट्टी के छिद्र बंद हो जाते है। लेकिन पौधों की जड़ों को जीवित रहने और बढ़ने के लिए 50% हवा और 50% जलवाष्प की जरूरत होती है।
इसी संतुलन वाली स्थिति को वाफसा कहते है। यानि "पौधे पानी नहीं पीते, वे पानी की भाप पीते है"
- खेत में वाफसा की स्थित बनाए: खेत में वाफसा स्थित बनाए रखने के लिए आपको ये तीन काम करने होंगे -
- भरपूर पानी न दे: खेत को कीचड़ जैसा न भरे। केवल इतना ही सिंचाई करे की नमी बनी रहे।
- दोपहर में सिंचाई से बचे: सिंचाई हमेशा शाम या सुबह में करे।
- मल्चिंग (आच्छादन)अनिवार्य: बिना जमीन ढकें वाफसा नहीं बन सकता,क्योंकि धूप सीधे मिट्टी पर पड़ेगी तो नमी भाप बनकर हवा में उड़ जाएगी और पौधों के जड़ों को नहीं मिलेगी।
- लाभ: 90% पानी की बचत होती है। जड़े मजबूत बनती है जिससे हवा या आंधी में बने रहते है। सूखे से बचाव होती है।
👉ये चारों, पिलर मिलकर एकसाथ कैसे काम करते है -
- बीजामृत से बीज सुरक्षित हुआ।
- जीवामृत ने मिट्टी में जीवन फूंका।
- आच्छादन नें उन सूक्ष्मजीवों को घर और सुरक्षा प्रदान की।
- वाफसा नें जड़ों को सांस लेने और बढ़ने के लिए, सही माहौल प्रदान किया।
प्राकृतिक खेती के अन्य घटक
सुभाष पालेकर जी की तकनीक का सबसे बड़ा मंत्र है -"बाजार से कुछ मत खरीदों"। जब किसान खाद और कीटनाशक खुद बनाता है, तभी उनकी खेती 'शून्य बजट" की खेती बनती है। आइए जानते है इन्हें बनाने की सटीक विधियाँ -
1. घन जीवामृत (Ghan Jeevamrut):
जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है या जहां सिंचाई के साथ जीवामृत देना संभव नहीं है, वहां घन जीवामृत का उपयोग किया जाता है -
- कैसे बनाए:
- 100 किलो गोबर में 1 किलो गुड़ ,1 किलो बेसन और थोड़ा सा गोमूत्र मिलकर अच्छी तरह से गूंथ ले। अब इसे छाया में सुखाकर बारीक कर ले।
- उपयोग:
- इसे बुआई के समय या बुआई के पहले ही खेत में छिड़का जा सकता है। इसे 6 महीनों तक स्टोर किया जा सकता है।
2. प्राकृतिक कीट नियंत्रक (Natural Pesticides):
प्राकृतिक खेती में फसलों को बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों की नहीं,बल्कि कडवें पौधों के अर्क की जरूरत होती है। जो निम्न तरह की है -
- A. अग्निअस्त्र (Agniastra):
इसका उपयोग इल्ली और कीड़ों से फसलों को बचानें के लिए किया जाता है।
- सामग्री:
- 10 लीटर गोमूत्र,1 किलो कडवें नीम की पत्तियां,500 ग्राम तीखी मिर्च का पेस्ट,500 ग्राम अदरख और लहसुन का पेस्ट।
- विधि:
- सबको मिलकर धीमी आंच पर तबतक पकाए जबतक घोल आधा न रह जाए। फिर इसे ठंडा करके छान ले। (नीम की पत्तियों का मिक्सी में पीसकर पेस्ट बना कर उपयोग करे)
- उपयोग:
- 2-3 लीटर, अग्निअस्त्र को 100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
- B. ब्रह्मास्त्र (Brahmastra):
इसका उपयोग चूसने वाले कीटों से फसलों को बचाने के लिए उपयोग किया जाता है -
- सामग्री:
- 10 लीटर गोमूत्र के साथ 5 तरह के कड़वे पत्तों (नीम,करंज,सीताफल,धतूरा,अमरूद,पपीता आदि) का मिश्रण। सभी कड़वे पत्तों को मिक्सी में पीसकर गोमूत्र में मिलाकर मिश्रण बना ले।
- विधि:
- सभी पत्तों के मिश्रण को गोमूत्र में देर तक उबाले और फिर दो दिनों तक रख दे। उसके बाद प्रयोग करें।
- C. नीमास्त्र (Neemastra):
नीमास्त्र, को उबलनें की जरूरत नहीं होती है। इसमें केवल गोबर,गोमूत्र और नीम की पत्तियों को पानी में 48 घंटे तक सड़ाकर बनाया जाता है। यह रस चूसने वाले कीटों और छोटे इलियों के लिए रामबाण इलाज है।
👉उपरोक्त प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग करने से -
- पर्यावरण सुरक्षा: दुश्मन कीट मर जाते है लेकिन मित्र कीट वापस आ जाते है। पर्यावरण को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचता है।
- शुद्ध उपज: बिना कीटनाशक और रासायनिक उपयोग वाले शुद्ध जैविक अनाज जो शरीर या पर्यावरण को किसी प्रकार से नुकसान नहीं पहुंचाते है।
- कैंसर से मुक्ति: किसानों को कीटनाशकों के कारण और अनाज के कारण होनेवाले कैंसर से मुक्ति मिलती है।
मिश्रित खेती को अपनाए
मिश्रित खेती 'शून्य बजट प्राकृतिक खेती' का एक बहुत ही वैज्ञानिक हिस्सा है। इसे अक्सर 'सह-फसल (Inter-Cropping) या बहु-फसल (Multi-Cropping) मॉडल भी कहा जाता है।
1. मिश्रित खेती का मूल सिद्धांत:
प्राकृतिक खेती में कोई भी पौधा अकेला नहीं उगाया जाता है। जंगल में, बड़े पेड़ों के नीचे छोटे पौधे, झाड़ियां और बेलें एकसाथ बढ़ती है। इसी सिद्धांत को खेतों में उतरना मिश्रित खेती है।
इसमें मुख्य फसलों के साथ ऐसी गौड़ फसलें चुनी जाती है जो एक दूसरे के पूरक हो।
2. फसलों का चुनाव कैसे करें ?:
पालेकर जी के अनुसार फसलों का चुनाव करते समय इन 3 बातों का ध्यान रखना चाहिए -
- ऊंचाई का अंतर: इसमें एक फसल ऊंची हो (गन्ना,अरहर) और दूसरी फसल छोटी हो (जैसे -मूंग,उड़द) इससे दोनों को बराबर धूप और हवा मिलता है।
- जड़ों की गहराई: एक फसल की जड़े गहरी हो और दुसरें फसल की जड़े उथली हो। इससे वे मिट्टी के अलग-अलग स्तरों से पोषक तत्व लेती है और आपस में मुकाबला नहीं करती है।
- परिवार का अंतर: मुख्य फसलों के साथ दलहन (दालें) उगाना अनिवार्य है। दालों की जड़ों में ऐसी गांठ होती है जो हवा से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी को उपजाऊ बनाती है।
3. मिश्रित खेती के लाभ:
मिश्रित खेती का दोहरा लाभ होता है -
- नाइट्रोजन की पूर्ति: यदि आप अनाज के साथ चना एवं मूंग लगाते है,तो दाल वाली फसलें अनाज वाली फसलों को मुफ्त में नाइट्रोजन प्रदान करती है। आपको बाहर से यूरिया डालने की जरूरत नहीं पड़ती।
- कीट नियंत्रण: कुछ फसलें रक्षक फसल का काम करती है। जैसे कपास के चारों ओर गेंदा या भिंडी लगाने से कीड़े मुख्य फसल को छोड़कर उनपर चले जाते है। बैगन के खेत में धनियां लगते है तो कीड़े कम लगते है या नहीं लगते है।
- मिट्टी की सुरक्षा: छोटी फसलें जमीन को ढक लेती है जैसे धनियां,मेथी,पुदीना आदि जिससे खर=पतवार नहीं उगते और वाफसा बना रहता है।
- आर्थिक सुरक्षा: यदि किसी कारण से एक फसल खराब हो जाती है,तो दूसरी फसल किसान को नुकसान से बचा लेती है।
4. प्रसिद्ध मिश्रित मॉडल:
- गन्ना मॉडल: गन्ने की दो पंक्तियों के बीच काफी जगह होती है। इसमें आप आलू,धनियां,पत्ता गोभी,चना जैसी एक साथ 4-5 फसलें ले सकते है।
- अनाज+दाल मॉडल: जैसे- गेहूं+सरसों+चना ।
- फलदार बाग मॉडल: आम या अमरूद के बाग में शुरुआती 5-6 सालों में सब्जियां, अदरक,हल्दी और दालें उगाई जा सकती है।
देशी गाय का महत्व
जीरो बजट या सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती में देशी गाय केवल एक पशु नहीं है, बल्कि वह इस पूरी कृषि पद्धति की मुख्य इंजन है।
क्योंकि बिना इसके 'शून्य बजट खेती' संभव नहीं है। इस बात कड़ाई से पालन करना चाहिए की इस खेती में जर्सी या एचएफ जैसी विदेशी गायों का इस्तेमाल न किया जाय नहीं तो पूरी की पूरी पद्धति फेल हो जाएगी।
इस पद्धति में केवल भारतीय मूल की देशी गाय ही कारगर है। -
1. सूक्ष्मजीवों का भंडार (Microbial Powerhouse):
- वैज्ञानिक शोधों के आधार पर पालेकर जी बताते है कि देशी गाय के 1 ग्राम गोबर में 300 से 500 करोड़ लाभकारी सूक्ष्मजीव होते है।
- इसके विपरीत, विदेशी नस्ल के गायों या भैंस के गोबर में इन जीवाणुओं की संख्या बहुत कम होती है और वे भारतीय वातावरण के अनुकूल नहीं होते है।
2. स्वर्ण क्षार और गोमूत्र की शक्ति:
- देशी गाय के पीठ पर, एक कूबड़ (Hump) होता है जिसे 'सूर्यकेतु नाड़ी' कहा जाता है। यह नाड़ी सूरज के किरणों को सोखकर गाय के दूध,गोबर और मूत्र में विशेष औषधीय गुण और 'स्वर्ण क्षार' पैदा करती है।
- गीर गाय के ऊपर शोधों में, ये साबित भी हो चुका है की उसके दूध में स्वर्ण पाए जाते है।
3. गोबर के विशेष गुण:
देशी गाय, का गोबर बनावट में रेशेदार और सूक्ष्मजीवों को पनपने के लिए अनुकूल होता है। जब हम जीवामृत बनाते है तब यह गोबर 'जामन' (Starter) का काम करता है,जिससे करोड़ों सूक्ष्मजीव पैदा होकर, मिट्टी की संरचना को बदल देते है।
4. कम रखरखाव अधिक लाभ:
- कम खुराक: एक देशी गाय बहुत कम चारा खाकर भी जीवित रह सकती है और खेत के अवशेषों पर भी पल सकती है।
- अर्थशास्त्र: चूंकि, एक ही गाय के गोबर से 30 एकड़ खेती हो सकती है,इसलिए किसान को केवल खेती करने के लिए ढेर सारी गायें पालने की जरूरत नहीं होती है। एक गाय, का खर्च उसके दूध से निकल आता है और खेती के लिए खाद बिल्कुल मुफ्त में मिल जाती है।
5. विदेशी गाय क्यों नहीं:
- पालेकर जी के अनुसार, विदेशी गायें बैल (Bos Taurus) की प्रजाति से आती है,जबकि भारतीय गाय वृषभ (Bos Indicus) प्रजाति की है।
- विदेशी गायों के गोबर में, वह सूक्ष्मजीवी विविधता नहीं पाई जाती है जो भारतीय मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए आवश्यक है।
- साथ ही विदेशी गायों का रख-रखाव भी खर्चीला है, जो 'शून्य आधारित खेती' के सिद्धांत के विपरीत है।
क्या आप जानते है ?
भारतीय गायों की नस्लें, जैसे--गीर,साहिवाल,हरियाणा,थारपारकर,राठी और लाल सिन्धी-- प्राकृतिक खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। यदि आपके पास गाय नहीं है,तो आप अपने किसी पड़ोस के देशी गाय के गोबर और गोमूत्र का उपयोग भी कर सकते है।
आर्थिक लाभ क्या होगा ?
प्राकृतिक खेती (SPNF), का सबसे बड़ा आकर्षण इसका आर्थिक पक्ष है। सुभाष पालेकर जी इसे 'शून्य बजट' इसीलिए कहते है क्योंकि इसमें मुख्य फसलों की उत्पादन लागत न के बराबर हो जाती है।
प्राकृतिक खेती केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं,बल्कि किसानों के बैंक बैलैन्स के लिए भी वरदान है। इसके आर्थिक लाभ को हम 5 बिंदुओं में समझते है -
1. उत्पादन लागत में भारी गिरावट (Reduction in Input Cost):
पारंपरिक खेती में एक किसान का 60-70% हिस्सा रासायनिक खाद,हाइब्रिड बीज,और महंगे कीटनाशकों पर खर्च हो जाता है।
- बचत: प्राकृतिक खेती से खाद (जीवामृत),कीटनाशक (अग्निअस्त्र,नीमास्त्र) घर पर ही, गाय के गोबर और मूत्र से बन जाते है।
- बीज: किसान अपने ही खेत के बीज को 'बीजामृत' से उपचार करके बार-बार इस्तेमाल कर सकता है,जिससे हर साल महंगे बीज खरीदनें की जरूरत नहीं होती है।इससे किसान की पारंपरिक बीज विरासत भी संरक्षित होती है।
- परिणाम: प्रति एकड़ खेती की लागत 80-90% तक कम हो जाती है।
- बिना कर्ज के आत्मनिर्भर किसान: प्राकृतिक खेती किसानों को 'आत्मनिर्भर किसान' बना देती है, जिससे उसे खेती करने के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ता है।
2. पानी और बिजली बिल में बचत:
'वाफसा' और 'आच्छादन' के करण खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
- तथ्य: रासायनिक खेती की तुलना में 'शून्य बजट प्राकृतिक खेती' में 90% कम पानी की आवश्यकता होती है।इसमें किसी भी प्रकार के फसलों को कम से कम पानी में एवं ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई से भी किया जा सकता है।
- लाभ: पानी, कम लगने का सीधा मतलब है---ट्यूबवेल कम चलेगा,बिजली का बिल कम आएगा और श्रम की बचत होगी।
3. मिश्रित खेती से अतिरिक्त आय:
प्राकृतिक खेती में एकसाथ कई फसलें उगाई जाती है जिससे -
- गन्ने की फसलों के बीच में आप यदि सब्जियां,दालें और तिलहन आदि उगाते है तो -
- मुख्य फसल, के तैयार होने से पहले इन फसलों को बेचकर आप दैनिक खर्च निकाल लेते है इसे "बोनस इंकम" कहा जाता है।
4. प्रीमियम मूल्य मिलना:
आजकल, शहरों मे "जहर मुक्त" और "शुद्ध अनाज" की मांग बहुत बढ़ गयी है -
- मुनाफा: प्राकृतिक रूप से उगाएं गए उत्पाद रासायनिक उत्पादों की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक दाम पर बिकते है। जिससे किसान को प्रीमियम मूल्य मिलने से लाभ होता है।
- स्वास्थ्य लाभ: घर के लिए भी शुद्ध अनाज मिलता है, और किसानों को उत्पादन करने में भी रासायनिक उत्पादों के स्वास्थ्य पर होने वाले असर के नुकसान का डर नहीं रहता है। इससे, घर और परिवार का बीमारियों पर होनेवाला खर्चा बच जाता है।
5. मिट्टी की स्थाई उत्पादकता:
रासायनिक खेती, मिट्टी को कठोर और बंजर बना देती है,जिससे भविष्य में उसकी कीमत भी कम हो जाती है।
- संपती और दीर्घकालीन लाभ: चूंकि, प्राकृतिक खेती में मिट्टी हर साल अधिक उपजाऊ होती जाती है। उपजाऊ जमीन किसानों की सबसे बड़ी स्थाई संपति है। क्योंकि इसमें कम मेहनत में भी अधिक पैदावार होती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
आज जबकि हमने कृषि के मामले में एक ऐसे मोड़ पर खड़े है जहां 'विकास' के नाम पर हमने अपने जमीन को जहरीला और अपनी जेब को खाली कर लिया है, सुभाष पालेकर जी की यह 'जीरो बजट प्राकृतिक खेती' हमारे खेती से जुड़ी वर्तमान और भविष्य की सभी समस्याओं का एकसाथ हल कर देती है।
यह कृषि पद्धति, हमें प्रकृति से जोड़ती है,बाजार पर निर्भरता को हमेशा के लिए समाप्त कर देती है और अपनी विरासतों यथा देशी गाय,बीज विरासत और परंपरागत बीज आदि को संरक्षित रखने का मौका देती है। साथ ही ये जलवायु परिवर्तनों के प्रभाव को कम करती है और हमें sustainable lifestyle को प्रभावी बनाने का मौका प्रदान करती है।
यह, किसान और उसके परिवार से लेकर देश को भी जहरीले रसायन युक्त अनाजों और उसके दुष्प्रभावों से मुक्ति दिलाती है।
अब समय की मांग भी यही है कि, हम बढ़ते प्रदूषण से मुक्ति पाने के लिए और अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भोजन और उपजाऊ जमीन सुनिश्चित किया जा सके। इसमें भले ही शुरुआत धीमी होती है, लेकिन आगे चलकर पैदावार भी बंपर होती है जो खाद्य संकट का भी समाधान प्रदान करती है।
"अतः किसान भाइयों ,आपकी एक पहल न केवल आपका भविष्य बदल सकता है,बल्कि धरती माँ को एक नया जीवन भी प्रदान करता है। इसलिए छोटे ही स्तर पर आप इस साल क्या 'प्राकृतिक खेती ' करने के लिए तैयार है ? यही हां! तो कॉमेंट में जरूर बताए।"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:"जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग"(Zero Budget Natural Farming)क्या है? ▼
उत्तर: यह पूरी तरह से देशी गाय पर आधारित खेती है जिसमें किसान बाहरी खाद और कीटनाशक बिल्कुल नहीं खरीदता है और पानी की भी कम करूरत होती है। साथ में पारंपरिक बीजों का किसान उपयोग करता है जिससे उसे किसी भी खेती वाली जरूरत के लिए अपने खेत और गाँव से ही पूरी हो जाती है ,बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती है।
प्रश्न 2: क्या मैं छोटे स्तर पर शुरुआत कर सकता हूँ? ▼
उत्तर: जी हां! आप पहले अपने खेत के एक छोटे हिस्से से शुरुआत करें और परिणाम देखने के बाद इसे बड़े स्तर पर अपनाए। ये बेहतर रहेगा।
प्रश्न 3:क्या बिना गाय के यह संभव है? ▼
उत्तर: नहीं! क्योंकि प्राकृतिक खेती का मुख्य आधार देशी गाय का गोबर और मूत्र ही है। यदि आपके पास गाय नहीं है तो आप,अपने किसी पड़ोस के किसान या स्थानीय गौशाला से संपर्क कर सकते है और उससे सहयोग लेकर बिना गाय के भी कर सकते है।
प्रश्न 4: क्या पैदावार में तुरंत बढ़ोतरी होगी? ▼
उत्तर:शुरुआती दौर में मिट्टी को सुधरने में थोड़ा वक्त लगता है,लेकिन तीसरे वर्ष से पैदावार स्थिर और गुणवत्तापूर्ण हो जाती है।
प्रश्न 5:क्या बिना कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक के खेती संभव है? ▼
उत्तर: बिल्कुल संभव है!देश में हजारों किसान कर भी रहे है। इसमें रसायनों के जगह पर प्राकृतिक रूप से बने हुए जीवामृत,बीजामृत आग्नेयास्त्र,नीमास्त्र आदि का प्रयोग किया जाता है जो पूरी तरह से हानिरहित होता है और फसल की जरूरतों को भी पूरा कर देती है एवं किसान को महंगे रसायनों से मुक्ति भी मिल जाती है।
प्रश्न 6: क्या जीरो बजट प्राकृतिक खेती में सब्जियां और फलों को भी उगाया जा सकता है? ▼
उत्तर: बिल्कुल! इसमें सभी प्रकार के फसलों,सब्जियों और फलों को उगाया जा सकता है।
प्रश्न 7:क्या इसमे केवल देशी गाय का ही उपयोग होता है कि विदेशी गाय और भैंस का भी हो सकता है? ▼
उत्तर: नहीं! इसमे विदेशी गाय और भैंस के गोबर और मूत्र का बिल्कुल भी प्रयोग नहीं किया जा सकता है। यह पूरी तरह से भारतीय देशी गाय के गोबर और गोमूत्र पर आधारित है। सुभाष पालेकर जी के अनुसार देशी गाय के 1 ग्राम गोबर में 300-500 करोड़ लाभकारी जीवाणु होते है,जो जर्सी या विदेशी नस्ल के गायों या भैंसों में नहीं पाए जाते है।
प्रश्न 8: जीवामृत को कितने दिनों तक स्टोर किया जा सकता है? ▼
उत्तर: जीवामृत का सर्वोत्तम उपयोग इसे बनाने के 7 से 12 दिनों के भीतर कर लेना चाहिए। इसके बाद जीवाणुओं की संख्या कम होने लगती है।
प्रश्न 9:क्या प्राकृतिक खेती के लिए सरकारी सब्सिडी मिलती है? ▼
उत्तर: हां!भारत सरकार और कई राज्य सरकारें (जैसे उत्तर प्रदेश,हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश) 'पम्परागत कृषि विकास योजना'के तहत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण प्रदान कर रही है।
