खेत बचाओ अभियान क्या है?
"खेत बचाओ अभियान" भारत सरकार के "कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय" द्वारा शुरू किया गया एक "विशेष राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन" है।इसकी मुख्य शुरुआत मध्य प्रदेश के "रायसेन" जिले से की गई है।इसी का विस्तार अब पूरे देश में किया जा रहा है।
इस अभियान का प्राथमिक उद्देश्य "मिट्टी की बिगड़ते स्वास्थ्य को सुधारना" खेती की बढ़ती लागत को कम करना और किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक तरीकों से जागरूक करना है।
- राजनीतिक एवं प्रशासनिक इच्छाशक्ति: इस अभियान को धरातल पर उतरने के लिए अभूतपूर्व राजनीतिक एवं प्रशासनिक इच्छाशक्ति देखी जा रही है।
- 22 राज्यों के कृषि मंत्री: नई दिल्ली के "पूसा परिसर" में 22 राज्यों के कृषि मंत्रियों ने एकसाथ बैठ कर इस अभियान की रूपरेखा तय की है।
यह इस बात का प्रमाण है कि मिट्टी का संकट किसी एक राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश का है और इसके लिए "सहकारी संघवाद"(Co Operative Federalism) के तहत केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर काम कर रही हैं।
📌 अभियान का मूल मंत्र: "कम खाद, सही खाद और सही सलाह"
[कम खाद] ───> रासायनिक उर्वरकों (यूरिया/डीएपी) की अधिकता को रोकना
[सही खाद] ───> मिट्टी की जरूरत के अनुसार संतुलित और जैविक खाद का उपयोग
[सही सलाह] ───> वैज्ञानिकों द्वारा फसल विविधीकरण और आधुनिक तकनीक का मार्गदर्शन
➠अभियान का मूल मंत्र है--- "कम खाद, सही खाद और सही सलाह"
इस पूरे अभियान की आत्मा इसकी तीन मूल शब्दों में बसती है।जिसे हर किसान तक पहुंचाना इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य है
- कम खाद (Less Fertilizer): भारतीय खेतों में यूरिया का उपयोग तय मानकों से कई गुना अधिक हो रहा है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम (N: P:K) का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए। लेकिन कई राज्यों में यह संतुलन बिगड़कर 20:4:1 हो चुका है।अतः किसानों को यह समझाना है कि ज्यादा खाद देने से पैदावार नहीं बढ़ती,बल्कि फसल और जमीन दोनों खराब होते है।
- सही खाद (Right Fertilizer): हर मिट्टी की बनावट अलग होती है।इस अभियान के तहत किसानों को "सॉइल हेल्थ कार्ड (Soil Health Card) के आधार पर यह बताया जा रहा है कि उनके खेत को किस पोषक तत्व की जरूरत है। इसके साथ ही पारंपरिक रसायनिक खादों के विकल्प के रूप में नैनो यूरिया,नैनो डी ए पी और जैविक खादों (Organic Fertilizer) के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- सही सलाह (Right Advice): अक्सर किसान दुकानदारों या पड़ोसियों को देख कर अपने खेतों में कीटनाशक एवं खाद को डाल देते हैं।इस अभियान के तहत सरकार वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों को सीधे किसानों के खेतों तक भेज रही है।ताकि उन्हें मौसम,मिट्टी और बाजार की मांग के अनुसार "सही सलाह " मिल सके।
100 "रेड जोन" जिलों पर विशेष फोकस !
इस अभियान के पहले चरण में देश के उन "100 जिलों को चिन्हित किया गया है" जहां रसायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपभोग राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक है।इन जिलों में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल है।
यहां गहन खेती (Intensive Farming) के कारण मिट्टी की सेहत "क्रिटिकल" यानी चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी हैं।
संक्षेप में,"खेत बचाओ अभियान" मिट्टी की खोई हुई उर्वरता को वापस लाने,पर्यावरण को बचाने एवं किसानों की जेब पर पड़ने वाले खर्च को कम करने का एक समयबद्ध और सुव्यवस्थित प्रयास है।
खेत बचाओ अभियान के मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य
'खेत बचाओं अभियान' केवल कागजी दावों और विज्ञापनों तक सीमित रहने वाला कार्यक्रम नहीं है,बल्कि सरकार ने इसके लिए धरातल पर कड़े और समयबद्ध लक्ष्य निश्चित किये है। इस अभियान के व्यापक उदेश्य को हम निम्नलिखित पांच प्रमुख स्तंभों के मध्यम से समझ सकते है --
1. मिट्टी की सेहत (Soil Health) में सुधार और रि-कन्डीशनिंग:
जैसा की ऊपर भी इसके बारे में देख चुके है। जिस तरह से मानव शरीर को स्वास्थ्य रहने के लिए संतुलित आहार की जरूरत होती है,ठीक उसी तरह से मिट्टी को भी 16 आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।
लगातार एक ही तरह का फसल उगाने से और अत्यधिक यूरिया डालने से मिट्टी में --'ऑर्गैनिक कार्बन'(Organic Carbon) का स्तर घटकर 0.5% से भी कम रह गया है,जो कि आदर्श रूप से कम से कम 1% होना चाहिए।
- इस अभियान का मुख्य उदेश्य मिट्टी के 'स्वास्थ्य कार्ड'(Soil Health Card) को पुनर्जीवित करना है। इसके तहत खेतों की मिट्टी की जांच कर किसानों को एक सटीक सलाह दिया जा रहा है ताकि वे उन्ही तत्वों को खेत में डाले जिसकी कमी है।
2. खेती की लागत को कम करना:
ये मुख्य रूप से विदित है कि खेती में लागत तो बढ़ रही है,लेकिन उसके अनुपात में मुनाफा नहीं बढ़ रही है। और अब असली रूप से समझ आ चुका है कि खेती को मुनाफा लायक बनाने के लिए इसकी लागत को कम करना होगा। और इसके लिए सबसे पहले--महंगे डीजल,महंगे रसायनिक खाद और महंगे कीटनाशक के --ऑप्शन को तलाशना होगा और उसपर काम करना होगा।
- एक वैज्ञानिक तथ्य: जब किसान खेत में पारंपरिक तरीकें से यूरिया का छिड़काव करता है,तब उसका केवल 30-40% ही पौधों को मिल पाता है। बाकी हवा में उड़ जाता है या पानी में बह जाता है। अतः किसानों को ऐसा प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा जिससे कि वह प्रति एकड़ में 20-30% की कमी आसानी से कर सकें।
3. कृषि विज्ञान केंद्रों और 1,600 वैज्ञानिक टीमों की सक्रियता:
इस अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार ने प्रशासनिक अधिकारियों के बजाय वैज्ञानिकों को कमान सौंपी है। देश भर के 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों को मिलाकर 1600 से अधिक विशेष टीमें बनाई गई है।
ये टीमें सीधे गांवों में चौपाल लगा रही है। वैज्ञानिकों का यह दस्ता किसानों के खेतों पर जाकर लाइव डेमों दिखाकर बता रहे है कि कैसे कम रसायनों के साथ भी बेहतर उत्पादन किया जा सकता है।
4. फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को बढ़ावा:
भारत के कई राज्यों विशेषकर--पंजाब,हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में किसान केवल धान-गेहूं के फसल-चक्र में फंस चुके है। धान की फसल जमीन से अत्यधिक पानी खिचती है जिससे भूजल स्तर नीचे भागता जा रहा है।
'खेत बचाओं अभियान' के तहत किसानों को --दलहन,तिलहन और मोंटे अनाज (Millets)को उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हम जानते ही है कि दालों की फसलों के मध्यम से हवा से नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से मिट्टी को मिलती है,जिससे यूरिया की जरूरत अपने आप कम हो जाती है।
5. नकली कृषि उत्पादों पर सर्जिकल स्ट्राइक:
बाजार में नकली खाद,मिलावटी बीज और प्रतिबंधित खराब किस्म की कीटनाशकों का नेटवर्क हमेशा सक्रिय रहता है। मासूम किसान इनके चपेट में आ ही जाते है।
- इस अभियान के तहत जिला स्तर पर विशेष टीमें बनाई गई है,जो दुकानों पर औचक छापेमारी करती है। साथ ही किसानों को भी असली उत्पाद के बारे में जागरूक किया जाता है।
आधुनिक कृषि तकनीकों की भूमिका
चूंकि हम 21 वी सदी में है और इस सदी में कृषि को भी बिना तकनीक के न तो बेहतर किया जा सकता है और न ही बचाया जा सकता है। 'खेत बचाओं अभियान' कृषि के पारंपरिक तकनीकों को आधुनिक तकनीकों के साथ समागम करके किसानों के लिए उपयोगी बना दिया है और इसे अपनाने पर जोर दिया जा रहा है ---
1. ड्रोन टेक्नोलॉजी और नैनो फर्टिलाइजर:
इस अभियान के तहत --'नमो-ड्रोन दीदी' जैसी योजनाओं को सीधे जोड़ा गया है। पारंपरिक यूरिया की 45 किलो बोरी की जगह पर अब इफको (IFFCO) द्वारा बनाई गई 'नैनो यूरिया' और 'नैनो डीएपी' की आधा लीटर की बोतल मे ले चुकी है। - फायदे: इससे जमीन पर रसायनों का सीधा बोझ नहीं पड़ता है,पानी की भी बचत होती है और छिड़काव का कम चंद मिनटों में पूरा हो जाता है।
2. सटीक खेती और मृदा नमी सेंसर:
अभियान के तहत प्रगतिशील किसानों को सेंसर आधारित कृषि से जोड़ा जा रहा है। 'प्रिसीजन फार्मिंग'-- का मतलब है खेत के जिस हिस्से को जितनी जरूरत हो,उतना ही 'इनपुट' देना। सॉइल मॉसचुराइजिंग सेंसर के मध्यम से किसान जान सकते है कि फसल को वास्तव में पानी की जरूरत है कि नहीं है।
इससे सिंचाई की पानी की बर्बादी रुकती है।
3. एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन:
यह तकनीक पूरी तरह से रसायनों को बंद करने की वकालत नहीं करता है। बल्कि एक संतुलन बनाकर किसानों को सिखाया जाता है कि---
- बायो-फर्टिलाइजर (Bio-fertilizers): एजोटोबैक्टर और राइजोबियम जैसे बैक्टीरियां का उपयोग करना जो मिट्टी की जैविक शक्ति को बढ़ाते है।
सरकारी योजनाओं का एकीकरण और किसानों को होनेवाला लाभ
इस अभियान के तहत सरकार ने दूरदर्शिता दिखाते हुए पहले से चल रही कई महत्वपूर्ण कृषि योजनाओं को इस अभियान के साथ सिंक कर दिया है। इसका सीधा फायदा यह हो रहा है कि जब कृषि वैज्ञानिक गांवों में कैप करते है तब इन योजनाओं के बारे में भी किसानों को जागरूक किया जाता है --
1. पीएम-किसान सम्मान निधि और केसीसी(KCC) का सीधा जुड़ाव:
इस अभियान के तहत आयोजित होने वाले ग्रामीण शिविरों में उन किसानों का ऑन-द-स्पॉट निबटारा किया जा रहा है,जिन्हे तकनीकी दिक्कतों या ई-केवाईसी न होने के चलते 'किसान सम्मान निधि' से वंचित रहना पड़ रहा है। साथ हि KCC की प्रक्रिया को भी इन शिविरों में पूरा किया जा रहा है।
2. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से सुरक्षा कवच:
किसानों को इस अभियान के तहत 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' के बारे में जागरूक किया जा रहा है और इसके फायदे एवं जरूरतों को विस्तार से बताया जा रहा है। साथ ही इसके क्लैम प्रोसेस और शिकायतों का भी निबटारा किया जा रहा है।
3. डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन:
अभियान के तहत किसान के खेत की 'जिओ-टैगिंग'(Gio-Tagging) और एक 'युनीक किसान आईडी' बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इससे आने वाले समय में सरकार को यह जानने में आसानी होगी की किस क्षेत्र में किस प्रकार की फसल बोई गई है,और वहां किस तरह के संकट की संभावना है और कैसे समाधान हो सकता है।
किसानों और देश के लिए दीर्घकालिक लाभ
जब यह अभियान देश के सभी राज्यों में पूरी तरह से लागू होगा,तो इसके दूरगामी परिणाम केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेंगे,बल्कि इसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था और उसके स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा ----
- अन्न की गुणवत्ता में सुधार: जब खेतों में रासायनिक कीटनाशकों और यूरिया का उपयोग कम होगा,तो हमारी फसलों में जहरीलें पदार्थों की मात्रा कम हो जाएगी। इससे नागरिकों को शुद्ध और पौष्टिक अनाज मिलेगा जिससे लीवर एवं किडनी की बीमारियों में कमी आएगी।
- भूजल स्तर और पर्यावरण की रक्षा: फसल विविधीकरण और तकनीक के प्रयोग होने से पानी की कम खपत होगी,जिससे जलस्तर को दुबारा सुधारा जा सकेगा। रसेनीक बहाव रुकने से जलाशयों और नदियों का पानी शुद्ध होगा।
- वैश्विक बाजार में भारतीय कृषि की साख: आज दुनियां भर में जैविक एवं प्राकृतिक रूप से उगाए गए अनाज की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इस अभियां के मध्यम से जब हमारे फसल 'केमिकल फ्री' होंगे तो भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ेगी और इनकी विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। कृषि निर्यात बढ़ने से किसानों की आय बढ़ेगी।
निष्कर्ष (Conclusion)
इस प्रकार से 'खेत बचाओं अभियान' को महज एक सरकारी बजट या प्रशासनिक फ़ाइलों तक सीमित नहीं समझना चाहिए,बल्कि यह एक गंभीर और ईमानदार कोशिश है,और इस कोशिश में हम सबको अपने स्तर से सहयोग करना चाहिए और लोगों को इसके बारे में जागरूक करने का प्रयास करना चाहिए।
आखिर सरकार भविष्य को लेकर क्यों चिंतित है कि,रसायनों के प्रयोग को कृषि में कम करने का मुहिम चला रही है,ये बात हम सभी किसान भाइयों को भी सांझनी चाहिए। क्योंकि आने वाले दिनों में जैविक और प्राकृतिक अनाज का ही बोलबाला रहने वाला है,अतः इस बारे में अभी से हमें जागरूक हो जाना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:खेत बचाओं अभियान क्या है? ▼
उत्तर:भारत सरकार के कृषि मंत्रालय एवं कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वार पूरे देश में शुरू किया गय अभियान जिसका लक्ष्य मिट्टी का उर्वरता को सुधारना,लागत कम करना और नकली उत्पादों को रोकना है।
प्रश्न 2: खेत बचाओं अभियान में विशेष फोकस किस क्षेत्रों पर है? ▼
उत्तर: विशेष फोकस देश के उन 100 सबसे महत्वपूर्ण जिलों पर है जहां रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग राष्ट्रीय औसत की तुलना मे सबसे ज्यादा हो रहा है जी-पंजाब,हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलें।
प्रश्न 3:खेत बचाओं अभियान का मुख्य तकनीक कौन कौन सा है जिसका किसानों को जागरूकता से बढ़ावा दिए जाने को प्रेरित किया जा रहा है? ▼
उत्तर: इसमें नैनो यूरिया के प्रयोग,ड्रोन का प्रयोग और सेंसर आधारित कृषि को बढ़ावा देने के साथ जैविक एवं जीरो बजट प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिए जाने को प्रेरित किया जा रहा है।
प्रश्न 4:इस अभियान का मुख्य नारा क्या है? ▼
उत्तर:इस अभियण का मुख्य नारा है --"कम खाद,सही खाद और सही सलाह है'इसका उदेश्य रासायनिक खादों के अंधाधुंध उपयोग को रोकना है,और मिट्टी को बचाना है।
प्रश्न 5:किसान भाई अपनी मिट्टी की जांच कैसे करवा सकते है? ▼
उत्तर:किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या ग्राम पंचायत स्तर पर लगने वाले कृषि शिविरों में जाकर मिट्टी का नमूना (Soil Sample) दे सकते हैं। इस अभियान के तहत वैज्ञानिकों की 1600 से अधिक टीमें सीधे गांवों में जाकर सॉइल हेल्थ कार्ड (Soil Health Card) बनाने में मदद कर रही हैं।
प्रश्न 6:क्या सरकार कृषि भूमि संरक्षण के लिए योजनाएं चलाती है? ▼
उत्तर: हाँ, सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्राकृतिक खेती मिशन और विभिन्न भूमि संरक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को सहायता प्रदान करती है।इस अभियान में इन योजणआओं के बारे में किसानों को जागरूक किया जा रहा है।
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