लेमनग्रास क्या है ? इसके गुण, उपयोग और व्यावसायिक खेती की पूरी गाइड
🌿 सार संक्षेप (Quick Summary)
लेमनग्रास (Lemongrass) एक बहुवर्षीय सुगंधित एवं औषधीय घास है, जिसकी पत्तियों से उच्च गुणवत्ता का Essential Oil प्राप्त होता है। इस तेल का उपयोग आयुर्वेद, कॉस्मेटिक्स, हर्बल चाय, परफ्यूम, अरोमा थेरेपी, साबुन और अगरबत्ती उद्योग में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
यह फसल अपेक्षाकृत कम पानी, कम रखरखाव और एक बार रोपाई के बाद लगभग 4–5 वर्षों तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। इसलिए यह किसानों के लिए आय बढ़ाने वाला एक अच्छा व्यावसायिक विकल्प बनती जा रही है।
- ✅ लेमनग्रास क्या है और इसकी पहचान कैसे करें?
- ✅ औषधीय गुण, उपयोग और बाजार में बढ़ती मांग
- ✅ उन्नत एवं व्यावसायिक खेती की पूरी प्रक्रिया
- ✅ सही किस्म, रोपाई, सिंचाई और खाद प्रबंधन
- ✅ कटाई, तेल निकालने की प्रक्रिया और गुणवत्ता
- ✅ लागत, उत्पादन, संभावित कमाई और बाजार
- ✅ सरकारी सहायता, किसानों की सामान्य गलतियाँ और सफलता के व्यावहारिक सुझाव
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| लेमनग्रास की खेती देश में बढ़ती जा रही है और लाभदायक भी है |
📌लेमनग्रास क्या है ? इसके गुण, उपयोग और व्यावसायिक खेती की पूरी गाइड:
📑 Table of Contents
- ➤ प्रस्तावना(Introduction)
- ➤ 1. लेमनग्रास क्या है? (What is Lemongrass in Hindi) ?
- ➤ 2. लेमनग्रास के पोषक तत्व और रासायनिक संरचना
- ➤ 3. लेमनग्रास के आयुर्वेदिक गुण (Ayurvedic Properties of Lemongrass)?
- ➤ 4. लेमनग्रास के स्वास्थ्य लाभ और अद्भुत उपयोग (Health Benefits & Uses)
- ➤ 5. भारत में लेमनग्रास की खेती कहां और कितनी होती है?
- ➤ 6. लेमनग्रास की सबसे अच्छी और उन्नत किस्में (Best Varieties)?
- ➤ 7. लेमनग्रास की नर्सरी कैसे तैयार करें? (Step-by-Step Guide)
- ➤ मुख्य खेत की तैयारी ,रोपाई और खाद प्रबंधन:
- ➤ लेमनग्रास की कटाई और तेल निकालने की प्रक्रिया:
- ➤ 10. लागत, कमाई और शुद्ध मुनाफा (Cost and Profit Analysis)
- ➤11. लेमनग्रास के नुकसान और सावधानियां (Side Effects)
प्रस्तावना (Introduction)
1. लेमनग्रास क्या है? (What is Lemongrass in Hindi)?
- यह 5 से 6 फिट लंबी झाड़ीनुमा घास वाला पौधा है।
- पत्तियां लंबी,संकरी और हल्का धारदार होती हैं।
- पौधे की जड़े गुच्छेदार और मजबूत होती है जो मिट्टी को बांधकर रखती हैं।
- इससे और इसकी पत्तियों से मसलने पर भी नींबू जैसी खुशबू आती है।
- कटाई के बाद पौधा फिर। से बढ़ जाता है इसलिये हर साल दुबारा बुआई की जरुरत नहीं पड़ती हैं।
2. लेमनग्रास के पोषक तत्व और रासायनिक संरचना
- विटामिन्स: इसमें मुख्य रूप से विटामिन A, विटामिन C और विटामिन B कॉम्प्लेक्स पाए जाते हैं।
- मिनरल्स: इसमें पोटैसियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम, आयरन, जिंक और मैंगनीज पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
- मुख्य घटक: इसके मुख्य घटक निम्नलिखित है:
- सिट्राल (Cytral): यह वह सबसे महत्वपूर्ण घटक है जिसके कारण लेमनग्रास में नींबू जैसी खुशबू आती है।
- जेरानियॉल (Geraniol): यह इसमें पाया जाने वाला सुगंधित यौगिक है जिसका उपयोग कॉस्मेटिक्स और इत्र उद्योग में किया जाता है।
- मायरसीन (Myecene): यह प्राकृतिक एंटी ऑक्सीडेंट गुणों वाला यौगिक है जो इसमें प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
- लिमोनिन (Limonene): यह ताजगी भरी सुगंध देने वाला तत्व है जिसको सुगंधित वस्तुओं के उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है।
- फ्लेवोनॉयड्स और फेनोलिक यौगिक: यह शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।
3. लेमनग्रास के आयुर्वेदिक गुण (Ayurvedic Properties of Lemongrass)?
- कफ और वात नाशक: इसकी तासीर गर्म होती है अतः यह कफ़ और पित्त दोषों को जब शरीर में बढ़े जाते है तो उन्हें शांत करने में सहायक होते है। इसीलिए सर्दी खांसी और जोड़ों के दर्द में यह बढ़िया काम करती है।
- पित्त पर प्रभाव: इसकी तासीर गर्म होने के कारण इसका अत्यधिक सेवन करने से यह पित्त को बढ़ा देती है।अतः पित्त प्रधान व्यक्ति को इसका उपयोग सीमित मात्रा में ही करनी चाहिए।
- रस (स्वाद): इसका स्वाद तिक्त (कड़वा) और कटु (तीखा) होता हैं।
- गुण (प्रकृति): यह लघु यानी पचने में हल्की एवं तीक्ष्ण होती है।
- दीपन और पाचन: यह पेट की मंद पड़ी अग्नि यानी जठराग्नि को प्रदीप्त कर देती है जिससे भूख बढ़ती भी है और पाचन भी सुचारु रूप से होता है।
4. लेमनग्रास के स्वास्थ्य लाभ और अद्भुत उपयोग (Health Benefits & Uses)
- सर्दी, खांसी और जुकाम में: लेमनग्रास की चाय और काढ़ा पीने से श्वास नली की सूजन दूर हो जाती है।साथ ही यह जमे हुए कफ को बाहर निकालने में मदद करता है।
- पाचन तंत्र को मजबूती में: गैस बनने, एसिडिटी,अपच और पेट फूलने जैसी समस्याओं में लेमनग्रास का चाय या काढ़ा को खाना खाने के बाद में पीने से राहत मिलता है।
- तनाव एवं अनिद्रा से मुक्ति में: यह नर्वस सिस्टम को रिलेक्स करती है इसीलिए इसको सोने से पहले पीने से नींद अच्छी आती है और तनाव में राहत प्रदान करती है।
- बॉडी डिटॉक्सिफिकेशन: चूंकि यह नेचुरल डाइयूरेटिक है अतः पेशाब के रस्ते से किडनी, लिवर और ब्लेडर से हानिकारक टॉक्सिंस तत्वों को बाहर निकल देती हैं।
- वजन कम करने में सहायक: यह शरीर में मेटाबोलिज्म के रेट को बढ़ा देती है जिससे शरीर में जो अतिरिक्त चर्बी जमा रहती है वह बर्न हो जाती है।और मोटापा से राहत मिलती है।
- स्किन प्रॉब्लम को दूर करने में: इसमें फफूंद नाशक और जीवाणु नाशक तत्व मौजूद होते है जो स्किन को ठीक रखने में मदद करती है।
लेमनग्रास के व्यावसायिक उपयोग:
लेमनग्रास के मुख्य व्यवसायिक उपयोग इस प्रकार से है:
- लेमनग्रास एसेंशियल ऑयल: लेमनग्रास का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग इसके पत्तियों से एसेंशियल ऑयल (Essantial Oil) को निकला जाता है जिसके लिए भाप आसवन विधि का प्रयोग किया जाता है।यह ऑयल "अरोमा थेरेपी" से लेकर "दर्द निवारक तेल" बनाने के साथ साथ कॉस्मेटिक्स एवं सुगंध उद्योग आदि से किया जाता है।
- मच्छर और कीड़े भगाने में: लेमनग्रास में "सिट्रोनेला" होता है जिसके महक से मच्छर, मक्खियां और अन्य कीट दूर भागते हैं।अतः इसका उपयोग मच्छर अगरबत्ती आदि उद्योगों में किया जाता है।
- कॉमेटिक्स और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में: एंटी बैक्टेरियल और एंटी फंगल गुणों के कारण इसका व्यापक उपयोग कॉस्मेटिक्स एवं ब्यूटी प्रोडक्ट्स बनाने में किया जाता है।साथ ही अच्छी खुशबू होने के कारण परफ्यूम उद्योग में भी जबरदस्त इस्तेमाल किया जाता है।
- थाई और एशियन कुकिंग में: थाई सूप जैसे Tom Yum Soup और करी आदि फूड प्रोडक्ट बनाने में इसके निचले सफेद हिस्से का उपयोग किया जाता है।साथ ही स्वाद और सुगंध के लिए भी फूड प्रोसेसिंग उद्योग में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
- अरोमा थेरेपी में: लेमनग्रास की ताजगी भरी सुगंध के कारण इसका व्यापक उपयोग अरोमा थेरेपी में किया जाता है।साथ ही इसके सुगंध का उपयोग स्पा और योग सेंटर में अच्छी वातावरण बनाने के लिए भी किया जाता है।
- अगरबत्ती और सुगंध उद्योग में: पूजा अगरबत्ती,धूपबत्ती और सुगंध उद्योग में भी इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
- प्राकृतिक कीट प्रतिरोधक उत्पाद बनते में: मच्छरों के साथ ही कीटनाशक जो प्राकृतिक रूप से जैविक कीटनाशक बनाए जाते है उनमें भी इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
5. भारत में लेमनग्रास की खेती कहां और कितनी होती है?
- पूर्वी और मध्य भारत (शीर्ष उत्पादक): ओडिसा जो कुल एसेंशियल ऑयल के उत्पादन का 50% उत्पादित करता है। इसके अलावा झारखंड और मध्य प्रदेश में इसकी खेती व्यापक पैमाने पर होती हैं।
- उत्तर भारत: खासकर उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र और गंगा के मैदानों में एवं उत्तराखंड में सगंध पौध केंद्र CAP के सहयोग से और पंजाब में भी इसकी खेती हो रही है।
- दक्षिण भारत: पूरे आंध्र प्रदेश और केरल के मालाबार तट एवं कर्नाटक और तमिलनाडु में भी इसकी खेती हो रही है।
- अन्य क्षेत्र: अन्य क्षेत्रों में असम, महाराष्ट्र और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी तथा पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों की तलहटी में भी इसकी खेती हो रही है।
कितना होता है उत्पादन (Areas & Production):
इसके उत्पादन के आकड़े कुछ इस प्रकार से है:
- कुल उत्पादन: भारत में सालाना 800 से 1,000 मीट्रिक टन लेमनग्रास ऑयल का उत्पादन होता है।
- घरेलू और निर्यात बाजार: भारत अपने "कुल उत्पादन का लगभग 80% हिस्सा विदेशों में निर्यात" करता है। भारतीय लेमनग्रास को पूरी दुनियां में सबसे ज्यादा बेहतरीन माना जाता है।बाकी बचे "20% का देश में घरेलू उपयोग" जैसे कॉस्मेटिक्स, आयुर्वेदिक और फूड इंडस्ट्री में किया जाता है।
प्रति एकड़ पैदावार का गणित:
जब बात प्रति एकड़ उत्पादन की है तो सबसे पहले आप यह जान लिजिये कि लेमनग्रास की एक बार बुआई करने के बाद इसकी फसल 5 से 6 साल तक चलती रहती है,दुबारा बुआई का जरूरत नहीं पड़ता है।और इसकी "एक साल में 3 से 4 बार कटाई" भी किया जाता है।
इसके प्रति एक और प्रति हेक्टेयर उत्पादन को नीचे दिए गए टेबल से अच्छी तरह से समझते हैं:
🌿लेमनग्रास:प्रति एकड़/हेक्टेयर उत्पादन
| हरी घास का उत्पादन | तेल का उत्पादन |
|---|---|
| लगभग 10 से 15 टन प्रति एकड़ | लगभग 80 से 100 लीटर तेल प्रति एकड़ |
| लगभग 30 से 40 टन प्रति हेक्टेयर | लगभग 200 से 250 लीटर प्रति हेक्टेयर |
अतः इसका अधिक पैदावार एवं पत्तियों से अधिक तेल पाने के लिए हमेशा अच्छी वैरायटी की बीजों जैसे कृष्णा,कावेरी,प्रगति और OD 19 का ही बुआई करनी चाहिए।
6. लेमनग्रास की सबसे अच्छी और उन्नत किस्में (Best Varieties)?
1. कृष्णा (Krishna):
"कृष्णा" भारत में उगाई जाने वाली सबसे लोकप्रिय किस्म है लेमनग्रास का जिसकी पत्तियों में तेल की मात्रा अधिक होती है और तेल में सिट्राल की मात्रा अधिक होती है।
मुख्य विशेषताएं :
- अधिक तेल उत्पादन।
- सिट्राल की अधिक मात्रा।
- तेज वृद्धि
- वर्ष में 4 से 5 बार कटाई क्षमता।
- उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।
2. कावेरी (Kaveri):
"कावेरी" एक ऐसी उन्नत व्यवसायिक किस्म है जो उच्च गुणवत्ता वाला तेल प्रदान करता है।इसके तेल को इत्र उद्योग, अरोमा थेरेपी और कॉस्मेटिक्स उद्योग में विशेष रूप से पसंद किया जाता है।
मुख्य विशेषताएं:
- उत्कृष्ट गुणवत्ता का आवश्यक तेल प्रदान करता है।
- इसमें सुगंध की मात्रा अधिक होती है।
- व्यवसायिक खेती और तेल उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त है।
- क्योंकि तेल में सिट्राल की मात्रा अधिक पाई जाती है।
3. प्रगति (Pragati):
"प्रगति" इसकी ऐसी किस्म है जो बहुत तेजी से बढ़ती है और जिसमें अधिक "हरित जैवभार" (Green Biomass) प्राप्त होता है।जिन किसान का उद्येश्य अधिक मात्रा में इसकी पत्तियां प्राप्त करनी हो उसके लिए यह उचित विकल्प है।
मुख्य विशेषताएं:
- अधिक हरी पत्तियों का उत्पादन।
- नियमित कटाई में अच्छा प्रदर्शन।
- विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उपयुक्त।
4.CKP 25:
इसको मुख्य रूप से उच्च तेल उत्पादन को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।जो किसान खुद तेल निकालते है उनके लिए यह सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
मुख्य विशेषताएं:
- अधिक तेल प्रतिशत उत्पादन।
- अच्छी गुणवत्ता का तेल।
- व्यवसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त।
5. सुगंधा (Sugandha):
"सुगंधा" नाम से ही स्पष्ट है कि यह अपनी बहुत तेज सुगंध जो लंबे समय तक टिकी भी रहती हैं के लिए जानी जाती है।इसका ज्यादा उपयोग हर्बल और अरोमा उद्योग में किया जाता है।
मुख्य विशेषताएं:
- तेज प्राकृतिक सुगंध।
- आवश्यक तेल की अच्छी गुणवत्ता।
- छोटे और मध्यम किसानों के लिए उपयुक्त।
6. सीमैप सुप्रिया (CIMAP Supriya):
सीमैप सुप्रिया को रोग प्रतिरोधी के तौर पर विकसित किया गया है।साथ ही यह उत्पादन भी अच्छी देती हैं।
मुख्य विशेषताएं:
- रोगो से लड़ने में सक्षम।
- कीटो के प्रभाव को भी कम करती हैं।
- विपरीत परिस्थितियों में अच्छा उत्पादन।
7. लेमनग्रास की नर्सरी कैसे तैयार करें? (Step-by-Step Guide)
चरण 1. सही समय और बीज की मात्रा:
- समय: नर्सरी तैयार करने का सही समय "फरवरी_मार्च" या "जून_जुलाई" होता है।
- मात्रा: एक हेक्टेयर यानी करीब ढाई एकड़ खेत के लिए "4 से 5 किलोग्राम" स्वास्थ्य एवं पौष्टिक बीज की जरूरत पड़ती हैं।
चरण 2. क्यारियां तैयार करना:
- जलभराव मुक्त: इसकी नर्सरी लगाने के लिए ऐसी जगह चुन्नी चाहिए जहां कभी भी जलभराव नहीं होता हो।
- जुताई: जमीन को कम से कम 2 से 3 बार अच्छी जुताई के लेनी चाहिए।अंतिम जुताई से पहले उसमें गोबर की खाद जितना हो सकें उतना जरूर मिलाए।
- क्यारियों की दूरी: इसकी क्यारियों को जमीन से 10 से 15 सेमी ऊंची और 1 मीटर चौड़ी बेड जैसी क्यारियां बनानी चाहिए।
चरण 3. बिजाई और सिंचाई करना:
- बीज बुआई: आप जो इसकी क्यारियां बनाए हैं उसमें 10 सेमी की दूरी पर कतार बना लीजिए।और उस कतार में इसके बीजों को 1 से 2 सेमी की गहराई में बुआई के दीजिये।
- ढकाई: बीजों को बोने के बाद उसके ऊपर बारीक मिट्टी या केंचुए की खाद की बारीक परत बिछाकर ढंक देना चाहिए।
- सिंचाई: इसकी सिंचाई फव्वारा से करनी चाहिए। हां नमी को रोकने के लिए इसकी क्यारियों को पुआल आदि से ढकाई कर देनी चाहिए।इससे नमी बनी रहेगी लेकिन अंकुरण होते ही पुआल जो हटा देनी चाहिए।
- समय: ये नर्सरी के बीज करीब "50 से 60 दिनों में" तैयार हो जाते है।उसके बाद इसको ठीक से निकलकर मुख्य खेतों में रोपाई की जाती हैं।
खेत की तैयारी और दूरी:
खेत की तैयारी के लिए सबसे पहले मुख्य खेत की अच्छी जुताई करनी चाहिए करीब 2 से 3 जुताई करने के बाद खर पतवार को निकाल कर उसमें गोबर की कम्पोस्ट खाद मिलाकर फिर एक बार जुताई करनी चाहिए।
- पट्टा लगाए: जुताई करने के बाद खेत में पाटा लगानी चाहिए जिसे बिहार के कई इलाकों में हेंगा देना भी कहते हैं।इससे खेत की जमीन समतल और बराबर हो जाती है।
- रोपाई की दूरी: रोपाई में भी दूरी का विशेष ख्याल रखा जाता है।
- कतार से कतार की दूरी 60 सेमी रखनी चाहिए।
- पौधों से पौधों की दूरी 45 सेमी सही रहती हैं।
खाद और उर्वरक प्रबंधन:
जहां तक खाद और उर्वरक की बात है लेमनग्रास को इसकी खास ज्यादा जरूरत नहीं होती हैं। लेकिन आप वैज्ञानिक एवं व्यवसायिक रूप से खेती कर रहे है इसलिए संतुलित पोषक की व्यवस्था करना जरूरी हो जाता है।
- बेस डोज: बेस डोज के लिए "प्रति एकड़" गोबर की कम्पोस्ट खाद को 4 से 5 टन की मात्रा में देना सबसे बेहतर रहता है।
- रसायनिक खाद: रसायनिक खाद में प्रति एकड़ 30 किलो यूरिया,16 किलो फास्फोरस और 16 किलो पोटैशियम की आवश्यकता पड़ती हैं।
- कटाई के बाद: जो 30 किलो नाइट्रोजन यानी यूरिया है उसको एक ही बार में नहीं देना है।बल्कि यूरिया को 3 से 4 भागो में 4 बार और वह भी प्रत्येक कटाई के बाद देनी चाहिए।
- सिंचाई प्रबंधन: गर्मियों में 7 से 10 दिनों के अंतराल पर एक बार सिंचाई करनी चाहिए जबकि सर्दियों में यह 15 से 20 दिनों के अंतराल पर होनी चाहिए। बरसात के मौसम में सिंचाई की जरूरत नहीं होती है।
- खर पतवार: शुरुआती 2 से 3 महीनों में खर पतवार बहुत होते हैं।इनको निकलवा देनी चाहिए।
- कीट और रोग प्रबंधन: लेमनग्रास में कीट और रोग बहुत कम लगते है।जड़ों की सड़ने की शिकायत हो सकती है। इसके लिए जल भराव से बचना चाहिए।दीमक,रस चूसक और पत्तियों का खुलसा रोग हो सकता है।इसके लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र के सलाह से दवाई का छिड़काव करें।
लेमनग्रास की कटाई और तेल निकालने की प्रक्रिया:
लेमनग्रास को एक बार रोपाई करने के बाद 5 से 6 सालों तक रोपाई करने की छुट्टी हो जाती है।बस इसको समय समय पर कटाई करते रहना है।
- पहली कटाई: इसकी रोपाई के ठीक 90 से 100 दिनों के बाद इसकी पहली कटाई करनी चाहिए।
- अगली कटाई: पहली कटाई के हर 60 से 70 दिनों के अंतराल पर कटाई करते रहनी चाहिए।
- वर्ष में कटाई: पहले वर्ष 3 से 4 कटाई करनी चाहिए उसके बाद के वर्षों में 5 से 6 कटाई करनी चाहिए।
- कटाई की विधि: कटाई हमेशा पौधों की जड़ों से 10 से 15 सेमी ऊपर और हंसिए से करनी चाहिए।इससे नई बढ़वार जल्दी होने लगती हैं।
तेल निकालने की भाप आसवन विधि (Steam Distillation):
अब इसका तेल निकालने के लिए भाव आसवन विधि का उपयोग किया जाता है।यह पास के ही खेत में होता हैं जिसे कई किसान मिलकर लगते है।या कोई किसान लगते है और किराए पर सबके तेल निकालने का काम करते है।
बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में किसान पहले "पिपरमेंट" की खेती करते थे। उसमें ज्यादा पानी और सिंचाई के कारण उसका खेती छोड़कर किसान अब "लेमनग्रास" की खेती को अपना चुके हैं।
उन्हीं किसानों का पिपरमेंट से तेल निकालने वाला भाप आसवन मशीन अभी भी "लेमनग्रास" की तेल को निकालने में काम आ रहा है।
- सबसे पहले कटी हुई पत्तियों को खेत के पास "आसवन संयंत्र" के मशीन के टैंक में भरा जाता है।
- नीचे से आग जलाया जाता हैं और भाप के जरिए पत्तियों में मौजूद तेल वाष्पीकृत होकर कंडेंसर में जाता है।
- कंडेनसर में ठंडा होने के बाद पानी और तेल अलग हो जाते हैं।
- चूंकि तेल हल्का रहता है इसलिए वह पानी के ऊपर तैरता रहता है।उसे आसानी से अलग के लिया जाता है।
10. लागत, कमाई और शुद्ध मुनाफा (Cost and Profit Analysis)
💰लागत,कमाई और मुनाफा का गणित:
| खर्च/कमाई का विवरण | अनुमानित राशि |
|---|---|
| पहले साल की लगत (नर्सरी, जोताई,रोपाई,खाद) | Rs 15,000-Rs 20,000 |
| सालाना तेल उत्पादन (प्रति एकड़) | 80-120 लीटर |
| बाजार में तेल की कीमत (प्रति लीटर) | Rs 1,000- Rs 1,500 |
| कुल सालाना कमाई(Gross Income) | Rs 80,000 से Rs 1,40,000 |
| शुद्ध मुनाफा | Rs 60,000 से Rs 1,10,000 |
कमाई और लागत एवं शुद्ध मुनाफे का यह गणित पूरी तरह से एसेंशियल ऑयल के उत्पादन एवं उसकी बिक्री पर आधारित है। लेकिन आप इसका तेल निकालने का खुद का प्लांट लगा लेते हैं तो मुनाफा और भी बढ़ जायेगा।
- जैसे कि आप "हर्बल चाय" के लिए इसकी "सूखी पत्तियां" तैयार करके बेचते है तो अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं।
- छोटे पैकेट में लेमनग्रास ऑयल का ब्रांडिंग करके बेचने से।
- किसान उत्पादक संगठन (FPO) के माध्यम से सामूहिक विपणन करने से।
- यदि आप कॉस्मेटिक्स, अरोमा और हर्बल उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को डायरेक्ट बिक्री करते हैं तो आपकी आय बढ़ सकती हैं।
11. लेमनग्रास के नुकसान और सावधानियां (Side Effects)
- गर्भावस्था (Pregnancy): गर्भवती महिलाओं को लेमनग्रास की चाय या इसके तेल के आंतरिक सेवन से बचना चाहिए।क्योंकि यह गर्भावस्था को उत्तेजित कर सकता है।
- त्वचा की संवेदनशीलता: लेमनग्रास को कभी भी सीधे स्किन पर मत लगाएं क्योंकि स्किन एलर्जी वाले लोगों को इससे कुछ दिक्कत भी हो सकती है।अतः इसे हमेशा किसी कैरियर ऑयल यानी नारियल तेल या बादाम तेल आदि में मिलाकर स्किन पर लगानी चाहिए।
- पित्त प्रकृति: जिन लोगो के शरीर में पित्त(गर्मी) ज्यादा बनती है उन्हें इसका सेवन कम मात्रा में ही करनी चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:क्या लेमनग्रास को छत पर गमले में उगाया जा सकता है? ▼
प्रश्न 2: लेमनग्रास का तेल कहा बिकता है ? ▼
प्रश्न 3: क्या लेमनग्रास को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती हैं ? ▼
प्रश्न 4:लेमनग्रास की खेती के लिए किस प्रकार की मिट्टी और जलवायु अच्छी होती है? ▼
प्रश्न 5:क्या लेमनग्रास के फसल को आवारा पशु या नीलगाय नुकसान पहुंचा सकते है? ▼
प्रश्न 6:लेमनग्रास की एक बार रोपाई करने के बाद यह कितने दिनों या वर्षों तक फसल प्रदान करती हैं? ▼
प्रश्न 7:एक साल में लेमनग्रास की कितनी कटाई की जा सकती हैं? ▼
प्रश्न 8:लेमनग्रास की सुखी पत्तियों का क्या उपयोग किया जाता है? ▼
स्रोत,संदर्भ एवं महत्वपूर्ण लिंक:
इस लेख को तैयार करने में किसान भाइयों से बात और उनके अनुभव के अलावा निम्नलिखित सरकारी संस्थानों और अनुसंधान केंद्रों के आधिकारिक दस्तावेजों के अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है:
- केंद्रीय औषधि एवं सगंध पौधा संस्थान (CIMAP), लखनऊ। लेमनग्रास की उन्नत किस्मों और इसकी कृषि तकनीक के लिए भारत का शीर्ष संस्थान।🌍 वेबसाइट:https://www.cimap.res.in।
- विदेशी व्यापार महानिदेशालय (DGFT), भारत सरकार। लेमनग्रास के तेल के निर्यात और वाणिज्यिक आंकड़ों की पुष्टि के लिए।🌐 वेबसाइट लिंक:https://www.dgft.gov.in।
- राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB), आयुष मंत्रालय,भारत सरकार। औषधीय पौधों की खेती पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी, योजनाओं और आयुर्वेदिक दिशा निर्देश की आधिकारिक जानकारी के लिए।🌐 वेबसाइट लिंक:https://www.nmpb.nic.in।
- विकासपीडिया (Vikaspedia): कृषि पोर्टल। भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा संचालित पोर्टल,जहां लेमनग्रास की खेती की जानकारी उपलब्ध हैं।🌐 वेबसाइट लिंक:https://www.vikaspedia.in।

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