खेत के किनारे बबूल और कोइत लगाना फायदेमंद या सिरदर्द? जानिए जमीनी हकीकत

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लेख का संक्षिप्त सार (Quick Summary)


  • ⚠️ बड़ी समस्या: खेतों की मेड़ या सड़कों के किनारे उगे कैथा (कोईत) और बबूल के कांटे आधुनिक कृषि मशीनों (टैक्टर/हार्वेस्टर) को रोकते हैं, टायर पंचर करते हैं और नीलगाय जैसी आफत के आगे बेअसर हैं।
  • ⚖️ कानूनी नियम: सरकारी सड़क या वन विभाग की जमीन पर लगे कटीले पेड़ों को बिना अनुमति खुद काटना अपराध है। इसके लिए ग्राम प्रधान (मुखिया) या अंचल अधिकारी (CO) को लिखित आवेदन देना सही तरीका है।
  • 🌱 स्मार्ट विकल्प: कांटों के झंझट से बचने के लिए पेड़ों की 7-8 फीट तक 'हाई प्रूनिंग' (छँटाई) करें या उनकी जगह लेमन ग्रास, करौंदा, मेहंदी की सुरक्षित 'बायो-फेंसिंग' अपनाएं।

 

Koyit aur babul jaise kantedar paudhe kheti ka sirdrd
कांटेदार पेड़ से किसान परेशान क्या है समाधान 


📌खेत के किनारे बबूल और कोइत लगाना फायदेमंद या सिरदर्द? जानिए जमीनी हकीकत:


प्रस्तावना (Introduction)

''पेड़ लगाओ, पर्यावरण बचाओ'' इस संदेश की हमलोग बचपन से ही सुनते और किताबों में पढ़ते भी आ रहे हैं।यह सही भी है नहीं तो मानव के साथ पूरी प्रकृति का अस्तित्व खतरें में पड़ जाएगा।

और इसी सोच के साथ कई राज्यों में सड़को के किनारे, नहरों के किनारे, पाइनो के किनारे,चरागाहों और कई स्थान पर तो खेतों की मेड़ पर भी बबूल, कोईत यानी कैथा और और अन्य कांटेदार वृक्षों का रोपड़ कराया जाता हैं।

इसका उद्देश्य भी स्पष्ट था देश में हरित आवरण बढ़ाना,मिट्टी का कटाव रोकना, पर्यावरण की रक्षा और आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित करना।

लेकिन यह कांटेदार वृक्ष किसानों,राहगीरों,मवेशियों,कृषि उपकरणों और फसल के साथ मिट्टी के लिए भी कई तरह के सिरदर्द पैदा कर दिक्कत पहुंचा रहे हैं।यानी इसकी अच्छाई तो है ही कुछ बुराई और नुकसान भी हो रहा है।

अब सवाल यह है कि क्या इस समस्या का कोई समाधान है या नहीं है।क्या सामंजस्य बनाकर कुछ बेहतर रास्ता और विकल्प को तलाशा जा सकता है या इसको ऐसे ही झेलते रहा जा सकता है। इसी विषय पर इस लेख में इसके कानूनी और व्यवहारिक समाधान की गहराई में जाकर विश्लेषण करेंगे।

क्योंकि किसान भाई सरकार और देश के नियम को शत प्रतिशत पालन करते हैं। लेकिन जब यह भलाई वाला काम समस्या बन जाए एवं इस समस्या के समाधान और विकल्प मौजूद हो तो इसका चर्चा, विश्लेषण और जागरूक करना जरूरी हो जाता है।

पारंपरिक सोच बनाम आज का हकीकत:यह सिरदर्द क्यों बनी?

पहले के समय में हमारे बुजुर्गों ने और सरकार ने इस तरह के कांटेदार वृक्षों को पूरी योजनबद्ध तरीकों से लगाया। मवेशी और आवारा पशु खेतों में न घुसे और मुफ्त की जलावन की लकड़ी भी मिल जाए।साथ ही सरकार के द्वारा भी इन पेड़ो को लगाया गया।

इसके पीछे मुख्य सोच इस प्रकार थी:-
  • कम पानी में भी आसानी से बढ़ने वाले पेड़:कांटेदार पेड़ कम पानी और सूखा क्षेत्रों में भी आसानी से बिना खास देखभाल के उग सकते है। इसीलिए इनको लगाया गया।
  • मिट्टी के कटाव को रोकना: इन पेड़ों का जड़ गहराई में जाते हैं और गहरे जड़ वाले पेड़ मिट्टी को गहराई से बांधकर रखते हैं।
  • हरित आवरण बढ़ाना: जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान को देखते हुए सरकार हरित आवरण बढ़ाने के लिए पेड़ो को लगा रही हैं।
  • ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लकड़ी और ईंधन: बबूल की लकड़ी मजबूत होती है और जलावन में भी उपयोग की जाती है।
  • जैव विविधता को बढ़ावा: पेड़ इसके अलावा पक्षियों, कीटों, मधुमक्खियों आदि को आश्रय देकर जैव विविधता को बढ़ाने में सहयोग प्रदान करते हैं।

साफ है सरकार की और हमारे बुजुर्गों की मंशा बिल्कुल साफ थी। लेकिन यही कांटेदार पौधों पिछले कुछ दसकों में किसान और ग्रामीण परिवेश के लिए कई तरह की दिक्कतें पैदा करने लगे हैं। 

आमजन में इसके चलते कुछ सामान्य समस्याओं का सामना कुछ इस तरह से करना पड़ता है:-

1. कांटों से मजदूरों और पशुओं को चोट:

कोईत और बबूल जैसे पेड़ के कांटे बहुत कड़े और नुकीले होते हैं।तेज हवा चलने या डालियां टूटने के बाद ये कांटे रास्तों और खेत की मिट्टी में बिखर जाते है।जब खेत पर किसान,मजदूर आदि जाते है तो उनके पैरों में चुभ जाते है।

  • इंफेक्शन का खतरा: जब कांटे पैर में चुभते है तो अंदर ही टूट जाते है।इससे पैरों में सूजन,दर्द और चुभन होने लगती है और कई बार तो टिटनेस जैसी बीमारियां हो जाती है।
  • मजदूरों की समस्या: कंटीले मेड़ो के डर से आजकल मजदूर भी इन खेतों पर जाने और काम करने से कतराने लगे हैं।
  • पशुओं को समस्या: यही समस्या बेजुबान पशुओं की हो जाती है और उनके पैरों एवं घास चरने के दौरान उनके मुंह भी चोटिल हो जाती है।जिनके इलाज में किसानों को पैसा भी खर्च करना पड़ता है।
  • महिला मजदूरों की परेशानी: महिला मजदूर जो धान की रोपाई पानी से भरे खेतों में करती है।उनके पैरों और हाथों में भी कांटे चुभ जाते हैं।इससे वो इन खेतों में जाने से कतराने लगी है।

2. आधुनिक कृषि मशीनों को चलाने में बाधा:

अब बैल से खेती नहीं होती है और आज का किसान आधुनिक हो गया है।वह खेतों की जुताई, बुआई और कटाई के लिए ट्रैक्टर, पावर टिलर और हार्वेस्टर जैसे मशीनों का प्रयोग करता है और खेतों पर बाइक से ही चला जाता है।साइकल भी खेतों पर जाने और समान आदि पहुंचाने के लिए उपयोग करता है। लेकिन 

  • टायर पंचर होना: इससे बार बार इन मशीनरी गाड़ियों के टायर पंचर हो जाते हैं जिससे किसान को आर्थिक नुकसान के साथ समय का भी नुकसान हो जाता है।
  • मशीनों से काम करने में दिक्कत: चूंकि कई बार मशीन ऊंचे भी होते हैं।इन पेड़ो की टहनियों से दिक्कत होती है।साथ ही इनकी जड़े खेतों में चली जाती है इससे खेतों की जुताई में दिक्कत होने लगती है।

3. फसल पर छाया का प्रभाव:

जहां तक फसल का सवाल है जब ये पेड़ बड़े होते हैं तो खूब फैलते हैं और इनकी छाया दूर तक खेतों के फसलों पर पड़ती है।इससे उतने दूर तक की फसलें कमजोर हो जाती है।


4. पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा:

हां इनकी जड़े खेतों के अंदर दूर तक पहुंच जाती है। और पोषक तत्वों को पाने के लिए इन पेड़ो और फसलों में प्रतिस्पर्धा होने लगती है। हम जो खाद पानी फसलों में डालते है उसको ये पेड़ सोख लेते हैं।


5. खेत की उपयोगी भूमि कम होना:

उतना दूर में जितना दूर तक इन पेड़ो की जड़े और शाखाएं फैली रहती है,खेती की भूमि बेकार हो जाती है। अतः खेतों और छोटे पईनो के किनारे लगे इन पेड़ो से खेती योग्य भूमि भी कम हो जाती है।


6. राहगीरों को कांटा और टायर पंचर का डर:

ये सीधे किसानों को नहीं बल्कि उस रास्ते से जाने वाले बाइक से जो राहगीर होते है उनकी टायर पंचर होने का डर रहता है।साथ ही जब किसान तैयार होकर बाजार करने के लिए शहरों में जाता है तो घर से निकलते ही उनकी बाइक के टायर में कांटे चुभ जाते हैं और वह पंचर हो जाती है।



सबसे बड़ा पेंच: कांटेदार पेड़ हटाने का कानूनी पक्ष

किसान इन पेड़ो से परेशान रहते है लेकिन वे इसे काट नही सकते है।और क्या सच में इन्हें काट देना ही समाधान है,तो जबाव है कि नहीं! केवल काट देना ही समाधान नहीं है। काटने पर तो पुलिस केस या वन विभाग द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता है।

1. पेड़ की स्थिति और जमीन का मालिकाना हक:

यह महत्वपूर्ण है यदि आप पेड़ को काटने के बारे में सोच रहे हैं तो। देखते है इन स्थितियों के बारे में ---

  • यदि पेड़ और जमीन निजी हो: ऐसी स्थिति में आप कृषि कार्य में बाधा डालने वाली टहनियों को छांट सकते है, लेकिन कुछ प्रतिबंधित प्रजातियों के पूरे पेड़ को जड़ से काटने के लिए राजस्व अधिकारी या अंचल अधिकारी (CO) से अनुमति लेनी होती हैं।
  • पेड़ और जमीन सरकारी हो: यदि पेड़ सरकारी सड़क, नहर, पाइन आदि के किनारे सरकारी जमीन जैसे वन विभाग,PWD या ग्रामीण विकास की तो इस पेड़ पर आपका कोई कानूनी अधिकार नहीं है।इसे बिना अनुमति काटना गंभीर और दंडनीय अपराध है।
  • यदि पेड़ और जमीन सांझी हो: मान लीजिए दो मेड़ों के बीच में पेड़ हो और जमीन दो लोगों के एकदम बीच में हो तो बिना पड़ोसी किसान की लिखित या मौखिक सहमति के पेड़ काटना आपसी विवाद और FIR का कारण बन सकता है।
अतः कभी भी बिना सोचे समझे किसी पेड़ को नही कटना चाहिए।और इसीलिए किसान दर्द झेलते रहते है लेकिन पेड़ को काटते नहीं है।

2. वन संरक्षण अधिनियम और राज्य के नियम:

अब इन पेड़ो के बारे में काटने को लेकर वन विभागों और राज्य सरकारों का नियम क्या कहता है:-

  • वृक्ष संरक्षण अधिनियम: राज्यों जैसे बिहार, यूपी आदि के "वृक्ष संरक्षण अधिनियम" के अनुसार कुछ पेड़ो को काटने पर पूर्ण या आंशिक रूप से प्रतिबन्ध है।
  • जंगली या स्वतः उगने वाली: यदि पेड़ जंगली और स्वतः उगने वाली है,बबूल और कोईत इसी श्रेणी में आती है, तो उन्हें हटाने के लिए नियम थोड़े लचीले है।फिर भी यदि पेड़ सरकारी जमीन पर है तो वन विभाग या स्थानीय ग्राम पंचायत की संपति मानी जाती है।उन्हें काटने पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के जुर्म में जुर्माना या जेल या दोनों हो सकता है।

कांटेदार पौधों की समस्या का पक्का कानूनी समाधान क्या है?

यदि सड़क के किनारे का पेड़ आपकी फसल को नुकसान पहुंचा रही है या रस्ते पर कांटे गिराकर दुर्घटना का कारण बन रहा है तो कानून को हाथ में लेने की जरूरत नहीं है।आप इन 3 कानूनी तरीकों को अपनाए :-

कदम 1. ग्राम पंचायत या सरपंच को लिखित शिकायत:

सबसे पहले आप ग्राम प्रधान यानी मुखिया जी और वार्ड सदस्य को एक लिखित आवेदन दीजिए।

  • आवेदन में साफ लिखे कि "सड़क के किनारे इस कांटेदार पेड़ के कारण राहगीरों के पैर जख्मी हो रहे है और वाहनों के टायर पंचर हो रहे है एवं खेती की मशीनों को आने जाने में बाधा हो रही है।
  • ग्राम पंचायतों को सार्वजनिक रास्तों को साफ और सुरक्षित रखने का अधिकार होता है।मुखिया जी पंचायत स्तर पर प्रस्ताव पास करवा कर उस पेड़ की पूरी छंटाई करवा सकते हैं।

कदम 2. अंचल अधिकारी (CO) या PWD विभाग को आवेदन:

 यदि पेड़ लोकनिर्माण विभाग (PWD) या किसी सरकारी सड़क की जमीन पर है तो एक साधारण आवेदन जिला या ब्लॉक के अंचल अधिकारी (CO) या स्थानीय PWD अधिशासी अभियंता को देनी चाहिए।

  • आवेदन में इस बात का जिक्र जरूर करें कि पेड़ लोक सुरक्षा (Public Safety) के लिए खतरा बन चुका है।
  • कानूनन यदि कोई पेड़ जन हानि या सार्वजनिक बाधा उत्पन्न करता है तो प्रशासन उसे हटाने या छंटने के लिए बाध्य है।

कदम 3. आपसी सहमति का पंचनामा:

अगर पेड़ आपके पड़ोसी की मेड़ पर है और आपके खेत में उसकी डालियां झुककर फसल को बर्बाद कर रही है तो --

  • भारतीय नागरिक संहिता: के नियमों के अनुसार आपको अपनी सीमा में आने वाली डालियों को छांटने का अधिकार है। लेकिन विवाद से बचने के लिए गांव के दो लोगों के सामने एक सहमति पत्र बना ले ताकि आगे चलकर विवाद न हो।


व्यवहारिक उपाय: बिना पेड़ो को काटे कांटो से मुक्ति कैसे पाए ?

चूंकि हमलोग भारत देश में रहते है तो यहां के कानून का तो सम्मान करना ही होगा।और यहां के कानून की विशेषता यह है कि एक ही कानून के आधार पर कभी काम जल्दी हो जाते है और कभी लटक गए तो सालों तक लटके ही रह जाते है।

 अतः यदि कानूनी प्रक्रिया में समय लग रहा है तो तुरंत समाधान के लिए आपके पास कुछ स्मार्ट और व्यवहारिक तरीके है जिन्हें अपना कर आप काम निकाल सकते है।और इस तरह से सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी।

1. हाई प्रूनिंग (High Pruning) तकनीक:

 पेड़ को जमीन और जड़ से काटने के बजाय उसकी निचली डालियों तक सफाई करें।यानी उसको एकदम ठूठ कर दीजिए।

  • तरीका: जमीन से लेकर 7 से 8 फिट तक पेड़ के तने को बिल्कुल साफ कर दीजिए और ठूठ बना दीजिए।ऊपर एक छोटी सी कटीली शाखा को छोड़ दीजिए।
  • फायदा: इससे रस्ते से गुजरने वाले लोगों या गाड़ियों को कांटे नहीं चुभेंगे और कृषि मशीन जैसे हार्वेस्टर खेत के मेड़ तक मुड़ सकते हैं।और नीचे की फसल को भी अच्छी धूप मिल जाएगी।


2. नए पौधों का रसायनिक और जैविक नियंत्रण (Root Treatment):

नए पौधे यानी इन पेड़ो बबूल और कोईत के पेड़ की खूबी होती है कि इनको जड़ से भी सफाई करने पर इनकी जड़ों से दोबारा कई कल्ले निकलते रहते है।ये बिना बीज के भी जड़ों में से ही हुए पौधें उग जाते हैं।अतः इन्हें हमेशा के लिए रोकने का तरीका --

  • जैविक तरीका: जब आप छोटे अनचाहे और कंटीले पौधों को जड़ के पास से काटे तो उसकी बची हुई ठूंठ यानी कटे हुए हिस्से पर नमक का घोल और छाछ(मठ्ठा) लेकर डाल दीजिए।इससे वह जड़ अंदर ही अंदर सड़कर खत्म हो जाती है और दुबारा नहीं पनपती है।
  • रसायनिक तरीका: कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर कटे हुए तने के हिस्से पर "ग्लाइफोसेट" (Glyphosate) जैसी खर पतवार नाशी दवा का लेप लगाने से जड़े पूरी तरह से खत्म हो जाती है।ध्यान रखें फसलों का नुकसान न हो।

3. कम्यूनिटी क्लिन अप (सामूहिक स्वच्छता):

जब भी सीजन आए यानी रबी और खरीफ की सीजन आने से ठीक पहले गांव के युवाओं और आस पास के किसानों को आपस में मिलकर एक दिन "कांटा सफाई अभियान" चलानी चाहिए।

सूखे कांटों को इकठ्ठा करके फिर सड़क के किनारे जला देनी चाहिए और गड्ढे में डाल देनी चाहिए।ताकि वे टायरों को नुकसान नहीं पहुंचा पाए।

 

भविष्य का रास्ता: कांटेदार बाड़ के 4 आधुनिक विकल्प

अब हमें सरकार के साथ मिलकर और सामंजस्य बनाकर अपनी सोच को बदलनी ही होगी तब इस समस्या का स्थाई समाधान हो सकता है।आजकल बाजार में और कृषि विज्ञान केंद्र में "स्मार्ट बायो फेंसिंग (सुरक्षित प्राकृतिक बाड़) के भी कई बेहतरीन विकल्प मौजूद है जो खेतों और फसलों को सुरक्षा प्रदान करने के साथ साथ अतिरिक्त आय भी प्रदान करते हैं।

विकल्प 1. लेमनग्रास (Lemon Grass) या खस का बाड़:

  • यह क्या है : यह एक औषधीय पौधा है जो मेड़ों पर घने रूप में लगाया जाता है।
  • फायदा: इसकी पत्तियां इतनी घनी और तेज धार वाली होती है कि छूटा आवारा मवेशी या नीलगाय इसे पार नहीं कर पाते है।साथ ही इसकी तीखी नींबू जैसी खुशबू के कारण जानवर इसके पास नहीं जाते है।
  • कमाई: इस घास को काटकर इसका तेल निकाला जाता है जो बाजार में बहुत महंगे दामों पर बिकता है।इसकी पत्तियां की भी होटल रेस्टोरेंट इंडस्ट्री में अच्छी खासी मांग होती है।इससे किसान कमाई भी कर सकते हैं।


विकल्प 2. करौंदा (Karonda)की झाड़ी:

  • यह क्या है: करौंदे में छोटे छोटे कांटे होते है लेकिन यह पेड़ जैसा नहीं होता है बल्कि एक झाड़ी जैसा होता है।
  • फायदा: आप जब चाहे इसे मनचाहे रूप और आकार में छांट सकते हो। साथ ही इसकी ऊंचाई को 4 से 5 फीट तक से ऊंचा मत होने दीजिए।
  • कमाई: इसके खट्टे मिट्ठे फलों का उपयोग आचार और जेली बनाने में किया जाता है।किसान इससे सीजन में अच्छी कमाई कर लेते हैं।

विकल्प 3. मेंहदी (Heena) की हरी दीवार:

  •  मेंहदी क्या है: मेंहदी के पौधे को मेड़ों में सटाकर खेतों पर लगा दीजिए।इसके बारे में तो सभी लोग जानते ही हैं।
  • फायदा: यह इतनी घनी और मजबूत दीवार बन जाती है कि इसमें आर पार देखना भी मुश्किल हो जाता है। इसमें एक भी कांटा नहीं होता है।
  • कमाई: इसके पत्तों को तोड़कर पीसकर मेंहदी लगाया जाता है और इसे मेंहदी उद्योगों को बेचकर कमाई की जा सकती है।


विकल्प 4. नीम,सहजन और अर्जुन से भी कमाई:

  • यह क्या है: यह बड़े पेड़ है खासकर नीम और अर्जुन।सहजन को खेतों के मेड़ों पर और नीम एवं अर्जुन को सड़क के किनारे आदि जगहों पर लगाया जा सकता है।
  • फायदा: सड़क पर छांव अच्छी मिलेगी और गांवों में लोगों को दातुन भी मिल जाएंगे।साथ ही सहजन की सब्जी भी मिल जाएगी।
  • कमाई: नीम के बीजों से आप कमाई कर सकते है और अर्जुन की छाल का आयुर्वेदिक दवाई उद्योग में उपयोग होता हैं।सहजन की सब्जी से लेकर इसके पत्तों का पावडर बनता हैं जो बहुत महंगा बिकता है।इससे किसान कमाई कर सकते हैं।


विकल्प 5. सोलर फेंसिंग या झटका मशीन:

  • सोलर फेंसिंग: यदि किसान पशुओं से खेत को बचाने के लिए पौधे लगाना चाहते है तो उससे बढ़िया उपाय है यदि पैसा खर्च कर सकें तो और वह हैं सोलर फेंसिंग।
  • कैसे काम करता है: यह दिनभर धूप से चार्ज होने वाली बैटरियों से जुड़ा होता है और उसमें से धीरे धीरे करेंट छोड़ा जाता है।जब इसे आवारा पशु या नीलगाय छूती है तो उनको करेंट लगता है और वह दुबारा उस खेत पर नहीं आती है।

इस प्रकार से यदि किसान और सरकार मिलकर ऐसे पेड़ो और पौधों को सड़क और खेतों के किनारे एवं खेतों के मेड़ों पर लगाते हैं तो यह स्थाई समाधान और भविष्य में समस्या नहीं होने वाली समाधान है।

सरकार के द्वारा कई जगह बड़े पेड़ो को प्राकृतिक रूप से मशीनों की सहायता से स्थानांतरण भी किया जाता है।अतः यदि सरकार को आवेदन दिया गया है तो यदि इस तरह की संभावना हो सकती है तो उसे स्थानांतरित भी किया जा सकता है।


विशेषज्ञों की राय और शोध क्या कहते हैं?

भारत में खेतों की मेड़ पर पेड़ लगाने की अवधारणा नई नहीं है।"राष्ट्रीय एग्रोफॉरेस्ट्री नीति,2014" का उद्देश्य भी खेती के साथ वैज्ञानिक तरीके से पेड़ लगाकर किसानों की आय बढ़ाना और मिट्टी एवं जल संरक्षण करना तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत कार्यरत "केंद्रीय एग्रोफॉरेस्ट्री अनुसंधान संस्थान (CAFRI),झांसी" ने विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिए ऐसी एग्रोफोरेस्ट्री मॉडल विकसित किए गए है जिनमें पेड़ो और फसलों का संतुलित संयोजन किया जाता है ताकि खेती और पर्यावरण दोनों को लाभ होता है।

भारत सरकार ने अब "हर मेड़ पर पेड़" जैसी अवधारणा को भी बढ़ावा दे रही है।पहले "Sub Mission on Agroforestry (SMAF)" और वर्तमान में "राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत एग्रोफोरेस्ट्री को बढ़ावा दिया जा रहा है।ताकि किसान गुणवत्तापूर्ण पौधें प्राप्त किया जा सके और किसान वैज्ञानिक ढंग से वृक्ष आधारित खेती को अपना सकें।

हालांकि कृषि विशेषज्ञ यह भी कहते है कि "हर पेड़ खेत के लिए उपयुक्त नहीं होता है "। पेड़ो की प्रजाति,दूरी,छंटाई,मिट्टी का प्रकार और फसल का चुनाव इन सभी का वैज्ञानिक प्रबंधन करने के बाद पेड़ लगानी चाहिए।

अतः भविष्य में कांटेदार पेड़ लगाने से पहले सरकार और किसान दोनों को मिलकर विशेषज्ञों से राय ले लेनी चाहिए।


निष्कर्ष (Conclusion)

इस प्रकार से खेतों की मेड़ और ग्रामीण सड़कों के किनारे कांटेदार पौधों को लगाने से कुछ फायदे तो है लेकिन ग्रामीण परिवेश और किसानों के लिए इसके नुकसान निश्चित रूप से है।इसे नकारा नहीं जा सकता है।

लेकिन इसका समाधान अंधाधुंध कटाई कर देना नहीं होना चाहिए।और यदि कटाई भी करनी है तो "सही प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाकर और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर" इस समस्या का समुचित निदान किया जा सकता हैं।

साथ ही इसका स्थाई समाधान और भविष्य की दूरदर्शी सोच के साथ वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ सरकारी संस्थाओं और कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर स्थानीय किसानों एवं ग्रामीणों के समन्वय से वैकल्पिक पेड़ पौधों को लगाया जा सकता है।इससे पर्यावरण सुरक्षा के साथ किसानों को इस समस्या से छुटकारा भी मिल जाएगा और किसानों को कुछ आय भी प्राप्त हो जाएगा।

अतः यदि आपके क्षेत्र में इस तरह की समस्या हो तो इन्हीं कदमों को अपनाए और नए पौधों को लगाने के समय में ही वैकल्पिक पौधों को लगवाए।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1:क्या खेत की मेड़ों पर बबूल जैसे कांटेदार पेड़ लगाने से फसलों को नुकसान होता हैं?
उत्तर:हां! खेत की मेड़ों पर कांटेदार पौधों को लगाने से उसकी छाया से फसलों को नुकसान होता हैं और उसकी जड़ों को खेतों में दूर तक फैलने से पोषक तत्वों को सोख लेने के कारण फसलों को पोषक तत्व भरपूर मात्रा में नहीं मिल पाती हैं
प्रश्न 2: क्या मैं अपने खेत की मेड़ पर लगे सरकारी पेड़ को खुद काट सकता हूं ?
उत्तर: नहीं! यदि पेड़ सरकारी जमीन या सड़क के किनारे है वन विभाग की जमीन में तो आप के द्वारा खुद काटना कानूनी अपराध है। पहले इसके लिए ग्राम पंचायत या अंचल अधिकारी को आवेदन देना होगा।
प्रश्न 3: कोइत या बबूल के कांटों से ट्रैक्टर के टायर को पंचर होने से कैसे बचाए ?
उत्तर: सबसे पहले आप व्यवहारिक हाई प्रूनिंग करें जिसमें पेड़ को नीचे से लेकर 7 फिट तक बढ़िया से सभी डालियों को छांटने और काट दे ताकि कांटे जमीन पर न गिरे।
प्रश्न 4:खेत की मेड़ के लिए कौन से पेड़ बेहतर माने जाते हैं?
उत्तर:खेत की मेड़ के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नीम,सहजन, लेमनग्रास,मेंहदी,अर्जुन आदि पौधों को लगाया जा सकता हैं।इसके लिए कृषि या वन विभाग से सलाह लेना उचित रहता है।
प्रश्न 5:एग्रोफोरेस्ट्री क्या होता है?
उत्तर:एग्रोफोरेस्ट्री वह प्रणाली है जिसमें खेती और पेड़ो को वैज्ञानिक तरीके से विकसित किया जाता है ताकि किसानों को फसल के साथ फल,लकड़ी और अन्य उपयोगी चीज मिल सकें और उन्हें कमाई भी हो सकें।
प्रश्न 6:किसानों और सरकार के बीच बेहतर समाधान क्या हो सकता है?
उत्तर: हां!समय समय पर इस तरह के कांटेदार पौधों का सर्वेक्षण, वैज्ञानिक छंटाई,उन्नत पेड़ो का चुनाव और किसानों की समस्याओं एवं शिकायतों का त्वरित समाधान ये मिलकर बेहतर परिणाम दे सकते हैं।
प्रश्न 7:सरकार इन पेड़ो को लगाती क्यों है ?
उत्तर: सरकार हरित क्षेत्र को देश में बढ़ाना, पर्यावरण सुरक्षा और मिट्टी के कटाव को रोकने के साथ जैव विविधता का संरक्षण करने और बढ़ावा देने के लिए इन पेड़ो को लगाया जाता है
प्रश्न 8:कांटेदार पेड़ से किसानों के समय के बचाव के लिए सबसे उचित और स्थाई समाधान क्या है?
उत्तर: सबसे पहले जो पेड़ लग गए है उनका छटाई करना,जरूरी पौधों को कानूनी रूप से काटना,और भविष्य में इन कांटेदार पौधों की जगह अनुकूल पौधों एवं पेड़ो की रोपाई विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार करना ही स्थाई समाधान है।


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स्रोत एवं संदर्भ :

  • 1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR): वेबसाइट:https://icar.gov.in⁠
  • 3. भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE): वेबसाइट:https://icfre.gov.in
  • 4. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय,भारत सरकार। वेबसाइट:https://agriwelfare.gov.in⁠
  • 5. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): वेबसाइट:https://rkvy.nic.in⁠
  • 6. राष्ट्रीय एग्रोफॉरेस्ट्री नीति (National Agroforestry Policy) नीति दस्तावेज। वेबसाइट:https://agricoop.gov.in⁠

विशेष नोट: यह लेख किसानों के अनुभव,उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी और सरकार के संस्थानों द्वारा प्रकाशित उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। विभिन्न क्षेत्रों में मिट्टी, जलवायु,पेड़ो की प्रकृति और खेती की पद्धति अलग होने के कारण परिणाम अलग हो सकते हैं।

अतः खेत की मेड़ पर पेड़ लगाने और हटाने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विभाग या वन विभाग से सलाह अवश्य लेनी चाहिए और ले।

(अंतिम अपडेट:09 जुलाई 2026)

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