भारत के 10 विदेशी आक्रामक पौधे: देशी वनस्पति और पारिस्थितिकी के लिए बढ़ता संकट

⚡ संक्षेप में (Key Takeaways)
1 MIN READ
  • संकट का दायरा: भारत के 40% से अधिक प्राकृतिक वन क्षेत्र और प्रमुख टाइगर रिज़र्व विदेशी आक्रामक पादप प्रजातियों (IAPS) से प्रभावित हैं।
  • शीर्ष आक्रामक प्रजातियां: लैंटाना, विलायती बबूल, पार्थेनियम (गाजर घास), जलकुंभी और सेना स्पेक्टेबिलिस देशी वनस्पतियों व भूजल को सबसे अधिक क्षति पहुँचा रही हैं।
  • रासायनिक प्रभाव: ये पौधे एलेलोपैथिक यौगिक छोड़ते हैं, जिससे देशी घासों और स्थानीय पेड़ों का प्राकृतिक अंकुरण रुक जाता है।
  • वैज्ञानिक समाधान सूत्र: केवल उखाड़ना पर्याप्त नहीं; स्थायी बहाली के लिए Removal ➔ Restoration (देशी प्रजातियां लगाना) ➔ Long-term Monitoring का त्रि-स्तरीय चक्र अनिवार्य है।

 

"भारत के 10 विदेशी आक्रामक पौधे देशी जैव विविधता और वनों के लिए बढ़ता पारिस्थितिक संकट"
विदेशी आक्रामक पौधों से तो हरियाली दिखती है लेकिन जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रही है 


📑 विषय सूची (Table of Contents)
त्वरित नेविगेशन

 


प्रस्तावना (Introduction) 

भारत के जैव विविधता को देख जाए तो यह केवल बाघ, हाथी, हिरण और पक्षियों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि भारत के जंगलों, घासभूमियों, पहाड़ों और ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे हजारों देशी पौधे भी है जो स्थानीय इकोसिस्टम को मजबूत बनाते हैं।

लेकिन इनके सामने एक विशेष प्रकार का खतरा बढ़ रहा है जो पहली नजर में तो दिखाई नहीं देता है और वह हैं -- "विदेशी आक्रामक पौधे" (Invasive Alien Plants Species - IAPS)। 

यह विदेशी पौधे भारत में कैसे आ गए।

इनमें से कुछ पौधे सजावट के उद्देश्य से आ गए, कुछ कृषि और वानिकी के लिए लगाए गए और कुछ व्यापार या अन्य मानवीय गतिविधियों के माध्यम से चुपके से आ गए।

लेकिन हर विदेशी पौधा खतरनाक नहीं भी होता है।

फिर भी उनमें से कुछ विदेशी पौधे भारत में प्रवेश करने के बाद इतनी तेजी से फैलते हैं कि वे देशी पौधों से पानी, प्रकाश, पोषक तत्व और उसके स्थान को भी छीन लेते हैं।

कई बार वह झुरमुठ बनाकर देशी पौधों के अंकुरण और उसके उगने के प्राकृतिक प्रजनन को भी बाधित कर देते हैं।

इसीलिए इस लेख में हमने 10 ऐसे ही विदेशी पौधों का विश्लेषण किया है जो भारतीय पौधों के इकोसिस्टम की परिस्थितिकी, जैव रसायनिक युद्ध और फैलाव के गणित को प्रभावित करते हैं।

इसके नियंत्रण के उपायों की भी समीक्षा साथ में ही करेंगे।


विदेशी पौधा और आक्रामक विदेशी पौधा एक ही चीज नहीं है 


आगे बढ़ने से पहले ही इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर को समझ लेना जरूरी हो जाता है।

विदेशी पौधे वह प्रजाति होती है जो किसी क्षेत्र की मूल मातृभूमि की वंशज या पैदाइश नहीं होती है। यह किसी न किसी मानवीय गतिविधियों के माध्यम से यहां पहुंचती है या पहुंचाई जाती है।

लेकिन हर विदेशी पौधा आक्रामक नहीं होता है। कुछ विदेशी पौधे भारत में आने के बाद सीमित क्षेत्रों में ही रहते हैं। यह स्थानीय इकोसिस्टम को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचाते है।

लेकिन कुछ विदेशी प्रजातियां तेजी से फैलती है और स्थानीय रूप से अनुकूलित हो जाती है फिर वह मूल स्थानीय बायोडायवर्सिटी पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगती है।

इसी आक्रामक विदेशी पौधों को Invasive Alien Species - IAS कहा जाता है।


भारत में विदेशी आक्रामक पौधों की समस्या कितनी बड़ी है? 


जब तक इसकी समस्या और इसकी गहराई को नहीं जानेंगे तब तक इसके दुष्प्रभावों और इससे बचाव या नियंत्रित करने के उपायों पर विचार नहीं करेंगे। अतः इसकी वास्तविक समस्या को पहले देखते हैं।

भारत में विदेशी आक्रामक पौधों पर किए गए शुरुआती व्यापक अध्ययनों में 173 विदेशी आक्रामक पौधों की प्रजातियां,117 वंश और उनकी 44 परिवार को दर्ज किया गया है।

इस अध्ययन में लगभग - 74% प्रजातियों का मूल उष्णकटिबंधीय अमेरिका है और करीब 11% का मूल उष्णकटिबंधीय अफ्रीका दर्ज किया गया है।

एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह दर्ज किया गया है कि इन 173 प्रजातियों में -

  • 151 शाकीय पौधे (Harbaceous Plants)
  • 74 झाड़ियां (Shrubs)
  • 3 पेड़ (Tree)

दर्ज किया गया है।

इससे यही समझ विकसित होती है कि आक्रामक विदेशी पौधों में केवल पेड़ नहीं होते हैं। बल्कि इसमें बहुत छोटी घास , झाड़ियां और बेलें होती है जो स्थानीय इकोसिस्टम को गंभीर खतरा बन कर उभरती है।


1. लैंटाना कमारा (Lantana Camara) 


लैंटाना कमारा (Lantana Camara) - Verbenaceae कुल का पौधा है। मूल रूप से यह अमेरिका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का पौधा है।

भारत में इसको मुख्य रूप से सजावटी पौधा (Ornamental Plant) के रूप में कलकत्ता के रॉयल बॉटनिकल गार्डन में लाया गया था।
🌱 आक्रमण एवं प्रसार प्रवाह (Invasion Pathway)
📍 मूल: मध्य व दक्षिण अमेरिका
1807 सजावटी आयात ➔
🌲 भारत के वन
कैनोपी विखंडन ➔
⚠️ 40%+ वन क्षेत्र प्रभावित

 

वर्तमान समय में यह भारत की सबसे चर्चित आक्रामक विदेशी पौधा बन चुकी है।

"वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया" (WII) और अन्य परिस्थितिकीयविंदो जैसे - Journal of Applied Ecology, 2020 के अध्ययनों के अनुसार -

लैंटाना कमारा भारत के प्राकृतिक वन क्षेत्र और वह भी "टाइगर रेंज" के वन क्षेत्रों के 40% से अधिक हिस्सों में अतिक्रमण कर चुका है। यह लगभग 3 लाख वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को प्रभावित करके रख दिया है।

यह कार्बेट, कान्हा, बांदीपुर और नागरहोल जैसे प्रतिष्ठित टाइगर रिजर्वो के कोर और बफर जोन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।


किस तरह से नुकसान कर रहा है? 

सबसे पहले तो यह अपनी पत्तियों और जड़ों से पेंटासाइक्लिक ट्राइटरपेनॉइड्स, लैटमराइन और फेनोलिक एसिड छोड़ता है जो देशी पौधों के बीजों के अंकुरण को पूरी तरह से बाधित कर देता है।

दूसरा नुकसान मवेशियों और वन्यजीवों को होता है। वे जब इसका सेवन कर लेते हैं तब इनका त्वचा फटने लगता है और यकृत विकार होते हुए भी देखा गया है।

तीसरा यह कि लैंटाना कमारा की पत्तियां अत्यधिक ज्वलनशील बायोमास बनती है। शुष्क मौसम में यह जमीनी आग को जन्म देती है जिससे देशी पौधों की छाल नष्ट हो जाती है।

इसके अलावा यह जंगल की जमीन पर प्रकाश को पहुंचने से रोकती है और देशी पौधों को अंकुरण की जगह को छीन लेती है।साथ ही यह शाकीय एवं औषधीय पौधों को दबा देती है।

भले ही शोध में इसके कुछ औषधीय गुण पाए गए हैं लेकिन इससे होने वाला नुकसान बहुत ज्यादा है इसलिए इसको आक्रामक की श्रेणी में रखा गया है।

इसको नियंत्रित करने के लिए कट रूट स्टॉक विधि सबसे सही मानी जाती है जिसे - प्रो सी. आर. बाबू,(प्रोफेसर,CEMDE, दिल्ली विश्वविद्यालय) द्वारा विकसित करके कार्बेट में मानकीकृत किया गया था।

इसमें पौधों को मुख्य जेडी कॉलर के नीचे - 3आज सेमी नीचे जेडी को काट दिया जाता है।



"लैंटाना कमारा Lantana camara के रंग-बिरंगे फूल और भारतीय जंगल में फैली घनी झाड़ियां"
लैंटाना कमारा एक विदेशी आक्रामक पौधा


2. विलायती बबूल (Prosopis Juliflora) 


विलायती बबूल मूल रूप से दक्षिण अमेरिका, मेक्सिको और वेनेजुएला का पौधा है जो Fabaceae कुल का पौधा है।

भारत में इसको शुष्क क्षेत्रों में जलावन के लिए लकड़ी और मरुस्थलीकरण के रोकथाम के उद्देश्य से वर्ष 1877 में लाया गया था। लेकिन वर्तमान में कई क्षेत्रों में यह स्वयं इकोलॉजिकल समस्या बन चुका है।

Indian Arid Zone के ICAR के अध्ययन में विलायती बबूल के घेरे हुए क्षेत्र के नीचे "प्रकाश संश्लेषण के लिए सक्रिय विकिरण" में लगभग 86-87% की कमी पाई गई।

अर्थात इसके छत्रछाया के नीचे जमीन तक पहुंचने वाला उपयोगी प्रकाश बहुत कम हो सकता है।

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के अध्ययन में तमिलनाडु, गुजरात के बन्नी घास के मैदान और राजस्थान के क्षेत्रों में इसका 50% कब्जा हो चुका है और यह मूल पादप समुदायों को विस्थापित कर चुका है।


किस तरह से नुकसान करता है? 

पहला तो यह कि इसके प्राथमिक जड़ भूजल को प्राप्त करने के लिए 50 से 70 मीटर तक नीचे चला जाता है। यह देशी बबूल और खेजड़ी की तुलना में बहुत ज्यादा वाष्पोत्सर्जन करता है। अतः इससे स्थानीय जल संग्रह तेजी से कम होता है।

दूसरा इसकी बीजों और पत्तियों में मौजूद जूलीफ्लोराइन और जूलिफ्लोरिसिस मिट्टी के जीवाणुओं राइजोबियम और सूक्ष्मजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल कर उनके संतुलन को बदल देते हैं।

मवेशियों द्वारा इसकी फलियों को अधिक खाने से जबड़े का पक्षाघात होने की संभावना बढ़ जाती है।

इसके कुछ उपयोग भी है। यह जलावन के लिए लकड़ी, चारकोल बनाने और अन्य कामों में प्रयुक्त होती है। अतः यह पूरी तरह से बेकार पौधा नहीं कहा जा सकता है।

लेकिन जैविक इकोसिस्टम संरक्षण की दृष्टि से इसके खतरे को देखते हुए इसका फैलाव समस्या बन सकता है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने वर्ष 2017 में एक जनहित याचिका की सुनवाई में विलायती बबूल के उन्मूलन के लिए ऐतिहासिक निर्देश दिया था। फिर भी मिट्टी में मौजूद इसके बीज बैंक 10 सालों तक जीवित रहते हैं और कभी भी उग सकते हैं।



"विलायती बबूल Prosopis juliflora पेड़ की कांटेदार शाखाएं और कच्छ के घास के मैदान में प्रसार"
गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित विलायती बबूल 


3. कांग्रेस घास (Parthenium Hysterophorus) 


कांग्रेस घास जिसे गाजर घास भी कहा जाता है यह Asteraceae कुल का पौधा है जो मूलतः उष्णकटिबंधीय उत्तरी और मध्य अमेरिका का पौधा है।

देश की आजादी के समय भारत में गेहूं की कमी थी इसीलिए अमेरिका से आयात करना पड़ता था। उसी आयातित PL -480 गेहूं के साथ यह अनजाने में आया और पुणे महाराष्ट्र में घुस गया।

फिलहाल लगभग पूरे भारत में फैल चुका है।
चरण 1
PL-480 गेहूं आयात (1955)
चरण 2
बीज संदूषण (पार्थेनियम)
चरण 3 (प्रभाव)
35M हेक्टेयर कृषि व बंजर भूमि पर संक्रमण

 

Indian Council of Agricultural Research (ICAR) के तहत आनेवाली "खर पतवार अनुसंधान निदेशालय" (DWR, जबलपुर) के आंकड़ों के अनुसार कांग्रेस घास भारत के लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है।

यह रबी और खरीफ दिनों मौसमों की फसलों में 40% तक उपज को कम कर देने का मुख्य कारण बनता है।


किस तरह से नुकसान करता है? 

इसके अंदर पार्थेनिन टॉक्सिन लैक्टोन होता है। इसके परागकणों के माध्यम से हवा में जब मनुष्यों का संपर्क होता है तब एलर्जिक राइनाइटिस, ब्रोन्कियल अस्थमा और एक्जिमा की गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है।

दूसरा यह मात्र 3 से 4 महीना में ही 15,000 से 25,000 बीजों को पैदा कर देता है। यह बीज हल्के होते हैं और हवा एवं पानी के माध्यम से दूसरे क्षेत्रों में भी तेजी से फैलते हैं।

यह मिट्टी में फलियों वाले पौधों की गांठो के निर्माण की प्रक्रिया को बाधित कर देते हैं।

अतः इसका प्रभाव केवल पौधों पर ही नहीं होता है बल्कि - वनस्पति + कृषि धन + मानव स्वास्थ्य - तक होता है। 

इसके प्रभावों को कम करने के लिए "मैक्सिकन बीटल" को वर्ष 1983 में भारत लाया गया। यह भृंग होता है जो मानसून के समय में कांग्रेस घास की पत्तियों को खाकर इसके फूलों के उत्पादन को 80% तक कम कर देता है।


"पार्थेनियम गाजर घास Parthenium hysterophorus के छोटे सफेद फूल और कृषि भूमि पर खरपतवार संक्रमण"
कांग्रेस घास:विदेशी आक्रामक पौधा है जो गांवों के खेतों में अनचाहे उग जाती है 


4. काली बांसी (Ageratina Adenophora) 


इसको क्रोफ्टन वीड (Crofton Weed) भी कहा जाता है। यह Asteraceae कुल का पौधा है। इसका मूल उत्पति साथ मेक्सिको है।

भारत में इसका आक्रमण क्षेत्र मुख्यतः पूर्वी और पश्चिमी हिमालय के 1,000 से 2,500 मीटर की ऊंचाई वाले जगहों और नीलगिरी की पहाड़ियों पर है।

Ageratina Adenophora ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश,सिक्किम और असम के ऊंचे क्षेत्रों में स्थित बांज और चीड़ के जंगलों की निचली वनस्पतियों को गंभीर रूप से नष्ट कर दिया है।

यह अत्यधिक ढलान एवं भूस्खलन वाले क्षेत्रों में तेजी से जड़ें जमा लेता है। यह देशी झाड़ियों को तेजी से खत्म कर देता है।

इसमें पाए जाने वाले यौगिक 9-oxo -ageraphorone घोड़ो और खच्चरों के फेफड़ों को स्थाई रूप से नुकसान पहुंचा देते हैं। इसको न्यूमिस डिजीज के रूप में जाना जाता है।


एजेराटीना एडेनोफोरा Crofton weed हिमालयी ढलानों पर फैली आक्रामक खरपतवार झाड़ी"
काली बांसी (Ageratina Adenophora)



5. गंधा घास (Ageratum Conyzoides) 


गंधा घास को गन्धेली एवं बिलिगोट वीड नाम से भी जाना जाता है। यह Asteraceae कुल का पौधा है। यह भी मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय अमेरिका का मूल पौधा है।

यह भारत के तराई क्षेत्र और उप पर्वतीय क्षेत्र एवं कृषि पारिस्थितिकी तथा सीमांत जंगलों में फैली हुई है।

यह एक तीव्र रूप से बढ़ने वाला मौसमी वार्षिक पौधा है जो फसलों,बगानों खासकर चाय और कॉफी के बगानों एवं खुले वनों में भी घना मोनोक्लाचार मैट के रूप में फैलता है।

इसमें पाइरोलिजिडन एल्कलाइड्स यौगिक होता है जो लिवर वेनो ऑक्लुसिव विकारों को ट्रिगर करता है जिससे शाकाहारी कीट और वन्यजीव इसको चरने से बचते हैं।

साथ ही यह पौधा प्रिकोसीन को स्रावित करता है जो कीट प्रजातियों के किशोर हार्मोन को बाधित कर देता है जिससे कीटों का असामान्य कायान्तरण जाता है।

चावल, मक्का और सब्जियों के खेत में यह फास्फोरस और जिंक को छीन कर अवशोषित कर लेता है।

Shivalik Landscape के एक अध्ययन में गंधा घास के अतिक्रमण से फसलों के उत्पादन में 32.10% तक की कमी की रिपोर्ट बताया गया है।


"एजेरेटम कोनिज़ोइड्स Billygoat weed के नीले-बैंगनी फूल और चाय बागानों में फैला कालीन"
गंधा घास (Ageratum Conyzoides)



6. सियाम वीड (Chromolaena Odorata) 


इसको असम लताओं की झाड़ी भी कहा जाता है। यह Asteraceae कुल का पौधा है। इसका मूल उत्पति स्थान मध्य और दक्षिण अमेरिका है।

करीब 19वीं सदी के अंत में असम के चाय बगान में किसी तरह आया था और धीरे धीरे फैल गया।

यह पश्चिमी घाट के आर्द्र पर्णपाती और सदाबहार वनों के किनारों पर सबसे विनाशकारी खर पतवारों में से एक है। काजीरंगा नेशनल पार्क और मानस नेशनल पार्क में यह गैंडे एवं हिरण के पसंदीदा घास को विस्थापित करके खत्म कर रही है।

यह प्रति माह 10 से 20 सेमी तक बढ़ सकता है और 3 मीटर तक ऊंची अभेद्य दीवार खड़ी कर देता है।

इसके जड़ों से निकलने वाले फ्लेवोनॉयड्स मिट्टी में माइकोराइजा कवकों के सहजीवी संबंधों को नष्ट कर देते हैं। इससे देशी पेड़ो के अंकुर मर जाते हैं।

इसकी पत्तियों में मौजूद आवश्यक तेल अत्यधिक वाष्पशील और ज्वलनशील होता है जो वनों में आग लगने पर उसकी तीव्रता और प्रसार को कई गुना बढ़ा देता है।


"क्रोमोलेना ओडोराटा Siam weed पश्चिमी घाट के वनों में फैली ऊंची और सघन आक्रामक वनस्पति"
सियाम वीड (Chromolaena Odorata)


7. मिकानिया मिक्राऺथा (Mikania Micrantha) 


इसको माइल -ए -मिनट विड भी कहा जाता है जो Asteraceae कुल का पौधा है। इसका मूल स्थान उष्ण कटिबन्धीय मध्य और दक्षिणी अमेरिका है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय में युद्ध के दौरान हवाई पट्टियों को तेजी से छुपाने के लिए इसको असम में रोपा गया था।
⚡ मिकानिया का विनाशकारी चक्र (Choking Cycle)
गति
8-9 सेमी / 24 घंटे
➔
फैलाव
कैनोपी पर चढ़ना
➔
अवरोध
पूर्ण सौर आच्छादन
➔
प्रभाव
प्रकाश संश्लेषण अवरोध
➔
परिणाम
पोषक वृक्ष की मृत्यु

 

मिकानिया एक बहुत तेज आक्रमणकारी बारहमासी लता है। यह उपयुक्त परिस्थितियों में 24 घंटों में ही 8 से 9 सेमी तक बढ़ सकती है।

यह पेड़ो बांसों की कुंजो और कृषि फसलों पर चढ़कर एक घना छतरी बना लेती है। इससे नीचे के पौधों को सूर्य का प्रकाश ही नहीं मिलता है और अंततः परपोषी पेड़ की मृत्यु हो जाती है।

पूर्वोत्तर भारत और केरल में यह चाय बगानों में चाय की झाड़ियों को पूरी तरह से ढक लेती है। टी बोर्ड ऑफ इंडिया के अनुसार इससे सालाना करोड़ों रुपए का उत्पादन और निराई गुनाई का नुकसान हो जाता है।

प्रत्येक पौधा सालाना 20,000 से 40,000 तक पैराशूट जैसे रोमगुच्छ वाले बीज को पैदा करते हैं। यह बीज हवा एवं पानी के माध्यम से कई किलोमीटर दूर तक पहुंच कर फैल जाते हैं।

इसके इन खतरनाक और तेज प्रभावों के कारण यह अति आक्रामक विदेशी पौधों की सूची में शामिल है।


"मिकानिया मिक्रान्था Mile a minute लता पेड़ों की कैनोपी को ढकती हुई असम का जंगल"
मिकानिया मिक्राऺथा (Mikania Micrantha)



8. मिमोसा डिप्लोट्रिका (Mimosa Diplotricha) 


मूल रूप से ब्राजील का यह विशाल संवेदनशील पौधा है जो Fabaceae कुल का पौधा है। भारत में यह केरल, कर्नाटक,असम और अंडमान निकोबार द्वीप समूहों में फैला हुआ है।

यह एक अर्द्ध काष्ठीय और तेजी से फैलने वाला झाड़ी वाला पौधा होता है। इसका तना 4 कोणीय होता है और यह बेहद तीखे एवं मुड़े हुए कांटों से ढका रहता है।

इसीलिए यह मनुष्य एवं जानवरों दोनों को जंगलों और चरागाहों में आवागमन को असंभव कर देते हैं।

यह काजीरंगा नेशनल पार्क में बाढ़ के पानी के माध्यम से पार्क के कोर ग्रासलैंड में प्रवेश कर गया। फिर यह उपयोगी देशी प्रोटीन से युक्त घासों को दबाकर एक सींग वाले गैंडों के मुख्य भोजन को छीनकर उनके संतुलन को बिगाड़ रहा है।

यह नाइट्रोजन को बहुत तेजी से और अत्यधिक मात्रा में अवशोषण कर लेता है। इससे मिट्टी का पोषण ढांचा तेजी बदलने के कारण बहुत सारे स्थानीय पौधे उग ही नहीं पाते हैं।


"मिमोसा डिप्लोट्रिका Giant sensitive plant के कांटेदार तने और काजीरंगा ग्रासलैंड में फैलाव"
मिमोसा डिप्लोट्रिका (Mimosa Diplotricha) 



9. जलकुंभी (Eichhornia Crassipes) 


जलकुंभी Pontederiaceae कुल का पौधा है। यह बंगाल के आतंक (Terror of Bengal) के नाम से मशहूर है। इसका मूल स्थान अमेजन बेसिन और दक्षिणी अमेरिका है।

भारत में 1890 के दशक में ब्रिटिश वायसराय लेडी हेस्टिंग्स के द्वारा इसके आकर्षक लैवेंडर फूलों के कारण सजावटी फूलों के रूप में लाया गया था।

जलकुंभी 12 दिनों के अंदर अपनी आबादी को दोगुना करने की क्षमता रखता है। यह तालाबों, नदियों, झीलों, नहरों, आर्द्रभूमि और धीमे बहने वाले पानी के स्रोतों में तेजी से फैल जाती है।

यह पानी की सतह पर घना और कई फिट मोती चादर की परत जैसी बिछा देती है।

यह वायु - जल इंटरफेस को बाधित कर देती है। जल में प्रकाश संश्लेषण के बाधित होने और मृत बायोमास के सड़े गले अपघटन से जल का DO स्तर शून्य के करीब पहुंच जाता है। इससे मछलियां और अन्य महत्वपूर्ण सूक्ष्मजीवों की मृत्यु हो जाती है।

जलकुंभी से ढके पानी की वाष्पोत्सर्जन दर खुले पानी की तुलना में 3.5 से 4 गुना अधिक होती है। इससे जलाशय तेजी से सूखते है।

अतः जलकुंभी एक ऐसा आक्रामक विदेशी पौधा है जो मिट्टी की जगह जलीय पारिस्थितिकी को संकट पैदा करता है।


"जलकुंभी Eichhornia crassipes से पूरी तरह ढका हुआ भारतीय जलाशय और बैंगनी फूल"
जलकुंभी (Eichhornia Crassipes) 



10. पीला कैसिया (Senna Spectabilis) 


इस पूरे सूची का यह सबसे महत्वपूर्ण वृक्ष का उदाहरण है। यह Febaceae कुल का पौधा है और इसको कैलोसिंथी भी कहा जाता है। मूलतः यह दक्षिण और मध्य अमेरिका का पौधा है।

इस वृक्ष को वन विभाग द्वारा सामाजिक वानिकी और सड़को के किनारे छायादार एवं सजावटी पेड़ के रूप में 1980 के दशक में लगाया गया था।

पीला कैसिया (Senna Spectabilis) वर्तमान में बांदीपुर टाइगर रिजर्व, मदुमलाई, सत्यमंगलम और वायनाड वन्यजीव अभयारण्य के लिए सबसे बड़ा वृक्ष आक्रमणकारी के रूप में खतरा बन गया है।

केरल वन अनुसंधान संस्थान (KFRI) के अध्ययनों के अनुसार वायनाड वन्यजीव अभयारण्य का 30% से अधिक क्षेत्र इससे प्रभावित हो गया है। इसकी घनी छतरी देशी प्रजातियों और दलहनी घासों के प्राकृतिक पुनर्जनन को रोक दे रही है।

साथ ही इसकी पत्तियों में बहुत अधिक मात्रा में टैनिन एवं विषाक्त एल्केलाइड्स पाए जाते हैं। इसके कारण चीतल, सांभर और हाथी इसको खाते नहीं है। अतः इनके चारे में भी कमी हो गई है।

यदि इस पेड़ को तने से काट दिया जाए तो इसके स्टंप से 20 से 50 तक नए कल्ले निकल जाते हैं। इससे इसकी वृद्धि दर और भी बढ़ जाती है।

इसलिए इसके आक्रामक प्रभावों से बचाव के लिए केवल तना काटना प्रभावी नहीं होता है।


"सेना स्पेक्टेबिलिस Senna spectabilis के पीले फूलों से लदे पेड़ वायनाड वन्यजीव अभयारण्य केरल"
पीला कैसिया (Senna Spectabilis) 


प्रजातियों का तुलनात्मक वैज्ञानिक विश्लेषण 


नीचे दिए गए तालिका के माध्यम से इन प्रजातियों के वैज्ञानिक रूप से तुलनात्मक विश्लेषण को एक ही जगह पर देखा एवं पढ़ा जा सकता है -
📊 प्रजातियों का तुलनात्मक वैज्ञानिक विश्लेषण (दाएं-बाएं स्क्रॉल करें 👉)
वैज्ञानिक नाम मूल उत्पत्ति आक्रमण माध्यम प्रमुख रासायनिक यौगिक प्राथमिक प्रभावित आवास
Lantana camara उष्णकटिबंधीय अमेरिका सजावटी (1807) Lantadene A & B शुष्क और आर्द्र पर्णपाती वन, टाइगर रिजर्व
Prosopis juliflora मेक्सिको / द. अमेरिका वनीकरण / ईंधन (1877) Juliflorine, L-Tryptophan अर्ध-शुष्क घास के मैदान, कच्छ, दिल्ली रिज
Parthenium hysterophorus मध्य अमेरिका बीज संदूषक (1955) Parthenin, Caffeic acid कृषि भूमि, बंजर भूमि, चरागाह
Ageratina adenophora मेक्सिको सजावटी / आकस्मिक 9-Oxo-ageraphorone शीतोष्ण व उप-हिमालयी ढलान (1000-2500m)
Ageratum conyzoides उष्णकटिबंधीय अमेरिका आकस्मिक प्रसार Precocene I & II, Pyrrolizidine बागान, फसलें, नम पर्णपाती वन
Chromolaena odorata द. एवं मध्य अमेरिका आकस्मिक (असम चाय बागान) Odoratin, Quercetin पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर वर्षावन, संरक्षित क्षेत्र
Mikania micrantha मध्य / द. अमेरिका छलावरण (WW-II) Sesquiterpenoids, Phenolics पूर्वोत्तर वन, नम तराई, चाय बागान
Mimosa diplotricha ब्राजील कवर क्रॉप संदूषण Mimosine घास के मैदान (काजीरंगा), कृषि-पारिस्थितिकी
Eichhornia crassipes अमेज़ॅन बेसिन सजावटी बागवानी (1890) सेल्युलोज बायोमास, फिनोल मीठे पानी की आर्द्रभूमियां, नदियां, झीलें
Senna spectabilis मध्य / द. अमेरिका सामाजिक वानिकी (1980) Piperidine alkaloids, Tannins नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व (वायनाड, बांदीपुर)

 


 क्या ये आक्रमणकारी पौधे भारत के संकटग्रस्त पौधों को समाप्त कर सकते हैं? 


यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल हर किसी के मन में आता है।

यदि वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो किसी विशेष संकटग्रस्त पेड़ पौधों की प्रजातियों के विकल्प होने का कारण केवल आक्रमणकारी विदेशी पौधे है ऐसा कहना उचित नहीं होगा।

हां और कारणों के साथ साथ यह भी एक कारण हो सकता है। यह भी उन पौधों को संकट में डालने का प्रभाव पैदा करते हैं और उनके प्रजनन से लेकर विकास को प्रभावित करने में विपरीत प्रभाव को देखा गया है।

यह देशी पेड़ो को इस प्रकार से नुकसान पहुंचाते हैं -

  • प्रतिस्पर्धा करके प्रकाश संश्लेषण, पानी,पोषक तत्वों और जगहों का अतिक्रमण कर लेते हैं।
  • कुछ आक्रामक पौधे रासायनिक यौगिक छोड़ते हैं जिससे देशी पौधों का प्रजनन और विकास को बाधित कर देते हैं।
  • यह देशी पौधों के रिजेनरेशन को रोक देते हैं। यानी देशी पौधों के नए बीज उग ही नहीं पाते हैं।
  • देशी पौधे पेड़ के साथ साथ पशु पक्षियों, कीटों, तितलियों आदि को आश्रय एवं भोजन प्रदान करते हैं। आक्रमणकारी पौधा ऐसा नहीं करते इससे पूरा इकोसिस्टम प्रभावित होता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भले ही देशी पौधों को विलुप्त करने में केवल विदेशी आक्रामक प्रजातियों की ही भूमिका नहीं होती है लेकिन ये महत्वपूर्ण रूप से प्रभाव तो पैदा करते ही है।

अतः इनसे बचाव और इनके नियंत्रण के वैज्ञानिक उपाय जरूरी हो जाता है।




आक्रामक विदेशी पौधों के प्रभावों से बचाव और समाधान क्या है? 


इन विदेशी आक्रामक प्रजातियों के पौधों से सबसे बड़ा खतरा होता है -"हरा लेकिन जैव विविधता से खाली भूमिक्षेत्र"। 

इसके प्रभावों से जुड़े क्षेत्रों को देखकर हम कह सकते हैं कि - "देखिए! कितना हरा भरा क्षेत्र है!" लेकिन यदि उस हरियाली में केवल एक दो ही देशी पौधे हैं तो यह जैव विविधता का प्रमाण नहीं है।

पहले जहां 50 से अधिक देशी पेड़ पौधे थे वहीं इनके आक्रमण के बाद केवल 2-5 ही बचे हैं और बाकी जगह हरी भरी दिखाई दे रही है तो यह चिंतनीय है।

परम्परिक रूप से भारत में खर पतवार का नियंत्रण केवल प्रतिक्रियाशील रूप में ही होता रहा है सक्रिय रूप से नहीं। अतः इसको सक्रिय रूप से सबसे पहले जरूरी काम समझते हुए प्रबंधन करना चाहिए।

इसके लिए निम्नलिखित मुख्य दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए --


1. प्रारंभिक पहचान और तीव्र प्रतिक्रियाओं को अपनाना: 

अब ढुलमुल नीति और प्रतिक्रिया को अपनाने से संकट इतना बढ़ सकता है कि इसको संभालना मुश्किल हो जाएगा।

रिमोट सेंसिंग और जीआईएस (GIS) मैपिंग के माध्यम से इनके सघन क्षेत्रों में मौसमी बदलावों के आधार पर इनके संक्रमण का सटीक नक्शा तैयार किया जाना चाहिए।

साथ ही AI संचालित ड्रोन के द्वारा निगरानी करके दुर्गम घाटी क्षेत्रों में इनके अतिक्रमण की पहचान करनी चाहिए।


2. एकसाथ मानवीय और जैव नियंत्रण शुरू करनी चाहिए: 

इनका पहचान और मैपिंग हो जाने के बाद अब इनका नियंत्रण करनी चाहिए। इसके लिए एक ही साथ मानवीय और जैविक नियंत्रण उपायों को तेजी से शुरू कर देनी चाहिए।

कुछ आक्रमणकारी पौधों को उनकी जड़ से 3-5 सेमी की गहराई तक मुख्य कंद तक को काटकर निकाल कर फिर सूखने की व्यवस्था करनी चाहिए।

बाकी के कुछ आक्रमणकारी पौधों जैसे - जलकुंभी और पार्थोनियम आदि को जैविक और बायो रसायनिक विधियों से छिड़काव के माध्यम से नष्ट करके नियंत्रित किया जा सकता है।

दुबारा उगने न पाए इसके लिए कड़ी मॉनिटरिंग करनी चाहिए।

इनको नष्ट करने के बाद जो बायोमास निकलता है उसका बेहतर प्रबंधन का व्यवस्था करनी चाहिए। इनसे फर्नीचर, चारकोल, बायोगैस एवं बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग सामग्री आदि बनाया जा सकता है।


3. देशी परिस्थितिकी और पौधों की बहाली करनी चाहिए: 

केवल आक्रमणकारी विदेशी पौधों को नष्ट कर देने से ही सही समस्या समाधान नहीं होगा। बल्कि उसके जगहों पर उतनी ही तेजी से देशी पेड़ पौधों की रोपाई करनी चाहिए।

देशी पेड़ पौधों के साथ साथ इन जगहों पर देशी घास भी सघन मात्रा में लगानी चाहिए ताकि आक्रमणकारी पौधों को दुबार उगने का जगह न मिलने पाए।

वैज्ञानिक कार्ययोजना

प्रभावी पादप आक्रमण प्रबंधन के 5 चरण

1
Early Detection (प्रारंभिक पहचान)
नये क्षेत्रों में आक्रामक पौधे की शुरुआत होते ही त्वरित पहचान व अलर्ट जारी करना।
2
GIS & Field Mapping (विस्तार मानचित्रण)
जीआईएस (GIS), सैटेलाइट डेटा और फील्ड सर्वे द्वारा संक्रमण सघनता का सटीक नक्शा बनाना।
3
Removal & Control (नियंत्रण व उन्मूलन)
स्थिति अनुसार बहु-स्तरीय वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग:
Manual (हाथ से उखाड़ना) Mechanical (मशीनी कटाई) Targeted Treatment Bio-Control (जैविक नियंत्रण)
4
Native Restoration सर्वाधिक महत्वपूर्ण
खाली हुई जमीन पर देशी घासों व पेड़ों का त्वरित पुनर्स्थापन, ताकि विदेशी बीज दोबारा न पनप सकें।
5
Long-term Monitoring (दीर्घकालिक निगरानी)
मिट्टी में मौजूद 'सीड बैंक' (Seed Bank) को निष्प्रभावी करने के लिए कम से कम 3-5 वर्षों तक निरंतर फॉलो-अप।
पारिस्थितिक संतुलन का मूलमंत्र
Removal ➔ Restoration ➔ Monitoring

 

इन आक्रमणकारी पौधों में से कई पौधों के बीज बैंक मिट्टी में 5 से 10 सालों तक भी जिंदा रहते है और फिर से दुबारा उग जाते हैं। अतः इनपर नियंत्रण पाने के बाद भी लंबे समय तक मॉनिटरिंग की नीति को अपनानी चाहिए।


देशी पौधे बनाम invasive पौधों का दृश्य
देशी पौधे बनाम invasive पौधों का दृश्य


निष्कर्ष (Conclusion) 


वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत में विदेशी आक्रामक पौधों की समस्या को केवल "खर पतवार की समस्या" समझना सबसे बड़ी भूल होगी।

  • क्योंकि यह आक्रमणकारी पौधे पूरे जंगलों की इकोसिस्टम को बदल कर जैव विविधता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • कृषि और मानवीय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।
  • वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव और उनके चारे की समस्या पैदा कर सकते हैं।
  • देशी पौधे को उगने से भी रोक सकते हैं।
  • मिट्टी और इसकी संरचना को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

अतः इनको खर पतवार नहीं बल्कि पूरे मानवीय और जैविक इकोसिस्टम के लिए संभावित खतरे के रूप में देखना जरूरी हो जाता है।

तभी हम एक सक्रिय रूप से वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से उपायों को अपना कर इनको नियंत्रित कर सकते हैं और लंबे समय तक मॉनिटरिंग को अपना सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)

1. क्या विदेशी पौधा और विदेशी आक्रामक पौधों एक ही चीज है?

नहीं! विदेशी पौधे वह प्रजाति होती है जो किसी क्षेत्र की मूल मातृभूमि की वंशज या पैदाइश नहीं होती है। यह किसी न किसी मानवीय गतिविधियों के माध्यम से यहां पहुंचती है या पहुंचाई जाती है।


लेकिन हर विदेशी पौधा आक्रामक नहीं होता है। कुछ विदेशी पौधे भारत में आने के बाद सीमित क्षेत्रों में ही रहते हैं। यह स्थानीय इकोसिस्टम को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचाते है।


लेकिन कुछ विदेशी प्रजातियां तेजी से फैलती है और स्थानीय रूप से अनुकूलित हो जाती है फिर वह मूल स्थानीय बायोडायवर्सिटी पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगती है।


इसी आक्रामक विदेशी पौधों को Invasive Alien Species - IAS कहा जाता है।

2 भारत में विदेशी आक्रामक पौधों की समस्या कितनी बड़ी है? 

भारत में विदेशी आक्रामक पौधों पर किए गए शुरुआती व्यापक अध्ययनों में 173 विदेशी आक्रामक पौधों की प्रजातियां,117 वंश और उनकी 44 परिवार को दर्ज किया गया है।


इस अध्ययन में लगभग - 74% प्रजातियों का मूल उष्णकटिबंधीय अमेरिका है और करीब 11% का मूल उष्णकटिबंधीय अफ्रीका दर्ज किया गया है।


एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह दर्ज किया गया है कि इन 173 प्रजातियों में -


151 शाकीय पौधे (Harbaceous Plants)

74 झाड़ियां (Shrubs)

3 पेड़ (Tree)


दर्ज किया गया है।


इससे यही समझ विकसित होती है कि आक्रामक विदेशी पौधों में केवल पेड़ नहीं होते हैं। बल्कि इसमें बहुत छोटी घास , झाड़ियां और बेलें होती है जो स्थानीय इकोसिस्टम को गंभीर खतरा बन कर उभरती है।

3.  लैंटाना कमारा (Lantana Camara) किस तरह से नुकसान करती है?

 सबसे पहले तो यह अपनी पत्तियों और जड़ों से पेंटासाइक्लिक ट्राइटरपेनॉइड्स, लैटमराइन और फेनोलिक एसिड छोड़ता है जो देशी पौधों के बीजों के अंकुरण को पूरी तरह से बाधित कर देता है।


दूसरा नुकसान मवेशियों और वन्यजीवों को होता है। वे जब इसका सेवन कर लेते हैं तब इनका त्वचा फटने लगता है और यकृत विकार होते हुए भी देखा गया है।


तीसरा यह कि लैंटाना कमारा की पत्तियां अत्यधिक ज्वलनशील बायोमास बनती है। शुष्क मौसम में यह जमीनी आग को जन्म देती है जिससे देशी पौधों की छाल नष्ट हो जाती है।


इसके अलावा यह जंगल की जमीन पर प्रकाश को पहुंचने से रोकती है और देशी पौधों को अंकुरण की जगह को छीन लेती है।साथ ही यह शाकीय एवं औषधीय पौधों को दबा देती है।

4. विलायती बबूल (Prosopis Juliflora) को भारत में कब लाया गया था?

 भारत में इसको शुष्क क्षेत्रों में जलावन के लिए लकड़ी और मरुस्थलीकरण के रोकथाम के उद्देश्य से वर्ष 1877 में लाया गया था। लेकिन वर्तमान में कई क्षेत्रों में यह स्वयं इकोलॉजिकल समस्या बन चुका है।


Indian Arid Zone के ICAR के अध्ययन में विलायती बबूल के घेरे हुए क्षेत्र के नीचे "प्रकाश संश्लेषण के लिए सक्रिय विकिरण" में लगभग 86-87% की कमी पाई गई।

5. कांग्रेस घास (Parthenium Hysterophorus) भारत में कैसे आया ?

 देश की आजादी के समय भारत में गेहूं की कमी थी इसीलिए अमेरिका से आयात करना पड़ता था। उसी आयातित PL -480 गेहूं के साथ यह अनजाने में आया और पुणे महाराष्ट्र में घुस गया।


फिलहाल लगभग पूरे भारत में फैल चुका है।Indian Council of Agricultural Research (ICAR) के तहत आनेवाली "खर पतवार अनुसंधान निदेशालय" (DWR, जबलपुर) के आंकड़ों के अनुसार कांग्रेस घास भारत के लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है।


यह रबी और खरीफ दिनों मौसमों की फसलों में 40% तक उपज को कम कर देने का मुख्य कारण बनता है।

6. क्या जलकुंभी (Eichhornia Crassipes) भारत का पौधा है?


नहीं! जलकुंभी Pontederiaceae कुल का पौधा है। यह बंगाल के आतंक (Terror of Bengal) के नाम से मशहूर है। इसका मूल स्थान अमेजन बेसिन और दक्षिणी अमेरिका है।


भारत में 1890 के दशक में ब्रिटिश वायसराय लेडी हेस्टिंग्स के द्वारा इसके आकर्षक लैवेंडर फूलों के कारण सजावटी फूलों के रूप में लाया गया था।


जलकुंभी 12 दिनों के अंदर अपनी आबादी को दोगुना करने की क्षमता रखता है। यह तालाबों, नदियों, झीलों, नहरों, आर्द्रभूमि और धीमे बहने वाले पानी के स्रोतों में तेजी से फैल जाती है।

7. सियाम वीड (Chromolaena Odorata) पौधा कहा का मूल पौधा है?


इसको असम लताओं की झाड़ी भी कहा जाता है। यह Asteraceae कुल का पौधा है। इसका मूल उत्पति स्थान मध्य और दक्षिण अमेरिका है।


करीब 19वीं सदी के अंत में असम के चाय बगान में किसी तरह आया था और धीरे धीरे फैल गया।


यह पश्चिमी घाट के आर्द्र पर्णपाती और सदाबहार वनों के किनारों पर सबसे विनाशकारी खर पतवारों में से एक है। काजीरंगा नेशनल पार्क और मानस नेशनल पार्क में यह गैंडे एवं हिरण के पसंदीदा घास को विस्थापित करके खत्म कर रही है।

8. क्या विदेशी आक्रमणकारी पौधे भारत के संकटग्रस्त पौधों को समाप्त कर सकते हैं? 

यदि वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो किसी विशेष संकटग्रस्त पेड़ पौधों की प्रजातियों के विकल्प होने का कारण केवल आक्रमणकारी विदेशी पौधे है ऐसा कहना उचित नहीं होगा।

यह देशी पेड़ो को इस प्रकार से नुकसान पहुंचाते हैं -

  • प्रतिस्पर्धा करके प्रकाश संश्लेषण, पानी,पोषक तत्वों और जगहों का अतिक्रमण कर लेते हैं।
  • कुछ आक्रामक पौधे रासायनिक यौगिक छोड़ते हैं जिससे देशी पौधों का प्रजनन और विकास को बाधित कर देते हैं।
  • यह देशी पौधों के रिजेनरेशन को रोक देते हैं। यानी देशी पौधों के नए बीज उग ही नहीं पाते हैं।
  • देशी पौधे पेड़ के साथ साथ पशु पक्षियों, कीटों, तितलियों आदि को आश्रय एवं भोजन प्रदान करते हैं। आक्रमणकारी पौधा ऐसा नहीं करते इससे पूरा इकोसिस्टम प्रभावित होता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भले ही देशी पौधों को विलुप्त करने में केवल विदेशी आक्रामक प्रजातियों की ही भूमिका नहीं होती है लेकिन ये महत्वपूर्ण रूप से प्रभाव तो पैदा करते ही है।

 

संबंधित विषय: 


📚 वैज्ञानिक संदर्भ एवं स्रोत (References)
Wildlife Institute of India (WII) – स्टेटस ऑफ टाइगर्स, को-प्रेडैटर्स एंड प्रे इन इंडिया (आक्रामक कैनोपी फैलाव रिपोर्ट)।
ICAR - Directorate of Weed Research (DWR, जबलपुर) – पार्थेनियम और विदेशी खरपतवारों पर अनुसंधान व वार्षिक रिपोर्ट।
Kerala Forest Research Institute (KFRI) – पश्चिमी घाट में Senna spectabilis व अन्य आक्रामक प्रजातियों का प्रभाव और मैपिंग।
Current Science Association – भारत में पादप आक्रमण (Ramaswami & Sukumar, प्रो. सी.आर. बाबू आदि के अनुसंधान पत्र)।
Global Invasive Species Database (GISD - IUCN/ISSG) – वैश्विक शीर्ष 100 आक्रामक प्रजातियों का पारिस्थितिक प्रोफाइल डेटाबेस।
नोट: सभी आंकड़े व वैज्ञानिक तथ्य वन अनुसंधान संस्थानों एवं अधिकृत डेटाबेस पर आधारित हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

AI खेती 2035: आने वाले 10 सालों में कैसे बदलेगी भारतीय कृषि ?

केले का "वेस्ट टू वेल्थ" मॉडल: तने, फूल और बायोमास से नए कृषि उद्योग की पूरी जानकारी

क्या आप भी बनना चाहते है "फॉरेंसिक साइंस मे एक्सपर्ट " कैसे जानिए पूरी प्रोसेस

भारत का LiFE पहल:कैसे वैदिक जीवनशैली से पर्यावरण सुरक्षा को प्रेरित करती है

स्वस्थ्य रहने के लिए भोजन के 10 नियम:सही तरीके से क्या,कब और कैसे खाए ?

Zero Budget Natural Farming : क्या सच में 1 गाय से 30 एकड़ खेती संभव है ? जानिए पूरा सच

भारत मे अब E20 Petrol,BS6 और Flax Engine Tractor ये तीन बड़ी टेक्नोलॉजी 2026 मे खेती को कैसे बदल देगी?

क्या PM कुसुम योजना मार्च 2026 के बाद बंद हो रही है ? जानिए पूरी सच्चाई (Fact Check)

स्वदेशी और स्वावलम्बन:घर पर दंत-मंजन बनाने का लघु व्यवसाय कैसे शुरू करे?

Redox Flow Battery क्या है और यह एनर्जी स्टोरेज की दुनिया को कैसे बदलेगी?