असली सीता अशोक
Saraca asoca (Fabaceae)
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संरचना: चौड़ा, छत्रनुमा कैनोपी
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फूल: नारंगी-लाल घने पुष्प गुच्छ
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उपयोग: अत्यधिक औषधीय छाल (गर्भाशय टॉनिक)
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स्थिति: जंगलों से लुप्तप्राय (Vulnerable)
नकली / झूठा अशोक
Polyalthia longifolia (Annonaceae)
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संरचना: सीधा, पतला, खंभे जैसा वृक्ष
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फूल: हल्के हरे-पीले छोटे तारे जैसे फूल
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उपयोग: केवल सजावटी, शून्य औषधीय मूल्य
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स्थिति: सड़कों के किनारे सर्वत्र उपलब्ध
असली अशोक यानी सीता अशोक का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। साथ ही इसके छाल में कैटेचिन, टैनिन और फ्लेवोनॉयड्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो महिलाओं के स्त्री रोग विकारों में मुख्य घटक है।
आयुर्वेदिक की प्रसिद्ध स्त्री रोग दवा "अशोकारिष्ट" इसी से बनाया जाता है।
संकट का कारण क्या है? दरअसल सड़कों और पार्कों में दिखने वाला जो सीधा पेड़ होता है वह झुठा अशोक (Polyalthia Longifolia) होता है।
असली सीता अशोक की छाल की बहुत अधिक मांग के कारण पेड़ो की छाल को पूरी तरह से छिल दिया जाता है। इससे पेड़ की फ्लोएम नलिकाएं नष्ट हो जाती है और पेड़ पोषक तत्वों के अभाव में सुख जाता है।
PIB के अनुसार अशोक की छाल की अनुमानित मांग 2,000 मीट्रिक टन से अधिक बताई गई है और इसकी वनों में उपलब्धता तेजी कम होने को भी बताया गया है।
FRLHT (Foundation for Revitalization of Local Health Traditions), बेंगलुरु के अनुसार -
"भारत में हर्बल उद्योगों में प्रयुक्त होने वाली अशोक छाल का 80% से अधिक हिस्सा या तो मिलावटी होता है या तो अन्य पेड़ों से लिया जाता है। क्योंकि प्राकृतिक वनों में परिपक्व सीता अशोक के वृक्ष अब दुर्लभ हो चुके हैं।"
इसीलिए इसके संरक्षण के तौर पर गांवों में खेतों की मेड़ पर पेड़ो को लगाने, स्कूल और पंचायत भूमि के क्षेत्रों पर पेड़ लगाने एवं स्थानीय नर्सरी में इसके पौधे को उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है।
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| सीता अशोक और नकली अशोक के पेड़ |
3.सफेद मूसली (Chlorophytum Borivilianum)
सफेद मूसली भारत की महत्वपूर्ण औषधीय पौधों में से एक है। इसका वैज्ञानिक नाम Chorophytum Borivilianum है और यह Asparagaceae परिवार से आता है।
Kew के Plant of the World Online में इसकी ICUN स्थिति Critically Endangered (CR) दर्ज है।
इसे ग्रामीण भारत में सफेद सोना और प्राकृतिक विकीकरण रसायन भी कहा जाता है। इसकी कंदयुक्त जड़ों में सैंपोनीन, पॉलिसकेराइड और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है।
संकट का मुख्य कारण क्या है? जैसे ही मानसून शुरू होता है और पौधे उगते है स्थानीय संग्रहकर्ता इसके परिपक्व होने और बीज बनने से पहले ही खोद लेते हैं। इससे बीज बैंक पूरी तरह से समाप्त हो गया है।
CSIR -CIMAP ( केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान ), लखनऊ के अनुसार -
"जंगली अवस्था में Chlorophytum Borivilianum की उपस्थिति अब केवल कुछ संरक्षित वनों तक ही सीमित रह गई है। औषधीय उद्योग पूरी तरह से इसके नियंत्रित कृषि उत्पादन पर निर्भर होता जा रहा है"
4.जटामांसी (Nardostachys Jatamansi)
हिमालय की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिलने वाली जटामांसी एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है।
इसका वैज्ञानिक नाम Nardostachys Jatamansi है और यह Kew के अनुसार IUCN की कटेगरी में Critically Endangered (CR) की स्थिति में है।
इसकी जड़ों और कंदों से प्राप्त होने वाला सुगंधित तेल एवं पारंपरिक और आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी भारी मांग के चलते अत्यधिक अनियंत्रित दोहन के कारण इसका प्राकृतिक आवास का विनाश हो चला है।
जलवायु परिवर्तन का हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे प्रतिकूल प्रभावों का भी इस पर असर हो सकता है।
इसीलिए इसके अधिक दोहन को नियंत्रित करने के लिए इसका निर्यात को विनियमित करने के उद्देश्य से भारत के वन्यजीव प्रबंधन प्राधिकरण से लीगल सर्टिफिकेट और CITES Export Permit लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व उत्तराखंड में इसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखा गया है।
इसके संरक्षण के लिए नियंत्रित खेती और नर्सरी प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए और पर्वतीय गांवों द्वारा इसको गोद लिया जाना चाहिए।
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| औषधीय पौधा जटामांसी जो संकटग्रस्त सूची में है |
5. कुटकी (Picrorhiza Kurrooa)
कुटकी हिमालय की एक महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी बूटी है। इसका वैज्ञानिक नाम Picrorhiza Kurrooa है और यह IUCN की स्थिति Endangered (EN) में है।
वर्ष 1980 के बाद से इसकी आबादी में 50% गिरावट दर्ज किया गया है।
इसका औषधीय उपयोग यकृत विकार, पाचन और बुखार आदि में किया जाता है। लेकिन इसको निकालने के लिए पौधों के कण्ड एवं जड़ों का उपयोग होने के चलते पूरे जड़ से ही उखाड़ दिया जाता है।
इससे पौधा नष्ट हो जाता है और इसका पुनरूत्पादन ही रुक जाता है। जबकि इसको पूरी तरह से विकसित होने में 3 से 4 वर्ष लग जाते हैं। साथ ही यह केवल हिमालयी क्षेत्रों में 2700 से 4500 मीटर की ऊंचाई पर ही उग और विकसित हो सकती है।
अतः इसके संरक्षण के लिए केवल इसके 30-40% भाग के प्रकंद को निकाल कर बाकी भाग को मिट्टी में छोड़ देने की तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है।
हिमालयी अल्पाइन क्षेत्रों के गांवों में इसकी खेती और विकास के लिए विशेष प्रोत्साहन कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।
6. आतिस (Aconitum Heterophyllum)
अतिस भी हिमालय का एक महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी बूटी है। इसका वैज्ञानिक नाम Aconitum Heterophyllum है और यह IUCN के संकटग्रस्त पौधों की सूची में Endangered (EN) दर्ज किया गया है।
आयुर्वेद में इसे अतिविषा भी कहा जाता है जिसका उपयोग ज्वर, अतिसार, कफ और बच्चों के रोगों में प्रमुखता से किया जाता है।
इसका भी कंद ही औषधीय रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसका जीवनकाल बहुत ही कम होता है। इसके विकसित होने और बीजों को अंकुरित होने के लिए लगभग 15°C या उससे भी कम तापमान की आवश्यकता होती है।
अधिक दोहन और पूरे पौधे सहित उखाड़ देने एवं ऊंचाई क्षेत्रों में अनियंत्रित चारागाह के कारण इस पर संकट पैदा हो गया है।
मुख्य रूप से इसको भी संरक्षण प्रदान करने के लिए इसके 50% से अधिक कंदों को मिट्टी में ही छोड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
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एक महत्वपूर्ण सबक
गांवों में Medicinal Plant Conservation का अर्थ केवल “पौधे लगाना” नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ है:
पौधे की पहचान + सही Harvesting + Regeneration + Nursery + Market Regulation
📌 सस्टेनेबल हार्वेस्टिंग प्रोटोकॉल
केवल 30–40% प्रकंद निकालकर शेष भाग को मिट्टी में छोड़ देने की वैज्ञानिक तकनीक (Good Agricultural and Collection Practices — GACP) को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि प्राकृतिक पुनरुत्पादन निरंतर बना रहे।
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| आतिश का पौधा जो एक औषधीय जड़ी बूटी है |
7. कूठ (Saussurea Costus)
कूठ का वैज्ञानिक नाम Saussurea Costus है और यह Asteraceae यानी सूरजमुखी के कुल परिवार के एक अत्यंत मूल्यवान और सुगंधित औषधीय पौधा है।
यह भी ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों हिमाचल प्रदेश, तिब्बत और जम्मू कश्मीर में उगता है।
आयुर्वेद, तिब्बती चिकित्सा और इत्र उद्योग में इसकी जड़ों का उपयोग किया जाता है। इसके भी जड़ों को उखाड़ने के लिए पूरे पौधों को अनियंत्रित तरीकों से उखाड़ दिया जाता है।
इसको पूरी तरह से विकसित होने में 3-4 साल लग जाते हैं लेकिन अवैध रूप से लोग 1 साल में ही पूरे पौधे के साथ उखाड़ लेते हैं। यही कारण है कि इसकी आबादी में भी 80% तक की कमी हो चुकी है।
इसको संरक्षित करने के लिए इसके निर्यात पर पूरी तरह से रोक लगा दिया गया है।
साथ ही हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति जिला और जम्मू कश्मीर में भी किसानों को उत्प्रेरित करके इसकी संगठित कृषि की शुरुआत किया गया है।
इसके स्थानीय उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से उत्प्रेरित करना होगा।
8. हिमालयी जेऺटियन (Gentiana Kurroo)
यह पश्चिमी हिमालय का एक महत्वपूर्ण जड़ी बूटी है। इसकी भी IUCN स्थिति Critically Endangered (CR) है और इसका भी 80% से अधिक क्षेत्र नष्ट हो चुका है।
आयुर्वेद, यूनानी और तिब्बती चिकित्सा में इसका उपयोग यकृत विकार, पुराने बुखार, पाचन शक्ति बढ़ाने और रक्त शोधन के लिए इसके जड़ों और कंदों का उपयोग किया जाता है।
इसका भी कहानी एक समान है। इसके जड़ों और कंदों को प्राप्त करने के लिए पूरे पौधे को जड़ से ही उखाड़ जाता है और अधिक मांग होने के कारण विकसित होने से पहले ही उखाड़ लिया जाता है।
इसके पौधों और बीजों की कमी हो गई है और अपने से मुश्किल से ही उग पाती है। इसके बीज बहुत सूक्ष्म होते हैं और इसका अंकुरण प्रतिशत बहुत ही कम होता है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत इसको संरक्षित पौधा घोषित कर दिया गया है। साथ ही इसके निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।
CSIR - IHBT, पालमपुर और GBPNIHE अल्मोड़ा संस्थानों ने इसके सूक्ष्म प्रवर्धन एवं टिश्यू कल्चर के माध्यम से प्रयोगशाला में पौधा तैयार करके किसानों को नर्सरी उपलब्ध करने पर काम कर रही है।
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| हिमालयी जेटीयन का पौधा |
9. चिरायता (Coptis Teeta)- पूर्वोत्तर की औषधीय विरासत
पूर्वोत्तर भारत के जैव विविधता में चिरायता (Coptis Teeta) एक महत्वपूर्ण पौधा है जिसे स्थानीय स्तर पर "मिशमी तीता" (Mishmi Teeta) कहा जाता है।
इसकी IUCN स्थिति Endangered (EN) है और यह मुख्य रूप से अरूणाचल प्रदेश के प्राकृतिक क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।
इसके प्रकंद में बर्बेरीन और कोप्थिसिन जैसे शक्तिशाली बायोएक्टिव एल्केलाइड्स उच्च मात्रा में पाए जाते हैं। जिससे इसका उपयोग मलेरिया, जीवाणु संक्रमण, दस्त, पीलिया और आंखों के रोगों में किया जाता है।
दवा निर्माण के लिए इसके भूमिगत प्रकंद को जड़ से ही पौधों सहित उखाड़ दिया जाता है और इससे पौधा पूरी तरह से नष्ट हो जाता है। इसके प्रकंद को औषधीय रूप से विकसित होने में 5-7 वर्षों का समय लग जाता है।
पारंपरिक चीनी चिकित्सा में भी इसका उपयोग होता है और इसीलिए इसका बड़े पैमाने पर अवैध व्यापार और सीमा पार तस्करी भी होती है। इस तरह से यह संकट में आ गया है।
स्थानीय मिशमी जनजाति जो इसका पारंपरिक खेती भी करती आयी है उन्हें वैज्ञानिक तरीके से भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। राज्य वन अनुसंधान संस्थान और ICAR ने मिलकर इसके बीजों को भी विकसित किया है।
अधिकतर इसको छाया में उगाया जाता है। इसे और भी प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
10. हिमालयी यू (Taxus Wallichiana)
हिमालयी यू (Taxus Wallichiana) एक सदाबहार शंकुधारी वृक्ष है। स्थानीय स्तर पर इसे तालिसपत्र,थुनेर,धाऺगरा या बर्मी कहा जाता है।
इसकी IUCN स्थिति Endangered (EN) है।
इसकी पत्तियों और मुख्य रूप से तने की छाल में - "पैक्लिटेक्सेल या टेक्सोल" (Paclitaxel/Taxol) नामक एक शक्तिशाली कैंसर रोधी यौगिक पाया जाता है। इसके कारण इसका उपयोग स्तन, डिम्बग्रंथि और फेफड़ों के उपचार में होता है।
छाल निकालने के लालच में पेड़ो के तने को पूरी तरह से छिल दिया जाता है और पेड़ सुख कर मर जाता है।
यह पेड़ बहुत धीमी गति से बढ़ता है और पूरी तरह से परिपक्व होने में या वृक्ष बनने में 70 से 100 वर्ष लग जाते हैं। जिस तेजी से इसे काटा गया उतनी तेजी से इसे लगाना संभव ही नहीं है।
साथ ही यह पौधा - "डॉयोशियस" (Diocecious) होता है। यानी इसके नर और मादा फूल अलग अलग पेड़ो पर लगते हैं। यदि आस पास सही अनुपात में नर और मादा वृक्ष नहीं रहे तो परागण ही नहीं होता है।
इतना ही नहीं बल्कि इसके बीजों में गहरी सुषुप्तावस्था होती है जिसे प्राकृतिक रूप से अंकुरित होने में 1.5 से 2 वर्षों का समय लग जाता है।
इसको संरक्षित घोषित कर दिया गया है और इसके निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
संरक्षण के लिए ऐसा तकनीक विकसित किया जा रहा है कि इसके पत्तियों से 10-DAB को निकाल कर प्रयोगशाला में सेमी सिंथेटिक तरीकों से टैक्सॉल बनाया जाता है जिससे पेड़ो की छाल और पेड़ नष्ट नहीं हो पाए।
साथ ही CSIE - CIMAP और CSIR - IHBT ने मिलकर कटिंग से नए पौधे विकसित करने के लिए क्लोनल प्रपोजेशन तकनीक की विधि को विकसित किया है। इसको वन विभाग ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में पुनर्रोपण के लिए उपयोग कर रहा है।
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| हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला हिमालयन यू पौधा |
11. अगरवुड/अगर (Aquilaria Malaccensis)
पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक वनस्पतियों में अगर का विशेष स्थान है। स्थानीय स्तर पर इसे सांची या इगलवुड भी कहा जाता है।
इसकी IUCN स्थिति Critically Endangered (CR) है। यानी इसे गंभीर रूप से संकटग्रस्त की श्रेणी में रखा गया है।
अगरवुड का सुगंधित रालदार भाग पेड़ की सामान्य लकड़ी नहीं होती है। यह लकड़ी तब बनती है जब तने पर किसी फफूंद का आक्रमण या संक्रमण होता है। उस समय पेड़ रक्षात्मक प्रतिक्रिया में सुगंधित राल को स्रावित करता है।
केवल 10% से 15% जंगली पेड़ो में ही प्राकृतिक रूप से यह राल बनता है। लेकिन बाहर से यह पहचानना संभव नहीं होता है कि किस पेड़ में अगरवुड बना है। इसीलिए शिकारी और तस्कर हजारों पेड़ो को बिना सोचे समझे काट कर गिरा देते हैं।
अगरवुड से निकलने वाले तेल की वैश्विक बाजार में कीमत लाखों रुपए प्रति किलो है। इसका उपयोग इत्र, अगरबत्ती और पारम्परिक चिकित्सा में होता है।
इसके अलावा झूम की खेती और चाय बगानों के विस्तार के कारण भी इसका प्राकृतिक आवास नष्ट हुआ है।
इन्हीं कारणों से अगरवुड संकटग्रस्त हो गया है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के द्वारा इसको संरक्षित पौधा घोषित किया गया है और CITES एवं DGFT के नियमों द्वारा इसके निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लागू है।
इसके संरक्षण और विकास के लिए असम के जोरहाट, गोलाघाट और होजाई जिलों में किसान अपने निजी खेतों और बगानों में अगरवुड के पौधों को लगाना शुरू कर दिया गया है।
साथ ही प्राकृतिक संक्रमण की अनिश्चितता को दूर करने के लिए वन अनुसंधान संस्थानों ने सुरक्षित कृत्रिम तकनीक को विकसित किया है जिससे 2--3 वर्षों में ही राल तैयार हो जाती है।
इससे जंगली वनों पर कटाई का दवाब कम होता है।
12. सर्पगंधा (Rauvolfia Serpentina)
सर्पगंधा उप हिमालयी तराई क्षेत्र से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और पश्चिमी घाट के नम पर्णपाती वनों में उगता है।
इसको IUCN की रेड लिस्ट में Endangered (EN) दर्ज किया गया है।
यह नम ग्रामीण क्षेत्रों में छायादार जगहों पर उगने वाला एक बहुवर्षीय पौधा है। इसकी जड़ों में रेसरपाइन (Reserpine) और एजमालाइन (Ajmaline) जैसे 50 से अधिक एल्कलॉइड पाए जाते हैं।
इसका उपयोग उच्च रक्तचाप, मानसिक तनाव और सांप के विष के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है।
नेशनल मेडिशनल प्लांट बोर्ड (NMPB), आयुष मंत्रालय के अनुसार --
"भारत के प्राकृतिक आवासों में सर्पगंधा का इतना व्यापक दोहन हो रहा है कि इसे अब घरेलू स्रोतों से जंगली रूप में एकत्र करना लगभग प्रतिबंधित है। व्यवसायिक मांग अब केवल नियंत्रित खेती से पूरी करने की सिफारिश है"
इसको भी दवा कम्पनियां ग्रामीणों के माध्यम से पूरी पौधे को जड़ों सहित उखाड़ लेती है। इससे इसका पुनर्जीवन असंभव हो जाता है।
इसके बीजों का भी सुषुप्तावस्था लंबी होती है और अंकुरण दर बहुत ही कम होती है। अतः इसको व्यवसायिक उपयोग के लिए नियंत्रित खेती ही सबसे बढ़िया तरीका है ताकि इसको संरक्षित किया जा सके।
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| आयुर्वेद में वर्षों सर्पगंधा का पौधा |
13. लाल चंदन (Pterocarpus Santalinus)
Red Sanders जिसे हिंदी में लाल चंदन या रक्त चंदन भी कहा जाता है यह दक्षिण भारत के पूर्वी घाट का विशिष्ट पौधा है। मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के चित्तूर, कडप्पा, कुरनूल और नेल्लोर जिलो के वनों एवं आस पास के क्षेत्रों में पाया जाता है।
यह IUCN की रेड लिस्ट में Endangered (EN) दर्ज है।
इसकी लकड़ी भारी और गहरे लाल रंग की होती है। इनमें सेन्टालिन (Santalin) नामक प्राकृतिक वर्णक होता है।
इसका उपयोग प्राकृतिक चिकित्सा, सौंदर्य प्रसाधनों, वाद्य यंत्र और परमाणु रिएक्टरों में विकिरण अवशोषक के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय काले बाजार में इसकी अत्यधिक कीमत होने के कारण संगठित तस्कर गिरोहों द्वारा अवैध कटाई किया जाता है।इसके प्राकृतिक आवासों का अधिक संकुचित होना और प्राकृतिक बीजों का बहुत कम अंकुरण होना इसके अस्तित्व पर भारी पड़ रहा है।
रक्त चंदन की प्राकृतिक आबादी में पिछले तीन पीढ़ियों में 50% की कमी आई है।
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| लाल चंदन जिसे रक्त चंदन भी कहा जाता है का पौधा |
14. हिमालयी लिली (Lilium Polyphyllum)
यह सामान्य बगीचे में दिखाई देने वाली लिली जैसी आम प्रजाति नहीं है।
स्थानीय स्तर पर इसे क्षीरकाकोल, कंदमूल या सफेद लिली कहा जाता है। यह हिमालयी क्षेत्रों की एक अत्यंत दुर्लभ, सुंदर और सुगंधित एवं बल्ब जैसी दिखने वाली बारहमासी पौधा है।
यह IUCN की रेड लिस्ट में Critically Endangered (CR) के रूप में दर्ज है। इसका प्राकृतिक आवास अफगानिस्तान से लेकर उतरी भारत तक फैला हुआ है। फिर भी पिछले तीन दशकों में इसमें 80% से अधिक की गिरावट आई है।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध कायाकल्प रसायन - "अष्टकवर्ग" और "च्यवनप्राश" के निर्माण में इसके भूमिगत शल्क कंद का उपयोग "क्षिरकाकोली" के रूप में किया जाता है।
कंद को निकालने के लिए पूरे पौधे को जमीन से खोद लिया जाता है। इससे पौधा नष्ट हो जाता है और पुनरूत्पादन पूरी तरह से रुक जाता है।
इसके बीजों में जटिल सुषुप्तावस्था होती है जो कि प्राकृतिक रूप से अंकुरित होने और एक परिपक्व फूल देने वाले कंद के रूप में तैयार होने में 4 से 6 वर्ष का समय लग जाता है।
इसको भी वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित घोषित किया गया है। साथ ही इसके भी निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लागू है।
राष्ट्रीय औषधि पादप बोर्ड द्वारा इसको हिमाचल प्रदेश के चंबा, शिमला और कुल्लू जिलों में इसके प्राकृतिक क्षेत्रों को "मेडिशनल प्लांट कंजर्वेशन एरिया" घोषित करके इन सीटू संरक्षण किया जा रहा है।
अतः इसके प्राकृतिक क्षेत्रों के गांवों और किसानों को उत्प्रेरित करके इसके संरक्षण में भागीदार बनाया जा सकता है।
15. असम का दुर्लभ पेड़ (Gymnocladus Assamicus)
अब एक ऐसा पेड़ जो ग्रामीण भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
स्थानीय स्तर पर इसको मिनांग आरांग, डीकांग या असम शोप ट्री भी कहा जाता है। यह अत्यंत दुर्लभ, पर्णपाती और बड़ा वृक्ष है।
इसकी IUCN स्थिति को Critically Endangered (CR) के रूप में दर्ज किया गया है।
इसके प्राकृतिक वनों में परिपक्व, प्रजनन सक्षम और सही पेड़ो की कुल संख्या 100 से भी कम बची हुई है। यह भारत के सबसे अधिक संकटग्रस्त वृक्षों में से एक है।
इसकी मोटी और मांसल फलियों में सेपोनिन की मात्रा अधिक होती है। परिपक्व होने के बाद जब फलियां जमीन पर गिरती है तब नमी के कारण मिट्टी में फंगस लगकर सड़ जाती है और उग नहीं पाती है।
इसके बीज का बाहरी आवरण इतना कठोर होता है कि बीज में पानी नहीं प्रवेश कर पाता है और इसका अंकुरण विफल हो जाता है।
अधिकांश बचे हुए पेड़ विखंडित और दूर दूर फैले हुए हैं जिससे इसका परागण सही से नहीं हो पाता और फल बनने की दर बहुत कम हो गई है।
स्थानीय लोग इसकी फलियों को नहाने और कपड़े धोने के लिए प्राकृतिक साबुन के तौर पर करते हैं। इसका उपयोग जू मारने की प्राकृतिक दवा के रूप में भी किया जाता है। फलियों के इस उपयोग के कारण अधिक संकलन होता है जिससे वे बीज नहीं बन पाती है।
यह अब बहुत ही सीमित क्षेत्र में बची हुय है और इसका दायरा संकीर्ण हो गया है।
इसे भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित घोषित किया गया है। इसके किसी भी जंगली वृक्ष को काटना, नुकसान पहुंचाना और इसके फलियों एवं बीजों को बिना वन विभाग की अनुमति के एकत्र करना दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया है।
वैज्ञानिक इसके बीजों के अंकुरण तकनीक पर काम कर रहे हैं। साथ ही प्रयोगशाला में इसके नए पौधे तैयार किए गए हैं।
इसके बचे हुए पेड़ो की जीपीएस से निगरानी किया जा रहा है। साथ ही स्थानीय जनजातियों के सहयोग और साथ मिलकर कुछ नए पौधे लगाए गए हैं।
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| असम का दुर्लभ पेड़ जिसकी केवल 100 से भी कम संख्या बची हुई है |
इन 15 पौधों में एक समान समस्या क्या है?
यदि इन पौधों को ध्यान से देखें तो इनके संकटग्रस्त होने का एक स्पष्ट पैटर्न (Pattern) दिखाई देता है:
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जड़ के लिए पौधा निकालना: कुटकी, कूठ, अतिस और जटामांसी जैसे पौधों में भूमिगत भाग (underground parts) उपयोगी होते हैं। इसलिए कटाई (harvesting) के दौरान पूरा पौधा ही जड़ से नष्ट हो जाता है।
इन 15 पौधों में एक समान समस्या क्या है?
यदि इन पौधों को ध्यान से देखें तो इनके संकटग्रस्त होने का एक स्पष्ट पैटर्न (Pattern) दिखाई देता है:
1
जड़ के लिए पौधा निकालना: कुटकी, कूठ, अतिस और जटामांसी जैसे पौधों में भूमिगत भाग (underground parts) उपयोगी होते हैं। इसलिए कटाई (harvesting) के दौरान पूरा पौधा ही जड़ से नष्ट हो जाता है।
2
छाल के लिए पेड़ को नुकसान: सीता अशोक और अर्जुन जैसे औषधीय वृक्षों में अनियंत्रित छाल संकलन (bark collection) उनके सूखने और मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बनता है।
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Resin के लिए टैपिंग (Tapping): गुग्गुल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ अधिक राल पाने के लिए रासायनिक चीरे लगाने से पेड़ 1-2 वर्ष में पूरी तरह सूख जाते हैं।
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अत्यधिक कमर्शियल हार्वेस्टिंग: अगरवुड, चंदन और रक्त चंदन (Red Sanders) जैसी उच्च-मूल्य वाली प्रजातियों पर अत्यधिक बाजार मांग और तस्करों का दबाव रहता है।
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प्राकृतिक आवास का विनाश (Habitat Loss): जब जंगल, चरागाह (grasslands), आर्द्रभूमियां (wetlands) या पहाड़ी आवास बदलते हैं, तो पौधों का प्राकृतिक पुनर्जनन (natural regeneration) पूरी तरह टूट जाता है।
6
जलवायु परिवर्तन (Climate Change): तापमान में वृद्धि और वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता विशेष रूप से संवेदनशील हिमालयी और शुष्क मरुस्थलीय वनस्पतियों के लिए बड़ा संकट है।
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पारंपरिक ज्ञान का लुप्त होना: गांव के बुजुर्ग जिन पौधों के औषधीय उपयोग जानते थे, नई पीढ़ी द्वारा उपेक्षा किए जाने से केवल पौधे ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित स्वदेशी ज्ञान भी लुप्त हो रहा है।
सरकार इन पौधों को बचाने के लिए क्या कर रही है?
भारत में पौधों का संरक्षण एक मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं है। कई मंत्रालय और संस्थान मिलकर ही इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभाते भी हैं।
जैसे - पर्यावरण मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, वन विभाग, ग्रामीण विकास मंत्रालय, राज्य सरकार, स्थानीय स्वशासन आदि। साथ में राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया,ICAR, Research Institute and Universities आदि।
NMPB का क्यों है महत्वपूर्ण योगदान?
National Medicinal Plant Board (NMPB) - आयुष मंत्रालय के अंतर्गत औषधीय पौधों के संरक्षण, उत्पादन, विकास और इसके सतत् प्रबंधन को बढ़ावा देता है।
NMPB की वर्तमान संरक्षण फ्रेमवर्क में - "इन सीटू कंजर्वेशन" "एक्स सीटू कंजर्वेशन" और "सामुदायिक संस्थाओं को सहयोग" करना शामिल है।
इन सीटू कंजर्वेशन क्या है?
इन सीटू कंजर्वेशन -(In- Situ Conservation) का अर्थ है कि पौधों को उसी प्राकृतिक हैबिट में बचाना।
इसमें औषधीय पौधों के लिए "Medicinal Plant Conservation and Development Area's (MPCDAs) और स्रोत पहचान एवं विकास जैसी गतिविधियां शामिल होता है।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल पौधा ही नहीं बल्कि उसका पूरा इकोसिस्टम सुरक्षित रहता है।
Ex - Situ Conservation क्या है?
जब वन्यजीव पौधों की संख्या बहुत ही कमजोर हो जाती है तब पौधों को उनके प्राकृतिक हैबिट एवं आवास से बाहर -- बॉटनिकल गार्डन, नर्सरी, फील्ड जीन बैंक, शोध संस्थानों और नियंत्रित खेती के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है।
इससे उन पौधों के वन आवासों पर भी दबाव कम होता है। साथ ही उन पौधों की जीन के जैव विविधता को सुरक्षित रखने में भी मदद मिलती है।
लेकिन एक्स सीटू कंजर्वेशन कभी भी "प्राकृतिक जंगल का विकल्प नहीं बन सकती है "।
वर्तमान में कानूनी और नीतिगत ढांचा क्या है?
विलुप्त होते पौधों के संरक्षण के लिए भारत में पहले से भी कानूनी ढांचा है और समय समय पर जरूरत के अनुरूप नए कानूनी नियमों को भी लागू किया जाता रहा है।
मुख्य विषय यह हो जाती है कि इनकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे ग्रामीण स्तर पर कितनी दृढ़ता के साथ लागू किया जाता है।
जैव विविधता अधिनियम 2002 (Biological Diversity Act,2002):
यह नियम संयुक्त राष्ट्र के जैव विविधता अभिसमय (CBD) के तहत भारत ने प्रतिबद्धता से लागू करने के लिए बनाया। इसकी संरचना त्रि- स्तरीय है -
- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA): राष्ट्रीय स्तर पर नीतियों का निर्धारण करना।
- राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBB): राज्य स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण।
- जैव विविधता प्रबंधन समितियां (BMC): प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर अनिवार्य रूप से गठित स्थानीय निकाय।
कानूनी अधिदेश - धारा 41(1) - के अनुसार - "प्रत्येक स्थानीय निकाय अपने क्षेत्र में जैव विविधता के संरक्षण, सतत् उपयोग और प्रलेख को बढ़ावा देने के लिए एक "जैव विविधता प्रबंधन समिति" का गठन करेगी।
ग्रामीण स्तर पर "Native Plant Register" क्यों जरूरी है?
पौधों के संरक्षण की दिशा में बनायी गई नीतियों में इसके बारे में कहा गया है। यह कोई सरकारी रजिस्टर नहीं है बल्कि यह गावों के संपूर्ण जैव संपदा, स्थानीय पौधों इनके पारंपरिक उपयोगों और संरक्षण के स्थिति का कानूनी जानकारी है।
- यह कॉर्पोरेट या दवा कंपनियों द्वारा स्थानीय संसाधनों के जैव चोरी को रोकता है।
- यदि कोई कंपनी उस गांव के औषधीय पौधों का उपयोग करती है तब उस गांव या पंचायत को अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा देना अनिवार्य हो जाएगा।
यह रजिस्टर कुछ इस प्रकार से बनाए जा सकते हैं --
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स्थानीय वनस्पति रजिस्टर (PBR प्रारूप)
ग्राम स्तर पर जैव विविधता के दस्तावेजीकरण और संरक्षण का व्यावहारिक मॉडल
| जानकारी (फ़ील्ड) |
विवरण / प्रारूप |
| पौधे का स्थानीय नाम |
स्थानीय भाषा / बोली में |
| वैज्ञानिक नाम |
यदि ज्ञात हो (वानस्पतिक नाम) |
| कहाँ मिलता है (आवास) |
जंगल / तालाब / मेड़ / पहाड़ी / बंजर |
| संख्या |
अनुमानित (प्रचुर / सामान्य / गिने-चुने) |
| पारंपरिक उपयोग |
औषधि / फल / चारा / इमारती लकड़ी / गोंद |
| खतरे का प्रकार |
अवैध कटाई / अति-चराई / आवास ह्रास |
| संरक्षण स्थल |
पंचायत गोचर / देवराई / वन क्षेत्र |
| बीज उपलब्धता |
हाँ
/
नहीं
|
| पौध तैयार |
तैयार पौधों की संख्या (नर्सरी स्तर) |
| जिम्मेदार समूह |
SHG / स्कूल वाटिका / BMC / किसान |
💡
प्रभाव: इस रजिस्टर के नियमित संधारण से गांव की समृद्ध जैव विविधता (Biodiversity) पहली बार प्रमाणित आधिकारिक डेटा में दिखाई देने लगेगी।
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम,1996 (PESA):
PESA कानून ग्रामीण और जनजातीय समुदायों को - लघु वनोपजन (Minor Forest Produce - MFP) पर पूर्ण स्वामित्व और प्रबंधन का अधिकार देता है।
इसका उपयोग करके ग्राम सभाएं महुआ, चिरौंजी और हरड़ जैसे किसी भी औषधीय एवं देशी प्रजातियों के अनियंत्रित दोहन पर प्रतिबंध लगा सकती है।
गांवों में पहले पारंपरिक रूप से पौधों का संरक्षण कैसे होता था?
आधुनिक वनस्पति विज्ञान और पौधों के संरक्षण के कानून से भी ज्यादा विकसित थी भारत की सदियों पुरानी प्राचीन जैव सतत् प्रबंधन। यह मजबूत सांस्कृतिक और सामाजिक प्राणियों से बंधी हुई थी।
लेकिन इसका प्रभाव संतुलित और विकासात्मक था। इन प्रणालियों को फिर से सक्रिय करना आज के समय की जरूरत बन गई है।
इसको समझते हैं -
🌳
ग्रामीण संरक्षण ढांचा
धार्मिक / सांस्कृतिक तंत्र
➔
पवित्र उपवन (देवराई, ओरण, सरना)
सामाजिक नियम
➔
मौसमी प्रतिबंध (काटने/चुगने की सख्त तारीखें)
साझा प्रबंधन
➔
ग्राम सभा और पंचायती चरागाह नियंत्रण
पवित्र उपवन - जीवित जीन बैंक कैसे होता था?
भारत के कई राज्यों में ग्रामीणों द्वारा संरक्षित जंगलों के छोटे छोटे टुकड़े पाए जाते हैं जिनको धार्मिक मान्यताओं के साथ अभी भी सुरक्षित रखा गया है।
राजस्थान में स्थानीय लोक देवता के नाम पर भूमि छोड़ी जाती है। इस भूमि पर हरे पेड़ पौधों को काटना और कुल्हाड़ी चलाना भी वर्जित माना जाता है।
थार के कई लुप्तप्राय पौधे जैसे - रोहिड़ा, गूगल और फोग इसी व्यवस्था के कारण बचे हुए हैं। इस व्यवस्था को "ओरण" कहा जाता है।
इसी तरह से महाराष्ट्र में "देवराई" व्यवस्था है। पश्चिमी घाट के घने जंगलों में स्थित इस देवराई ने सीता अशोक और दुर्लभ औषधीय लताओं को शरण प्रदान किया है।
वही झारखंड एवं मध्य भारत में "सरना" व्यवस्था है। जनजातीय लोग सरना जो प्राकृतिक पूजा स्थल होता है और यह साल, महुआ और करंज जैसे पेड़ो के संरक्षण का केंद्र है।
इसी तरह केरल में "कावू" व्यवस्था है। यह नाग देवताओं को समर्पित उपवन होता है जो दुर्लभ जलीय एवं औषधीय पौधों के प्राकृतिक आवास है।
पारंपरिक ज्ञान में सतत् संकलन कैसे महत्वपूर्ण होता था?
प्राचीन और पारंपरिक विधानों में जड़ी बूटियों एवं दिव्य औषधीय पौधों को तोड़ने या उपयोग करने के संरक्षित नियम होते थे। इन नियमों का पालन लोग श्रद्धा से करते थे।
पारंपरिक ग्रामीण वैद्य और वनोपज संग्राहक कभी भी पूरे पौधे को नष्ट नहीं करते थे बल्कि वे -
- छाल निकालने के लिए पेड़ के केवल एक चौथाई और वह भी लंबवत रूप से निकली जाती थी। इससे पेड़ का रस संचार रुकता नहीं था और घाव भर जाता था।
- बीजों को संकलन के भी नियम थे। पूरी बीजों का 30-40% हिस्सों को पक्षियों और प्राकृतिक रूप से पुनर्जनन के लिए पेड़ पर ही छोड़ दिया जाता था।
इन प्राचीन नियमों को बचाए रखने और इनको पुनः स्थापित करने की जरूरत वर्तमान समय में फिर से महसूस किया जाने लगा है।
 |
| ओरण स्थान जहां देशी पेड़ो पौधों को काटने की मनाही रहती है |
हमारे गांव इन प्रजातियों को कैसे पुनर्जीवित कर सकते हैं?
यदि सही में इन पौधों को सुरक्षित एवं पुनर्जीवित करना है तो गांवों और ग्रामीण लोगों को इसमें शामिल करना ही पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं किया जाएगा तो यह काम केवल वैज्ञानिकों के प्रयोगशालाओं तक ही सीमित रह जाएगा।
ग्राम सभाएं नीचे तालिका में दिए गए निम्नलिखित 6 सूत्रीय व्यवहारिक कार्यक्रम को अपना सकती है -
🏛️ ग्राम पंचायत स्तरीय 6-सूत्रीय संरक्षण मॉडल
पारंपरिक ज्ञान और विधिक अधिकारों का व्यावहारिक समन्वय
1
PBR का अद्यतनीकरण
संकटग्रस्त पौधों की सटीक मैपिंग और स्वदेशी ज्ञान का प्रलेखन
2
मनरेगा (MGNREGA) अभिसरण
ग्राम स्तर पर देशी पादप नर्सरी और जल संचयन खाइयों का निर्माण
3
गोचर / शामलात का उद्धार
विदेशी विलायती बबूल को हटाना और मूल देशी वृक्षों का रोपण
4
विनाशकारी संकलन पर शुल्क
पारंपरिक नियमों का विधिक प्रवर्तन और गैर-कानूनी दोहन पर रोक
5
प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षण
देशी पादप वाटिका की स्थापना और नई पीढ़ी को हरित विरासत शिक्षा
6
किसान-उत्पादक संगठन (FPO)
नियंत्रित वैज्ञानिक खेती और बिना बिचौलियों के सीधी बाजार बिक्री
मनरेगा (MGNREGA) जिसका नाम "विकसित भारत जी राम जी" कर दिया गया है। इसके माध्यम से ग्राम पंचायतों द्वारा विदेशी प्रजातियां के रोपण पर रोक लगाने का प्रयास कर सकती है।
साथ ही प्रत्येक पंचायत में एक "देशी पादप नर्सरी" का स्थापना कराया जा सकता है। इसमें इन संकटग्रस्त वृक्षों की प्रजातियों के पौधे हो।
तीसरी बात जल संरक्षण के तहत तलब के मेड़ों पर हिज्जल और अर्जुन के वृक्ष लगाए जाने चाहिए।
इसी तरह से गांवों की चारागाह की भूमि से विदेशी और कंटीली झाड़ियों को साफ करके उस स्थान पर फोग, अंकोल और रोहिला जैसे पौधों की बाड़ लगाया जाना चाहिए।
जब नए अंकुरण हो रहे हो तब चराई को नियंत्रित किया जाना चाहिए।
गांवों को वैज्ञानिकों द्वारा प्रशिक्षण की व्यवस्था हो
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के माध्यम से इन औषधीय पौधों के कंद, मूल और छालों आदि को निष्कर्षण करने के लिए प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
यह सबसे जरूरी भी है। साथ ही इन पौधों के रोपण और अन्य विधियों की भी प्रशिक्षण कार्यक्रम किया जाना चाहिए।
ग्रामीण महिलाओं और किसान उत्पादक संगठनों की भागीदारी
ग्रामीण महिलाओं (SHGs) और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से औषधीय पौधों की नियंत्रित खेती और इसके उत्पाद बनाकर व्यवसायिक रूप दिया जा सकता है।
इससे जंगलों और प्राकृतिक आवासों से इनको उखाड़ना बंद हो जाएगा या रोक लगा दिया जाएगा।
दवा कंपनियों को औषधीय पौधों को केवल FPOs के माध्यम से ही लेने का नियम भी बनाया जा सकता है। इससे इन पौधों का अनियंत्रित दोहन नहीं हो पाएगा।
सफल सामुदायिक प्रयासों का केस स्टडी क्या है?
भारत के कई क्षेत्रों में ग्रामीण जागरूक समुदायों ने ऐसा कर दिखाया है।
राजस्थान का लापोड़िया मॉडल इसका मुख उदाहरण है। लापोड़िया गांव में लक्ष्मण सिंह और अन्य ग्रामीणों ने "चौका प्रणाली" को विकसित किया।
इसके माध्यम से वे जल संरक्षण और बंजर चरागाहों में पानी को रोकने के लिए देशी पौधों - फोग, खैर और देशी बबूल को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया।
इसी तरह से महाराष्ट्र के गढ़ चिरौली के मेंढ़ा लेखा गांव ने नारा दिया -"दिल्ली - मुम्बई में हमारी सरकार ,हमारे गांव में हम ही सरकार"। इस नारे के साथ PESA कानून के तहत अपने वन संसाधनों का प्रबंधन खुद गांव ने ही संभाल लिया।
गांव ने महुआ और अन्य वनोपजन संग्रह के कड़े नियम बनाये। जंगलों की आग पर रोक लगाई। चारोली के वृक्षों का भी फिर से प्राकृतिक पुनर्जनन शुरू हो गया।
अतः यदि देश में इन संकटग्रस्त वृक्षों को बचाना है तो सरकार, संस्थाओं और वैज्ञानिक समुदाय के साथ साथ ग्रामीण समुदाय को भी साथ में लेकर चलना होगा।
 |
| ग्रामीण भारत अपनी जैव विविधता के संरक्षण के प्रति जागरूक हो चुकी है |
निष्कर्ष (Conclusion)
भावी पीढ़ियों के लिए जंगल सरकार ही नहीं, समाज भी बचाता है:
भारत में संकटग्रस्त पौधों को बचाने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्र और सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होगी।
भारत के लगभग हर क्षेत्रों में कोई न कोई ऐसा पौधा जरूर है जिसे स्थानीय लोग कभी बिल्कुल सामान्य ही समझते थे लेकिन अब वह पहले की तुलना में बहुत कम दिखती है।
कही वह पौधा गुग्गुल है।
तो कही वह पौधा सीता अशोक है।
और कही वह पौधा लाल चंदन भी हो सकता है।
कही वह पौधा हिमालय की जटामांसी, कुटकी और अतीस हो सकती है।
लेकिन संरक्षण की असली सफलता तब होगी जब कोई गांव का बच्चा अपने गांव के पेड़ो को देख कर या कहे कि -"यह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं है बल्कि यह हमारे गांव की जीवित जैविक विरासत है"।
यही सोच भारत को केवल कृषि उत्पादक ही नहीं बल्कि जैव विविधता के संरक्षण का केंद्र बना सकती है।
इन पौधों के संरक्षण के लिए जितना जरूरी वैज्ञानिक समुदाय, प्रयोगशालाएं और सरकारी संस्थाएं है उतना ही जरूरी गांव की पंचायत, किसान, महिला स्वयं सहायता समूह, वनवासी समुदाय और स्थानीय युवा भी है।
क्योंकि जिस पौधे की महत्ता गांव के लोगों को पहचान में आ जाएगा उसे गांव के लोग रक्षा कर लेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)
1. देशी पेड़ पौधों के विलुप्त होने के मुख्य कारण क्या है?
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अनियंत्रित और विनाशकारी कटाई है। जैसे जड़ों के लिए पूरा पौधा को उखाड़ देना या रसायनिक इंजेक्शन देकर गोंद निकालना या छाल के लिए पूरे तने को छील देना।इसके अलावा कृषि में रसायनिक खादों का अधिक उपयोग, विदेशी पौधों का अतिक्रमण और इनके आवास का विखंडन होना भी प्रमुख कारण है।
2. असली सीता अशोक और नकली सीता अशोक में क्या अंतर है?
असली सीता अशोक एक चौड़ी छतरीनुमा कैनोपी वाला पौधा होता है जिसपर नारंगी और लाल फूलों के खूब गुच्छ आते हैं और इसकी छाल अत्यंत औषधीय होती है। जबकि नकली सीता अशोक के वृक्ष सड़को के किनारे दिखने वाला सीधा खड़ा और खम्भे जैसा लंबा पेड़ होता है। इसका उपयोग केवल सजावट के लिए होता है इसमें कोई औषधीय गुण नहीं होता है।
3. जैव विविधता प्रबंधन समिति (BMC) क्या है और यह गांव में कैसे काम करती है?
जैव विविधता अधिनियम 2002, के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर 7 सदस्यीय जैव विविधता प्रबंधन समिति (BMC) का गठन अनिवार्य है। इसका मुख्य कार्य गांव के सभी पेड़ पौधों, औषधियों और पशु प्रजाति का दस्तावेजीकरण करना और उसके दोहन पर स्थानीय स्तर पर नियंत्रण करना है।
4. जन जैव विविधता रजिस्टर क्या है?
यह ग्राम पंचायत की जैविक संपदा और पारम्परिक ज्ञान का एक कानूनी दस्तावेज है। यह बड़ी कंपनियां द्वारा गांव की जड़ी बूटियों के दोहन पर नियंत्रण लगता है। साथ ही यदि कोई कंपनी गांव के पौधों का व्यवसायिक उपयोग करती है तो उसके आय का एक निश्चित हिस्सा पंचायत को देना होगा।
5. Ex - Situ Conservation क्या है?
जब वन्यजीव पौधों की संख्या बहुत ही कमजोर हो जाती है तब पौधों को उनके प्राकृतिक हैबिट एवं आवास से बाहर -- बॉटनिकल गार्डन, नर्सरी, फील्ड जीन बैंक, शोध संस्थानों और नियंत्रित खेती के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है।
इससे उन पौधों के वन आवासों पर भी दबाव कम होता है। साथ ही उन पौधों की जीन के जैव विविधता को सुरक्षित रखने में भी मदद मिलती है।
6. गुग्गुल का पेड़ क्यों संकटग्रस्त हो गया?
गठिया आदि आयुर्वेदिक दवा के लिए इसकी गोंद की अत्यधिक मांग होती है। इसी मांग के कारण व्यापारियों ने ग्रामीणों के माध्यम से इसके पेड़ो पर "एथिफॉन" (Ethephon/Ethrel) जैसे रसायनिक हार्मोन के अधिक मात्रा में इंजेक्शन लगवा दिए।
इससे गोंद तो बहुत अधिक मात्रा में निकला लेकिन पेड़ 1 से 2 वर्षों के भीतर ही सुख कर मर गए। साथ ही इसके प्राकृतिक बीजों में अंकुरण की दर भी 5% से कम ही होती है। यही मुख्य कारण है कि यह वृक्ष संकट के दौर से गुजर रहा है।
7. परमाणु विकिरण को कौन से पेड़ की लकड़ी अवशोषित करती है?
लाल चंदन या रक्त चंदन के पेड़ की लकड़ी का उपयोग परमाणु रिएक्टरों में विकिरण अवशोषक के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय काले बाजार में इसकी अत्यधिक कीमत होने के कारण संगठित तस्कर गिरोहों द्वारा अवैध कटाई किया जाता है।
8. एक आम ग्रामीण या युवा अपने स्तर पर इन पौधों को बचाने के लिए क्या कर सकता है?
अपने खेतों की मेड़ों और बंजर भूमि पर विदेशी पौधों (यूकेलिप्टस, विलायती बबूल) की जगह कैथ, महुआ, रोहिड़ा या सहजन जैसे देशी पौधे लगाएं।
- औषधीय पौधों की कटाई करते समय छाल या जड़ को पूरी तरह नष्ट करने के बजाय 'अच्छी संकलन पद्धतियां' (GACP) अपनाएं।
गांव के बुजुर्गों से पारंपरिक औषधीय ज्ञान को लिखकर पंचायत के जैव विविधता रजिस्टर (PBR) में दर्ज करवाएं।
संबंधित विषय:
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प्रामाणिक स्रोत एवं संदर्भ (References)
Verified Data
🔗
IUCN Red List of Threatened Species:
संकटग्रस्त पादप प्रजातियों (CR, EN, VU) का वैश्विक डेटाबेस व वर्गीकरण मानक।
🔗
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India - BSI):
भारत के संकटापन्न संवहनी पौधों (Vascular Plants) की रेड डेटा सूची और संरक्षण आकलन।
🔗
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB), आयुष मंत्रालय:
गूगल, सफेद मूसली और सर्पगंधा के संरक्षण दिशानिर्देश एवं कृषि अनुदान योजनाएं।
🔗
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA):
जैविक विविधता अधिनियम, 2002 एवं जन जैव विविधता रजिस्टर (PBR) का कानूनी प्रारूप।
🔗
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (ICAR-CAZRI):
थार मरुस्थल की देशी वनस्पतियों (रोहिड़ा, गूगल, फोग) के पुनरुद्धार पर वैज्ञानिक शोध।
🔗
CSIR - CIMAP, लखनऊ:
लुप्तप्राय औषधीय एवं सगंध पादप प्रजातियों के टिशू कल्चर व कृषि प्रोटोकॉल।
* सभी लिंक नए टैब में खुलते हैं और भारत सरकार व अंतरराष्ट्रीय संरक्षण निकायों के आधिकारिक पोर्टल से संबद्ध हैं।
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