GI Tags of Bihar:बिहार के नए और पारंपरिक जीआई टैग उत्पादों की पूरी सूची और उनका इतिहास

संक्षेप में

बिहार अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और कृषि विरासत के लिए प्रसिद्ध है। राज्य के कई पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त हो चुका है, जिससे उनकी विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण मिला है।

  • बिहार में 15 से अधिक GI टैग उत्पाद हैं।
  • मधुबनी पेंटिंग बिहार का पहला GI टैग प्राप्त उत्पाद है।
  • शाही लीची, कतरनी चावल और मिथिला मखाना प्रमुख कृषि GI उत्पाद हैं।
  • भागलपुरी सिल्क और बावन बूटी साड़ी वस्त्र क्षेत्र की पहचान हैं।
  • GI टैग किसानों, कारीगरों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है।

 

GI Tags of Bihar list Hindi:बिहार के भौगोलिक संकेत उत्पादों की सूची और जानकारी
बिहार के नए और पारंपरिक GI Tags उत्पादों की जानकारी 


📌GI Tags of Bihar:बिहार के नए और पारंपरिक जीआई टैग उत्पाद:


प्रस्तावना (Introduction)

मैंने पिछले लेख --उत्तर प्रदेश के GI टैग उत्पाद:ग्रामीण विकास की नई क्रांति और भविष्य की संभावनाएं क्या है ? में उत्तर प्रदेश के जीआई टैग के बारे में चर्चा किया था। लोगों ने उसे बहुत पसंद किया और सराहा। इसके लिए उन्हे बहुत ही तहे दिल से धन्यवाद। कई लोगों ने बिहार के जीआई टैग के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए आग्रह किया। अतः अब इसी आग्रह को ध्यान में रखते हुए बिहार के जीआई उत्पादों के बारे में इस लेख में हम चर्चा कर रहे है। 

क्योंकि बिहार की यह पवित्र भूमि केवल इतिहास एवं ज्ञान का केंद्र ही नहीं रहा है,बल्कि यह भूमि अपने अनोखे स्वादों,बेहतरीन कृषि उत्पादों और अद्भुत हस्तशिल्प के लिए भी पूरी दुनियां में मशहूर है। जब हम बिहार के बारे में सोचते है तो ---नालंदा के खंडहर,बोधगया के मंदिर और माँ गंगा की अविरल धारा याद आने लगती है। 

लेकिन क्या आप जानते है कि बिहार के पास एक और ऐसी अनमोल धरोहर है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान को चमका रही है। जी हां !--हम बात कर रहे है 'जीआई टैग (Geographical Indication Tag)' प्राप्त उत्पादों की। 

पिछले कुछ समय में बिहार के पारंपरिक उत्पादों को यह खास टैग मिला है,जिसने यहां के किसानों और हस्तशिल्पियों की किस्मत बदल दिया है। इसीलिए तो भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने इस जीआई टैग को मिलने के बाद अपनी खुशी जाहीर की है। 

इस लेख में हम इस नवीनतम जीआई टैग के साथ पुराने जीआई टैग के बारे में भी उनके इतिहास के साथ जानकारी प्राप्त करेंगे। 
 

जीआई टैग (Geographical Indication) क्या होता है और यह क्यों जरूरी है

इससे पहले की हम बिहार की जीआई टैग सूची पर नजर डालें,उससे पहले यह संक्षेप में समझते है कि आखिर जीआई टैग क्या है ?

'भौगोलिक संकेतक' या 'जीआई टैग' एक प्रकार का साइन या नाम होता है जो उन उत्पादों को दिया जाता है जिनकी एक विशिष्ट भौगोलिक उत्पति होती है और जिसमें उस स्थान की वजह से कोई विशेष गुण या प्रतिष्ठा होती है। यानि "जीआई टैग (Geographical Indication Tag)' एक ऐसा प्रमाण पत्र होता है जो किसी उत्पाद की विशिष्ट गुणवत्ता,प्रतिष्ठा या विशेषता को उस भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ता है।"

उदाहरण के लिए मुजफ्फरपुर की शाही लीची का स्वाद और सुगंध अन्य क्षेत्रों की लीची से अलग होती है। इसीलिए इसी विशेषता के कारण उसे GI Tag प्राप्त हुआ है। 

  • जीआई टैग के मुख्य फायदे:

  1. कानूनी सुरक्षा: कोई भी दूसरा शहर या देश उस नाम का गलत इस्तेमाल करके नकली उत्पाद को नहीं बेच सकता।  
  2. क्वालिटी का भरोसा: यह ग्राहकों को उसकी उत्पाद की शुद्धता और उसकी प्रमाणिक्ता की गारंटी प्रदान करता है। 
  3. आर्थिक मजबूती: इसके मिलने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार (Global Market) में उस उत्पाद की मांग बढ़ती है,जिससे स्थानीय किसानों और कारीगरों की आय में बढ़ोतरी होता है। 
  4. ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यटन: इसके चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और इन क्षेत्रों में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता है। क्योंकि लोग इन उत्पादों को बनते हुए देखने के लिए भी आते है। 


एक नजर में: बिहार के प्रमुख जीआई टैग उत्पाद --

बिहार को 'पहला' जीआई टैग --वर्ष 2007 में 'मधुबनी पेंटिंग' को प्राप्त हुआ था। इसके बाद राज्य के कई कृषि उत्पादों खाद्य पदार्थों और हस्तशिल्पों को GI Tag प्राप्त हो चुका है। बिहार के मुख्य जीआई टैग उत्पादों की सूची इस प्रकार से है ---


💁बिहार के GI टैग उत्पादों की सूची 


उत्पाद का नाम 

श्रेणी (Category) 

संबंधित जिला/क्षेत्र 

बावन बूटी साड़ी 

हस्तशिल्प (Handicraft) 

नालंदा (बसवन बिघा) 

पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट 

हस्तशिल्प (Handicraft) 

गया 

पिढ़िया पेंटिंग 

हस्तशिल्प / कला 

भोजपुर (आरा) 

मर्चा धान (चावल) 

कृषि (Agriculture) 

पश्चिमी चम्पारण 

मिथिला मखाना 

कृषि (Agriculture) 

मिथिला क्षेत्र (दरभंगा, मधुबनी आदि) 

शाही लीची 

कृषि (Agriculture)

मुजफ्फरपुर 

जर्दालू आम 

कृषि (Agriculture)

भागलपुर 

कतरनी चावल 

कृषि (Agriculture)

भागलपुर और बांका 

मगही पान 

कृषि (Agriculture)

औरंगाबाद, गया, नवादा, नालंदा 

सिलाव का खाजा 

खाद्य सामग्री (Food Spl) 

नालंदा 

मधुबनी पेंटिंग 

हस्तशिल्प (Handicraft) 

मधुबनी / मिथिला 

मंजूषा कला 

लोककला 

भागलपुर 

सुजनी कढ़ाई 

हस्तशिल्प (Handicraft) 

मिथिला 

सिक्की शिल्प 

हस्तशिल्प (Handicraft) 

मिथिला 

अप्लिके (खतवा) कला 

हस्तशिल्प (Handicraft) 

मिथिला 




उपरोक्त सूची से स्पष्ट हो जाता है कि बिहार अपनी सांस्कृतिक विरासत का धनी होने के कारण और भी GI tag उत्पादों की बढ़ोतरी आगे आने वाले दिनों में हो सकती है। 


बिहार के नवीनतम जीआई टैग उत्पाद:इतिहास और विशेषताएं

अब हम सबसे पहले उन जीआई टैग उत्पादों के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जिन्हे हाल ही में इस सूची में स्थान प्राप्त हुआ है। साथ में उनकी एतिहासिक विशेषताओं को भी जानने का प्रयास करेंगे ---

1. बावन बुटीक साड़ी और फैब्रिक (नालंदा):

नालंदा जिला सिर्फ ज्ञान के प्राचीन विश्वविद्यालय के लिए ही नहीं,बल्कि अपनी सदियों पुरानी कपड़ा बुनाई की कला के लिए भी जाना जाता है। नालंदा के --'बसवन बीघा' गांव और उसके आस-पास के क्षेत्रों में बुनी जाने वाली साड़ी --जिसको 'बावन बुटीक साड़ी' के नाम से प्रसिद्धि हासिल है,हाल ही में इसको जीआई टैग मिला है। यह इस क्षेत्र के और पूरे बिहार के हैंडलूम सेक्टर के लिए यह एक एतिहासिक पल है। और जानते है --
  • 52 बुटीक का रहस्य: आधा तो इस साड़ी के नाम और कपड़े से ही इसकी खासियत मालूम चल जाती है। इसमें 'टसर सिल्क' या 'सूती कपड़ा' पर हाथ से ही (Extra Weft Technique) 52 अलग-अलग और बहुत ही बारीक सुंदर आकृतियां (Motifs) बुनी जाती है। 
  • सांस्कृतिक प्रतीक: इन बूटियों पर आमतौर से बौद्ध एवं हिन्दू संस्कृति से जुड़े प्रतीकों जैसे--बोधि-वृक्ष,बैल,त्रिशूल,कमल का फूल,रथ और घड़ा आदि उकेरें जाते है। 
  • क्या है खास: इन साड़ियों को बनाने में किसी भी मशीन का प्रयोग नहीं किया जाता है। यह पूरी तरह से बुनकरों के हाथ और पैर से चलने वाले पारंपरिक करघों (Handloom) का उपयोग करके बनाया जाता है। अतः एक साड़ी को बनाने में कई दिनों की कड़ी मेहनत लगती है। 


2. पत्थरकटी स्टोन क्राफ्ट (गया):

हम सभी जानते है कि गया की धरती अध्यात्म और मोक्ष की नागरी है। और इसी पवित्र भूमि से जुड़ी है -- पत्थरकटी की पत्थर शिल्पकला। गया जिले के नीमचक बथानी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले पत्थरकटी गांव के कारीगरों ने काले पत्थरों को काटने की अपनी पुरखों की इस कला को अभी भी जीवित रखा है। 
  • 300 साल पुराना इतिहास: यह कहा जाता है कि जयपुर के राजा 'मानसिंह' ने गया के प्रसिद्ध 'विष्णुपद मंदिर' के जीर्णोद्धार के लिए राजस्थान से कुशल शिल्पकारों को गया भेजा था। वही शिल्पकार स्थाई रूप ये यहा बस गए और स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थर पर नक्कासी शुरू कर अपना जीवन जीने लगे। 
  • कला की बरीकियां: ये शिल्पकार हथौड़ी और छेनी की मदद से कठोर से कठोर पत्थर को भी भगवान बुद्ध,भगवान विष्णु और अन्य देवी देवताओं का सजीव मूर्तियों में बदल देते है। 
  • बाजार में मांग: जीआई टैग मिलने के बाद अब इन मूर्तियों एवं सजावटी सामानों की मांग न केवल भारत के विभिन्न भागों और राज्यों में,बल्कि जापान,थायलैंड और वियतनाम जैसे देशों में भी तेजी से बढ़ गई है। 


3. पीढ़ियां पेंटिंग (भोजपुर/आरा):

इतना ही नहीं लोक कलाओं के मामले में भी बिहार हमेशा से ही आमिर रहा है। मधुबनी और मंजूषा पेंटिंग के बाद अब भोजपुर क्षेत्र की 'पीढ़िया पेंटिंग' को जीआई टैग मिलने से ग्रामीण महिलाओं के हुनर को सम्मान प्रदान हो गया है। 
  • यह कला क्या है?: पीढ़िया पेंटिंग भोजपुर यानि आरा और आसपास के क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा की जाने वाली एक पारंपरिक लोक कला है। यह त्योहारों विशेष रूप से --'पीढ़िया व्रत' या गोवर्धन पूजा के दौरान घरों,आँगनों चौखटों और दीवारों पर बनाई जाती है। 
  • प्राकृतिक रंगों का जादू: ये सबसे बड़ी खूबी है कि इस कला में किसी भी प्रकार के रासायनिक रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता है। चावल के आटे का घोल (पीठार),गाय के गोबर,मिट्टी और स्थानीय पौधों के रस से प्राकृतिक रंग को तैयार किया जाता है। 
  • सामाजिक महत्व: यह पेंटिंग केवल एक कलकृति ही नहीं है,बल्कि ग्रामीण जीवन की सादगी,भाईचारा प्रकृति के प्रति प्रेम और पारिवारिक खुशहाली को व्यक्त करता है। यह कला भोजपुर ही नहीं बल्कि बक्सर,रोहतास में भी प्रचलित है।  

4. मर्चा धान/मर्चा चावल (पश्चिमी चंपारण):

जब मैं बेतिया में चार सालों तक रहा था तब मर्चा धान के चावल को अपनी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बना लिया था। आज मर्चा धान को जीआई टैग मिलने से बिहार को कृषि के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त हो गई है। पश्चिमी चंपारण का यह चावल अपने रूप रंग एवं खुशबू के लिए अनोखा है। 
  • नाम के पीछे की वजह: इस धान के दानों का आकार थोड़ा गोल और हल्की काली मिर्च जैसा होता है। और यह स्थानीय भाषा में काली मिर्च को --'मर्चा' या मरीच कहा जाता है। अतः इस धान का नाम इसी के करण मर्चा धान पड़ गया। 
  • सुगंध और स्वाद का राजा: जब यह चावल खेतों में पकती है तब इसकी खुशबू पूरे इलाके में फैल जाती है। इतना से ही जान लीजिए की जब आप इसके चावल को बिना बनाए भी घर में रखते है तो खुशबू बिखेरनें लगता है। इसका भात बहुत ही स्वादिष्ट और मुलायम होता है। इसका चूड़ा यानि पोहा जबरदस्त होता है जिसकी मांग हाथोंहाथ होती है। 
  • चूड़े के लिए मशहूर: मर्चा धान से बनने वाला चूड़ा बिहार में बहुत ही चाव से खाया जाता है। यह सस्ता,सफेद और स्वाद का राजा होता है जिसे दही,दूध और गुड़ मिलाकर खाया जाता है। 

ये उत्पाद बिहार के वह नवीनतम जीआई टैग प्राप्त उत्पाद है जो वर्तमान में पूरे देश में सुर्खियां बटोर रही है। और सच कहा जाए तो इन उत्पादों को ये जीआई टैग बहुत ही पहले मिल जाना चाहिए था जो अब जाकर मिल रहा है। 

बिहार के सदाबहार कृषि उत्पाद (Agriculture GI Tags)

हम सभी ये बात जानते ही है कि 'कृषि' बिहार की रीढ़ है,और इसीलिए यहां की मिट्टी में कुछ ऐसा जादू है जो कि यहां के उगने वाली फसलों और फलों को पूरी दुनियां में सबसे अनोखा बना देता है। हम उन्ही में से उन अनोखा कृषि उत्पादों के बारे में जानकारी हासिल करेंगे जिन्हे जीआई टैग मिल चुका है --

1. मिथिला मखाना (Mithila Makhana):

अब बात सुपर वाली करते है और जब भी सुपर फूड की बात आती है तो आज पूरी दुनियां 'मखाना' को सुपर फूड के बारे में लोहा मान चुकी है। और आप शायद ही जानते होंगे की पूरे भारत और यहां तक की पूरी दुनियां के कुल मखाना उत्पादन का अकेले 80-90% हिस्सा बिहार के मिथिला क्षेत्र से ही आता है। 

दरभंगा,पूर्णियाँ,मधुबनी और सहरसा जैसे जिलों में उगाई जानेवाली इस मखाना को --'मिथिला मखाना' के नाम से जीआई टैग मिला है। 
  • क्या है खासियत: मिथिला के तालाबों के पानी और विशेष मिट्टी के कारण यहां का मखाना आकर में बड़ा,अत्यधिक सफेद और रसायनिक खाद से मुक्त होता है। 
  • पोषक तत्वों का खजाना: इसमे बहुत ही प्रचुर मात्रा में प्रोटीन,मैग्नीशियम और एंटी-आक्सीडेंट पाए जाते है,जबकि कोलेस्ट्राल और फैट बिल्कुल ही न के बराबर होता है। 
  • ग्लोबल डिमांड: पहले यह मखाना उतना प्रसिद्ध नहीं था लेकिन यह जीआई टैग मिलने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण ब्रांड बन गया है। अब यह अमेरिका,यूरोप और खाड़ी देशों के सुपर-मार्केट में प्रीमियम दामों पर बिक रहा है। 
Mithila Mkhana farming Darbhanga,Bihar जीआई टैग उत्पाद
मिथिला क्षेत्र का मखाना अपनी मिट्टी की खुसबू और बड़ी सफेद दानों वाली होती है 




2. शाही लीची (Shahi Lychee मुजफ्फरपुर):

गर्मियों के मौसम में यदि आपने मुजफ्फरपुर की शाही लीची नहीं खाई है तो आपने जीवन में लीची का असली स्वाद ही नहीं पाई है। इस क्षेत्र की मिट्टी में चुनें की अधिक मात्रा होने से इस लीची को बिल्कुल ही खास लीची बना देती है। 
  • स्वाद और सुगंध: शाही लीची का गुदा बहुत ही रसीला,मखमली और गाढ़े मीठे स्वाद वाला होता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है और इसका खुशबू बहुत ही अनोखा होता है जो इसे विशेष बनाता है। 
  • शाही इतिहास: हां! आखिर इसे शाही क्यों कहा जाता है। क्योंकि इसकी खुशबूदार स्वाद के चलते पहले राजा-महाराजाओं को साथ ही अन्य गणमान्य लोगों को तोहफे के रूप में भेजा जाता था। इसीलिए इसका नाम शाही लीची हो गया। 


3. जर्दालू आम (jardalu Mango भागलपुर):

फलों में आम राजा है और आम के राजा तो कई आम है लेकिन खुशबू के मामले में भागलपुर के जर्दालू आम के जैसा कोई राजा नहीं है। हल्के पीले रंग का यह आम अपनी बहुत ही तीखी और मनमोहक सुगंध के लिए जानी जाती है। जब तक मैं उस क्षेत्र में था केवल यही आम खाता था। लेकिन हरेक जगह यह आम खोजने पर भी नहीं मिल रही है,तो खाए कैसे। 
  • विशेषता: जर्दालू आम का छिलका बहुत ही पतला होता है और इसके गुदें में रेशे बिल्कुल भी न के बराबर होते है। यह खाने में हल्का एवं सुपाच्य होता है। 
  • खास पहचान: हर साल बिहार सरकार की ओर से खास बगीचे का जर्दालू आम को देश के प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति और अन्य गणमान्य लोगों को भेजा जाता है। 

जर्दालू आम बिहार के भागलपुर जिलों मे बहुत होता है
स्वाद और विशेष खुसबू के कारण प्रसिद्ध है जर्दालू आम 




4. कतरनी चावल (Katarni Rice भागलपुर और बांका):

बिहार का भागलपुर 'सिल्क' के लिए तो प्रसिद्ध है ही साथ में यह कतरनी चावल के लिए भी बहुत ही प्रसिद्ध है। भले ही अब कतरनी चावल का उत्पादन बिहार के सभी जिलों में होता है,लेकिन यह फैला है भागलपुर से ही। यह चावल छोटे दानें वाला होता है और पकने के बाद खुशबूदार हो जाता है। 
  • चूड़ा और पुलाव जबरदस्त: कतरनी चावल का उपयोग विशेष रूप से घरों में त्योहारों या सामान्य अवसरों पर खीर बनाने,पुलाव और पारंपरिक शादी-विवाह में व्यंजन बनाने में होता है। मर्चा धान की तरह ही इसका भी चूड़ा बिहार में बेहद लोकप्रिय है। 

5. मगही पान (Magahi paan मगध क्षेत्र):

मगही पान---नाम लेते ही एक बार खाने को मन कर जाता है। इतना बेजोड़ स्वाद और चबाने में मुलायम होता है यह मगही पान। नवादा,गया,औरंगाबाद और नालंदा के मगध क्षेत्र में उगाया जाने वाला यह पान औषधीय गुणों और बेहतरीन स्वाद का अद्भुत मिश्रण है। 
  • मुह में घुलने वाला जादू: इस पान के पत्ते इतने मुलायम,चिकनें और हल्के हरे रंग के देखने में भी खूबसूरत होते है कि इसको चबाने में मेहनत नहीं करनी पड़ती है और यह धीरे-धीरे मुंह में घुल जाता है। इसमें कड़वाहट बिल्कुल नहीं होती है जिससे कत्था और चुना मिला देने के बाद और भी बेहतरीन हो जाता है। 

मगही पान का पत्ता कृषि के क्षेत्र में
मगही पान अपने आप में लाजवाब होती है 



पारंपरिक हस्तशिल्प और कलाकृतियां (Handicraft & Arts)

जब हम पारंपरिक हस्तशिल्प की बात करते है तो बिहार में यह परंपरा हजारों सालों से भी ज्यादा पुरानी है। यहां के कारीगरों और महिलाओं ने अपनी परंपरा को पीढ़ियों से लेकर अभी तक संजोकर रखा हुआ है --

1. मधुबनी पेंटिंग:मिथिला का प्रसिद्ध कला:

बिहार का नाम आते ही सबसे पहले जो कला जहाँ में आता है वह है --'मधुबनी पेंटिंग' जिसे बिहार का आबसे पहला जीआई टैग भी प्राप्त हुआ था। आज यह वैश्विक फैशन और इंटीरियर डिजाइनिंग का प्रमुख हिस्सा बनकर अपना छाप हर जगह छोड़ रहा है। 
  • दीवारों के कैनवास तक: मूल रूप से यह कला मिथिलाञ्चल के घरों की दीवारों पर और आंगन में महिलाओं द्वारा बनाई जाती थी। आज यह कपड़ों कागज और कैनवास पर उकेरने के साथ सरकारी इमारतों,रेलवे स्टेशनों आदि की दीवारों को सुशोभित कर रही है। 
  • प्राकृतिक रंगों और उंगुलियों का खेल: इसको बनाने मे माचिस की तीली,बांस की कलम और उंगुलियों का इस्तेमाल किया जाता है। रंग केवल और केवल प्राकृतिक रंग ही इस्तेमाल किये जाते है। इसमें रामायण के प्रसंग,देवी-देवता,प्रकृति और सूर्य-चंद्रमा आदि के दृश्य उकेरे जाते है। 

मधुबनी पेंटिंग बिहार का पहला जीआई टैग उत्पाद है
मधुबनी पेंटिंग मिथिला क्षेत्र की खास पहचान है 



2. भागलपुरी तसर सिल्क:

हम जानते ही है कि --भागलपुर को 'भारत की सिल्क सिटी' कहा जाता है। यहां का तसर सिल्क अपनी अनूठी बनावट,बुनावट प्राकृतिक सुनहरे रंग और अपनी मजबूती के लिए दुनियां भर में जाना जाता है। 
  • पर्यावरण के अनुकूल सिल्क: तसर सिकल को ---'अहिंसा का सिल्क' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें कई प्रकार के रेशम को बिना रेशम के कीड़ों को मारे हुए ही रेशम का सूत निकाल लिया जाता है।इसकी चमक और ग्रेस-कारपोरेट वियर एवं शादियों के परिधान के लिए सबसे पहले पसंद किये जाते है। 


3. सूजनी कढ़ाई:

यह सूजनी कढ़ाई--केवल एक हस्तशिल्प ही नहीं है,बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं की कहानियों एवं भावनाओं को कपड़े पर उकेरनें का मध्यम भी है। 
  • पुरानी साड़ियों का पुनर्जन्म: इसमे पारंपरिक रूप से घर की मां अपनी पुरानी सूती साड़ियों और धोतियों को एक के ऊपर एक रखकर रंगीन धागों से बारीक सिलाई करती थी। विशेष रूप से इसलिए की नवजात शिशुओं के लिए मुलायम बिछौना तैयार किया जा सके। आज सूजनी कढ़ाई के मध्यम से साड़ियों,कुर्तियों और होम-डेकोर के समानों पर समकालीन और सामाजिक मुद्दों की कहानियां उकेरी जा रही है। 


4. सिक्की ग्रास क्राफ्ट:

यह भी रोचक ही है। बिहार के दलदली इलाकों और नदियों के किनारों पर उगने वाली एक विशेष सुनहरी घास जिसे --'सिक्की' कहा जाता है उससे यहां की महिलायें अद्भुत कलाकृतियाँ बनाती है। बिहार के कई इलाकों में इसे मुज भी कहा जाता है। यह कला सस्टैनबल लाइफस्टाइल का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। 
  • सुनहरी कला और डाल-दौड़ी: इस घास को सुखाकर पारंपरिक और चमकीले रंगों में रंगा जाता है। फिर इसके खूबसूरत डालियां,दौड़ी,खिलौने,बक्से और सजावटी समान इत्यादि बनाए जाते है। यह कला पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का एक बेहतरीन उदाहरण है। 



प्रसिद्ध व्यंजन और खाद्य उत्पाद (Food & Delicacies)

भाई बिहार में बिहारी और बिहारी व्यंजन तो इतना प्रसिद्ध है की इसको देश ही नहीं बल्कि ग्लोबल पहचान मिलने लगी है। भले ही वो जीआई टैग हासिल किया हो या न किया हो। जैसे यहां की 'लिट्टी-चोखा' अब इंटरनेशनल लिट्टी-चोखा बन गई है। 

बक्सर की सोन-पापड़ी अपनी स्वाद और मिष्ठान के लिए देश दुनियां में मशहूर होता जा रहा है। बस इन व्यंजन और खाद्य उत्पादों को जीआई टैग मिलने की देर है,जिसके बाद यह और भी लोकप्रिय होकर बिहार ही नही बल्कि पूरे देश का नाम विश्व के पटल पर रोशन करने को तैयार है। 

1. सिलाव का खाजा-नालंदा:

नालंदा जिले के राजगीर और बिहारशरीफ के बीच एक छोटा सा कस्बा है --'सिलाव' और यह कस्बा अपने विश्व प्रसिद्ध सिलाव के खाजे के लिए प्रसिद्ध है। इस पारंपरिक मिठाई को खाद्य श्रेणी में जीआई टैग मिला हुआ है। 
  • 52 परतों का जादू: बनावट ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। यह मैदा,चीनी और घी के मेल से इस तरह से बेलकर मोड़ा जाता है कि इसमें 52 परतें स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह मुंह में रखते ही क्रिप्सी और खस्ता महसूस कराकर अद्भुत स्वाद प्रदान कराता है। 
  • बौद्ध काल से संबंध: स्थानीय मान्यताओं और इतिहास के अनुसार जब भगवान बुद्ध राजगीर से होकर गुजर रहे थे तब उन्हे यह मीठा व्यंजन भेट किया गया था। चीनी यात्री --'ह्वेनसांग' के यात्रा वृतांत में भी इस प्रसंग का जिक्र मिलता है। 


जीआई टैग से बिहार को क्या फायदा हो रहा है (The Impacts of GI Tags)

अब आते है असली मुद्दे पर। जीआई टैग मिलने से पहले भी यह उत्पाद विशिष्ट ही होते है। लेकिन जीआई टैग मिलने के बाद जमीन पर बहुत बड़े और सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते है। मधुबनी पेंटिंग का देश और दुनियां में उतना नाम नहीं था जितनी प्रसिद्धि जीआई टैग मिलने के बाद हुई। इसी तरह से मिथिला मखाना का भी यही हाल था जिसे जीआई टैग मिलने के बाद ग्लोबल पहचान मिली और आज पूरी दुनियां में छा गई है। 

बिहार के संदर्भ में जीआई टैग मिलने से निम्नलिखित फायदे हो रहे है --
  • नकली और पायरसी उत्पादों पर लगाम: जीआई टैग मिलने के बाद अब इन उत्पादों को कोई भी इनके नाम पर नहीं बेच सकता है। कानूनन अब यह जुर्म है। इससे असली और इस भौगोलिक क्षेत्र के लोगों का हक और फायदा दूसरा नहीं उठा पाएगा। एवं डायरेक्ट इनका फायदा होगा। 
  • स्थानीय किसानों एवं कारीगरों की अर्थीक उन्नति: जीआई टैग एक वैश्विक सर्टिफिकेट की तरह से काम करता है। अब इन उत्पादों को सीधे बड़ी कंपनियां और ई-कामर्स कंपनियां सीधे इस क्षेत्र के किसानों एवं उद्यमियों से संपर्क कर सकेंगे। जिससे स्थानीय किसानों और कारीगरों को लाभ होगा। 
  • बिहार के पर्यटन को बढ़ावा: जब कोई भी उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध होता है,तब लोग उस जगह को भी देखने और भ्रमण करने आते है जिस जगह वह समान यानि उत्पाद बनाता है। इससे पर्यटन में भी इजाफा होता है और पर्यटन से संबंधित रोजगार एवं आय में भी बढ़ोतरी होती है। 
  • सरकार का ध्यान: जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों और इसके क्षेत्रों पर सरकार का भी विशेष ध्यान हो जाता है और विभिन्न योजनाओं के मध्यम से इन उत्पादों को बढ़ावा और उत्पादन प्रोत्साहन की योजनाएं भी चलाई जाती है। जिससे इस क्षेत्र का कुछ विकास हो जाता है। 

भविष्य की राह:बिहार के और कौन से उत्पाद कतार में है

बिहार में इस तरह के विशिष्ट भौगोलिक उत्पादों की कमी नहीं है। बस उन्हे पहचानने और जीआई टैग दिलाने की जरूरत है। यदि इन उत्पादों को जीआई टैग मिल जाता है तो निश्चय ही बिहार इन उत्पादों के साथ पर्यटन में भी अपने एक अलग मुकाम को हासिल कर लेगा। कुछ विशेष उत्पाद यह हो सकते है ---
  1. हरिहर क्षेत्र के मेला का उत्पाद -सोनपुर क्षेत्र। 
  2. चिनिया केला -हाजीपुर क्षेत्र। 
  3. उदवंत नगर का खुरमा --भोजपुर क्षेत्र। 
  4. गया का तिलकुट और लाई -गया क्षेत्र। 
  5. मनेर के लड्डू -पटना क्षेत्र। 
  6. बक्सर का सोन-पापड़ी -बक्सर क्षेत्र। 

और भी ऐसे ही कई उत्पाद है जिनको जीआई टैग मिलना है। और जो अपने क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताओं से भरपूर होती है। उम्मीद है आने वाले दिनों में इन उत्पादों के लेवल पर भी हमें जल्दी ही जीआई टैग देखने को मिल जाए। 

निष्कर्ष (Conclusion)

उपरोक्त जीतने भी जीआई टैग उत्पाद है वह केवल एक उत्पाद नहीं है,बल्कि इनमें बिहार की मिट्टी की खुशबू,यहां के लोगों की सदियों पुरानी चली आ रही मेहनत,परंपरा और संस्कृति का जीता जागता नमूना है। और ये नमूना अपने साथ एतिहासिक कहानियां और धरोहरों को सँजोये हुए है। 

अब,एक ब्लॉगर,जिम्मेदार नागरिक एवं पाठक होने के नाते हमारा यह कर्तव्य है कि हम इन जीआई टैग और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दे। जब हम खुद --'लोकल के लिए वोकल'(Vocal for The Local) बनते है,तब हम न केवल अपनी संस्कृति को बचाते है,बल्कि अपने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि का दिया जलाने में योगदान प्रदान करते है। 

इसलिए जब अगली बार आप किसी को कोई उपहार दे तो बिहार के इन जीआई टैग उत्पादों हस्तशिल्पों और स्वादों को जरूर चुनें। 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1:GI Tag क्या होता है?
उत्तर:GI(Geographical Indication)Tags किसी उत्पाद की विशिष्ट गुणवत्ता,प्रतिष्ठा या पहचान को उसके भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ने वाला एक कानूनी प्रमाणपत्र है।
प्रश्न 2: बिहार का पहला जीआई टैग उत्पाद कौन सा है?
उत्तर: मधुबनी पेंटिंग बिहार का पहला जीआई टैग उत्पाद है जिसे वर्ष 2007 में मान्यता मिली थी।
प्रश्न 3:बिहार में लगभग कितने जीआई टैग उत्पाद है??
उत्तर: वर्तमान में बिहार के लगभग 15 से अधिक--कृषि,हस्तशिल्प खाद्य और वस्त्र उत्पादों को जीआई टैग उत्पाद का दर्जा मिल चुका है।
प्रश्न 4:किसी उत्पाद को मिलने वाली जीआई टैग की वैधता कितने समय की होती है?
उत्तर:किसी भी उत्पाद को दिया जाने वाला जीआई टैग 10 वर्षों के लिए मान्य होता है। 10 वर्ष पूरा हो जाने के बाद संबंधित संस्था या विभाग द्वारा इसे दोबारा रेन्युअल कराना पड़ता है।
प्रश्न 5:मर्चा धान या चावल को जीआई टैग किस जिलें के लिए मिला है?
उत्तर:मर्चा धान मुख्य रूप से पश्चिमी चंपारण जिलें में उगाया जाता है। इसके धानों के दानें काली मिर्च जैसा गोल और हल्का काला होता है इसलिए इसे मर्चा धान कहा जाता है। यह अपने सुगंधित खुसबू और महक के लिए प्रसिद्ध है।
प्रश्न 6:बावन बुटीक साड़ी और फैब्रिक का संबंध बिहार के किस क्षेत्र से है?
उत्तर: नालंदा के --'बसवन बीघा' गांव और उसके आस-पास के क्षेत्रों में बुनी जाने वाली साड़ी --जिसको 'बावन बुटीक साड़ी' के नाम से प्रसिद्धि हासिल है,हाल ही में इसको जीआई टैग मिल है।इसमें 'टसर सिल्क' या 'सूती कपड़ा' पर हाथ से ही (Extra Weft Technique) 52 अलग-अलग और बहुत ही बारीक सुंदर आकृतियां (Motifs) बुनी जाती है।
प्रश्न 7:सिक्की ग्रास क्राफ्ट क्या है जिसे जीआई टैग मिला है?
उत्तर: बिहार के दलदली इलाकों और नदियों के किनारों पर उगने वाली एक विशेष सुनहरी घास जिसे --'सिक्की' कहा जाता है उससे यहां की महिलायें अद्भुत कलाकृतियाँ बनाती है। बिहार के कई इलाकों में इसे मुज भी कहा जाता है। यह कला सस्टैनबल लाइफस्टाइल का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस घास को सुखाकर पारंपरिक और चमकीले रंगों में रंगा जाता है। फिर इसके खूबसूरत डालियां,दौड़ी,खिलौने,बक्से और सजावटी समान इत्यादि बनाए जाते है। यह कला पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का एक बेहतरीन उदाहरण है।
प्रश्न 8:जीआई टैग मिलने से बिहार को क्या फायदा हुआ है?
उत्तर: बिहार के संदर्भ में जीआई टैग मिलने से निम्नलिखित फायदे हो रहे है --नकली और पायरसी उत्पादों पर लगाम,स्थानीय किसानों एवं कारीगरों की अर्थीक उन्नति,बिहार के पर्यटन को बढ़ावा,सरकार का ध्यान: जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों और इसके क्षेत्रों पर सरकार का भी विशेष ध्यान हो जाता है और विभिन्न योजनाओं के मध्यम से इन उत्पादों को बढ़ावा और उत्पादन प्रोत्साहन की योजनाएं भी चलाई जाती है।


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