📌 संक्षेप में (Quick Summary)
- GI टैग (Geographical Indication Tag)।
- ✔ किसी उत्पाद की "भौगोलिक पहचान" होती है। इसका सीधा मतलब यह होता है कि ---वह उत्पाद उस विशेष स्थान की मिट्टी,जलवायु परंपरा और कौशल से जुड़ा होता है।
- GI टैग मिलने के बाद --✔ उस नाम का उपयोग केवल उसी क्षेत्र के लोग कर सकते है। ✔ नकली उत्पाद पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। ✔GI टैग 10 साल के लिए वैध होती है और उसका रिनूअल हो सकता है। ✔ कोई भी किसान,कारीगर संगठन,सरकारी संस्था या FPO/NGO किसी विशेष क्षेत्र के लिए इस GI टैग के लिए आवेदन कर सकता है।
- GI टैग मिलने के बाद -बदलाव -1.साल भर काम और बेहतर मार्जिन 2. अंतरराष्ट्रीय पहचान (Global Identity) 3. स्टार्टअप और शिल्प में रुचि 4. सीधा वैश्विक निर्यात (Direct Export)
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| उत्तर प्रदेश का GI Tag और ग्रामीण विकास को मिलता बल |
📑 Table of Contents
- ➤ प्रस्तावना:
- ➤ GI टैग क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है ?
- ➤ उत्तर प्रदेश के प्रमुख GI उत्पाद:एक नजर
- ➤ 1. बुनावट और वस्त्र (Textiles & Weaving):
- ➤ 2.कृषि उत्पाद (Agricultural Products):
- ➤ 3. धातु और हस्तशिल्प (Metal & Handicraft):
- ➤4. पत्थर और मिट्टी के उत्पाद (Stone & Pottery)
- ➤ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांति कैसे आ रही है ?
- ➤सरकार की भूमिका:'एक जिला एक उत्पाद'
- ➤भविष्य की चुनौतियां और समाधान
- ➤ निष्कर्ष
- ➤ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQ
प्रस्तावना (Introduction)
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज सबसे बड़ा सवाल है --"किसानों और कारीगरों की आय कैसे बढ़ें ?" और इसी सवाल का एक शक्तिशाली उत्तर है GI टैग।
आज इस बात पर चर्चा करेंगे की कैसे हम GI को ध्यान में रखकर अपनी पारंपरिक व्यवसाय को नया रूप प्रदान कर सकते है नए तरह से मार्केटिंग कर सकते है और इस GI उत्पाद से संबंधित नया व्यवसाय भी शुरू कर सकते है। क्योंकि ये GI टैग ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम चेंजर साबित हो रहे है।
उत्तर प्रदेश,जिसे भारत का सबसे बड़ा ग्रामीण राज्य माना जाता है,GI टैग के मामले में देश में अग्रणी राज्यों में शामिल है। यहां के पारंपरिक उत्पाद सिर्फ वस्तुएं नहीं है, बल्कि वे इतिहास,संस्कृति,कौशल और स्थानीय पहचान की जीवित विरासत है।
जब दुनियां ग्लोबलाइजेशन की ओर बढ़ रही है,तब GI टैग ग्रामीण भारत को Local to Global" बनाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। अब हम समझते है कि 'उत्तर प्रदेश के GI टैग उत्पाद' कैसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ बन सकते है।
GI टैग क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है ?
GI टैग (Geographical Indication Tag)किसी उत्पाद की "भौगोलिक पहचान" होती है। इसका सीधा मतलब यह होता है कि ---वह उत्पाद उस विशेष स्थान की मिट्टी,जलवायु परंपरा और कौशल से जुड़ा होता है।
उदाहरण के लिए -
- दार्जिलिंग की चाय
- कश्मीर का केशर
- बनारसी साड़ी
GI टैग मिलने के बाद उस नाम का उपयोग कोई और नहीं कर सकता। अतः यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए 'ब्रांडिंग लाइसेंस' है।
➢GI टैग कौन देता है ?
भारत में GI टैग देने का कम करता है --"Geographical Indication Registry" और यह संस्था भारत सरकार के Ministry of Commerce and Industry के अंतर्गत आती है। इसका मुख्यालय 'चेन्नई',तमिलनाडु में है।
भारत में GI टैग को --"Geographical Indication of Goods (Registration and Protection ) Act,1999 कानून के तहत प्रदान किया जाता है जो वर्ष 2003 से लागू है। भारत का पहला GI टैग -दार्जिलिंग चाय को वर्ष 2004 में मिला था।
- कोई भी किसान,कारीगर संगठन,सरकारी संस्था या FPO/NGO किसी विशेष क्षेत्र के लिए इस GI टैग के लिए आवेदन कर सकता है।
- GI-रजिस्ट्री जांच करती है कि -क्या उत्पाद सच में उस क्षेत्र से जुड़ा है ?,क्या उसका इतिहास और प्रमाण है ? और अगर सही पाया गया तो GI Journal में उसे प्रकाशित किया जाता है।
- अगर कोई आपत्ति नहीं मिलती है तो प्रक्रिया आगे बढ़ता है और उत्पाद को आधिकारिक GI टैग मिल जाता है।
GI टैग मिलने के बाद --
- उस नाम का उपयोग केवल उसी क्षेत्र के लोग कर सकते है।
- नकली उत्पाद पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
- GI टैग 10 साल के लिए वैध होती है और उसका रिन्यूअल हो सकता है।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख GI उत्पाद:एक नजर
उत्तर प्रदेश में GI टैग की सूची अब 75 से अधिक हो चुकी है,जो भारत के किसी भी राज्य में सबसे अधिक है। उत्तर प्रदेश की कला और कृषि को हम तीन मुख्य श्रेणियों की चर्चा करेंगे। यहां के उत्पाद केवल वस्तुएं नहीं,बल्कि 'उस मिट्टी की जीती-जागती- विरासत' है।
1. बुनावट और वस्त्र (Textiles & Weaving):
यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है,जहां लाखों परिवार पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़े हुए है --
➤बनारसी साड़ी: लाखों बुनकरों की जीवनरेखा
बनारसी साड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं,बल्कि ये 700 साल पुरानी कला है। साथ ही सोने और चांदी के तारों (जरी) का काम,जो इसे दुनियां का सबसे कीमती कपड़ा बनाता है।
- ग्रामीण प्रभाव:
- 5 लाख से अधिक बुनकर परिवार जुड़ा हुआ है।
- घर घर में करघा चलता है।
- महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी है।
- GI टैग मिलने के बाद:
- नकली साड़ियों पर रोक लगी।
- अंतर्राष्ट्रीय बाजार खुला।
- यह एक पूरा ग्रामीण उद्योग बन गया है।
➤भदोही के हस्तनिर्मित कालीन:"Carpet City of India"
इन्हे 'विश्व कालीन का हब' कहा जाता है। यहां के कालीन व्हाइट हाउस से लेकर दुनियां के शाही महलों तक बिछे हुए है।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
- 20 लाख लोगों को रोजगार।
- छोटे गांवों में भी उत्पादन कार्य।
- 80% निर्यात आधारित।
यह उत्पाद दिखाता है कि GI टैग कैसे गांवों को Global Supply Chain से जोड़ता है।
➤लखनऊ चिकनकारी:महिलाओं की आर्थिक आजादी
नवाबों के शहर लखनऊ की यह नाजुक कढ़ाई अब 'पेरिस और लंदन' के फैशन रैम्प तक पहुंच चुकी है। चिकनकारी कढ़ाई महिलाओं के लिए वरदान है।
- ग्रामीण असर:
- 70% काम महिलायें करती है।
- घर बैठे रोजगार।
- स्वयं-सहायता समूहों की वृद्धि।
- GI टैग के बाद:
- निर्यात की मांग बढ़ गई।
- ई-कामर्स से सीधे विक्री होने लगी।
- महिला सशक्तिकरण मजबूत हुआ।
2.कृषि उत्पाद (Agricultural Products):
उत्तर प्रदेश की उपजाऊ मिट्टी नें ऐसे उत्पाद दिए है जो दुनियां में कही और नहीं मिलता है।
➤मलिहाबाद का दशहरी आम -किसानों की पहचान
लखनऊ के पास स्थित मलिहाबाद का यह आम अपनी मिठास और पतली गुठली के करण विश्व भर में प्रसिद्ध है।
- GI टैग के बाद:
- इसका निर्यात बढ़ गया।
- किसानों को उत्पाद का प्रीमियम कीमत मिलने लगी।
➤प्रयागराज का सुरखा अमरूद
प्रयागराज का सुरखा अमरूद पूरे देश में प्रसिद्ध है। इसका लाल गुदा और मीठा स्वाद इसे विशेष बनाते है।
- GI टैग के बाद:
- इसकी ब्रांड वैल्यू और भी बढ़ गई।
- किसान अब सीधे बाजारों से जुड़ने लगे है।
➤सिद्धार्थनगर का काला नमक चावल
इसे भगवान "बुद्ध का महाप्रसाद" कहते है। इसकी खुसबू पकने के बाद पूरे मोहल्ले में फैल जाती है। साथ ही यह शुगर-फ्री गुणों के लिए भी जानी जाती है।
- GI टैग के बाद:
- इसका नाम और प्रसिद्धि फैल गया।
- पूरे देश के लोग जान गए इसके बारे में।
- मांग बहुत अधिक बढ़ गई।
- उत्पाद का मूल्य भी प्रीमियम मिलने लगा।
➢आगरा का पेठा: इसी प्रकार से आगरा के पेठा को GI टैग मिलने से इसकी मांग देश और दुनियां भर में बढ़ गई जिससे इससे जुड़े हुए किसानों से लेकर स्थानीय व्यवसायी और महिलाओं को आर्थिक रूप से बहु ही फायदा पहुचा है।
3. धातु और हस्तशिल्प (Metal & Handicraft):
➤मुरादाबाद का मेटल क्राफ्ट --Brass City
यह पित्तल के बर्तनों और सजावटी सामानों का सबसे बड़ा निर्यात केंद्र के रूप में जाना जाता है। यहां बनने वाले पित्तल पूरी दुनियां भर में जाते है।
- GI टैग के बाद:
- लाखों कारीगर जुड़े है इस काम से उनका भरोसा बढ़ा।
- छोटे गांव की यूनिट की मांग बढ़ी।
- निर्यात से आय बढ़ गई।
➤कन्नौज की इत्र:तरल सोना
कन्नौज का इत्र 400 साल पुरानी परंपरा है जो पुरानी 'देग-भपका' विधि से तैयार की जाती है और यह "तरल सोना" के रूप में प्रसिद्ध है। -
- ग्रामीण प्रभाव:
- GI टैग मिलने से फूलों की खेती बढ़ गई।
- गुलाब,चमेली और केवड़ा का उत्पादन और मांग बढ़ गई।
- इससे किसानों की भी आय बढ़ गई।
- यह कृषि+उद्योग का शानदार नमूना है।
इसके अलावा फीरोजाबाद का ग्लास (कांच) की चूड़ियाँ,सहारनपुर का काष्ठ शिल्प और अमरोहा की ढोलक भी बहुत ही प्रसिद्ध और पूरे विश्व में मांग की जानेवाली GI टैग उत्पाद है।
4. पत्थर और मिट्टी के उत्पाद (Stone & Pottery)
- खुर्जा की पॉटरी: रंगीन चीनी मिट्टी के बर्तन जो हर भारतीय के घर में पाया जाता है।
- निजामाबाद की काली मिट्टी के बर्तन: चांदी जैसी चमक वाली काली मिट्टी की कलाकारी,जो दिखने में बहुत आधुनिक और शाही लगती है।
- मिर्जापुर का सैंडस्टोन: एतिहासिक किलो और महलों में इस्तेमाल होनेवाला पत्थर।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांति कैसे आ रही है ?
GI टैग ने उत्तर प्रदेश के गांवों में एक 'रिवर्स माइग्रेशन'(विपरीत पलायन) की शुरुआत की है। GI टैग और सरकार के योजनाओं के संगम से एक 'मौन क्रांति' का उभार हुआ है जो खेती किसानी और पारंपरिक शिल्प को गुजारा चलाने के साधन से निकल कर एक मुनाफा का व्यवसाय में बदल दिया है।
इस 'मौन क्रांति' के मुख्य स्तम्भ निम्नलिखित है -
1. रिवर्स माइग्रेशन (विपरीत पलायन):
GI टैग मिलने से स्थानीय उत्पादों की मांग वैश्विक स्तर पर बढ़ी है जिससे -
- स्थानीय गौरव: पहले जो युवा काम की तलाश में शहरों में भागते थे,अब वे अपने पैतृक हुनर में ही अपना भविष्य देखने लगे है और ये भविष्य उन्हे उज्ज्वल नजर आने लगी है।
- आर्थिक स्थिरता: जब गांव में ही उन्हे शहर जैसा उचित दाम और काम मिलने लगे है,तो उनमें आर्थिक स्थिरता आने लगी है और पलायन रुकने लगा है।
2. सीधा बाजार पहुंच:
डिजिटल क्रांति ने "खेत से बाजार"(Farm to Fork) के अंतर को कम कर दिया है।
- ई-कामर्स का साथ: अब सिद्धार्थ नगर का किसान 'कला नमक चावल' अमेजन या फ्लिपकार्ट पर सीधे ही बेच सकता है। e-NAM योजना भी इनके उत्पाद को सही दाम और पहुच प्रदान कर रही है।
- उचित मूल्य: GI टैग एक तरह का 'क्वालिटी सर्टिफिकेट' बन गया है। ग्राहक इसके लिए प्रीमियम मूल्य देने को तैयार रहता है,जिसका सीधा लाभ सीधे ग्रामीण उत्पादको को होता है।
3. महिला सशक्तिकरण का नया मॉडल:
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में GI उत्पादों के निर्माण में महिलाओं की भागीदारी 50% से अधिक है।
- लखनऊ की चिकनकारी और गाजीपुर की 'वॉल हैंगिंग' जैसी कार्य में जुटी महिलायें अब केवल श्रमिक ही नहीं बल्कि उद्यमी भी बनने लगी है।
- स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से उन्हें आसान ऋण और ट्रैनिंग भी मिल जा रही है।
4. ब्रांडिंग और पैकेजिंग "ब्रांड यूपी"
अभी तक ग्रामीण उद्योगों की सबसे बड़ी कमी उनकी पैकेजिंग और ब्रांडिंग थी। लेकिन GI टैग के बाद -
- ODOP (एक जिला एक उत्पाद): सरकार के इस योजना ने ग्रामीण शिल्प को कारपोरेट जैसी ब्रांडिंग प्रदान कर दिया है जिसका फायदा जमकर हो रहा है।
- वैल्यू: अब गांव का बना गुड़ या आचार आकर्षक पैकेजिंग के साथ एयरपोर्ट और बड़े बड़े मॉल में भी बिक रही है। इनकी परसीव्ड वैल्यू बढ़ गई है।
5. पर्यटन और GI टूरिज्म:
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक नया आयाम 'GI पर्यटन' के रूप में उभर रहा है।
- लोग अब देखने के लिए गांवों का दौरा कर रहे है कि कन्नौज में इत्र कैसे बनता है,और आजमगढ़ में काली मिट्टी के बर्तन कैसे ढाले जाते है।
- इससे गांवों में 'होम स्टे'स्थानीय परिवहन और खान-पान के नये अवसर भी पैदा होने लगे है।
सरकार की भूमिका:'एक जिला एक उत्पाद'
उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जिला एक उत्पाद' (One district One Product) योजना ने GI टैग वाले उत्पादों को स्थानीय बाजार से निकालकर वैश्विक बाजार तक पहुचानें में एक 'इंजन' की तरह काम किया है।
इस भूमिका को निम्न तरह से समझा जा सकता है -
- वित्तीय सहायता और सब्सिडी: सरकार नें ग्रामीण उद्यमियों और शिल्पकारों को पैसे की कमी को दूर करते हुए -
- मार्जिन मनी स्कीम: के तहत छोटे उद्योगों को कुल प्रोजेक्ट का 25% तक सब्सिडी प्रदान की जाती है।
- आसान ऋण: 'मुद्रा योजना' और अन्य स्थानीय बैंक टाईअप के जरिए बिना किसी जटिल प्रक्रिया के शिल्पकारों को ऋण मुहैया कराया जा रहा है।
- कौशल विकास और ट्रैनिंग: परंपरा को आधुनिकता से जोड़ने के लिए सरकार ने प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की है -
- आधुनिक टूलकिट: शिल्पकारों को आधुनिक टूलकिट मुफ्त या रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
- डिजिटल साक्षरता: इन्हे ऑनलाइन पेमेंट करने,सोशल मीडिया मार्केटिंग और ई-कामर्स प्लाटफार्म पर अपने उत्पाद को लिस्ट करने की ट्रैनिंग प्रदान की जा रही है।
- कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFC): छोटे कारीगर महंगी मशीनें खुद नहीं खरीद सकते इसलिए सरकार ने जिलें में CFC बनाए है -
- यहाँ एक ही छत के नीचे डिजायनिंग,टेस्टिंग,पैकेजिंग और कच्चा माल भंडारण की सुविधा मिलती है।
- ब्रांडिंग और वैश्विक मार्केटिंग: सरकार ने इन उत्पादों को एक 'प्रीमियम ब्रांड' के रूप में स्थापित किया है -
- G-20 और विदेशी दौरे: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा विदेशी मेहमानों को भेंट में ODOP उत्पाद (जैसे-गुलाबी मिनकारी या सिल्क की चादरें) का उपहार देना इनकी वैश्विक ब्रांडिंग का उदाहरण है।
- प्रदर्शनी और मेलें: देश के प्रमुख शहरों में ODOP स्टोर खोले गए है और दिल्ली के प्रगति मैदान जैसे मेलें में इनके लिए विशेष पैवेलियन की व्यवस्था प्रदान की जाती है।
- बुनियादी ढांचा और लोजिस्टिक:
- एक्स्प्रेसवे और ड्राइपोर्ट्स: उतर प्रदेश के नये एक्स्प्रेसवे ग्रामीण इलाकों को नये ऐरपोर्ट्स और बंदरगाहों से जोड़ रहे है। इससे इनका ट्रसपोर्ट लागत कम हुई है और उत्पाद खराब होने का दर भी नहीं रहता है।
- जेवर एयरपोर्ट: आने वाले दिनों में इन उत्पादों के लिए अंतर्राष्ट्रीय निर्यात का हब बनेगा।
भविष्य की चुनौतियां और समाधान
उत्तर प्रदेश के GI उत्पादों ने विदेशी बाजार मे अपनी धमक तो बढ़ा दिया है,लेकिन इस सफलता को स्थाई बनाए रखने के लिए हमें कुछ जमीनी चुनौतियों का सामना हमें करना होगा।
1. नकली उत्पाद और पाइरेसी का खतरा:
क्योंकि जैसे ही किसी उत्पाद को GI टैग मिलता है मार्केट में उसके डुप्लिकेट आने लगते है। इससे असली शिल्पकारों के उत्पाद की आय और साख दोनों का नुकसान होता है।
- समाधान:
- QR कोड और टैगिंग
- कानूनी कार्रवाई
2. आधुनिक तकनीक और परंपरा का तालमेल:
हमारे कई ग्रामीण शिल्पकार आज भी सदियों पुरानी तकनीक का उपयोग कर रहे है। हालांकि यही उनकी विशेषता है,लेकिन उत्पादन की धीमी गति के करण वैश्विक मांग को पूरा करने में वे पीछे रह जाते है।
- समाधान:
- सेमी आटोमेशन: जिसमें शिल्पी की आत्मा की आवाज को ध्यान में रखा जाय और उत्पादन भी बढ़ा दिया जाय।
- डिजाइन इन्टरवेंशन: निफ़्ट (NIFT) और एनआईडी (NID) जैसे संस्थानों के साथ मिलकर परंपरागत के साथ आधुनिक फैशन को मिलाना।
3. कच्चे माल की बढ़ती लागत:
कालीन उद्योग हो या पित्तल उद्योग इन सबकी कच्चे माल की कीमतें तेजी से बढ़ रही है। इससे छोटे कारीगर को महंगी कच्चा माल खरीद कर फिर प्रतिस्पर्धा के साथ बेचना मुश्किल हो जाता है।
- समाधान:
- रॉ मेटेरियल बैंक: सरकार को ब्लॉक स्तर पर कच्चा माल गोदाम बनाना चाहिए ताकि पंजीकृत शिल्पकारों को सब्सिडी वाली दरों पर कच्चा माल मिल सके।
- सहकारी समितियां: कारीगरों को समूहों में संगठित करके थोक में कच्चा माल को मिलकर खरीदने की योजना बनानी चाहिए।
4. डिजिटल साक्षरता और मार्केटिंग:
गांव के लोग इंस्टाग्राम पर रील बनाना और अमेजन पर समान बुक करना नहीं जानते है और इसको सीखने के लिए उनके पास समय की कमी है। इसलिए वे अभी भी बिचौलियों पर ही निर्भर है।
- समाधान:
- डिजिटल ट्रैनिंग कैम्प: तहसील स्तर पर युवाओं को नियुक्त करना जो इन्हे हेल्प और सीखने में सहयोग कर सके।
- डायरेक्ट टू उपभोक्ता (D to C): सरकार को एक ऐसा प्लेटफार्म और ऐप विकसित करनी चाहिए जो डायरेक्ट इन उत्पादों और शिल्पियों से जुड़ सके।
5. जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय प्रभाव:
कृषि आधारित GI उत्पाद जैसे मलीहाबादी आम' या 'बासमती चावल' जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे है। जो इनकी आय और गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है -
- समाधान:
- क्लाइमेट स्मार्ट फार्मिंग: किसानों को ऐसी तकनीक सिखाना और प्रदान करना जो कम पानी और शून्य बजट प्राकृतिक खेती से भी अच्छी उपज निकाल सके।
- ईको-फ़्रेंडली उत्पादन: हस्तशिल्प में प्राकृतिक रंगों के उपयोग को बढ़ाना ताकि पर्यावरण को नुकसान न हो और वैश्विक बाजार में सस्टेनेबल उत्पाद के रूप में खरीदा जाय और मांग बनी रहे।
निष्कर्ष (Conclusion)
इन 'सांस्कृतिक चेतना' वाले GI उत्पाद जो सदियों से गांवों की गलियों में जीवित है,आज जब हम "आत्मनिर्भर भारत" की बात करते है तो ये इस नारे को धरातल पर सच करते हुए दिखाई देते है। स्पष्ट है की इसके पीछे GI टैग ही है जिसने इन उत्पादों को 'कानूनी सुरक्षा' के साथ 'वैश्विक पहचान' भी प्रदान किया है।
एक जिला एक उत्पाद (ODOP) के माध्यम से सरकार ने भी इसमें अपना बहुमूल्य योगदान प्रदान किया है। आज वाराणसी की गलियों से लेकर सिद्धार्थनगर के गांवों तक युवाओं में एक विश्वास जागी है। और ग्रामीण भारत को आर्थिक और भौगोलिक पहचान के साथ आय का मजबूत साधन स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो गया है।
यदि इसी तरह से ग्रामीण अर्थव्ययवस्था को मजबूत करने वाले प्रयास किये जाते रहे तो निश्चित ही आने वाले दिनों में देश 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है।
अब समय आ गया है कि हम और आप मिलकर 'लोकल फॉर वोकल' को अपने जीवन का हिस्सा बनाए।
"उत्तर प्रदेश का हुनर,अब दुनियां की पसंद है"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:GI टैग क्या होता है? ▼
उत्तर: GI टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक पहचान है,जो बताता है कि वह उत्पाद किसी विशेष क्षेत्र से जुड़े हुए है।
प्रश्न 2: GI टैग से किसानों को क्या फायदा होता है? ▼
उत्तर: GI टैग से किसानों को उनके उत्पाद का कीमत बढ़ता है,नकली समान रुकता है और निर्यात बढ़ता है। साथ ही उनकी एक विशेष ब्रांडिंग हो जाती है।
प्रश्न 3:उत्तर प्रदेश में कुल कितने GI टैग उत्पाद है? ▼
उत्तर: उत्तर प्रदेश में वर्तमान में 75 से अधिक उत्पादों को GI टैग मिल चुका है,यह संख्या भारत के किसी भी अन्य राज्य से सबसे ज्यादा है जो उत्तर प्रदेश को GI टैग का हब बनती है।
प्रश्न 4:GI टैग और 'एक जिला एक उत्पाद'(ODOP)के बीच क्या संबंध है? ▼
उत्तर:GI टैग उत्पाद को भौगोलिक सुरक्षा और कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है,जबकि ODOP योजना सरकार का एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए उत्पादों की ब्रांडिंग,मार्केटिंग और शिल्पकारों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। ये दोनों मिलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करती है।
प्रश्न 5:क्या GI टैग वाले उत्पाद केवल हस्तशिल्प ही होते है? ▼
उत्तर:नहीं!GI टैग हस्तशिल्प के अलावा कृषि उत्पादों (जैसे काला नमक चावल,मलिहाबाड़ी आम)खाद्य सामग्री और प्राकृतिक वस्तुओं को भी दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में इन सभी श्रेणियों में उत्पाद मौजूद है।
प्रश्न 6: क्या कोई भी व्यक्ति अपने उत्पाद पर GI टैग का लोगो इस्तेमाल कर सकता है? ▼
उत्तर: नहीं!केवल वही शिल्पकार या उत्पादक GI टैग का इस्तेमाल कर सकते है जो उस विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित है और जिन्होंने संबंधित विभाग में अधिकृत उपयोगकरता के रूप में अपना पंजीकरण कराया है।
प्रश्न 7:हम असली GI टैग उत्पाद को ऑनलाइन कहा से खरीद सकते है? ▼
उत्तर: आप उत्तर प्रदेश के आधिकारिक ODOP Mart पोर्टल ,अमेजन और सरकारी प्रदर्शनियों एवं मेलों में इस उत्पाद को असली रूप में खरीद सकते है।
प्रश्न 8:उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक किस जिलें में सबसे अधिक GI टैग उत्पाद है? ▼
उत्तर: अकेले वाराणसी और उसके आस-पास के क्षेत्रों जैसे मिर्जापुर,सोनभद्र,गाजीपुर आदि के पास उत्तर प्रदेश के कुल GI टैग का एक बड़ा हिस्सा है।
प्रश्न 9:GI टैग कौन प्रदान करता है? ▼
उत्तर: भारत में GI टैग देने का कम करता है --"Geographical Indication Registry" और यह संस्था भारत सरकार के Ministry of Commerce and Industry के अंतर्गत आती है। इसका मुख्यालय 'चेन्नई',तमिलनाडु में है।
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