कुपोषण मुक्त भारत के लिए जीवन चक्र दृष्टिकोण के तहत संस्थागत रणनीतियां क्या है?

⚡ त्वरित सारांश (Quick Read) • 2 मिनट सार
  • जीवन चक्र दृष्टिकोण: किशोरावस्था, गर्भावस्था, प्रथम 1000 दिन और बाल्यावस्था के जरिए अंतर-पीढ़ीगत कुपोषण के चक्र पर प्रहार।
  • संस्थागत आधार: सक्षम आंगनवाड़ी, पोषण ट्रैकर का डिजिटल रीयल-टाइम डेटा और Triple-A (ASHA, ANM, AWW) का जमीनी नेटवर्क।
  • रणनीतिक विस्तार: एनीमिया मुक्त भारत का $6 \times 6 \times 6$ से $7 \times 7 \times 7$ मॉडल—वरिष्ठ नागरिकों का समावेशन, सिकल सेल स्क्रीनिंग और आयुष पद्धतियों का समन्वय।

 

कुपोषण मुक्त भारत अभियान के तहत स्वस्थ ग्रामीण मां और सुपोषित शिशु
कुपोषण मुक्त स्वास्थ्य मां और बच्चा के खेलने का दृश्य


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  1. प्रस्तावना: कुपोषण की चुनौती
  2. NFHS-5 के आंकड़े और जमीनी हकीकत
  3. जीवन चक्र दृष्टिकोण (Life-Cycle Approach) के 5 चरण
  4. सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 की संस्थागत रणनीतियां
  5. नीतिगत अपग्रेड: एनीमिया मुक्त भारत (6×6×6 से 7×7×7 मॉडल)
  6. चुनौतियां और आगे की राह (Way Forward)
  7. निष्कर्ष और आपकी राय
  8. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
  9. आधिकारिक स्रोत एवं संदर्भ


प्रस्तावना (Introduction) 

कुपोषण केवल भोजन की कमी नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के शारीरिक विकास, संज्ञानात्मक क्षमता और देश के समग्र विकास को अवरुद्ध करने वाली एक बहुआयामी चुनौती है।

भारत में चार दशकों से अधिक समय तक सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चर्चा मुख्य रूप से बीमारियों पर नियंत्रण तक ही सीमित रहती थी। शुरुआत में यह दृष्टिकोण काफी प्रभावी भी रहा।

लेकिन अब सामुदायिक चिकित्सा काफी आगे निकल चुकी है और अब इसका ध्यान केवल अलग अलग बीमारियों को रोकने तक ही सीमित नहीं रह गया है।

अब पूरी आबादी और खासकर कमजोर और संवेदनशील वर्गों के स्वास्थ्य और कल्याण को सुनिश्चित करने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। यह बदलाव जरूरी भी है और कुछ क्षेत्रों में अभी अधूरा भी है।

इन्हीं बातों के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार ने नीतिगत बदलाव करते हुए "जीवन चक्र दृष्टिकोण" (Life - Cycle Approach) को अपनाया है। इसका मूल संदेश स्पष्ट है कि - "स्वास्थ्य वयस्क के लिए स्वास्थ्य बचपन जरूरी है, और स्वास्थ्य बचपन के लिए मां का स्वास्थ्य होना अनिवार्य है"।

इस विश्लेषण में कुपोषण के इन्हीं दृष्टिकोण और संस्थागत रणनीतियों में बदलाव के साथ किए जा रहे प्रयासों की चर्चा उपलब्ध प्रमाणिक स्रोतों के माध्यम से किया जा रहा है।

1. समस्या की गंभीरता: आधिकारिक आंकड़े क्या कह रहे हैं? 

समस्या कितना गंभीर है या सामान्य ही है यह जानने के लिए हमें आधिकारिक आंकड़ों की ओर रुख करना पड़ेगा।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS -5:2019-21) के आधिकारिक आंकड़े भारत में पोषण की स्थिति का स्पष्ट खाका प्रस्तुत करते हैं।

स्टंटिंग यानि उम्र के अनुपात में कम कद के मामले में 5 वर्ष से कम उम्र के 35.5% बच्चे इससे प्रभावित हैं। वही 5 वर्ष से कम उम्र के 19.3% बच्चे कद के अनुपात में कम वजन वाले है।

इसी तरह लगभग 32.1% बच्चे उम्र के अनुपात में कम वजन वाले है। वाकई में यह आकड़े बताते है कि हमें अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के वर्ष 2019 के वैश्विक अनुमानों के अनुसार प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया के मामलों में भारत दुनियां में पांचवे स्थान पर था। 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -5 (NFHS -5 वर्ष 2019 से 2021) के अनुसार भारत में प्रजनन आयु वर्ग की 57% महिलाएं एनीमिया से पीड़ित थी। जबकि NHFS -4 में यह अकड़ा 53 प्रतिशत ही था।

इसी तरह इसी सर्वेक्षण के अनुसार 6 से 59 महीने के उम्र के 67.1 प्रतिशत बच्चे भी एनीमिया से पीड़ित पाए गए। जबकि पांच साल पहले तक यह अकड़ा 58.6 प्रतिशत ही था। यानी इसमें भी काफी बढ़ोतरी हुई है।


एनीमिया अभियान की 7 x 7 x 7 रणनीति क्या है? 
7 लक्षित लाभार्थी
+
7 रणनीतिक हस्तक्षेप
+
7 संस्थागत तंत्र
= “समग्र एनीमिया मुक्त भारत अभियान”

इन्हीं परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में भारत ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान को फिर से शुरू करने का फैसला किया। 

जून 2026 में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद् की 16वीं बैठक के दौरान इस अभियान के लिए नए दिशा निर्देशों को जारी किया गया।

इन दिशा निर्देशों के तहत पहले के 6x 6x 6 रणनीति को बदल कर अब 7x 7x 7 प्रारूप को अपनाया गया है। इसमें मुख्य रूप से जो बाते है -

  1. इसमें जन्म के समय कम वजन वाले 0-6 महीने के शिशुओं को सातवें लाभार्थी समूहों के रूप में जोड़ा गया है।
  2. इसमें "सही खान पान" को सातवीं प्रमुख पहल के रूप में शामिल किया गया है।
  3. निगरानी और मूल्यांकन व्यवस्था को मजबूत करना इसका सातवां संस्थागत स्तंभ बन गया है।
  4. अब T3 की जगह पर T4 रणनीति को अपनाया गया है। T3 में "जांच, उपचार और परामर्श" शामिल था जबकि अब T4 रणनीति में जांच, उपचार और परामर्श के साथ "निगरानी" को भी शामिल किया गया है।
  5. अब एनीमिया से उपचार के लिए केवल नियमित रूप से आयरन देने की जगह - अब उपचार और मरीज की स्थिति के आधार पर प्रबंधन पर जोर दिया जाएगा।

नीतिगत अपग्रेड: एनीमिया मुक्त भारत (6×6×6 से 7×7×7 मॉडल)

1. 7 लक्षित वर्ग (Beneficiaries) आयाम 1
क्या शामिल है:
  • 6–59 माह के शिशु
  • 5–9 वर्ष के बच्चे
  • 10–19 वर्ष के किशोर/किशोरियां
  • 20–24 वर्ष की गैर-गर्भवती महिलाएं
  • गर्भवती महिलाएं
  • धात्री (स्तनपान कराने वाली) माताएं
+ प्रमुख विस्तार (7वां समूह): वरिष्ठ नागरिक (Elderly/Geriatric): वृद्धावस्था में पोषण की कमी और क्रॉनिक बीमारियों से होने वाले एनीमिया को प्राथमिक दायरे में लाया गया।
2. 7 रणनीतिक हस्तक्षेप (Interventions) आयाम 2
क्या शामिल है:
  • रोगनिरोधी IFA (आयरन-फोलिक एसिड) सप्लीमेंटेशन
  • नियमित कृमि मुक्ति (Deworming - एल्बेंडाजोल)
  • व्यवहार परिवर्तन संचार (SBCC) व पोषण शिक्षा
  • मलेरिया, फ्लोरोसिस जैसे गैर-पोषण कारणों का इलाज
  • डिजिटल पॉइंट-ऑफ-केयर हीमोग्लोबिन जांच
  • फोर्टिफाइड चावल व खाद्य पदार्थों का वितरण
+ प्रमुख विस्तार (7वां हस्तक्षेप): आनुवंशिक एनीमिया की स्क्रीनिंग: सिकल सेल एनीमिया और थैलेसीमिया जैसी हीमोग्लोबिनोपैथी की पहचान व विशेष प्रबंधन (सिकल सेल मिशन से जुड़ाव)।
3. 7 संस्थागत तंत्र (Institutional Mechanisms) आयाम 3
क्या शामिल है:
  • मंत्रालयों के बीच नीतिगत अभिसरण (Convergence)
  • राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय नोडल टास्क फोर्स
  • सुदृढ़ दवा आपूर्ति एवं लॉजिस्टिक्स श्रृंखला
  • डिजिटल रीयल-टाइम मॉनिटरिंग डैशबोर्ड
  • तकनीकी विशेषज्ञ समूह एवं ज्ञान साझा मंच
  • विशेष अनुसंधान एवं क्लीनिकल प्रोटोकॉल
+ प्रमुख विस्तार (7वां तंत्र): आयुष (AYUSH) का एकीकरण: पारंपरिक आहार, स्थानीय पौष्टिक जड़ी-बूटियों और समग्र जीवनशैली को आधिकारिक स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ना।
निश्चित ही यह कदम स्वागत योग्य है। लेकिन बड़ी चुनौती यह रही है कि उपलब्ध कराई गई चीजों को लोगो यह पहुंचाने के बावजूद उसका वास्तविक सेवन नहीं हो पाना है।

उदाहरण के लिए साप्ताहिक आयरन और फोलिक एसिड सप्लिमेंट कार्यक्रम दो दशकों से अधिक समय से चल रहा है। इसमें कई बार वितरण का स्तर 80% से अधिक रहा है लेकिन वास्तविक सेवन की दर 20% या उससे भी कम रही।


2. जीवन चक्र दृष्टिकोण (Life - Cycle Approach) क्या है? 


संतुलित पोषण थाली जिसमें बाजरे की रोटी, हरी पत्तेदार सब्जियां, दाल और मोटे अनाज शामिल हैं
श्री अन्न से बनी संतुलित पोषक तत्वों से भरपूर भोजन की थाली


जीवन चक्र दृष्टिकोण (Life - Cycle Approach) का अर्थ है कि पोषण संबंधी हस्तक्षेप किसी एक बिंदु तक सीमित न रहे, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन के हर संवेदनशील चरण में उपलब्ध हो।
जीवन चक्र पोषण प्रवाह
किशोरावस्था
➔
गर्भावस्था
➔
प्रथम 1000 दिन
➔
प्रारंभिक बाल्यावस्था
➔
स्कूली उम्र
↺ अंतर-पीढ़ीगत चक्र को तोड़ना (Break the Cycle)

 

1. किशोरावस्था (Adolescence - 10 से 19 वर्ष): 

यह ऐसी महत्वपूर्ण अवस्था है जब भविष्य के मातृत्व और प्रजनन स्वास्थ्य की नींव पड़ती है। इसका मजबूत होना सबसे पहले जरूरी है।

इसके लिए प्रमुख हस्तक्षेप में "एनीमिया मुक्त भारत" रणनीति के तहत साप्ताहिक आयरन और फोलिक एसिड सप्लिमेंट प्रदान किया जाता है।

साथ ही "राष्ट्रीय किशोरी स्वास्थ्य कार्यक्रम" (RKSK) के तहत पोषण और स्वच्छता परामर्श प्रदान किया जाता है।


2. गर्भावस्था और प्रसव (Pregnancy & Childbirth): 

मुख्य महत्व यह है कि गर्भस्थ शिशु का विकास पूरी तरह से मां के पोषण पर निर्भर करता है।

"प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना" (PMMYV) के तहत गर्भवती माताओं और धात्री माताओं के पोषण सहायता हेतु प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रदान किया जाता है।

साथ ही प्रसव पूर्व जांच एवं कैल्शियम तथा आयरन की खुराक मुहैया कराई जाती है।


3. प्रथम 1,000 दिन (The First 1,000 Day's): 

महत्व यह है कि गर्भधारण से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक का समय "सुनहरा अवसर" माना जाता है। मानव मस्तिष्क का 80% विकास इसी अवस्था में होता है।

इसके लिए मुख्य हस्तक्षेप में जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान की शुरुआत, अगले 6 माह तक केवल स्तनपान और उसके उपरांत पर्याप्त, सुरक्षित और विविध पूरक आहार प्रदान करना।


4. बाल्यावस्था और स्कूली उम्र (Childhoods & School Age): 

महत्व यह है कि इस समय शारीरिक वृद्धि और रोग प्रतिरोधक क्षमता का स्थिरीकरण को विकसित करना जरूरी होता है।

मुख्य हस्तक्षेप में आंगनबाड़ी केंद्रों द्वारा पूरक पोषण और "पीएम पोषण योजना" के तहत प्राथमिक तथा उच्च विद्यालयों में पौष्टिक मध्याह्न भोजन को प्रदान किया जाता है।


3. कुपोषण मुक्त भारत हेतु प्रमुख संस्थागत रणनीतियां  

जीवन चक्र दृष्टिकोण के आधार पर इन नई बदलावों को समाहित करते हुए भारत सरकार की संस्थाएं और प्रमुख एजेंसियां कुपोषण मुक्त भारत के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रही है।

नीति आयोग की रणनीतिक रूपरेखा और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MoWCD) के दिशा निर्देशों के तहत निम्नलिखित 5 प्रमुख संस्थागत तंत्र को स्थापित किया गया है -

1. मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 (POSHAN 2.0) 


सक्षम आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चे की वृद्धि निगरानी और ऊंचाई माप करती आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चे की लंबाई और वजन की माप करती आंगनवाड़ी कार्यकर्ता 


सरकार ने अलग अलग चल रही योजनाओं को एकीकृत करते हुए "पोषण 2.0" का गठन किया है। इनमें इन मुख्य बातों पर बल दिया जाता है -

1. अभिसरण (Convergence): स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास तथा पंचायती राज और जल शक्ति मंत्रालयों के बीच संस्थागत समन्वय पर जोर दिया गया है।

2. सक्षम आंगनवाड़ी: पारंपरिक आंगनवाड़ी केंद्रों को बेहतर बुनियादी ढांचे से लैस करना शामिल है।

2. फ्रंटलाइन वर्कर्स का त्रिकोण (The Triple - A Framework) 

जमीनी स्तर पर कार्य करने वाली तीन महिला कार्यकर्ताओं का समन्वय करना। इससे पोषण डिलिवरी बेहतर हो जाएगी क्योंकि यह तीनों इस स्तर की रीढ़ है। ये तीनों है -

1. ASHA (Accredited Social Health Activist): आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य ट्रैकिंग और रेफरल की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह समन्वय के साथ और बेहतर कर सकती है।

2. ANM (Auxiliary Nurse Midwife): एएनएम नर्स टीकाकरण और स्वास्थ्य जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है अतः समन्वित प्रयास से इनका भी बेहतर योगदान हो सकता है।

3. AWW (Anganwadi Workers): महिला आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पोषण आहार वितरण और वृद्धि निगरानी की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इन तीनों के समन्वित प्रयासों के माध्यम से हर महीनें ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस (VHND) का आयोजन किया जा रहा है। इससे समुदाय को एक ही स्थान पर जांच और परामर्श भी मिलता है।

साथ ही इन तीनों के साथ साथ "मिशन इंद्रधनुष" का भी समन्वय किया गया है।

इन समन्वित प्रयासों के कारण ही छः महीने से कम उम्र के बच्चों में केवल मां का दूध पिलाने की दर 95.6% तक पहुंच गई है जो एक सराहनीय कदम है।

इतना ही नहीं बल्कि बैनेपन की दर जो NHFS- 5 में 35.5% था वह NHFS-6 में घटकर 29.3% पर आ गया है। वही गंभीर दुबलेपन की दर भी 7.7% से घटकर 5.2% हो गई है।

3. तकनीक और डेटा आधारित निगरानी:"पोषण ट्रैकर" 

पारंपरिक कागजी रजिस्टरों के साथ साथ अब मुख्य रूप से डिजिटल तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग किया जा रहा है।इससे रियल टाइम ट्रैकिंग आसान हो जाती है और आगे की कार्ययोजना को प्रभावी बनाने में मदद मिलती है।

इसके लिए देश भर के आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को स्मार्टफोन दिए गए हैं।

"पोषण ट्रैकर ऐप" के माध्यम से लाभार्थियों के आधार प्रमाणीकरण, टेक होम राशन वितरण और वृद्धि निगरानी का रियल टाइम डेटा डैशबोर्ड पर उपलब्ध रहता है।

इसी तरह से "ग्रोथ मॉनिटरिंग डिवाइसेज" (GMD) के माध्यम से स्टंटिंग और वेस्टिंग की सटीक पहचान के लिए हर केंद्रों पर इन्फेटोमीटर, स्टेडियोमीटर और डिजिटल वजन तराजू को अनिवार्य कर दिया गया है।



4. खाद्य सुदृढ़ीकरण और "श्री अन्न" (Millets) का समावेशन 

खाद्य सुदृढ़ीकरण पर विशेष फोकस प्रदान किया गया है।इसके लिए PDS यानी राशन वितरण प्रणाली और "पीएम पोषण" में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 युक्त फोर्टिफाइड चावल के वितरण को प्राथमिकता प्रदान किया गया है।

अब पारंपरिक मोटे अनाजों जैसे रागी, बाजरा और ज्वार को आंगनवाड़ी और स्कूल के भोजन के मेन्यू में शामिल कर दिया गया है। यह सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं।

पोषण वाटिका के माध्यम से स्थानीय स्तर पर ताजी हरी सब्जियों और फलों की उपलब्धता के लिए आंगनवाड़ी परिसरों में किचन गार्डन को विकसित किया जा रहा है।


5. सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन (SBCC) और जन आंदोलन  

विश्लेषण करने के बाद यह देखा गया है कि कुपोषण केवल भोजन बांटने से ही खत्म नहीं होगा। इसके लिए जब तक समाज में खान पान और स्वच्छता में बदलाव एवं जागरूकता जरूरी है।

इसी को ध्यान में रखते हुए पोषण माह के रूप में सितंबर महीना और पोषण पखवाड़ा को मार्च में प्रतिवर्ष आयोजित करके राष्ट्रव्यापी जन जागरूकता अभियान को विकसित किया जा रहा है।

साथ ही लोगों की भागीदारी और जागरूकता के लिए समुदाय आधारित कार्यक्रम (CBE) को भी शुरू किया गया है। इनमें पारंपरिक रीति रिवाजों जैसे "अन्नप्राशन दिवस" के माध्यम से पूरक आहार की शुरुआत और "गोद भराई" के माध्यम से मातृ पोषण परामर्श को व्यवहार परिवर्तन के मंच के रूप में विकसित किया जा रहा है।


ग्रामीण विद्यालय परिसर में ताजी हरी सब्जियों और फलों से युक्त पोषण वाटिका
गांव के स्कूल में स्थित पोषण वाटिका न्यूट्री गार्डन


4. चुनौतियां एवं आगे की राह 

हालांकि इन प्रयासों के माध्यम से संस्थागत ढांचा सुदृढ़ हुआ है और इनके कई सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। फिर भी कई चुनौतियां एवं व्यवहारिक बाधाएं अभी भी विद्यमान है।

इन चुनौतियों और बाधाओं को इस रूप में देखा जा सकता है और इसके समाधान पर कार्य किया जा सकता है -

1. सिर्फ पोषण नहीं, थेरेपी भी जरूरी: 

अभी तक औपचारिक रूप से इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया है। क्योंकि शुरुआती जीवन में कुपोषण से बच निकलने वाले कई बच्चों में संज्ञानात्मक और विकास संबंधी कई समस्याएं बनी रह सकती है।

क्योंकि शुरुआती जीवन में बौनापन और दुबलेपन से उबरने वाले बच्चों में आगे चलकर इंसुलिन प्रतिरोध, मोटापे और हृदय तथा चयापचय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।


2. एक तरफ कुपोषण दूसरी तरफ मोटापा का दोहरा बोझ: 

एक तरफ जहां बच्चों की कुपोषण की स्थिति में सुधार हो रहा है वहीं दूसरी तरफ वयस्कों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है।

15 से 49 वर्ष की महिलाओं में मोटापा की दर 30.7 प्रतिशत हो गई है जो पहले 24 प्रतिशत ही थी वही पुरुषों में भी यह डर पांच वर्षों में ही 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत हो गई है।

यह भी देखने में आ रहा है कि एक ही परिवार और कई बार एक ही व्यक्ति अपने जीवन के अलग अलग चरणों में कुपोषण और मोटापा दोनों का सामना कर रहा होता है।


3. परिवारिक आदतों में बदलाव की चुनौतियां: 

इन सभी प्रयासों के बावजूद परिवार में कई ऐसी आदते और परंपराएं हो सकती है जो सभी मेहनत पर पानी फेर सकती है।

जैसे लोग एनिमिया और अन्य सप्लीमेंट को प्राप्त करने के बाद भी उसका सेवन नहीं कर पाते हैं। इसके लिए नियमित और कड़ी निगरानी के साथ साथ जन जागरूकता जरूरी हो जाता है।

साथ ही जन भागीदारी जो अधिक विकसित करना जरूरी हो जाता है। क्योंकि डिजिटल डैशबोर्ड उस परिवार की जगह नहीं ले सकता जो अपनी बेटी को आयरन से भरपूर भोजन देता है।

साथ ही पहले 1,000 दिनों में अपने बच्चे को उचित पोषण, विकास के लिए जरूरी गतिविधियां और उनका देखभाल जैसे कार्यों में भी जन भागीदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।

5. वर्ष 2055 के लाभांश की राह कुपोषण पर विजय से मिलेगी 


यह महत्वपूर्ण है कि भारत को अपनी युवा शक्ति की आबादी का लाभ इस सदी के मध्य यानी वर्ष 2055 तक ही उपलब्ध है। अतः यह अवसर पूरी तरह से हासिल कर लिया जाएगा कि वर्थ ही चला जाएगा यह कुपोषण मुक्त भारत पर ही निर्भर करता है।

देश की संस्थागत व्यवस्था कितनी प्रभावी ढंग से इन योजनाओं को मापने योग्य, वास्तविक रूप से अपनाए गए और लंबे समय तक कायम रहने वाले परिणामों में बदल पाती है।

कुपोषण पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली समस्या है। इसलिए तमाम प्रयासों के बावजूद जब तक योजनाओं और कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करके जीवन के हरेक चरणों में पोषण पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो लक्ष्य अधूरा ही रह जाएगा।

अतः आज के जो शिशु और बाल एवं किशोर कुपोषण मुक्त रहेंगे वही आने वाले वर्षों में भारत की प्रगतिशील युवा पीढी का निर्माण करेंगे और उसका लाभ देश को मिल पाएगा।


कुपोषण मुक्त भारत के तहत ग्रामीण परिवेश में स्वस्थ मां, सुपोषित बच्चा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
गांव के आंगनवाड़ी केंद्र


निष्कर्ष (Conclusion) 

"सुपोषण" केवल आहार नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव: 

भारत में कुपोषण निवारण अब केवल भोजन वितरण या कैलोरी गिनाने तक ही सीमित नहीं है।

"जीवन चक्र दृष्टिकोण" और "सक्षम आंगनवाड़ी व पोषण 2.0" जैसी पहलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब किशोरी, गर्भवती महिला और नवजात शिशु के संवेदनशील चरणों को लक्षित या सुरक्षित नहीं कर किया जाता है तब तक अंतर - पीढ़ीगत कुपोषण चक्र को नहीं तोड़ा जा सकता है।

इसी क्रम में एनीमिया मुक्त भारत का 6 x 6 x 6 से 7 x 7 x 7 मॉडल में विस्तार अब यह दर्शाता है कि नीतियां अधिक समावेशी हो रही है। इनमें अब अनुवांशिक कारणों की पहचान, वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और आयुष की पारंपरिक पोषक पद्धतियों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ा जा रहा है।

लेकिन यह सभी संस्थागत उपाय तब तक दीर्घकालीन एवं स्थाई प्रभाव नहीं दिखा पाएंगे जब तक जन भागीदारी और जन जागरूकता नहीं हो पाएगी।

अतः हम सभी को ऐसे विचार, लेख, प्रयास और अनुभव को सम्मान देना होगा तथा इसको प्राप्त करने के बाद आगे लोगो में फैलाने और जागरूक करने में खुद भी भागीदार बनना होगा।

आपकी क्या राय है?

क्या ग्रामीण स्तर पर आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 की यह रणनीतियां कुपोषण के अंतर-पीढ़ीगत चक्र को तोड़ने में पूरी तरह प्रभावी हो रही हैं? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।

स्वस्थ भारत • सुपोषित भारत


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)

1. कुपोषण का जीवन चक्र दृष्टिकोण (Life - Cycle Approach) क्या है?

जीवन चक्र दृष्टिकोण एक समग्र नीति है, जो यह मानती है कि कुपोषण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने वाली समस्या है। इसमें केवल बच्चे के जन्म के बाद नहीं, बल्कि किशोरावस्था, गर्भावस्था, धात्री अवस्था और शैशवावस्था के सभी संवेदनशील चरणों में लगातार स्वास्थ्य और पोषण संबंधी हस्तक्षेप किए जाते हैं।

2. बच्चे के विकास में "प्रथम 1,000 दिन" (First 1,000 Day's) इतने महत्वपूर्ण क्यों है?

गर्भधारण से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक का समय (लगभग 1000 दिन) शारीरिक और मानसिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवधि है। मानव मस्तिष्क का 80% विकास इसी दौरान होता है। इस अवधि में हुआ पोषण का नुकसान बाद में ठीक नहीं किया जा सकता।

3. सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 (Poshan 2.0) का मुख्य उद्देश्य क्या है?

पोषण 2.0 का उद्देश्य बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं में कुपोषण, स्टंटिंग और वेस्टिंग को समाप्त करना है। इसके तहत आंगनवाड़ियों को बेहतर बुनियादी ढांचे, आरओ पेयजल, पोषण वाटिका और तकनीक (पोषण ट्रैकर) से लैस आधुनिक केंद्रों में बदला जा रहा है।

4. एनीमिया मुक्त भारत की रणनीति में 6 x 6 x 6 से 7 x 7 x 7 में मुख्य बदलाव क्या हुआ है?

7 \times 7 \times 7 मॉडल में तीन प्रमुख विस्तार हुए हैं:

  1. 7वां लाभार्थी: वरिष्ठ नागरिकों (Elderly) को शामिल करना।
  2. 7वां हस्तक्षेप: सिकल सेल एनीमिया और थैलेसीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारियों की विशेष स्क्रीनिंग।
  3. 7वां तंत्र: आयुष (AYUSH) और पारंपरिक पोषण पद्धतियों का आधिकारिक स्वास्थ्य प्रणाली से एकीकरण।

5. NFHS -5 के अनुसार भारत में बाल कुपोषण की वर्तमान स्थिति क्या है?

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, 5 वर्ष से कम आयु के 35.5% बच्चे स्टंटिंग (उम्र के अनुपात में कम कद), 19.3% बच्चे वेस्टिंग (कद के अनुपात में कम वजन) और 32.1% बच्चे अंडरवेट हैं।

6. पोषण अभियान में "ट्रिपल A" फ्रेमवर्क क्या है?

यह ग्रामीण स्तर पर कार्यरत तीन महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का समन्वय है—

  • ASHA (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता), 
  • ANM (सहायक नर्स मिडवाइफ), और 
  • AWW (आंगनवाड़ी कार्यकर्ता)। 

ये मिलकर ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस (VHND) का संचालन करती हैं।

7. पोषण ट्रैकर ऐप से पोषण सेवाओं में क्या सुधार आया है?

पोषण ट्रैकर एक डिजिटल रीयल-टाइम प्लेटफॉर्म है। इसके माध्यम से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चों के वजन, लंबाई, टेक-होम राशन (THR) के वितरण और वृद्धि निगरानी का डेटा सीधे दर्ज करती हैं, जिससे पारदर्शी मॉनिटरिंग और कुपोषित बच्चों की समय पर पहचान संभव होती है।

8. कुपोषण को दूर करने में "श्री अन्न" और "फोर्टिफाइड चावल" की क्या भूमिका है?

मोटे अनाज (जैसे बाजरा, रागी, ज्वार) आयरन, कैल्शियम और फाइबर से भरपूर होते हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और पीएम पोषण (मिड-डे मील) में फोर्टिफाइड चावल (आयरन, विटामिन B12 व फोलिक एसिड युक्त) और मोटे अनाजों को शामिल करने से सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी (Hidden Hunger) को दूर करने में मदद मिलती है।

 

संबंधित विषय: 


प्रामाणिक स्रोत एवं संदर्भ (References & Sources)
  • महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MoWCD): पोषण 2.0 और सक्षम आंगनवाड़ी परिचालन दिशानिर्देश – wcd.nic.in
  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5): भारत में बाल एवं मातृ पोषण रिपोर्ट, IIPS मुंबई / MoHFW – rchiips.org/nfhs
  • नीति आयोग (NITI Aayog): राष्ट्रीय पोषण रणनीति (National Nutrition Strategy) एवं पोषण अभियान प्रगति रिपोर्ट – niti.gov.in
  • एनीमिया मुक्त भारत (AMB पोर्टल): स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) की आधिकारिक रणनीति रूपरेखा – anemiamuktbharat.info
  • पोषण ट्रैकर (Poshan Tracker): महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का राष्ट्रीय पोषण निगरानी पोर्टल – poshantracker.in
  • यूनिसेफ इंडिया (UNICEF India): 'The First 1,000 Days' बाल विकास एवं पोषण रिपोर्ट – unicef.org/india
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO): ग्लोबल न्यूट्रिशन टारगेट्स एवं बाल विकास मानक – who.int

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