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त्वरित सार (Key Takeaways)
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लाभांश का आधार: जनसांख्यिकीय लाभांश केवल कार्यशील आबादी बढ़ने से नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक व शारीरिक क्षमता से मिलता है।
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पहले 1,000 दिन: मानव मस्तिष्क का 90% विकास शुरुआती 5 वर्षों में होता है; बचपन का कुपोषण वयस्क उत्पादकता को 20% तक घटा देता है।
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हेकमैन समीकरण: 0–3 वर्ष के बाल पोषण व स्वास्थ्य में किए गए निवेश पर समाज को 13% प्रति वर्ष का सर्वाधिक आर्थिक रिटर्न (ROI) मिलता है।
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विकसित भारत @2047: भारत की वर्तमान युवा आबादी को वैश्विक नवाचार व आर्थिक महाशक्ति बनाने की शुरुआत पालने के पोषण से ही संभव है।
⏱ पढ़ने का समय: ~8-10 मिनट
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| एक स्वास्थ्य भारतीय मां अपने शिशु को गोद में लिए हुए |
प्रस्तावना (Introduction)
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक संपत्ति उसके भूभाग, प्राकृतिक संसाधनों या विदेशी मुद्रा भंडार से नहीं होती है बल्कि यह उसके नागरिकों के बौद्धिक और शारीरिक उत्पादकता में निहित होती है।
इसीलिए आज की वर्तमान विश्व व्यवस्था में "जनसांख्यिकीय लाभांश" (Demographic Dividend) और "मानव पूंजी निर्माण" (Human Capital Formation) पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।
अब जब भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश की चर्चा होती है तो केवल इसको युवा और कार्यशील आयु वर्ग की आबादी के आकार के संदर्भ में ही समझा जाता है।
यह संदर्भ और दृष्टिकोण अधूरा और आर्थिक रूप से जोखिम भरा है।
क्योंकि एक बड़ी युवा आबादी आर्थिक लाभ तभी बनती है जब बच्चे स्वस्थ, अच्छी तरह से पोषित, आत्मविश्वासी और सीखने के लिए तैयार होकर बड़े होते हो। इसकी नींव बच्चों के स्कूल जाने से बहुत पहले ही रख दी जाती है।
यह किसी भी शिशु के जन्म के 1,000 दिनों में ही तय हो जाती है। इसीलिए प्रारंभिक बाल विकास और जनसांख्यिकीय लाभांश किसी भी विकासशील देश को विकसित राष्ट्र बनाने का मूल आधार होता है।
इस लेख में इसी मूल आधार की चर्चा विशेषज्ञों के विश्लेषण के आधार पर की गई है। इसमें यह समझने में मदद मिलती है कि कैसे भारत "विकसित भारत @2047" के लक्ष्यों को प सकेगा।
1. जनसांख्यिकीय लाभांश क्या है?
जनसांख्यिकीय संक्रमण के सिद्धांत (Demographic Transition Theory):
जनसांख्यिकीय लाभांश को समझने के लिए पहले हमे जनसांख्यिकीय संक्रमण के चरणों को समझना जरूरी होता है।
जब भी कोई पारंपरिक समाज आधुनिकता की ओर बढ़ता है तो सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के कारण मृत्युदर और खासकर शिशु मृत्युदर में तेजी से गिरावट आती है।
इसके कुछ समय बाद महिला साक्षरता और शहरीकरण के चलते प्रजनन दर में भी गिरावट दर्ज की जाती है।
इस प्रक्रिया के ठीक बीच में एक विशेष प्रकार की जनसांख्यिकीय खिड़की खुलती है। इस दौरान -
- बच्चों का अनुपात कम होने लगता है।
- बुजुर्गों की संख्या तुरंत बहुत अधिक नहीं बढ़ती है।
- 15 से 64 वर्ष के कामकाजी आयु वर्ग का अनुपात जनसंख्या में ऐतिहासिक रूप से सर्वोच्च होता है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुसार -
"जनसांख्यिकीय लाभांश वह आर्थिक विकास क्षमता है जो जनसंख्या की आयु संरचना में बदलाव से उत्पन्न होती है। मुख्य रूप से तब जब कामकाजी उम्र की आबादी का हिस्सा गैर - कामकाजी उम्र की आबादी से बड़ा हो जाता है"
आर्थिक विकास के चार चैनल क्या है ?
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| भारत की युवाशक्ति को दर्शाता दृश्य |
अर्थशास्त्री डेविड ब्लूम और डेविड कैनिंग ने अपने शोध पत्रों "हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ" में स्पष्ट किया है कि जनसांख्यिकीय लाभांश किसी भी अर्थव्यवस्था में चार विशिष्ट चैनलों के माध्यम से प्रवाहित होता है -
1. श्रम आपूर्ति (Labor Supply): कार्यबल में युवाओं की आबादी बढ़ती है। इससे उत्पादन क्षमता का विकास होता है।
2. घरेलू बचत (Domestic Savings): आश्रितता अनुपात कम हो जाने के कारण परिवारों में प्रति व्यक्ति खर्च का बोझ कम हो जाता है। इससे बैंकों में घरेलू बचत बढ़ती है।
3. मानव पूंजी में निवेश (Human Capital Investment): कम संतानों के कारण माता पिता अपने प्रत्येक बच्चे के पोषण और शिक्षा पर अधिक संसाधन खर्च करने में सक्षम होते हैं।
4. घरेलू मांग और क्रयशक्ति: कमाने वाले हाथों की संख्या बढ़ने से उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की मांग में निरंतर वृद्धि होने लगती है।
2. शिशु विकास: एक अदृश्य जनसांख्यिकीय लाभांश
जीवन के पहले 1,000 दिन (The Critical 1, 000 Day's):
गर्भधारण से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक की अवधि को "पहले 1,000 दिन" कहा जाता है।
न्यूरोसाइंस और बालरोग विशेषज्ञ के वैश्विक शोध यह स्पष्ट करते हैं कि यह समय मानव जीवन के कालखंड का सबसे संवेदनशील समय होता है।
यूनिसेफ (UNICEF) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार मानव मस्तिष्क का लगभग 80% विकास 3 वर्ष की आयु तक और 90% विकास 5 वर्ष की आयु तक पूर्ण हो जाता है।
प्रारंभिक वर्षों में मस्तिष्क में प्रति सेकेंड 10 लाख से अधिक नए न्यूरल कनेक्शन बनते हैं। यह गति जीवन में फिर कभी दोहराई नहीं जा सकती है।
भाषा, तार्किक क्षमता, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक व्यवहार की नींव भी इसी दौर में पड़ती है।
गर्भधारण से 2 वर्ष (1,000 दिन)
+ सही पोषण व सुरक्षित वातावरण
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तीव्र न्यूरोलॉजिकल और शारीरिक विकास
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उच्च संज्ञानात्मक क्षमता (Cognitive Reserve)
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वयस्क होने पर उच्च उत्पादकता व समस्या-समाधान कौशल
कुपोषण कैसे करता है राष्ट्रीय उत्पादकता का क्षरण:
जब कोई शिशु इस नाजुक दौर में दीर्घकालिक कुपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी या बार बार होने वाले संक्रमणों का शिकार होता है तो वह स्टंटिंग (उम्र के अनुसार कम लंबाई) और वेस्टिंग (उम्र के अनुसार कम वजन) से ग्रस्त हो जाता है।
चिकित्सा पत्रिका "द लैंसेट" (The Lancet Child and Adolescents Health) की व्यापक शोध श्रृंखलाओं के अनुसार -
स्टंटिंग का प्रभाव केवल शारीरिक कद तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि यह मस्तिष्क के संरचनात्मक विकास और हिपोकैंपस को स्थाई रूप से बाधित करता है।
बचपन से नाटेपन का शिकार होने वाले बच्चे स्कूल में औसतन 1 से 2 वर्ष कम शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं।
वयस्क होने पर उनकी शारीरिक कार्यक्षमता, सहनशक्ति और जटिल मानसिक कार्यों को करने की क्षमता में 15% से 22% की स्थाई गिरावट देखने को मिलती है।
3. हैकमैन समीकरण के साथ आर्थिक प्रमाण
पहले के अर्थशास्त्र में प्रारंभिक बाल विकास को सामाजिक कल्याण का विषय माना जाता रहा है लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्र में इसको विशुद्ध रूप से "उच्च प्रतिफल पूंजीगत निवेश" के रूप में सिद्ध किया जाता है।
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर हैकमेन का समीकरण:
शिकागो विश्वविद्यालय के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर जेम्स. जे. हैकमेन ने प्रारंभिक बाल विकास कार्यक्रमों के दीर्घकालीन आर्थिक प्रभावों पर एक ऐतिहासिक शोध प्रस्तुत किया है।
हैकमेन के विश्लेषण के अनुसार -
- समाज शिक्षा और कौशल पर जितना बाद में खर्च करता है उसका आर्थिक प्रतिफल उतना ही कम होता जाता है ।
- कॉलेज या व्यवसायिक प्रशिक्षण में निवेश का रिटर्न न्यूनतम होता है।
- जबकि 0 से 5 वर्ष की आयु में बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और प्रारंभिक शिक्षा में किए गए निवेश पर समाज को 7% से 13% तक प्रति वर्ष का वार्षिक प्रतिफल (ROI) प्राप्त होता है।
- हैकमेन समीकरण यह स्पष्ट करता है कि प्रारंभिक निवेश अपराध दर को घटाता है, स्वास्थ्य खर्च को कम करता है और आजीवन कर राजस्व में वृद्धि करता है।
मानव पूंजी निवेश पर वार्षिक प्रतिफल (ROI)
आयु वर्ग के अनुसार आर्थिक लाभ (हेकमैन वक्र)
0–3 वर्ष (जन्मपूर्व व प्रारंभिक पोषण)
13% ROI
3–5 वर्ष (प्री-स्कूल व बाल विकास)
10% ROI
6–18 वर्ष (प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा)
7% ROI
18+ वर्ष (कॉलेज व वयस्क कौशल प्रशिक्षण)
2–4% ROI
💡 मुख्य निष्कर्ष: उम्र बढ़ने के साथ निवेश पर मिलने वाला आर्थिक रिटर्न तेजी से घटता है।
विश्व बैंक का मानव पूंजी सूचकांक (Human Capital Index - HCI):
विश्व बैंक का ह्यूमैन कैपिटल इंडेक्स (HCI) यह माप करता है कि आज पैदा होने वाला बच्चा 18 वर्ष की आयु तक अपनी पूरी उत्पादन क्षमता का कितना प्रतिशत हासिल कर पाएगा।
विश्व बैंक की रिपोर्ट दर्शाती है कि -
जो देश अपने बच्चों के जीवित रहने, स्टंटिंग निवारण और गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं वे अपने भविष्य के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का एक तिहाई से लेकर आधा हिस्सा तक स्थाई रूप से खो देते हैं।
यदि किसी देश का HCI स्कोर 0.50 है तो इसका सीधा अर्थ यह है कि भविष्य में उस देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी उसकी वास्तविक क्षमता से 50% कम ही रह जाएगी।
4. शिशु विकास से विकसित राष्ट्र निर्माण के 4 चरणों का मार्ग
रोडमैप इन्फोग्राफिक
शिशु की सेहत से समृद्ध राष्ट्र का चक्र
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चरण 1: सुदृढ़ नींव (0–5 वर्ष)
13% ROI
शुरुआती 1000 दिनों में संतुलित पोषण, स्तनपान और टीकाकरण से 90% मस्तिष्क विकास सुरक्षित होता है।
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चरण 2: जनसांख्यिकीय लाभांश (15–64 वर्ष)
कार्यबल
कुपोषण-मुक्त पीढ़ी उच्च संज्ञानात्मक क्षमता के साथ आधुनिक उद्योगों, तकनीक और नवाचार में अधिक उत्पादक बनती है।
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चरण 3: विकसित राष्ट्र @2047
आर्थिक उछाल
उच्च प्रति-व्यक्ति आय, कम स्वास्थ्य खर्च और घरेलू बचत से भारत ज्ञान-आधारित वैश्विक महाशक्ति बनता है।
🎯 एक पंक्ति में सार: आज के शिशु पोषण में किया गया निवेश ही कल की राष्ट्रीय जीडीपी तय करता है।
शिशु विकास और जनसांख्यिकीय लाभांश का समन्वय आखिर किस प्रकार से किसी निम्न या मध्यम आय वाले देश को भी समृद्ध राष्ट्र की श्रेणी में पहुंचा देता है।
इस बात को इन चार प्रमुख आर्थिक स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है -
स्तंभ - 1: ज्ञान अर्थव्यवस्था और नवाचार (Knowledge Economy & Innovation):
वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था शारीरिक श्रम से हटकर बौद्धिक नवाचार और डिजिटल नवाचार की ओर स्थानांतरित हो चुकी है।कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, उन्नत विनिर्माण और जैव प्रौद्योगिकी का दौर चल रहा है।
ऐसे में अर्थव्यवस्था को इस प्रकार की कार्यबल की आवश्यकता हो रही है जो अमूर्त चिंतन और जटिल समस्याओं का समाधान कर सकें।
अतः प्रारंभिक स्वास्थ्य विकास बच्चों में न्यूरोप्लास्टिसिटी अधिक होती है। यह पीढ़ी बड़ी होकर केवल उपभोग करने वाली आबादी नहीं बढ़ती है बल्कि यह पेटेंट, नई प्रद्योगिकी, वैज्ञानिक शोध और नए उद्यमों का सृजन करती है।
स्तंभ -2: वयस्क उत्पादकता और मजदूरी में वृद्धि:
जब कार्यबल शारीरिक रूप से मजबूत और मानसिक रूप से सजग होता है तब प्रति घंटा श्रम उत्पादकता में वृद्धि होती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार उच्च उत्पादकता सीधे तौर पर वास्तविक मजदूरी को बढ़ाती है।
इससे नागरिकों की क्रयशक्ति बढ़ती है और राष्ट्रीय बाजार का विस्तार होता है।
स्तंभ - 3: राजकोषीय बचत का अधिशेष में जाना:
बचपन के असंतुलित पोषण से वयस्कों में बीमारियों को बढ़ाता है और इससे अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ता है।
जबकि जब शिशु स्वास्थ्य मजबूत होता है तब राज्य और परिवारों का उपचारात्मक स्वास्थ्य पर खर्च बहुत कम हो जाता है। सरकार इस बच्चे हुए राजस्व को अनुत्पादक सब्सिडी आदि से हटाकर अवसंरचना विकास और उत्पादक कार्यों में लगती है।
स्तंभ - 4: महिला श्रमबल भागीदारी में वृद्धि:
प्रारंभिक बाल विकास अच्छा होने से लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण को मजबूत होता है।
इससे महिलाओं पर अवैतनिक बाल देखभाल का बोझ कम होता है और शिक्षित एवं कुशल महिलाएं अर्थव्यवस्था में काम करने के लिए स्वतंत्र होती है।
मैकेंजी ग्लोबल इंस्टिट्यूट के अध्ययनों के अनुसार महिला श्रमबल भागीदारी को पुरुषों के बराबर लाने से किसी भी उभरती हुई अर्थव्यवस्था की जीडीपी में 15% से 25% तक की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है।
5. भारत में शिशु विकास की जमीनी स्थिति क्या है?
भारत इस समय अपने इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है। देश की औसत आयु लगभग 28-29 वर्ष है। यह स्थिति 2040 के दशक के उत्तरार्ध तक बनी रहने वाली है।
भारत को 2047 तक एक समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनने के लिए इस जनसांख्यिकीय क्षमता को भरपूर उपयोग करना होगा।
स्वास्थ्य व पोषण संकेतकों में सुधार (NFHS-5 vs NFHS-6)
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2023–24) के प्रमुख आंकड़े
संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery)
▲ +2.0%
NFHS-5: 88.6%
➔
NFHS-6: 90.6%
पूर्ण टीकाकरण (12–23 महीने के बच्चे)
▲ +3.3%
NFHS-5: 83.8%
➔
NFHS-6: 87.1%
जन्म के 1 घंटे के भीतर स्तनपान
▲ +8.3%
NFHS-5: 41.8%
➔
NFHS-6: 50.1%
बच्चों में नाटापन/स्टंटिंग (5 वर्ष से कम)
▼ -6.2% सुधार
NFHS-5: 35.5%
➔
NFHS-6: 29.3%
✅ सकारात्मक संकेत: शिशु स्वास्थ्य व पोषण सुरक्षा में उल्लेखनीय राष्ट्रीय प्रगति।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -6 (NFHS -6) जो वर्ष 2023-24 को कवर करता है, यह दर्शाता है कि संस्थागत प्रसव NFHS -5 के 88.6 प्रतिशत से बढ़कर 90.6 प्रतिशत हो गया है।
इसी तरह से 12 से 23 महीने के उम्र के बच्चों का पूर्ण टीकाकरण 83.8 प्रतिशत से बढ़कर 87.1 प्रतिशत हो गया है। जबकि जन्म के 1 घंटे के भीतर स्तनपान करने वाले बच्चों का अनुपात 41.8% से बढ़कर 50.1% हो गया है।
साथ ही 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटापन 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत हो गया है।
लेकिन एनीमिया के अद्यतन अकड़े अभी उपलब्ध नहीं है। फिर भी NHF -5 (2021) के अनुसार यह 6 से 59 महीनों के 67.1 प्रतिशत बच्चों में और 49 वर्ष तक की 57 प्रतिशत महिलाओं में अभी भी होना चिंताजनक है।
जब हम शिशु और बाल शिक्षा की ओर विश्लेषण करते हैं तो यह भी कुछ संतोषजनक दिखाई देता है।
UDISE+ के 2024-25 के आंकड़े स्कूली शिक्षा में 24.69 करोड़ छात्रों के नामांकित होने की पुष्टि करते हैं।
लेकिन "राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण" 2021 ने गणित के औसत अंकों को कक्षा तीन में 57 प्रतिशत, कक्षा पांच में 44 प्रतिशत, कक्षा आठ में 36 प्रतिशत और कक्षा दस में 32 प्रतिशत को दर्ज किया था।
इससे जाहिर होता है कि सीखने के स्तर पर लगातार कुछ कमियां उपलब्ध है जिनपर ध्यान देना होगा।
परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण - 2024 ने सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कक्षा - तीन, छः और नौ के 21 लाख से अधिक छात्रों का आकलन किया।
इसके "असर - 2024 रिपोर्ट" के अनुसार ग्रामीण भारत में कक्षा तीन तक कक्षा दो के स्तर के बच्चों का पाठ पढ़ने में सक्षम बच्चों का अनुपात वर्ष 2022 के 16.3 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 23.4 प्रतिशत हो गया।
यह सुधार उत्साहजनक है, लेकिन शेष बची हुई कमी यह स्पष्ट करती है कि बुनियादी शिक्षा पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है।
6. "पहल और प्रत्युत्तर" नीतिगत हस्तक्षेप से होता सुधार
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| आंगनबाड़ी केंद्र में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के साथ बच्चे खेल खेल में सीखते हुए |
भारत सरकार ने मानव पूंजी की नींव को मजबूत करने के लिए कई व्यापक कार्यक्रम शुरू किए हैं। राष्ट्रीय नीति ढांचा इस निरंतरता के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया दे रहा है।
सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 (POSHAN 2.0) - मातृ पोषण, शिशु आहार प्रथाओं और बच्चों में वेस्टिंग स्टंटिंग की निगरानी के लिए एक एकीकृत पोषण सहायता कार्यक्रम शुरू किया गया है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने जन्म से 3 वर्ष तक के बच्चों के लिए -"नवचेतना" कार्यक्रम को विकसित किया है जो प्रारंभिक बाल्यावस्था प्रोत्साहन हेतु एक राष्ट्रीय ढांचा के रूप में काम कर रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 - में पहली बार 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए "प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा" (ECCE) को औपचारिक शैक्षणिक ढांचे का अभिन्न अंग बनाया गया है।
इसी तरह से तीन वर्ष से छः वर्ष तक के बच्चों के लिए "आधारशिला" कार्यक्रम को विकसित किया गया है। यह प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा हेतु राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का पूर्ण ढांचा है।
शून्य से तीन वर्ष का आयु वर्ग विशेष ध्यान देने योग्य है। यही पर परिवार प्रारंभिक बचपन के विकास (ECD) में एक महत्वपूर्ण भागीदार बन जाता है।
इस कड़ी में महाराष्ट्र का "आरंभ" और ओडिशा का "आमा कुनि पिला" जैसे अनुभव दर्शाते हैं कि कैसे घर पर आधारित जुड़ाव को आंगनवाड़ी प्रणाली के साथ जोड़ा जा सकता है।
ऐसे दृष्टिकोण का लगातार मूल्यांकन किया जाना चाहिए ताकि प्रभावी तौर तरीकों को अपनाया जा सके और उन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।
कामकाजी माताओं को राहत से भी होगा सुधार:
शिशु और माता के बीच में प्रत्यक्ष संबंध होता है और माता के स्वास्थ्य का सीधा प्रभाव शिशु के विकास के साथ जुड़ा हुआ है।इसीलिए मातृत्व सुविधाओं का दायरा बढ़ाने पर जोर है।
मिशन वात्सल्य और मिशन शक्ति के माध्यम से संकटग्रस्त बच्चों के संरक्षण और माताओं के कल्याण के लिए सुरक्षा तंत्र प्रदान किया जाता है।
क्रेच सेवाएं - जो माता पिता और परिवार के अन्य सदस्य कामकाजी है उनके बच्चों को देखभाल करने के लिए बच्चों को सुरक्षित रखने का स्थान है।
यह छोटे बच्चों के लिए पोषण, देखभाल, खेलकूद, प्रोत्साहन और एक सुरक्षित वातावरण प्रदान कर सकता है। हरियाणा की "राज्य क्रेच नीति - 2022" और कर्नाटक का "कूसीना माने" मॉडल ऐसी सेवाओं के विस्तार के विभिन्न दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
उनका अनुभव, उपलब्धता, गुणवत्ता और मानकों में सुधार के लिए आगे के प्रयासों को दिशा दे सकता है।
7. रोडमैप के रूप में समृद्ध राष्ट्र निर्माण के लिए क्या आवश्यक है?
जनसांख्यिकीय लाभांश को एक स्थाई आर्थिक चमत्कार में बदलने के लिए सरकारों, नीति निर्माताओं और नागरिक समाज को इन मुख्य पांच रणनीतियों पर तत्परता से काम करना होगा -
1. जीडीपी (GDP) का आवंटन बढ़ाना:
प्रारंभिक स्वास्थ्य और पोषण पर सार्वजनिक व्यय को जीडीपी के 2.5 से 3 प्रतिशत तक ले जाना होगा। साथ ही इसका एक बड़ा हिस्सा 0 से 5 वर्ष के बाल स्वास्थ्य के लिए आरक्षित करना होगा।
2. आंगनवाड़ी केंद्रों का आधुनिकीकरण:
ग्रामीण और कमजोर आर्थिक वर्ग के 0-5 वर्ष के बच्चों के विकास का मुख्य केंद्र आंगनवाड़ी ही है। अतः आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को केवल खाद्यान्न वितरण के रूप में नहीं बल्कि "प्रमाणित प्रारंभिक बाल विकास प्रशिक्षकों" के रूप में प्रशिक्षित और पुरस्कृत किया जाए।
3. सार्वजनिक निजी भागीदारी से पालनाघर:
कामकाजी महिलाओं के लिए उनके कार्यस्थल और आवासीय क्षेत्रों के निकट सुरक्षित एवं सब्सिडी युक्त बाल देखभाल केंद्र को स्थापित करना होगा।
4. जल, स्वच्छता और सफाई पर सतत बल:
शुद्ध पेयजल और स्वच्छ वातावरण के बिना पोषण अवशोषित नहीं होता है। पर्यावरणीय एंट्रोपैथी को रोकने के लिए स्वच्छता तंत्र को प्राथमिक स्वास्थ्य से जोड़ना होगा।
5. डेटा आधारित निगरानी:
प्रत्येक बच्चों के विकास जैसे - लंबाई, वजन और बौद्धिकता आदि को रियल टाइम ट्रैकिंग किया जाना चाहिए। इससे किसी भी कमी का पहचान पहले 1,000 दिनों में ही किया जा सकता है। इससे समय पर सुधार करने का अवसर मिल जाता है।
इन उपायों और रणनीतियों के साथ समय समय पर सर्वेक्षण, निरीक्षण और विशेषज्ञों द्वारा बताई गई नीतियों को प्रभावी रूप से लागू की जानी चाहिए।
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| विकसित भारत मिशन में योगदान देती भारत की युवा शक्ति - वैज्ञानिक और इंजीनियर |
निष्कर्ष (Conclusion)
जनसांख्यिकीय लाभांश प्रकृति द्वारा किसी राष्ट्र को दिया जाने वाला एक सीमित समय का ही उपहार होता है।
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश अंततः केवल इस बात पर ही निर्भर नहीं करेगा कि देश में कितने युवा हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगा कि वे क्या क्षमताएं हासिल करते हैं।
और उनकी यह क्षमता तब मजबूत होगी जब हम अपने बच्चों के शुरुआती 1,000 दिनों में सही तरह से निवेश करने में सफल रहते हैं।
यदि देश अपने नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य, पोषण और प्राथमिक मानसिक विकास को सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाता है तो वही कार्यबल विश्वस्तरीय नवाचार, आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता का वाहक बनता है।
शिशु का स्वास्थ्य ही राष्ट्र का भविष्य है -- और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोहों से नहीं बल्कि बच्चे के पालने से शुरू होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)
1. जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का क्या अर्थ है?
जब किसी देश की कुल आबादी में कामकाजी आयु वर्ग (15 से 64 वर्ष) का अनुपात आश्रित आबादी (0–14 वर्ष के बच्चे और 65 वर्ष से अधिक के बुजुर्ग) से अधिक हो जाता है, तो उस स्थिति को जनसांख्यिकीय लाभांश कहते हैं। यह स्थिति आर्थिक उत्पादन, बचत और राष्ट्रीय आय को तेजी से बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है।
2. शिशु विकास को जनसांख्यिकीय लाभांश का नींव क्यों माना जाता है?
क्योंकि मानव मस्तिष्क का लगभग 90% विकास जीवन के पहले 5 वर्षों (विशेषकर पहले 1,000 दिनों) में पूरा हो जाता है। यदि शुरुआती वर्षों में पोषण और स्वास्थ्य सही न हो, तो बच्चे की बौद्धिक और शारीरिक क्षमता स्थायी रूप से घट जाती है। आज का स्वस्थ शिशु ही भविष्य का कुशल, उत्पादक और सक्षम कार्यबल बनता है।
3. प्रारंभिक बाल विकास में "पहले 1,000 दिन" इतने महत्वपूर्ण क्यों है?
गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक की अवधि को "पहले 1,000 दिन" कहा जाता है।
न्यूरोसाइंस और बालरोग विशेषज्ञ के वैश्विक शोध यह स्पष्ट करते हैं कि यह समय मानव जीवन के कालखंड का सबसे संवेदनशील समय होता है।
यूनिसेफ (UNICEF) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार मानव मस्तिष्क का लगभग 80% विकास 3 वर्ष की आयु तक और 90% विकास 5 वर्ष की आयु तक पूर्ण हो जाता है।
प्रारंभिक वर्षों में मस्तिष्क में प्रति सेकेंड 10 लाख से अधिक नए न्यूरल कनेक्शन बनते हैं। यह गति जीवन में फिर कभी दोहराई नहीं जा सकती है।
भाषा, तार्किक क्षमता, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक व्यवहार की नींव भी इसी दौर में पड़ती है।
4. हैकमैन समीकरण क्या है और यह क्या सिद्ध करता है?
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जेम्स हेकमैन के अनुसार, प्रारंभिक बाल विकास (0 से 5 वर्ष) में निवेश किया गया प्रत्येक रुपया या डॉलर अर्थव्यवस्था को 7% से 13% प्रति वर्ष का आर्थिक प्रतिफल (ROI) देता है। यह वयस्क अवस्था के कौशल प्रशिक्षण या कॉलेज शिक्षा में किए गए निवेश की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक होता है।
5. स्टंटिंग (नाटापन) किसी देश की अर्थव्यवस्था को कैसे नुकसान पहुंचाती है?
स्टंटिंग केवल शारीरिक लंबाई कम होने का नाम नहीं है, यह मस्तिष्क के विकास को भी सीमित कर देती है। द लैंसेट के अनुसार, स्टंटिंग से पीड़ित बच्चे बड़े होकर मानसिक व शारीरिक कार्यों में 15% से 22% तक कम उत्पादक होते हैं, जिससे प्रति-व्यक्ति आय और देश की कुल जीडीपी वृद्धि पर सीधा नकारात्मक असर पड़ता है।
6. भारत के पास जनसांख्यिकीय लाभांश की खिड़की कब तक उपलब्ध है?
भारत की औसत आयु लगभग 28-29 वर्ष है, जिससे भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। जनसांख्यिकी विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के पास यह जनसांख्यिकीय अवसर (Demographic Window) 2040 के दशक के उत्तरार्ध तक खुला रहेगा। 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस अवधि का सदुपयोग करना अनिवार्य है।
7. शिशु विकास और पोषण को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की प्रमुख योजनाएं कौन सी है?
केंद्र सरकार द्वारा सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 (POSHAN 2.0), मिशन वात्सल्य, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत 'प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा' (ECCE) जैसे प्रमुख कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जो मातृ व शिशु स्वास्थ्य और पोषण पर केंद्रित हैं।
8. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -6 (NFHS -6) की मुख्य रिपोर्ट क्या है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -6 (NFHS -6) जो वर्ष 2023-24 को कवर करता है, यह दर्शाता है कि संस्थागत प्रसव NFHS -5 के 88.6 प्रतिशत से बढ़कर 90.6 प्रतिशत हो गया है।
इसी तरह से 12 से 23 महीने के उम्र के बच्चों का पूर्ण टीकाकरण 83.8 प्रतिशत से बढ़कर 87.1 प्रतिशत हो गया है। जबकि जन्म के 1 घंटे के भीतर स्तनपान करने वाले बच्चों का अनुपात 41.8% से बढ़कर 50.1% हो गया है।
साथ ही 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटापन 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत हो गया है।
संबंधित विषय:
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प्रमुख स्रोत एवं संदर्भ (Sources & References)
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NFHS / स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण आंकड़े —
rchiips.org/nfhs ↗
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* आंकड़े व तथ्य संबंधित वैश्विक व राष्ट्रीय संस्थानों के आधिकारिक प्रकाशनों पर आधारित हैं।
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