भारतीय संस्कृति में दामाद:सम्मान,परंपरा और बदलते समय की नई सोच - दामाद से बेटा बनने का सफर

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ब्लॉग का त्वरित संक्षेप (Quick Summary)

भारतीय सनातन परंपरा में दामाद को केवल एक सामाजिक रिश्ता नहीं, बल्कि 'जमाता विष्णु रूपेण' कहकर साक्षात भगवान विष्णु का आदरणीय दर्जा दिया गया है।

  • सांस्कृतिक विविधता: बंगाल के 'जमाई षष्ठी' से लेकर राजस्थान के 'पावणा' तक, पूरे देश में दामाद सत्कार के कई अनोखे रंग हैं।
  • शास्त्रीय महत्व: मनुस्मृति और पुराणों के अनुसार पितृ कार्यों और मांगलिक यज्ञों में दामाद की उपस्थिति अनिवार्य और कल्याणकारी मानी गई है।
  • बदलता दौर: आज का दामाद केवल औपचारिकता या 'दसवें ग्रह' का रौब रखने वाला अतिथि नहीं, बल्कि ससुराल के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाने वाला सगा बेटा बन चुका है।

 

भारतीय संस्कृति में दामाद का सम्मान,सास द्वार दामाद का तिलक लगाकर स्वागत
भारतीय परिवारों में दामाद को सम्मान और अपनापन देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है 


📌भारतीय संस्कृति में दामाद का महत्व:


प्रस्तावना (Introduction)

हमारे देश की रग रग में 'अतिथि देवो भव' की पहचान समाई हुई है,और हमारे यहां रिश्तों का सम्मान करना केवल एक औपचारिकता नहीं,बल्कि हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण एवं अभिन्न हिस्सा होता है। साथ ही यह केवल त्योहारों,भाषाओं और परंपराओं के लिए ही नहीं,बल्कि 'रिश्ते को सम्मान देने वाली संस्कृति' के तौर पर जाना जाता रहा है। 

इसी भारतीय परिवार व्यवस्था,परंपरा और संस्कृति में --'दामाद' (Son in Law) का स्थान सदियों से विशेष स्थान को सुशोभित कर रहा है। उसे केवल 'बेटी का पति' ही नहीं,बल्कि दो-दो परिवारों को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। 

यही कारण है कि कई क्षेत्रों में दामाद को प्रेम-पूर्वक --'जमाई-राजा' कहा जाता है और उसके स्वागत सत्कार की अनूठी परम्पराएं आज भी जीवित है और सांस्कृतिक विरासत की सुंदर झलक प्रस्तुत करते है। भले ही समय बदलने के इस दौर में रिश्तों की नई परिभाषाएं और सामाजिक सोच भी बदली है,लेकिन सम्मान,अपनापन और पारिवारिक सद्भावना आज भी भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा बनी हुई है। 

भारतीय संस्कृति में दामाद को इतना विशेष सम्मान क्यों दिया जाता है। इसके पीछे एतिहासिक,सामाजिक और सांस्कृतिक कारण क्या है ? और आधुनिक समय में इस रिश्ते का स्वरूप कैसे बदल रहा है। इसकी पूरी पड़ताल इस लेख में करेंगे। 

दामाद शब्द का अर्थ और महत्व

'दामाद' शब्द केवल एक पारिवारिक रिश्ते का नाम नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति में आदर,जिम्मेदारी और दो कुलों के मिलन का प्रतीक है। दामाद के अर्थ को हम इस प्रकार से समझ सकते है --

 दामाद शब्द का भाषाई और सामाजिक अर्थ:

  • उत्पति और संस्कृत मूल: 'दामाद' शब्द मूलतः संस्कृत के 'जामाता (जमाता) से विकसित हुआ है। 
  • गहरा अर्थ: संस्कृत-व्याकरण के निरुक्त के अनुसार--'जमाता' शब्द दो विचारों से मिलकर बना हुआ माना जाता है--जां (जाया/पत्नी) और माति (मान्य करोति) --इति 'जमाता'। यानि कि वह व्यक्ति जो किसी की पुत्री (अपनी पत्नी) को पूरा सम्मान देता है,उसके जीवन को संवारता है और उसे अपनी घर की लक्ष्मी बनाता है --वह 'जमाता' या 'दामाद' कहलाता है। 

 

लोकभाषा और देश के अलग अलग हिस्सों मे अलग अलग नामों से भी जाना जाता है --जैसे जमाई बाबू,यूपी बिहार में -पाहून,राजस्थान में 'पवणा' और दक्षिण भारत में 'मपील्ल्ई' कहा जाता है। और इन सभी शब्दों के मूल भाव 'अत्यंत पूजनीय अतिथि' ही है। 

यह दामाद दो कुलों को जोड़ने वाला सेतु होने के साथ साथ ससुराल का रक्षक और बेटा के समान होता है। यह ससुराल में देवतुल्य अतिथि और सभी का आत्मीय होता है। 


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🙍 दामाद का असली महत्व:

"दामाद शब्द का असली महत्व इस बात में है कि--वह एक पिता के दिल के सबसे प्यारे टुकड़े (उसकी बेटी) को थामता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति उसे सिर्फ एक दामाद नहीं मानता,बल्कि उसे 'जमाई-राजा' बनाकर अपने दिल और सम्मान के सर्वोच्च शिखर पर स्थान दिया है।


दामाद का परंपरागत सम्मान

दामाद जी का परंपरागत सम्मान केवल शिष्टाचार ही नहीं बल्कि यह एक अभूत ही गहरी और सामाजिक रीति भी है। यह दामाद को 'VIP' सम्मान प्रदान करती है और आदरणीय बनाती है। कैसे कैसे परंपरागत रूप से सम्मानित किया जाता है उसका छोटा सा झलक देखते है --

1. पलक-पावड़े बिछाना और द्वार-पूजा:

परंपरा के अनुसार जैसे ही दामाद जी के आने की सूचना मिलती है तो घर की साफ-सफाई और तैयारियों का स्तर ऐसे शुरू हो जाता है जैसे कोई पर्व या आयोजन हो --
  • द्वार पर स्वागत: दामाद के पैर घर के दरवाजे पर पड़ते ही सास या घर की बुजुर्ग महिलायें मुख्य द्वार पर आकर दामाद जी का 'आरती' उतारती है,माथे पर तिलक लगती है और अछत छिड़क कर उनका स्वागत करती है। कई समाजों में इसे 'दशगात्र' या 'जमाता अगवानी' भी कहा जाता है। 


2. चरण पखारने (पैर-धोने) की महान परंपरा:

यह 'दामाद' को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है। चूंकि दामाद को भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है,अतः घर के किसी बड़े बुजुर्ग द्वारा कांसे की थाली में दामाद के पैर को रखकर उसे दूध,पानी और गंगाजल से धोया जाता है। 

इसके बाद दामाद के पैरों में नए वस्त्र से पोंछकर उन्हे वस्त्र एवं भेंट प्रदान किये जाते है। 


3. छप्पन भोग और कांसे की थाली में भोजन:

परंपरागत रूप से दामाद जी के भोजन की व्यवस्था सबसे खास होती है। 
  • विशेष बर्तन और आसन: दामाद को साधारण बर्तन में खाना नहीं परोसा जाता है बल्कि उनके लिए पित्तल या कांसे की भारी थाली या कटोरियों का प्रयोग किया जाता है। उन्हे बैठने के लिए विशेष आसन प्रदान किया जाता है। 
  • पसंदीदा पकवान: भोजन में उनके पसंद की हर चीज बनाई जाती है। साथ ही ऐसे ही भोजन नहीं कराया जाता है बल्कि सास,साला या सालियों के द्वारा पंखा झलते हुए बहुत ही मनुहार और आग्रह के साथ भोजन कराया जाता है। 


4. मान-मनौअल और नखरों को सहना:

परंपरागत सम्मान का एक पहलू यह भी है कि दामाद की हर छोटी बड़ी बात का ध्यान रखा जाता है ताकि वो किसी बात पर रुष्ट न हो जाए। 
  • मान-मनौअल: किसी भी बात पर दामाद जी नाराज हो जाते है तो घर के सभी सदस्य दामाद जी को मान मनौअल के साथ मनाते है। 


5. बिदाई के समय शगुन और उपहार:

दामाद का सम्मान केवल उनके रुकने तक ही नहीं,बल्कि उनकी बिदाई के समय भी उतना ही सलीका से किया जाता है --

जब दामाद वापस घर जाने लगते है तब उनकी जेब या हाथ खाली नहीं छोड़े जाते है। परंपरा के अनुसार उन्हे शगुन के रूप में नगद राशि,नए वस्त्र,फल,मिठाइयां और अपनी समर्थ के अनुसार उनको चांदी या सोने की वस्तुओं का उपहार भी दिया जाता है। 


दामाद जी का इतना सम्मान और स्वागत किया जाता है कि कभी भी दुबारा आने में उनको किसी भी तरह का संकोच करने की जरूरत न पड़े।और उनको ससुराल आने में गर्व का अनुभव हो। 


🌿 दामाद का सत्कार:

दामाद का यह परंपरागत सत्कार उसकी कृतज्ञता को दर्शाने का तरीका है,जो एक पिता अपनी बेटी को खुश रखने वाले व्यक्ति के प्रति व्यक्त करता है। पैर धोने से लेकर बिदाई के शगुन तक हर रस्म के पीछे बेटी के सुख की कामना छिपी हुई होती है।

अत: हमारे इस परंपरा का सम्मान कम नहीं होनी चाहिए और बदलते समय के बावजूद यह आधुनिक रूप से जिंदा राहनी चाहिए

विभिन्न राज्यों की परम्पराएं

भारत एक ऐसा देश है जहां थोड़ी थोड़ी दूर पर भाषा,पहनावा और खान-पान बदल जाते है। ठीक इसी तरह से देश के अलग-अलग हिस्सों में दामाद जी का स्वागत और उनसे जुड़ी परम्पराएं भी अलग-अलग रूपों में नजर आती है। लेकिन सम्मान की भावना बिल्कुल एक जैसी ही है। 

आईए थोड़ा सा नजर डालते है देश के अलग अलग हिस्सों में दामाद सम्मान की परंपराओं को --

1. पूर्व और उत्तर भारत:उत्सव और लोकगीतों का रंग:

  • बंगाल की जमाई-षष्टि (Jamai Sasthi):
शायद पूरे भारत में दामाद को सबसे ज्यादा लाड़ और प्यार बंगाल में ही मिलता है। यहां बंगाली ज्येष्ठ महिनें (मई-जून) में बाकायदा --'जमाई-षष्ठी' नामक त्योहार मनाया जाता है जो पूरी तरह से दामाद जी पर समर्पित होता है। 
  • परंपरा: इस दिन सास अपने दामाद की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है। दामाद को घर बुलाकर नये कपड़े,उपहार,विभिन्न प्रकट के पकवान और मिठाइयां प्रदान की जाती है। 

  • बिहार और उत्तर प्रदेश का पाहून सत्कार:
बिहार और पूर्वी-उत्तर प्रदेश में दामाद को 'पाहून' कहा जाता है। यहां परंपरा है कि जब नये पाहून पहली बार ससुराल आते है,तब परिवार ही नहीं बल्कि पूरा गांव उन्हे देखने और सत्कार करने के लिए उमड़ पड़ते है। 
  • परंपरा: यहां दामाद के सत्कार में महिलायें विशेष 'गाली गीत' (लोकगीत) गाती है। ये गालियां व्यंगयात्मक होती है। 
  • पुर धोने की परंपरा: यहां भी दामाद को स्वागत में पैर धोने की परंपरा होती है। जिसे पैर पखारना कहा जाता है। 


2. पश्चिम भारत: मान-मनौअल और कड़क मिजाज:

  • गुजरात का 'पोटला' और कान खींचने की रस्म:
गुजरात में शादियों और उसके बाद भी दामाद का स्वागत बड़े ही अनूठे अंदाज में होता है। 
  • परंपरा: जब दामाद घर आते है तब उनकी आरती उतारी जाती है और प्यार से उनका नायक या कान को खींचा जाता है। यहां हरेक त्योहार और पर्व पर दामाद को विशेष उपहार प्रदान किया जता है। 

  • राजस्थान का 'पावणा' और 'मनुहार':
राजस्थान मे दामाद को 'पावणा' कहा जाता है। यहां की परम्पराएं राजसी ठाट-बाट से प्रेरित है। 
  • परंपरा: जब 'पावणा' घर आते है तब उनके माथे पर तिलक लगाकर और इत्र छिड़क कर उनका स्वागत किया जाता है। राजस्थान में 'मनुहार' यानि जिद करके खाना खिलाने यानि ज्यादा खाना खिलाने की कड़क प्रथा है। दामाद जितना माना करते है उनको उतना ही ज्यादा खाना खिलाया जाता है।  


3. दक्षिण भारत:मर्यादा,रेशम और नारियल-पानी:

  • तमिलनाडु और आंध्र-प्रदेश का 'मपिल्ल्ई' (Maapillai):
दक्षिण भारत में दामाद का रिश्ता बहुत ही मर्यादित और अत्यधिक आदर वाला होता है। यहां दिखावा और शोर-शराबा बहुत कम और सम्मान बहुत गहरा होता है। 
  • परंपरा: दीपावली के समय यहां --'तल-दीपावली' (Thala Deepavli) मनाई जाती है। यह शादी के बाद दामाद की पहली दीपावली होती है जिसमें दामाद को ससुराल में आना अनिवार्य होता है। इस दिन ससुर अपने दामाद को धोती कुर्ता भेंट करते है। पूरा परिवार मिल जुलकर तेल स्नान करने के बाद पूजा करता है। 


4. उत्तर भारत:रौब,तोहफे और 'मिलनी':

  • पंजाब और हरियाणा के 'जमाई बाबू':
यहां का मिजाज थोड़ा जिंदादिल और बड़ा होता है। पंजाब और हरियाणा के दामाद के स्वागत में पैसों की बारिश जमकर की जाती है। 
  • परंपरा: यहां शादी से लेकर हर पर्व और त्योहार पर 'शगुन' और 'मिलनी' की परंपरा है। हूर हर बार पैसों एवं गहनों की बारिश की जाती है। पकवान एवं व्यंजन खिलाए जाते है। 

"पूरब के 'जमाई षष्ठी' के पकवानों से लेकर पश्चिम के 'पावणा' के मनुहार तक,और उत्तर के मिलनी की 'शगुन' से लेकर दक्षिण की 'तल दीपावली' की मर्यादा तक .. भारत का हर राज्य दामाद को अलग तरीकों से सहेजता है। .. लेकिन तरीका भले ही अलग हो, सबके पीछे एक ही भावना होती है---अपनी बेटी के हमसफ़र को पलकों पर बिठाना।।"

भारत के अलग अलग राज्यों में दामाद का स्वागत और सम्मान अलग अलग अंदाज में होता है
घर आने पर दामाद का पारंपरिक रूप से सम्मान और सत्कार करती सास 


शास्त्रों और लोक कथाओ में दामाद का उल्लेख

भारत के प्राचीन शास्त्रों में भी दामाद के बारे में वर्णन मिलता है। जिसका अनुसरण लोक कथाओं एवं परंपराओं में भी मिलती है। कुछ प्रमुख शास्त्रों के उद्धरण इस प्रकार से है ---

1. दामाद को साक्षात 'विष्णु' का रूप मानने वाला सूत्र:

हमारी लोक परंपराओं में दामाद का इतना महत्व केवल ऐसे ही नहीं है,बल्कि इसके पीछे हमारे प्राचीन शास्त्रों एवं धर्मग्रंथों में भी दामाद के महत्व को ऐसा ही रेखांकित किया गया है। इसका प्रमाण कई जगह मिल जाता है। सबसे पहले हम संकल्प के उदाहरण को लेते है --

जब शादी के समय कन्यादान किया जाता है,तब वर (दामाद) को साक्षात नारायण मानकर यह संकल्प पढ़ा जाता है ---

ii कन्यकां सलक्षणां कनकभूषिताम् । 
दस्यामि विष्णवे तुभ्यं ब्रह्मलोकजिगीषया ॥ 
  • अर्थ: मैं समस्त शुभ लक्षणों से युक्त और स्वर्ण आभूषणों से युक्त इस कन्या को साक्षात भगवान विष्णु स्वरूप आप (वर/दामाद) को सौंपता हूं,ताकि मुझे ब्रह्मलोक की प्राप्ति हो सकें। 
यह श्लोक भारतीय संस्कृति में शादी और दामाद के महत्व को सर्वोपरि स्थान प्राप्त करा देता है। ससुर जी दामाद को विष्णु का स्वरूप मानकर उनके चरण पखारकर पूजा,तिलक आदि करने के बाद ही कन्यादान की परंपरा का निर्वहन करते है। 


2. पितृकार्य और श्राद्ध में दामाद का महत्व (मनु स्मृति):

मनुस्मृति (अध्याय-3) में पितरों की तृप्ति के लिए --'तीन' चीजों को सबसे पवित्र और आवश्यक बताया गया है,जिनमें से एक 'दामाद' (जमाता) या उसका पुत्र (दौहित्र) है --

॥ त्रिणी श्राद्धे पवित्रानी दौहित्रः कुतपस्तिलाः। 
वर्जनीयानि च् श्राद्धे क्रोधोअ ध्वगमनं त्वरा ॥ 
  • अर्थ: श्राद्ध कर्म में तीन चीजें अत्यंत पवित्र मानी गई है --'दौहित्र' (पुत्री का पुत्र या स्वयं दामाद/जमाता),दूसरा 'कुतप' (मध्याह्न का समय) और तीसरा 'तिल'। 

इस प्रकार से दामाद का महत्व केवल मांगलिक कार्यों में ही नहीं,बल्कि पितरों के तर्पण जैसे पवित्र और गंभीर धार्मिक अनुष्ठानों में भी अनिवार्य रूप से पूजनीय माने गए है। दामाद के बारे में ठीक इसी तरह से 'मत्स्यपुराण' में भी पितरों की तृप्ति और श्राद्ध कर्म में महत्व के बारे में बताया गया है। 


3. 'दसवां ग्रह' वाला प्रसिद्ध और व्यावहारिक श्लोक:

समाज में दामाद के मान-सम्मान और उसकी नाराजगी के डर को हल्के फुल्के अंदाज में बयान करने वाला यह एक बहुत ही लोकप्रिय नीति श्लोक है ---

॥ जमाता दशमों ग्रहः। 
सदा वक्री सदा क्रूरः.. सदा पूजाम् अपेक्षते॥ 
  • अर्थ: दामाद ज्योतिष के नौ ग्रहों के बाद 'दसवां ग्रह' है। वह हमेशा वक्री (टेढ़ा चलने वाला),हमेशा क्रूर (जल्द नाराज होने वाला) रहता है और हमेशा अपनी पूजा (आदर सत्कार) की अपेक्षा रखता है। 

यह व्यावहारिक रूप से दामाद के लिए लिखा गया है। जो बिल्कुल सच भी बैठता है--उन दामादों पर जो सच में अपने को दामाद और विष्णु स्वरूप समझते है। लेकिन अब तो दामाद अपने को ससुराल का बेटा से भी अधिक बढ़ चढ़ कर अपनी भूमिका निभाने लगे है। 


4. महाभारत में 'अतिथि' और दामाद का सत्कार:

शास्त्र और लोक व्यवहार की बात हो गई तो अब महाभारत की भी बात हो ही जाए। महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णन आता है कि जो व्यक्ति अपने दामाद का अनादर करता है ---उसके पुण्य क्षीण हो जाते है। --

॥ जमाता च तथा दौहित्रों विशेषतः। 
पूजनीयाः सदाः सद्भिः पूजिताः स्युः सुखावहाः॥ 
  • अर्थ: सज्जन पुरुषों को अपने जमाता (दामाद) और दौहित्र (नाती) का हमेशा विशेष रूप से पूजन और सत्कार करना चाहिए। इनका किया गया आदर परिवार में सुख,शांति और समृद्धि लाता है। 

इतना सम्मान हमारे शास्त्रों,ग्रंथों और और नीतियों मे दामाद को लेकर कही गई है तो भला परंपरों में इसकी झलक देखने को क्यों नहीं मिलेगी। और यही कारण है कि पूरे भारत में दामाद को अपने अपने तरह से पूरा सम्मान और सत्कार देखने को मिलते है। 

हमें हमारे ग्रंथों में कई उदाहरण जैसे ---रामायण में 'श्री राम और राजा जनक' का ससुर और दामाद का सम्मान हो या शिव पुराण में वर्णित--'भगवान शिव और राजा दक्ष' का ससुर द्वारा दामाद का अनादर करने और उसका परिणाम दक्ष के सम्राज्य का विनाश। 

यह पौराणिक कहानियां प्रेरणा देती है कि 'दामाद का अपमान कुल के लिए अनिष्टकारी' हो सकता है। 


अधिमास या मलमास को 'दामाद मास' क्यों कहा जाता है?

भारतीय संस्कृति में अधिमास (जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है) को लोकसंस्कृती में और खासकर उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश और बिहार के क्षेत्रों  के साथ साथ मिथिलाञ्चल में भी दामाद मास' या 'पाहून मास' कहने की एक अनूठी परंपरा है। 

धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से इसके पीछे कुछ दिलचस्प और मीठी मीठी कारण है जिसे समझते है --

1. मलमास के खालीपन को दामाद के सत्कार से भरना:

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हिन्दू कलेंडर में हर तीन साल में एक महिना जुड़ जाता है जिसे अधिमास मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस महनें में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य पूरी तरह से वर्जित एवं निषिद्ध रहते है। अतः --
  • दामाद सेवा सत्कार भगवान विष्णु की सेवा: इस वर्जित महिनें में दामाद को आमंत्रित किया जाता है और माहौल को उत्सवमय किया जाता है। अतः जिस महिनें को मलमास कहकर उपेक्षित किया जाता है उस महिनें को भी दामाद के आने से उत्सव और खुसनुमा बना दिया जाता है। 


2. भगवान विष्णु और 'पुरुषोत्तम मास' का कनेक्शन:

शास्त्रों के अनुसार जब इस मास का कोई स्वामी नहीं था तो --भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम दिया और यह 'पुरुषोत्तम मास' कहलाया। 
  • अतः जैसा की हम जान ही चुके है कि -- भारतीय परंपरा में दामाद को 'साक्षात विष्णु रूपेण' माना जाता है। 
  • इसलिए पुरुषोत्तम मास जो भगवान विष्णु का महिना है,और दामाद भगवान विष्णु का रूप होता है अतः इस पूरे महिनें विष्णु रूपी दामाद का सेवा और आदर सत्कार करके मनाने की परंपरा बन गई है और इस तरह से इस मास को 'दामाद मास' कहा जाने लगा।   


3. मालपूआ का दान और महाभोज 

अधिमास,मलमास यानि पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। और परंपरा रूप से इस महिनें में विशेष रूप से 'मालपूआ' दान करने का विधान है। 
  • एक अनोखी रस्म: इस महिनें में सास अपनी बेटी और दामाद को अपने घर बुलाकर कांसे के बर्तन में 33 मालपूआ रखकर उन्हें भेंट करती है और उनका पूजन करती है। माना जात है कि इस महिनें में दामाद का सेवा सत्कार करने से भगवान विष्णु खुश होते है और ससुराल को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। 
इस प्रकार से जिस मास को मनहूस मास कह कर उपेक्षित कर दिया जाता है उस मास को भी दामाद जैसे VIP ने शुभ और उत्सवनुमा बना दिया। ऐसे होते है भारतीय दामाद। 

बदलता दौर:दामाद से बेटा बनने का सफर

यह भारतीय समाज,संस्कृति और परंपरा की खूबी रही है कि समय के साथ अपनी कमियों,रूढ़ियों को छोड़कर और उसमें समय के अनुसार बदलाव करके समाहित कर लेता है। इसका ही उदाहरण है समाज में दामाद ससुराल और ससुर के संबंधों का आधुनिक दौर। 

एक समय था जब दामाद -- गंभीर और ससुराल से एक अदृश्य दूरी बनाकर ही रहता था। लेकिन अब के समय में दामाद ससुराल में सिर्फ एक बेटी का पति या जमाई बनकर नहीं रहता,बल्कि वह ससुराल के लिए 'बड़ा बेटा' बनकर उभरा है। 
  • दोस्ती और खुलकर बात: पुराने समय में दामाद के ससुराल में आते ही लगता था की बहुत बड़े पुलिस अधिकारी आ गए है। बच्चे चिपक और छुप जाते थे,साला साहब सहम जाते थे और ससुर जी कुछ भी बात बोलने से पहले दो-बार सोंचते थे की कही जमाई राजा नाराज न हो जाए। ये सब नजारा अब बदल गया है। 
  • आज की तस्वीर: जब दामाद घर पर आते है तब औपचारिकताएं की दीवारें ढह जाती है सभी खुश हो जाते है और घर की महिलाएं खुश हो जाती है। साले-और साली के साथ खुलकर बात करता है। देश दुनियां की बात ससुर के साथ और सास के हाथ का चाय ऑर्डर करके बनवा कर पीता है। 
  • दशम ग्रह के नखरे से घर के संकटमोचन तक: अब दामाद दसवां ग्रह बही रहें,बल्कि ससुराल पर कोई भी संकट आ जाए सबसे आगे आकर कमान को संभाल लेता है। यही नहीं घर में शादी विवाह हो खुलकर दामाद जी उसमें भी भाग लेते है। खासकर साली की शादी तो ऐसा लगता है कि दामाद की अपनी बहन की शादी हो। 
  • पराया धन की परिभाषा बदल गई है: पहले ससुराल के लोग अपनी समस्या को दामाद तो छोड़िए अपनी बेटी को भी नहीं बताते थे। क्योंकि अब वो पराया घर की हो चुकी है। लेकिन अब ऐसा नहीं है लोग दामाद और अपनी बेटी को घर की सभी बातें बताते यही सलाह मशविरा से हर काम करते है। कई बार तो घर के बेटा से ज्यादा देखभाल दामाद अपने ससुर को कर देता है। 

इस प्रकार से आज भी दामाद का सम्मान तो पहले जैसा ही है ---लेकिन उसकी अति नहीं है। और दामाद भी अब ससुराल को अपने घर जैसा मानने लगा है और ससुराल जाकर भी कॉमफ़र्ट फील करता है। हां चाहे दामाद कितना भी ससुराल में सहज क्यों न हो जाए यदि उसे ससुराल में सम्मान नहीं मिलता है तो उसे चाहे जैसा लगे या न लगे समाज में उस परिवार का सम्मान नहीं हो मिल पाता है। अतः कुछ भी हो जाए दामाद का सम्मान करना न भूले। 


भारतीय संस्कृति का मूल संदेश

भारतीय संस्कृति का मूल संदेश कृतज्ञता (Gratitude) है जब एक पिता दामाद को कन्यादान कर रहा होता है तो वह एक यज्ञ कर रहा होता है। और वह पिता दामाद का सम्मान करके अपनी बेटी और अपने कुल परिवार का सम्मान कर रहा होता है। 

यह बताता है कि भारतीय परंपरा मे विवाह केवल एक कानूनी बंधन और समझौता नहीं है,बल्कि दो दिलों का मिलन और दो परिवारों का मिलन है। विवाह के बाद दामाद पराया नहीं रह जाता है बल्कि वह परिवार का अभिन्न हिस्सा और सदस्य हो जाता है। 

यदि दामाद को विष्णु का दर्जा दिया गया है तो वह भी विष्णु के समान पालनहार का कर्तव्य निभाता है। वह ससुर की बेटी को अपने यहा लक्ष्मी के समान दर्जा देकर उसकी सभी सुख सुविधाओं को प्रदान करता है एवं उसे सुखी और खुश रखता है। वह दामाद अपने ससुराल में ससुर की अन्य बेटियों यानि अपनी साली को भी सुख एवं खुशी प्रदान करता है। 

यदि दामाद न हो और उसे ससुराल में सम्मान न मिले तो वह ससुराल जाएगा ही नहीं। और जब ससुराल नहीं जाएगा तो सबसे ज्यादा दिक्कत सास और साली को ही होती है। जिसे दामाद के रूप में मनोरंजन और प्यार करने वाला कोई नहीं मिलता है। इससे वो सब ऊब सी जाती है। और जब घर की लड़की एवं महिलायें खुश न रहे तो घर की रौनक में कमी हो जाती है। दामाद इस रौनक का स्रोत होता है। 

निष्कर्ष (Conclusion)


निष्कर्ष हमें यह बताता है कि ---' रिश्ते केवल खून के नहीं होते है' यह विश्वास एवं आदर पर जब आधारित होते है तब खून के रिश्तों से भी मजबूत और गहरा हो जाता है। जब हम किसी दामाद का सम्मान कर रहे होते है तब हम उस विश्वास और आदर का सम्मान कर रहे होते है जो दामाद ने हमारे परिवार में आकर निभाया है। 

साथ ही दामाद के इस सम्मान के माध्यम से हमारी संस्कृति अहंकार की जगह समर्पण और प्रेम के महत्व को रेखांकित करती है। साथ ही सम्मान ही वह अमोघ अस्त्र शस्त्र और मंत्र है जो हर किसी को अपने बस में कर लेता है और सम्मान मिलने से व्यक्ति भी कृतज्ञ हो जाता है। 

आज का दामाद ससुराल में सिर्फ 'मान' खोजने नहीं आता,बल्कि अपनी पत्नी के माता-पिता में अपनी खुद की माता-पिता की छवि देखकर उनके सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहने वाला बड़ा बेटा बनकर खड़ा रहता है। यह रिश्ता अब रौब का नहीं बल्कि अपनेपन का हो चुका है। 

अतः 
"सम्मान से शुरू हुआ रिश्ता जब अपनापन और विश्वास पा लेता है,तब दामाद भी परिवार का बेटा बन जाता है"

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1:शास्त्रों में दामाद को किस रूप में माना गया है?
उत्तर:भारतीय सनातन परंपरा और शास्त्रों में दामाद को 'भगवान विष्णु रूपेण' कहा गया है। यानि उन्हे साक्षात भगवान विष्णु का रूप माना गया है। विवाह के समय जब कन्या (लक्ष्मी रूपेण) का दान किया जाता है,तो वर (दामाद) को नारायण मानकर ही उनका सत्कार किया जाता है।
प्रश्न 2: दामाद को दसवां ग्रह (जमाता दशमों ग्रहः)क्यों कहा जाता है?
उत्तर: यह ज्योतिष और लोक संस्कृति में प्रयुक्त एक व्यंग्यात्मक श्लोक है। जैसे राहू-केतु और शनि जैसे क्रूर ग्रह नाराज होकर नुकसान पहुंचा सकते है,वैसे ही यदि दामाद नाराज हो जाए तो ससुराल की सुख शांति प्रभावित हो सकती है। इसीलिए मजाकिया अंदाज में उन्हे हमेशा खुश रखने के लिए दसवां ग्रह कहा गया है।
प्रश्न 3:श्राद्ध या पितृ कर्म में दामाद का क्या महत्व है?
उत्तर: मनु स्मृति और मत्स्य पुराण के अनुसार,पितरों के तर्पण या श्राद्ध के भोजन में दामाद (जमाता) या नाती (दौहित्र)की उपस्थिति अत्यंत पवित्र मणि गई है। शास्त्रों के अनुसार दामाद को श्रद्धा पूर्वक कराया गया भोजन सीधे पितरों तक पहुचता है और उन्हे तृप्त करता है।
प्रश्न 4:जमाई षष्ठी त्योहार क्या है और यह कहा मनाई जाती है?
उत्तर:जमाई षष्ठी मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और असम के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक त्योहार है। यह त्योहार पूरी तरह से दामाद को समर्पित होता है। ज्येष्ठ महिनें में सास अपने दामाद के लंबी उम्र और स्वास्थ्य समृद्धि के लिए षष्ठी तिथि को व्रत रखती है और दामाद को घर बुलाकर भव्य भोजन और सम्मान भेंट करती है।
प्रश्न 5:राजस्थान और बिहार-यूपी में दामाद को किस नाम से पुकारा जाता है??
उत्तर:राजस्थान में दामाद को अधिक सम्मान के साथ 'पावणा' कहा जाता है। यहां राजसी ठाट-बाट के साथ दामाद का स्वागत किया जाता है। वही बिहार,यूपी और झारखंड में दामाद को 'पाहून' कहा जाता है और उनका स्वागत मधुर लोकगीतों और विशेष आतिथ्य के साथ किया जाता है।
प्रश्न 6:अधिमास (मलमास)को दामादमास क्यों कहा जाता है?
उत्तर: अधिमास में सभी मांगलिक कार्य वर्जित होते है। इस खाली समय को उत्सवमय बनाने के लिए दामाद को ससुराल में बुलाया जाता है। चूंकि अधिमास के स्वामी भगवान विष्णु है और दामाद भी विष्णु के स्वरूप माने जाते है अतः इस महिनें दामाद को 33 मलपुए दान करने और विशिष्ट आतिथ्य करने के कारण अधिमास को दामाद मास कहा जाता है।
प्रश्न 7:दक्षिण भारत में दामाद के स्वागत करने की क्या खास परंपरा है?
उत्तर: दक्षिण भारत में विवाह के बाद दामाद की आने वाली पहली दीपावली को 'तल दीपावली'के रूप में मनाया जाता है।इस दीपावली को दामाद अपने ससुराल में ही रहना होता है। जहां ससुर उन्हे रेशमी वस्त्र भेंट करते है और पूरा परिवार पारंपरिक रूप से तेल स्नान करने के बाद उत्सव मनाता है।
प्रश्न 8:आधुनिक समय में दामाद और ससुराल के रिश्तों में क्या बदलाव आया है?
उत्तर: आधुनिक समय में दामाद अब दसम ग्रह के जगह घर के बड़े बेटे जैसा जिम्मेदारी उठाने वाला और ससुराल के सुख-दुख में बढ़ चढ़कर भाग लेने वाला बन गया है। आज दामाद केवल अतिथि या मेहमान बनकर नहीं रहता बल्कि वह बिना किसी खून के रिस्तें के भी उससे बढ़कर ससुराल की फिक्र करने वाला बन गया है।


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