हमारे जीवन और पर्यावरण में गौरैया का महत्व
गौरैया चिड़िया का वैज्ञानिक नाम --'पासरा डोमेस्टिकस' (Passer Domesticus) है जो 'पासेरिडे' परिवार का हिस्सा है। गौरैया को --'सिनैन्थ्रोपिक' (Synanthropic) जीव माना जाता है। जिसका अर्थ यह है कि वैसे जीव जो जंगल और जंगली जानवरों के बजाय इंसान और इंसानी बस्तियों में रहना पसंद करती है।
गौरैया (House Sparrow) सिर्फ हमारे घरों की रौनक ही नहीं बढ़ाती है,बल्कि यह हमारे पर्यावरण,स्वास्थ्य और हमारी खेती-बारी के लिए एक बहुत ही जरूरी और मददगार पक्षी है। भले ही देखने में यह छोटी लगे लेकिन यह हमें निम्न प्रकार से फायदा पहुचाती है ---
1. फसलों और पेड़-पौधों की रक्षक (प्राकृतिक कीटनाशक):
गौरैया इंसानों के लिए एक बेहतरीन --'नेचुरल पेस्टिसाइड' (प्राकृतिक कीटनाशक) का काम करती है। कई लोगों को यह बात सुनकर आश्चर्य लगता है। कैसे... देखते है ---
- किट-पतंगों का भोजन: भले ही बड़ी और वयस्क गौरैया अनाज के दानों को खाती है,लेकिन जब उनके घोसलें में बच्चे होते है तब वह अपने इन बच्चों को सिर्फ और सिर्फ --छोटे मोंटे कीड़ों,झल्लियाँ,मच्छर का लार्वा,टिड्डियां आदि को पकड़ कर अपने घोंसलों में लाती है और अपने बच्चों को खिलाती है।
- हानिकारक कीटों का नियंत्रण: इस प्रकार से गौरैया अपने बच्चों का पालन पोषण करने के लिए प्रतिदिन सैकड़ों कीटों का शिकार करती है और हमारे फसलों,बगीचों एवं घरों के हानिकारक कीड़ों की आबादी को नियंत्रित करती रहती है।
2. मच्छरों और बीमारियों से बचाव:
गौरैया मच्छरों के अंडे और छोटे मच्छरों को खा जाती है। इसके अलावा ये उन बहुत से कीटों को भी खा जाती है जो इंसानों और पालतू जानवरों में बीमारियां फैलाती है। ये जहां रहती है मच्छरों की संख्या तो कम हो ही जाती है साथ में आस-पास के हानिकारक कीटों के खत्म होने से बीमारियों से मुक्त रहने में हमें मदद मिलती है।
3. पर्यावरण का संतुलन (Food Chain):
पारिस्थितिकी तंत्र (Ecological System) में गौरैया की भूमिका बहुत बड़ी होती है।
- घास और खर-पतवार का नियंत्रण: यह कई तरह के जंगली घासो के बीजों को खाकर उनकी अत्यधिक वृद्धि को रोक देती है।
- बाज और उल्लू जैसे पक्षियों का भोजन: गौरैया खाद्य शृंखला का एक अहम हिस्सा भी होती है। गौरैया की मौजूदगी से ही प्रकृति में बड़े शिकारी पक्षियों की संख्या संतुलित बनी रहती है।
4. मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा:
शहरी भागदौड़ और तनाव भरी जिंदगी में सुबह-सुबह गौरैया का --चि-चि सुनना --यह आवाज इंसानी दिमाग के लिए एक थेरेपी की तरह काम करती है।
- शोध रिपोर्ट: कई शोध यह बताते है कि सुबह के समय पक्षियों की चहचहाहट सुनने और उन्हें दाना-पानी देने से इंसानों में तनाव और डिप्रेशन का स्तर काफी कम हो जाता है।
- बच्चों को सच्चा बनाती: यह हमारे बच्चों को प्रकृति से जोड़ने और उनके अंदर 'दयाभाव' जगाने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम करती है। क्योंकि यह बच्चों की प्रिय होती है।
🌿 इतिहास की एक बड़ी सीख:
सन 1958 में चीन के शासक 'माओत्से चुंग' ने फसलों को बचाने के लिए देश से सभी गौरैया को मारने का अभियान (Four Pests campaign) चलाया था। नतीजा यह हुआ कि गौरैया के खत्म होते ही पूरे देश में 'टिड्डियों'की संख्या इतनी भयानक बढ़ गई कि पूरी की पूरी फसलें तबाह हो गई और चीन में भयानक अकाल हो गया। इसमें करोड़ों लोगों की जान चली गई। इसके बाद चीन को दूसरे देशों से गौरैया चिड़ियाँ को मंगाना पड़ गया। तब जाकर स्थिति नियंत्रण में हो पाई।
निष्कर्ष: यह घटना साबित करती है कि गौरैया इंसान की कितनी अच्छी और बड़ी दोस्त है।
5. विश्व गौरैया दिवस:
गौरैया के इसी महत्व को देखते हुए कई लोग इसके संरक्षण की जरूरत और लोगों में इसके प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश करने लगे। और इसी कड़ी में नासिक महाराष्ट्र के रहने वाले -'मोहम्मद दिलावर' एवं उनकी संस्था --'नेचर फॉरएवर सोसाइटी' ने 2010 मे फ्रांस की संस्था --इको-सिक एक्सन फाउंडेशन' एवं अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर '20-मार्च' को पहली बार 'विश्व गौरैया दिवस' के रूप में मनाया।
तब से लेकर प्रति वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।
📅 क्या आप जानते हैं? 20 मार्च को ही क्यों मनाया जाता है 'विश्व गौरैया दिवस'
हर साल 20 मार्च को पूरी दुनिया में 'विश्व गौरैया दिवस' (World Sparrow Day) मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस खास दिन की शुरुआत कैसे और क्यों हुई?
- 🌱भारतीय पर्यावरणविद् की पहल: इस दिवस को शुरू करने का पूरा श्रेय भारत के नासिक (महाराष्ट्र) के रहने वाले मशहूर पर्यावरणविद् मोहम्मद दिलावर और उनकी संस्था 'नेचर फॉरएवर सोसायटी' को जाता है। गौरैया की घटती संख्या को देखकर उन्होंने साल 2010 में पहली बार इस अंतरराष्ट्रीय दिवस की शुरुआत की थी। (इस शानदार काम के लिए 'TIME' मैगज़ीन ने उन्हें 'हीरोज़ ऑफ़ द एनवायरनमेंट' की सूची में भी शामिल किया था)।
- 💧वसंत ऋतु का अनुकूल समय: 20 मार्च का समय पक्षियों के लिए सबसे खास होता है। इस दौरान मौसम न तो ज्यादा ठंडा होता है और न गर्म। यही वह समय है जब गौरैया सबसे ज्यादा सक्रिय होती है और अपने घोंसले बनाने व अंडे देने (Nesting Period) की तैयारी करती है।
- 🤝दिल्ली का राजकीय पक्षी: गौरैया के संरक्षण और जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए साल 2012 में दिल्ली सरकार ने इसे अपना राजकीय पक्षी (State Bird) घोषित किया था।
- 🍃इस समय प्रकृति में नए पत्ते और फूल आते हैं, जिससे चिड़ियों के लिए भोजन (छोटे कीड़े और दाने) आसानी से उपलब्ध होता है।ि
इंसानों से रिश्ता:: गौरैया को 'सिनैन्थ्रोपिक' (Synanthropic) जीव माना जाता है, जिसका अर्थ है कि यह जंगली जंगलों के बजाय इंसानों के आस-पास या उनके बस्तियों में रहना और पनपना पसंद करती है।
भारतीय संस्कृति और ग्रंथों में गौरैया
वैदिक काल से ही भारतीय वास्तुकला और संस्कृति में पक्षियों को घर का रक्षक और शुभ माना गया है। संस्कृत साहित्यों और वेदों में गौरैया को --'चटका' (चटक) कहा गया है।
1. वास्तु-शास्त्र और लोक-मान्यताओं में शुभ संकेत:
भारतीय संस्कृति में गौरैया को लेकर कई सकारात्मक मान्यताएं है ---
- सकारात्मक ऊर्जा:वास्तु-शास्त्र के अनुसार यदि गौरैया आपके घरों में घोंसला बनाती है तो ये शुभ संकेत है। इससे घर में सुख-समृद्धि आती है। ये अपने साथ वास्तु के दोषों को दूर करने वाली सकारात्मक तरंगों को साथ लाती है।
- पारिवारिक प्रेम का प्रतीक: गौरैया हमेशा जोड़े में रहती है और साथ में तिनका चुनती है। इसीलिए इसे सुखी वैवाहिक जीवन और पारिवारिक प्रेम एवं एकता का प्रतीक माना जाता है।
2. पंचतंत्र की कहानियों में सीख:
आचार्य विष्णुशर्मा द्वारा रचित विश्व-प्रसिद्ध ग्रंथ --'पंचतंत्र' में गौरैया पर आधारित कई कहानियां है जो जिनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है--'चटका-कुंजर कथा' (चिड़ियां और हाथी की कहानी)। इस कहानी में बताया गया है कि कैसे कैसे एक नन्ही सी गौरैया उसके घोंसलों को नष्ट करने वाले अहंकारी हाथी को --अपने मित्रों मेढक,मक्खी और कठफोड़वा के साथ मिलकर हरा देती है।
यह कहानी हमें बताती है कि 'संगठन में शक्ति होती है'।
3. संस्कृत ग्रंथों में गौरैया:
संस्कृत ग्रंथों में पक्षियों को इंसानों के प्रेरणास्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।
गौरैया के घोंसला बनाने की कला और उसके परिश्रम पर संस्कृत में एक बहुत ही प्रसिद्ध सुभाषित है ---
॥ चटककुलसंसर्गात् काकैः सह निवसन्त्यपि।
न त्यजति स्वकीयं शीलं सत्संगाद्धि गुणोदयः॥
- अर्थ: कौवे के साथ ही एक ही पेड़ पर रहने के बावजूद,गौरैया कभी भी अपनी मधुरता सौम्यता और अच्छे स्वभाव को नहीं छोड़ती है।
यह श्लोक हमें बताती है कि हमारी परिस्थितियाँ या आस-पास का माहौल चाहे कैसा भी हो इंसान को अपने मूल स्वभाव और संस्कारों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
इसके अलावा वेदों में पक्षियों के चहकने को ईश्वर की स्तुति और सुबह के मंगल गान के रूप में देखा गया है। जहां गौरैया को उषा (सुबह) की पहली दूत माना गया है।
शहरों से क्यों कम हो रही है गौरैया की संख्या
वैज्ञानिकों एवं जीववैज्ञानिकों के शोधों के अनुसार शहरों से गौरैया के अचानक गायब हो जाने के पीछे कोई एक बजह नहीं है,बल्कि इसके पीछे कई बड़े पारिस्थितिकी और आधुनिक बदलाव जिम्मेदार है। जैसे --
- आधुनिक वास्तुकला और घोंसलों की कमी: पुराने समय के घरों में रोशनदान,छज्जे और लकड़ी के कड़ियां एवं खुले आंगन आदि होते थे जो गौरैया के लिए बेहतरीन होते थे। आधुनिक घरों में गौरैया के जीने के लिए एक इंच की जगह नहीं बची है। इसे वैज्ञानिक भाषा में --'आवास का नुकसान' कहा जाता है।
- कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग और भोजन की कमी: यह सबसे बड़ा वैज्ञानिक कारण है। क्योंकि इसकी नवजात बच्चें कीड़े मकोड़े और लार्वा ही अधिक खाते है। अतः शहरों के रोड गलियों और पार्कों आदि मे रसायनों एवं कीटनाशकों आदि का छिड़काव होने के चलते कीटों की कमी हो गई है।
- मोबाइल टॉवर और इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक रेडिएशन: विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में यह देखा ज्ञब है कि मोबाइल के रेडिएशन पक्षियों के अंडों को नुकसान पहुचाता है। साथ ही यह उनके दिशा-ज्ञान को भी भ्रमित कर देता है जिससे वे दुर्घटना की ज्यादा शिकार होने लगती है।
- सुपर मार्केट संस्कृति और अनाज की कमी: पहले की महिलायें घरों में अनाज को साफ करती थी।जिसके गिरें हुए दानें गौरैया के भोजन हुआ करते थे। अब ये चीज शहरों में खत्म हो गई है। और गौरैया यहां से दूर हो गई है।
- विदेशी पौधों का चलन: आजकल शहरों में विदेशी पौधों को घरों आदि में लगाने की प्रथा हो गई है। जो देखने में तो सुंदर लगते है,लेकिन ये कीटों को आकर्षित नहीं कर पाते है। गौरैया को लगने लगता है की हम विदेश में आ गए है और वह अपना देश छोड़ देती है एवं किसी अन्य जगह चली जाती है।
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| गौरैया हमेशा जोड़े में रहती है और साथ में तिनका चुनती है |
बालकनी या छत पर गौरैया को आकर्षित करने के 5 अचूक तरीकें
गौरैया को अपने घर पर वापस बुलाना और उन्हे वहां फिर से बसाना एक अभूत ही खूबसूरत और सुकून देने वाला काम है। और यह काम बिल्कुल आसानी से किया जा सकता है। इसके लिए थोड़ा सा उपाय और थोड़ा सा बदलाव कर उन्हे आकर्षित करना होगा।
अतः गौरैया को घरों में बसाने के लिए आप निम्नलिखित उपाय कर सकते है ---
1. कृत्रिम घोसलें (Nest Boxes) लगाएं:
आप कृत्रिम घोंसला अपने से घर पर भी बना सकते है या मार्केट में खरीदने पर भी कई प्रकार के मिल रहे है। आप उन्हे भी खरीद कर घर पर ला सकते है। हां ये ध्यान रखे की कभी भी ये लकड़ी के घोंसला पेंट किया हुआ नहीं लेनी चाहिए। हमेशा बिना पेंट किये घोंसले को ही ले।
- सही जगह और ऊंचाई: घर के किसी सुरक्षित कोने,छज्जे के नीचे या बरामदे में जहां बिल्ली या कौवे आसानी से न पहुंच पाए। वहां पर ही लकड़ी के या गत्ते के कृत्रिम घोंसला को लटकाए।
- घोंसला का आकर: यह ध्यान रखना है कि घोंसला का प्रवेश द्वार छोटा हो --लगभग 3-3.5 सेमी का ही हो ताकि उसमें केवल गौरैया ही जा सके। बड़े पक्षी उसमें नहीं जा सकें।
- सही दिशा का चुनाव: घोसलें का मुंह कभी भी उस दिशा में न रखे जिस दिशा से ज्यादा धूप या बारिश का पानी या तेज हवा आती हो। इसके लिए आप उत्तर या पूर्व दिशा को ही चुने।
2. दानें-पानी का नियमित प्रबंध करें:
गौरैया को आकर्षित करने का सबसे आसान तरीका है--भोजन उपलब्ध कराना।
- पसंदीदा भोजन: अपने आँगन,खिड़की या छत पर बाजरा,टूटे हुए चावल,कंगनी एवं बारीक अनाज को बिखेरे।
- साफ पानी: एक मिट्टी के बर्तन में रोज साफ और ताजा पानी भरकर रखे। गौरैया को पानी पीना और उसमें नहाना बहुत पसंद होता है।
दाना | उपयुक्तता | बाजरा | सबसे पसंदीदा | ज्वार | बहुत अच्छा | गेंहू | अच्छा | टूटे चावल | उपयुक्त | रागी | अच्छा विकल्प |
👉क्या न रखें? -नमकीन खाद्य पदार्थ,बिस्कुट,तला हुआ भोजन,मसालेदार चीजें। |
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3. धूल स्नान (Dust bath) की व्यवस्था:
गौरैया अपने पंखों को साफ रखने और परजीवियों से बचने के लिए मिट्टी या धूल में नहाती है।
- अपने घर के किसी कोने या मिट्टी के गमले में थोड़ी सुखी और साफ मिट्टी या रेत रख दे। इसे देखकर गौरैया तुरंत आकर्षित होती है।
4. पेड़-पौधे एवं प्राकृतिक माहौल:
गौरैया को ऐसे स्थान पसंद आते है जहां भोजन के साथ सुरक्षा भी मिले। अतः --
- घनें और झाड़ीदार पौधे: अपने घर या बालकनी में गहने पौधे लगाए जैसे--कढ़ी पत्ता,तुलसी,मेहंदी,गुड़हल या और झाड़ीदार पौधा। जिसमें वो छुप सकें और उसके लिए कीड़े मिल सके।
- घास-फूस: घोंसला बनाने के लिए आस-पास सुखी घास,जुट के छोटे टुकड़े या रुई रख दे। ताकि वे इनका इस्तेमाल अपने घर को सजाने में कर सके।
5. सुरक्षा और शांति का रखे ध्यान:
- शिकारियों से बचाव: यदि आपके घर में पालतू कुत्ता या बिल्ली है तो दाना-पानी और घोंसला ऐसी ऊंचाई पर रखे जहां इनकी पहुंच नहीं होने पाए।
- कीटनाशकों से बचे: अपने पौधों में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल बिल्कुल न करे। उन कीटों को तो गौरैया के बच्चे ही खा जाएंगे।
6. यदि घर के बालकनी में लगा रहे है तो:
यदि आप बालकनी में लगा रहे है तो इसके घोंसलों को किसी ऐसी चीज में बांध दीजिए जो बिल्कुल भी हिल न पाए। क्योंकि चिड़िया और खासकर गौरैया किसी ऐसी जगह अंडा नहीं देती है जो घोंसला हिलता हो।
- दना-पानी में दूरी हो: गौरैया अपने घोसलें के पास बिल्कुल शांति चाहती है। अतः इसके दाना पानी को घोंसला से दूरी पर ही रखे।
- परदा लगा दे: गौरैया के घोंसलों के सामने और आसपास ज्यादा हलचल या आना जाना नहीं होनी चाहिए। इसके लिए आप इसके घोंसले के आगे पर्दा लगा दीजिए।
🌿एक जरूरी बात:
गौरैया स्वभाव से थोड़ी शर्मीली और सतर्क होती है। शुरुआत में हो सकता है कि उन्हें आपके घर को अपनाने में कुछ दिनों या हफ्तों का समय लगे, इसलिए धैर्य रखें। एक बार जब एक जोड़ा वहां रहने लगेगा, तो हर साल आपके घर में चीं-चीं की आवाज गूंजती रहेगी।
एक छोटी सी टिप: शुरुआत में बालकनी में अपनी हलचल थोड़ी कम रखें, खासकर सुबह के समय जब चिड़ियाँ जगह तलाशने निकलती हैं।
देश में कितनी गौरैया चिड़िया होगी
यह तो विदित है कि भारत या विश्व में कही भी गौरैया की कोई सटीक संख्या बताना मुश्किल और नामुमकिन ही है। फिर भी वैज्ञानिक संस्थाओं के रिसर्च (जैसे--WWF,BNHS और eBirds) और सर्वे के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े जरूर सामने आई है। इनका विवेचन इस प्रकार से है --
1. संख्या में कितनी बड़ी गिरावट आई है:
दुनियां भर के वैज्ञानिकों और 'बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी' (BNHS) के अनुसार पिछले 25-30 सालों में भारत के बड़े और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी में करीब --'60-80%' तक की भारी कमी दर्ज की गई है।
तटीय इलाकों (Coastal Regions) और महानगरों जैसे --दिल्ली,मुंबई और बेंगलुरु में यह गिरावट सबसे ज्यादा 70-80% तक देखी गई है। जबकि ग्रामीण इलाकों और कस्बों में इनकी स्थिति अभी भी शहरों के मुकाबले काफी अच्छी और बेहतर है।
अतः समय रहते हम सबकी ये जिम्मेदारी बन जाती है कि हम अधिक से अधिक जागरूक बने और अपने आँगन में इस फुदकने वाली चिड़िया को संरक्षित,सुरक्षित और इसके वृद्धि के लिए संभव प्रयास को अपने जीवन में अवश्य उतारे।
2. स्टेट ऑफ इंडियाज बर्डस (State of India's Birds) की रिपोर्ट:
भारत सरकार और पर्यावरण संस्थाओं द्वारा जारी --'स्टेट ऑफ इंडियाज बर्डस' की ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार --
- शहरी क्षेत्रों में: पक्के कंक्रीटो के मकानों,मोबाइल टावर के रेडिएशनों (जिससे गौरैया के कीड़े-मकोड़े कम होते है) और आधुनिक आर्कीटेक्चर के कारण शहरों में इनकी संख्या लगातार 'घटती श्रेणी' में है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में: गांवों में जहां आज भी पारंपरिक खेती होती है,फसलों के दानें मिलते है और छप्पर या पुराने मकान होते है वहां इनकी संख्या काफी हद तह स्थिर बनी हुई है।
यानि गांवों मे गौरैया के लिए अभी भी सेफ और सुरक्षित आवास के लिए अनुकूल वातावरण बना हुआ है। हमें इसे बरकरार रखना होगा।
3. भारत में गौरैया की कितनी प्रजातियां है ?:
पूरी दुनियां में गौरैया की लगभग 26 प्रजातियां है जिनमें से मुख्य रूप से ये 5 प्रजातियां भारत में पाई जाती है --
- हाउस स्पैरो (House Sparrow): यह वही घरेलू गौरैया है जो हमारे घरों में दिखती है।
- स्पेनिश स्पैरो (Spanish Sparrow): कुछ इलाकों में पाई जाती है।
- सिंध स्पैरो (Sind sparrow): ये भी कुछ पहाड़ी आदि इलाकों में पाई जाती है।
- रसेट स्पैरो (Russet Sparrow): बहुत कम इलाकों में।
- ट्री स्पैरो (Eurasian Tree sparrow): यह ज्यादातर हमारे देश के उत्तर-पूर्वी और पहाड़ी हिस्सों जैसे हिमालयी राज्य क्षेत्रों में पाई जाती है।
4. राहत की बात क्या है:
➢राहत की बात:
राहत की बात यह है कि भले ही शहरों में गौरैया कम हुई है,लेकिन --'इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर' (IUCN) की रेड लिस्ट में अभी भी इसे--'Least Concern'(यानि-खतरे से बाहर) की श्रेणी में रखा गया है। क्योंकि ग्रामीण भारत और वैश्विक स्तर पर इसकी मूल आबादी अभी भी इतनी मजबूत है कि यह पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर नहीं है।
यही वजह है कि --'विश्व गौरैया दिवस-20-मार्च' जैसे अभियानों और आपकी तरह लोगों द्वारा बालकनी में बर्डस हाउस लगाने की कोशिशों से कई शहरों में गौरैया अब धीरें-धीरें घरों में वापस भी कर रही है।
निष्कर्ष (Conclusion)
इस प्यारी फुदकती गौरैया का हमारे आँगन से दूर चला जाना केवल एक पक्षी की कमी नहीं है,बल्कि यह इस बात का गंभीर संकेत है कि हम आधुनिकता की दौड़ में प्रकृति से कितने दूर चले गए है। क्योंकि गौरैया सिर्फ अकेले नहीं रहती बल्कि वही रहती है जहां अन्य जीवों और पेड़ पौधों की भी संख्या होती है।
यदि आपके घरों में या बालकनी में क्या गौरैया ने अपना घोंसला बना रखा है ? यदि हां तो आप कमेन्ट करके जरूर बताईएगा कि इससे आपको कैसा महसूस होता है। यदि आपका और भी कोई सुझाव होगा तो बिना किसी संकोच के इस ब्लॉग के कमेन्ट में बताईएगा।
आग्रह: मेरा आग्रह है कि आप इस जागरूक करने वाले लेख को जरूर अपने मित्रों और रिश्तेदारों में शेयर कीजिएगा जो पक्षियों और प्रकृति से प्रेम करते है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1:गौरैया का सबसे पसंदीदा भोजन क्या होता है?? ▼
उत्तर:गौरैया को बारीक अनाज खाना सबसे ज्यादा पसंद होता है। इसमें कंगनी,ज्वार,बाजरा,टूटे हुए चावल और सूजी दलिया आदि शामिल है। इसके अलावा छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े को बड़ी चाव से खाती है।
प्रश्न 2: चिड़ियां का घोंसला किस दिशा में लगानी चाहिए? ▼
उत्तर: भारत के मौसम के हिसाब से चिड़ियां का बर्डस हाउस हमेशा उत्तर(North)या पूर्व (East)दिशा की दीवार पर लगानी चाहिए। क्योंकि इस दिशा में लगाने से तेज धूप,बारिश की बौछार और ताप्ती लू आदि सीधे घोंसला में नहीं आ पति है जिससे ये सुरक्षित रहती है।
प्रश्न 3:गौरैया के घोसलें का प्रवेश द्वार का सटीक आकार क्या होनी चाहिए? ▼
उत्तर: गौरैया के कृत्रिम घोसलें के छेद का आकर ३-३.५ सेमी से अधिक नहीं होनी चाहिए। यह आकार वैज्ञानिक रूप से सही है क्योंकि इसमें केवल गौरैया ही जा सकती है। कौवे,मैना,कबूतर या बिल्ली आदि इस घोसलें में नहीं जा सकती है।
प्रश्न 4:बर्ड हाउस लगाने के बाद भी गौरैया क्यों नहीं आ रही है? ▼
उत्तर:गौरैया बहुत ही सतर्क और शर्मीली होती है। नई जगह पर भरोसा करने में उसे २ सप्ताह से २ महिनें तक का समय लग सकता है। यदि घोंसला बहुत ज्यादा हिल रहा हो,आस-पास ज्यादा आवाजाही और हलचल हो या पालतू जानवरों का खतरा हो तो भी गौरैया आने से बचती है।
प्रश्न 5:क्या मोबाइल टावर रेडिएशन सच में गौरैया के खत्म होने के कारण है? ▼
उत्तर:हां!!वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार मोबाइल टावर से निकलने वाले विद्युत चुंबकीय तरंगे गौरैया की आबादी को प्रभावित करता है। इसके कारण गौरैया के अंडे का छिलका पतला हो जाता है। जिससे बच्चे अंडे से बाहर आने से पहले ही मर जाते है। साथ ही इससे उन्हे दिशा-भ्रम होने लगता है।
प्रश्न 6:विश्व गौरैया दिवस कब और क्यों मनाया जाता है? ▼
उत्तर: प्रति वर्ष २० मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' मनाया जाता है। इसकी शुरुआत साल 2010 में पर्यावरणविद मोहम्मद दिलावर की संस्था-'नेचर फारएवर सोसाईटी' ने की थी। ताकि आम लोगों को जागरूक करके इस पालतू चिड़िया को बचाया जा सके।
प्रश्न 7:गौरैया को पानी के साथ मिट्टी या धूल की जरूरत क्यों होती है? ▼
उत्तर: गौरैया पानी में नहाने के साथ-साथ मिट्टी के धूल में भी नहाती है। जिसे डस्ट बाथ कहा जाता है। ऐसा वह अपने पंखों को साफ करने और शरीर पर मौजूद सूक्ष्म-परजीवियों एवं कीड़ों को खत्म करने के लिए करती है।
प्रश्न 8:क्या गौरैया को घर में घोंसला बनाने देना शुभ होता है? ▼
उत्तर: भारतीय संस्कृति और वास्तु-शास्त्र के अनुसार--घर में गौरैया का घोंसला बनाना बहुत ही शुभ माना गया है। ऐसा माना जाता है कि गौरैया घर में सकारात्मक ऊर्जा को लाती है जिससे घर में सुख,शांति एवं समृद्धि तथा खुशहाली होती है।
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