रिले कृषि क्या है? धान की कटाई से पहले ही दूसरी फसल की करें बुआई वैज्ञानिक तरीके से

📌 एक नज़र में: रिले कृषि (Quick Summary)
Key Takeaways
  • क्या है रिले खेती? पहली फसल (धान) की कटाई से 7–10 दिन पहले ही खड़ी फसल में दूसरी फसल (मसूर/खेसारी) के बीज बोने की तकनीक।
  • शून्य जुताई एवं लागत: बिना किसी जुताई (Zero-tillage) के मिट्टी की अवशिष्ट नमी का उपयोग, जिससे खेती की लागत में 50% तक की कमी आती है।
  • सबसे उपयुक्त फसलें: मसूर (WBL-77, पूसा अगेती), खेसारी (रतन), सरसों/तोरिया और अलसी।
  • बीज दर नियम: खुले खेत में बेहतर अंकुरण के लिए सामान्य से 20–25% अधिक बीज और अनिवार्य बीजोपचार आवश्यक है।
  • पर्यावरणीय लाभ: भूजल की बचत, दलहनी फसलों द्वारा प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण और 'Rice-Fallow' भूमि का सदुपयोग।

 


धान खेत में मसूर के बीज पकड़े झारखंड के किसान - रिले कृषि तकनीक की शुरुआत
धान खेत में मसूर के बीज पकड़े किसान — रिले कृषि की शुरुआत


📑 विषय सूची (Table of Contents)
त्वरित नेविगेशन
  1. 1 रिले कृषि क्या है? वैज्ञानिक परिभाषा और बुनियादी सिद्धांत
  2. 2 पैरा / उतेरा और रिले कृषि में संबंध व क्षेत्रीय स्वरूप
  3. 3 रिले कृषि और सामान्य खेती में तुलनात्मक अंतर (FAO संदर्भ)
  4. 4 उपयुक्त फसलें, उन्नत किस्में, बीज दर और बुवाई का समय
  5. 5 बुवाई की संपूर्ण वैज्ञानिक कार्यविधि (Step-by-Step)
  6. 6 प्रमुख चुनौतियां और उनके वैज्ञानिक समाधान
  7. 7 पंचायती राज मंत्रालय का क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि मॉडल
  8. 8 संदर्भ एवं प्रामाणिक स्रोत (ICAR, IRRI, FAO)


प्रस्तावना (Introduction) 

रिले कृषि (Relay Cropping) जिसे बिहार, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में "पैरा" कहा जाता है तो वही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में "उतेरा" कहा जाता है। इसको तो हमलोग बचपन से ही देखते आए है करते हुए।

लेकिन आज इसके बारे में वैज्ञानिक रूप से गहराई के साथ समझते हैं। इसके क्या फायदे हैं और कैसे करनी चाहिए।

धान की कटाई के बाद कभी कभी कई दिनों तक खेत खाली रह जाती है। ऐसे में खाली खेत होने से पोषक तत्व नष्ट भी होने लगती है और मिट्टी की नमी भी भाग सकती है।

इसी का समाधान बन सकता है रिले कृषि।

आज खेती एकल फसल और अधिक जुताई पर आधारित होने से भूमिगत जल का दोहन बढ़ता जा रहा है, मिट्टी की उर्वरता घटती जा रही है तो लागत भी बढ़ती जा रही है। साथ ही लोगों को पारंपरिक रूप से विविध अनाजों का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

रिले कृषि - इन सभी का एक समाधान करता है प्रदान।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के साहित्य के अनुसार रिले कृषि में खड़ी हुई पहली फसल में ही दूसरी फसल की बुआई की जाती है और इसका उद्देश्य समय की बचत, नमी तथा अन्य संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है।

1.रिले कृषि क्या है? वैज्ञानिक परिभाषा और पृष्ठभूमि 

Food and Agriculture Organization (FAO) के कृषि शब्दावली स्रोत के अनुसार "रिले कृषि में अगली फसल को पिछली फसल की कटाई से पहले बोया जाता है"। यानी कुछ समय के लिए दोनों फैसले एक ही साथ एक ही खेत में रहती है।

यानी यह एक बहुफसली खेती प्रणाली है। कृषि विज्ञान की भाषा में इसे "अविराम फसल" या "आवतरण फसल" भी कहा जाता है।

कृषि विज्ञान के अनुसार -

"रिले कृषि वह प्रणाली है जिसमें पहली मुख्य फसल के पकने की अवस्था में, उसकी कटाई से कुछ दिन पूर्व ही खेत में दूसरी फसल के बीज बो दिए जाते हैं। इस प्रकार दोनों फैसले कुछ समय के लिए एक ही खेत में एक साथ जीवन चक्र साझा करती है" 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों ने रिले कृषि को धान आधारित खेती प्रणाली के लिए एक टिकाउ और लाभकारी तकनीक के रूप में मान्यता दी है।

पंचायती राज विभाग ने ICAR और कृषि मंत्रालय के सहयोग से 2026 में जारी किए गए "5 क्लाइमेट स्मार्ट कृषि मॉडल" में रिले कृषि को शामिल किया है जो इसकी राष्ट्रीय महत्ता को दर्शाता है।


रिले कृषि और सामान्य कृषि में क्या अंतर है? 

सामान्य फसल में बुआई पहली फसल की कटाई के बाद ही होती है जबकि रिले कृषि में उससे पहले ही खड़ी फसलों के बीच में ही बुआई हो जाती है।

इस आधार पर दोनों में मुख्य अंतर इस तालिका के माध्यम से समझते हैं -
तुलना का आधार सामान्य क्रमिक खेती (Sequential) रिले कृषि (Relay Cropping)
दूसरी फसल की बुवाई पहली फसल की कटाई के बाद पहली फसल की कटाई से पहले
खेत खाली रहने का समय अपेक्षाकृत अधिक बहुत कम या नहीं
मिट्टी की नमी कई बार अगली फसल तक कम हो सकती है अवशिष्ट नमी का तुरंत सदुपयोग
जुताई (Tillage) अक्सर आवश्यक (3-4 जुताई) पैरा/उतेरा में जुताई बहुत कम या शून्य
समय की बचत सीमित अधिक (15–20 दिन अगेती बुवाई)
उपयुक्त क्षेत्र विभिन्न सिंचित क्षेत्र विशेषकर नमी-आधारित और Rice-Fallow क्षेत्र
प्रमुख उदाहरण धान → जुताई के बाद गेहूँ धान + खड़ी फसल में बोई गई मसूर/खेसारी
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) संदर्भ: FAO के अनुसार, Relay Cropping और Sequential Cropping के बीच मुख्य वैज्ञानिक अंतर यही है कि रिले पद्धति में अगली फसल पिछली फसल की कटाई से पहले ही स्थापित (Establish) हो जाती है।


2. धान में रिले कृषि के लिए कौन कौन सी फसलें उपयुक्त है? 

रिले कृषि के लिए फसल चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसी फसल चुननी चाहिए जो कम समय में पक जाए, कम सिंचाई पर जीवित रहे और धान की कटाई के बाद बची हुई मिट्टी की नमी का लाभ उठा सकें।
धान के बाद उपयुक्त रिले फसलें
🌱 दलहनी फसलें
खेसारी, मसूर, चना, मूंग
🌾 तिलहन एवं अन्य
अलसी, सरसों / तोरिया

दूसरी बात यह कि धान के खेत में केवल वही फसलें सफल हो सकती है जो कम ऑक्सीजन, अत्यधिक नमी और बिना जुताई वाले सघन मिट्टी में भी जड़ें जमाने में सक्षम हो।

नीचे दी गई तालिका में धान खेत में उपयुक्त रिले कृषि फसलों, उनकी किस्मों, बीज दर और बुआई से समय की जानकारी दी गई है -

फसल उपयुक्त किस्में बीज दर (kg/ha) बुवाई का समय
🌱 मसूर लोकप्रिय WBL-77 (Moitree), L-4717 (Pusa Ageti), KLS-09-3, PL-8, IPL316 30–40 धान कटाई से
7–10 दिन पहले
🌾 सरसों / तोरिया Pusa Bold, Varuna, स्थानीय तोरिया 4–5 धान कटाई से
7–10 दिन पहले
🌱 मूंग IPM 2-3, स्थानीय किस्में 25–35
(रिले हेतु उच्च)
धान कटाई से
7–10 दिन पहले
🌱 उरद स्थानीय किस्में, PU-31 25–30 धान कटाई से
7–10 दिन पहले
⭐ विशेष नोट: मसूर रिले क्रॉपिंग के लिए सबसे लोकप्रिय फसल है, क्योंकि यह बहुत कम समय (90–110 दिन) में पककर तैयार हो जाती है।


मसूर रिले कृषि के लिए सबसे लोकप्रिय फसल है क्योंकि यह कम समय (90 से 120 दिनों में) पक जाती है। यह धान की कटाई के बाद बची नमी पर भी आसानी से उग जाती है।

ICAR की सलाह के अनुसार मसूर की बुआई धान की कटाई से 7-10 दिन पहले या यह स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से ज्यादा दिन भी हो सकता है करनी चाहिए ताकि बीज अंकुरित हो जाए और धान काटने के बाद फसल आसानी से स्थापित हो जाए।

सरसों या तोरी भी रिले कृषि के लिए अच्छा विकल्प होती है। साथ ही तिलहन में अलसी यानी तीसी का भी सालों से उपयोग रिले कृषि में बिहार आदि क्षेत्रों में किया जाता रहा है।

मूंग और उड़द एक आदर्श रिले कृषि फसलें है क्योंकि यह खुद ही मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती है और इनमें उर्वरक भी कम लगता है। यह 60-75 दिनों में ही तैयार हो जाती है।


धान की कटाई से पहले अंकुरित भी हो जाती है रिले कृषि की फसलें
धान की कटाई से पहले अंकुरित हो चुकी रिले कृषि की फसल


3. रिले कृषि की पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक विधि के साथ 


धान के खड़ी खेत में दूसरी फसल की बुआई केवल बीज को लेकर खेत में छींट देना ही नहीं होता है। बल्कि यह सूक्ष्म समय प्रबंधन का विज्ञान है।

इसके लिए वैज्ञानिक रूप से निम्नलिखित प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए -


चरण 1: खेत की तैयारी और नमी की जांच 

रिले कृषि में फसल बोने का यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। जिस खेत में रिले कृषि करना है उसमें धान की सिंचाई रिले बुआई से 15-20 दिन पहले बंद कर देनी चाहिए और पानी निकाल देनी चाहिए।

अब नमी की आदर्श स्थिति की जांच करनी चाहिए। आदर्श स्थिति तब होती है जब मिट्टी पर पैर रखने से निशान तो बने लेकिन पैर गहराई तक यानी 1-2 सेंटीमीटर से ज्यादा न धंसे।


चरण 2: बीज दर का निर्धारण और चयन 

रिले कृषि में बीज दर सामान्य बुआई से  20-30% अधिक ही रखनी चाहिए। क्योंकि धान की ठूंठ और पत्तियों के बीच कुछ बीज फंस कर नष्ट हो जाते हैं और कुछ चिड़िया चुग लेती है।

मसूर का बीज 30-35kg हेक्टेयर, सरसों का 4-5kg, मूंग का 25-35kg और उड़द का 25-30kg प्रति हेक्टेयर बीज दर रखनी चाहिए।

बीजों को बुआई से 3-5 घंटे पहले पानी में भिगो देना चाहिए। इससे अंकुरण तेजी से होता है। हो सके तो बीजों को राइजोबियम कल्चर या फफूंदनाशी से उपचारित कर लेनी चाहिए।


चरण 3: बुआई की विधि और सटीक समय 

जब धान की बालियां सुनहरी पीली हो जाए और दाने को दबाने पर आटा की अवस्था से अधिक होकर कठोर हो चुकी हो उस समय रिले बुआई करनी चाहिए।

रिले कृषि के लिए छींटकाव बुआई सबसे उपयुक्त विधि होता है। बीजों को रेत या सूखी मिट्टी के 1:3 के अनुपात में मिला लेनी चाहिए ताकि पूरे खेत में एक समान रूप से छींटाई हो सके।

कोशिश यह करनी चाहिए कि बीज मिट्टी की दलदली चिपचिपी सतह में जाकर धंस कर दब जाए।


चरण 4: धान की कटाई में सावधानी 

जिस धान के खेत में रिले कृषि कर रहे हैं उस खेत की धान की कटाई जमीन की सतह से कम से कम 10-15 सेमी ऊपर ही सावधानी से करनी चाहिए।

इससे नीचे उग रहे पौधों को नुकसान नहीं होता है। कटाई के बाद धान के बंडल को तुरंत खेत से बाहर निकाल देना चाहिए। उसे कई दिनों तक खेत में न छोड़े।

4. पोषक तत्व, जल और रोग प्रबंधन 


चूंकि रिले कृषि में खेत की जुताई नहीं होती है इसलिए आधार खाद और उर्वरक डालना भी संभव नहीं होता है। दूसरा यह कि यदि धान में पर्याप्त उर्वरक दिया गया है तब इसमें उर्वरक की कम मात्रा ही लगेगी।

इसके लिए वैज्ञानिक रणनीति निम्नलिखित होनी चाहिए -


लिक्विड उर्वरक का करें छिड़काव: 

धान की कटाई के 20-25 दिनों के बाद जब शाखाएं निकलने लगते हैं तब और दूसरी बार 45 दिनों के बाद जब फुल आने लगते हैं उर्वरक का छिड़काव करना चाहिए।

करीब 2% DAP का घोल और 1% NPK का घोल का छिड़काव करना चाहिए। सल्फर की कमी वाले क्षेत्रों में जिप्सम का भी छिड़काव उपयोगी रहता है।

यदि 0.5% जिंक और 0.25% बुझा हुआ चूना मिलकर छिड़काव करते हैं तो यह सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर कर देता है।


सिंचाई का प्रबंधन: 

रिले फसल की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि इसको धान की बची हुई नमी से ही उगाया जा सकता है। इसमें ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। थोड़ा बहुत बारिश होने से भी यह बहुत बढ़िया हो जाती है।

लेकिन यदि मिट्टी में दरारें पड़ने लगे और पौधे मुरझाने लगे तो हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इसकी सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर सिंचाई सिस्टम सबसे ज्यादा उपयोगी होता है।

खुले पानी के भराव वाले सिंचाई बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए। इससे पौधे सड़ जाते हैं।


खर पतवार और कीट प्रबंधन: 

यदि खर पतवार ज्यादा हो तो जहां तक संभव हो निराई गुनाई करनी चाहिए। इससे पशुओं को चारा भी उपलब्ध हो जाता है। 
दलहनी फसलों में क्विजलोकॉफ पी एथिल का 50 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर सकते हैं।

इसके अलावा आप फसलों के हिसाब से रोगों एवं कीटों के प्रकोप के आधार पर अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेकर कीटनाशक और अन्य उपायों को अपना सकते हैं।


कटाई और अगली फसल की योजना: 

रिले फसल की कटाई के बाद तुरंत अगली फसल यानी गर्मियों के फसल की योजना बना सकते हैं। रिले फसलों में अधिकतर नाइट्रोजन स्थिरीकरण वाले फसल होते हैं जिसका लाभ मिट्टी को मिलता है।

इससे खेत में सालों भर उत्पादकता बनी रहती है।


5. रिले कृषि की आर्थिक और अन्य लाभ 


सवाल यह उठता है कि रिले कृषि से क्या लाभ है? इसके लाभों को केवल कृषिगत लाभ और आर्थिक लाभ से ही नहीं मापा जाना चाहिए। इसके पर्यावरणीय और अन्य लाभ भी है जिनको उपेक्षित नहीं किया जा सकता है।

इसके लाभों को निम्नलिखित तरह से समझ सकते हैं -


1. शून्य जुताई लागत और इनपुट लागत में 50% तक की कमी: 

खेती में दिनों पर दिन लागत बढ़ती जा रही है। ऐसे में रिले कृषि का महत्व महत्वपूर्ण रूप से बढ़ जाता है।

जहां पारंपरिक बुआई में कई बार जुताई करना पड़ता है और पटा लगाना पड़ता है लेकिन रिले कृषि में यह बिल्कुल शून्य रहता है।


2. मिट्टी की नमी का अधिकतम संरक्षण और सिंचाई में बचत:

रिले कृषि में धान की खेती की नमी का संरक्षण हो जाता है और उसी नमी से रिले फसलें तैयार हो जाती है। इसमें पारंपरिक कृषि की तुलना में 30% से 40% कम सिंचाई की आवश्यकता होती है।

इससे किसान का सिंचाई के कार्यों में होने वाला समय एवं मजदूरी की भी बचत हो जाती है।


3. रबी फसलों की समय पर बुआई: 

रबी सीजन में किसानों को एक ओर धान की कटाई तो दूसरी ओर रबी फसलों की बुआई भी करनी होती है।

इस कारण से कई बार रबी फसलों की बुआई में देरी हो जाती है।इसका सीधा असर रबी फसलों की उत्पादकता, खेत का कई दिनों तक खाली रहना और किसानों की आय पर होता है।

लेकिन रिले कृषि में कम से कम 15-20 दिन पहले ही रबी फसलों की बुआई हो जाता है।

4. नाइट्रोजन स्थिरीकरण और मिट्टी का स्वास्थ्य: 

आज के समय में किसान जहां एक ही फसल की खेती करते हैं और इसके कारण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कमजोर होती जा रही है।

वही रिले कृषि में धान के बाद अधिकतर दलहनी फसलें लगाई जाती है जो वातावरण से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं। अतः ICAR के अनुसार इस प्रणाली से शुद्ध नाइट्रोजन भूमि में बढ़ जाता है।

साथ ही इससे मिट्टी में जैव कार्बन बढ़ती है और मिट्टी की संरचना सुधरती है।


5. कई क्षेत्रों में आर्थिक लाभ बढ़ती है: 

उड़ीसा में किया गए अध्ययन के अनुसार मूंग और उड़द की रिले फसलों में प्रति हेक्टेयर 875kg उपज प्राप्त हुई जो सामान्य फसलों की तुलना में 31.6% अधिक थी।

पूर्वी गंगा मैदान में इस प्रणाली से उत्पादकता में 187% और लाभप्रदता में 299% की वृद्धि हुई।

मध्य प्रदेश की मुरैना में सरसों में बरसेम की रिले खेती में पूरी उत्पादकता में 35 से 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हो सकता है हर जगह और हर परिस्थिति में यह उत्पादकता नहीं भी मिले।

लेकिन इसमें किसानों को होने वाली लागत तो कम हो ही जाता है जिससे लाभदायकता में कमी नहीं हो पाती है।


6. पर्यावरणीय लाभ भी है महत्वपूर्ण: 

इसका अनदेखा करना मानवता के पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसा हो सकता है।

इसका सबसे पड़ा पर्यावरणीय लाभ है - जल संरक्षण। कम सिंचाई की आवश्यकता के कारण भूमिगत जल और सतही जल की बड़ी मात्रा में बचत हो जाती है।

खेत खाली नहीं रहने से मिट्टी का कटाव कम होता है और मिट्टी के सूक्ष्मजीव बने रहते हैं। इससे जैव विविधता में बढ़ोतरी होती है। इसमें खेत की मेड़ का भी सही उपयोग हो पाता है।

यद्यपि जरूरी नहीं कि रिले कृषि में उत्पादन हमेशा अधिक ही हो।सामान्यतया देखने में यह आता है कि रिले कृषि के उत्पादन की तुलना में सामान्य कृषि में प्रति हेक्टेयर 1-2 क्विंटल अधिक उपज मिल सकती है।

लेकिन रिले कृषि का लागत - लाभ अनुपात (Benefit Cost Ratio) काफी ऊंचा रहता है क्योंकि इसमें पूंजीगत जोखिम लगभग नगण्य होता है।


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6. प्रमुख चुनौतियां और उनके वैज्ञानिक समाधान 


रिले कृषि चुनौतियों से रहित नहीं है। इसकी भी अपनी कुछ सीमाएं है। यदि इन चुनौतियों का वैज्ञानिक समाधान का रास्ता मिल जाए तो निःसंदेह इसका लाभ अविस्मरणीय रूप से बढ़ जाएगा।
⚠️ मुख्य चुनौती ✅ वैज्ञानिक व व्यावहारिक समाधान
1. बीज अंकुरण कम होना अनुकूल नमी (Optimum moisture) पर बुवाई करें, बीज दर को 20–30% बढ़ाएं और बीजोपचार (राइजोबियम / फफूंदनाशक) अनिवार्य रूप से करें।
2. खरपतवार दबाव धान की ठूंठ को मल्च के रूप में उपयोग करें, बुवाई के 20–25 दिन बाद हल्की निराई करें या जैविक खरपतवारनाशक का प्रयोग करें।
3. कीट-रोग प्रकोप एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) अपनाएं, नीम तेल या गौमूत्र का नियमित छिड़काव करें और रोग प्रतिरोधी किस्मों का ही चयन करें।
4. किसानों में जागरूकता की कमी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और ICAR के प्रदर्शन खेतों का भ्रमण करें, संबंधित सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं और किसान प्रशिक्षण सत्रों में भाग लें।
5. धान की यांत्रिक कटाई 'सुपर एसएमएस' (Super SMS) लगे कंबाइन हार्वेस्टर का प्रयोग करें, जो पुआल को बारीक काटकर पूरे खेत में एकसमान फैला देता है और वह मल्च (Mulch) की तरह कार्य करता है।
💡 स्मार्ट सुझाव: समय प्रबंधन और सही बीजोपचार रिले प्रणाली की 80% सफलता तय करते हैं। कटाई से पहले खेत में नमी का स्तर सही होना सबसे अहम है।

1. अंकुरण की अनिश्चितता और कमी: 

रिले कृषि में फसल की बुआई में बीज खुले खेत में डाले जाते हैं जिससे जिसके कारण कई बीज मिट्टी और नमी के संपर्क में नहीं आते और कई बीजों को चिड़िया आदि चुग लेती है। इससे अंकुरण में कमी आ जाती है।

व्यवहारिक समाधान के तौर पर बीजों को बोने से पहले बीजोपचार और 4-6 घंटे तक पानी में भिगो देने से बीज भारी हो जाते हैं और खेत में डालने पर मिट्टी को पकड़ लेते हैं।

दूसरा कम से कम 25-30 प्रतिशत अधिक बीजों के उपयोग से इस अनिश्चितता को कम किया जा सकता है।


2. धान की यांत्रिक कटाई: 

आज के समय में धान की कटाई सबसे अधिक हार्वेस्टर से किया जाता है। यह रिले कृषि से लिए सबसे ज्यादा व्यवहारिक कठिनाई पैदा करती है।

क्योंकि इससे धान की कटाई में भारी यंत्र से अंकुरित फसल दब जाते और और दूसरा पुआल के पराली में भी दब जाते हैं। इससे फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है।

लेकिन यह भी देखा गया है कि यदि हार्वेस्टर से कटाई के समय खेत में ज्यादा नमी न हो और कटाई के बाद पराली हटा दिया जाए तो रिले कृषि फसल की उत्पादकता पर खास फर्क नहीं होता है।

साथ ही "Super SMS" लगा हुआ हार्वेस्टर से कटाई करने पर इस समस्या का समाधान हो जाता है।


3. किसानों में जागरूकता की कमी: 

पहले जहां हरेक किसान कुछ न कुछ खेती की जमीन पर रिले कृषि यानी "पैरा" जरूर करते थे। लेकिन आज के समय में इस जागरूकता में कमी आ गई है।

आज नए किसान अधिकतर धान की कटाई के बाद वैसा ही फसल बोना चाहते हैं जिसे हार्वेस्टर से ही कटाई किया जा सकें।

रिले कृषि में सबसे अधिक मसूर, खेसारी, चना, सरसों,मूंग और तीसी आदि की खेती किया जाता है। इनमें से अधिकतर को यांत्रिक यानी हार्वेस्टर से कटाई करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता है।

अतः इसके समाधान के लिए किसानों को विभिन्न माध्यमों के माध्यम से कृषि विज्ञान केंद्रों,ICAR के द्वारा जागरूक किया जाना चाहिए। छोटे और सीमांत किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए।


7. सरकारी योजनाएं और प्रोत्साहन 


रिले कृषि की विशेषताओं, खूबियों और लाभों को देखते हुए सरकार इसको बढ़ावा देने के लिए कई प्रकार की कदमों को उठा रही है। इसमें किसानों को जागरूक करने के साथ साथ कई योजनाओं को संचालित किया जाना भी शामिल है।

मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार से किसान रिले कृषि को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चला रही है --


1. पंचायती राज विभाग द्वारा शुरू किए गए "5 क्लाइमेट स्मार्ट कृषि मॉडल": 

पंचायती राज विभाग द्वारा ICAR और कृषि मंत्रालय के सहयोग से गिरते भूजल स्तर, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन प्रभावों से निपटने के लिए "5 क्लाइमेट स्मार्ट कृषि मॉडल" शुरू किया गया है।

इसमें रिले कृषि फसल मॉडल को शामिल किया गया है। इसमें ग्राम पंचायत विकास योजना के तहत "कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के सहयोग से किसानों को बीज और इनपुट सहायता और जागरूकता बढ़ाने का काम किया जाता है।


2. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY):

इसके माध्यम से किसानों को ड्रिप सिस्टम एवं स्प्रिंकलर सिंचाई सिस्टम में सब्सिडी एवं अन्य सहायता प्रदान किया जाता है। साथ ही जल संरक्षण को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए भी सहायता का प्रावधान शामिल है।


3. नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन (NFSM): 

इसके तहत देश में दलहन और तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए सब्सिडी और बीज सहायता आदि प्रदान किया जाता है। रिले कृषि करने वाले किसानों के लिए यह मददगार हो सकती है।

किसान दलहनी फसलों मसूर, खेसारी और चना एवं मूंग आदि और तिलहन फसलों सरसों और तीसी के लिए सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

इसके अलावा "राष्ट्रीय कृषि विकास योजना" (RKVY) के माध्यम से नवीन कृषि योजनाओं को वित्तीय एवं अन्य सहायता प्रदान किया जाता है।

किसान को चाहिए कि वह अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या ब्लॉक कृषि कार्यालयों से जाकर इन योजनाओं का जानकारी एवं लाभ उठा सकते हैं।


भारत सरकार के द्वारा भी रिले कृषि को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं चलाई जा रही है
भारत सरकार के द्वारा रिले कृषि प्रोत्साहन योजना का लाभ उठाता किसान


8.निष्कर्ष (Conclusion) 


क्या किसान को रिले कृषि अपनानी चाहिए? 

रिले कृषि को देश में पहले से ही परंपरागत रूप से "पैरा" आदि नामों से किया जाता रहा है। इसकी अपनी विशेषताएं है जिसके कारण सरकार के द्वारा भी इसको प्रोत्साहन प्रदान किया जा रहा है।

यह धान आधारित खेती के लिए एक गेम चेंजर साबित हो रही है।खेत खाली रहने की समस्या को हल करने से लेकर यह कम सिंचाई, कम लागत और अधिक उत्पादन के माध्यम से किसानों की आय को बढ़ाती है।

छोटे और सीमांत किसान जो कम संसाधनों के माध्यम से खेती करते हैं उनके लिए कम जोखिम वाला और अधिक लाभकारी विकल्प है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जब पानी की कमी और मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है तब रिले कृषि एक टिकाऊ एवं पर्यावरण अनुकूल खेती के माध्यम के रूप में उभरी है।

यदि आप भी एक किसान है और कृषि में रुचि रखते हैं तो रिले कृषि फसल को अपनी खेती का हिस्सा जरूर बनाइए। इससे अपनी भी आय को बढ़ाइए और देश की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान प्रदान कीजिए।

9.अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)

1. रिले कृषि क्या होती है?

 कृषि विज्ञान के अनुसार -


"रिले कृषि वह प्रणाली है जिसमें पहली मुख्य फसल के पकने की अवस्था में, उसकी कटाई से कुछ दिन पूर्व ही खेत में दूसरी फसल के बीज बो दिए जाते हैं। इस प्रकार दोनों फैसले कुछ समय के लिए एक ही खेत में एक साथ जीवन चक्र साझा करती है" 

2. धान के साथ कौन सी रिले फसलें ली जा सकती है?

ऐसी फसल चुननी चाहिए जो कम समय में पक जाए, कम सिंचाई पर जीवित रहे और धान की कटाई के बाद बची हुई मिट्टी की नमी का लाभ उठा सकें। इसको ध्यान में रखते हुए मसूर, खेसारी, उड़द, चना, मटर, तीसी, सरसों और मूंग जैसी फसलों को उगाया जा सकता है।


इसके लिए स्थानीय मौसम और परिस्थितियों के अनुसार अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से सलाह लेनी चाहिए।

3. रिले फसल कब बोई जाती है?

ICAR की सलाह के अनुसार रिले फसलों की बुआई धान की कटाई से 7-10 दिन पहले ही करनी चाहिए ताकि बीज अंकुरित हो जाए और धान काटने के बाद फसल आसानी से स्थापित हो जाए।

4. क्या रिले खेती में जुताई करनी पड़ती है?

बिल्कुल नहीं! रिले कृषि में धान की कटाई करने से पहले खड़ी फसलों में ही बुआई किया जाता है। अतः इसमें खेत की जुताई की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती है।

5. क्या रिले कृषि में इनपुट लागत कम होती है!

हां! शून्य जुताई लागत और इनपुट लागत में 50% तक की कमी होती है। सिंचाई कम, उर्वरक कम, मजदूरी कम और समय का भी बचत होता है।खेती में दिनों पर दिन लगत बढ़ती जा रही है। ऐसे में रिले कृषि का महत्व महत्वपूर्ण रूप से बढ़ जाता है।


जहां पारंपरिक बुआई में कई बार जुताई करना पड़ता है और पटा लगाना पड़ता है लेकिन रिले कृषि में यह बिल्कुल शून्य रहता

 है।

6. रिले खेती में बीज को कब बोना चाहिए और क्या करना चाहिए?

रिले कृषि में फसल बोने का यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। जिस खेत में रिले कृषि करना है उसमें धान की सिंचाई रिले बुआई से 15-20 दिन पहले बंद कर देनी चाहिए और पानी निकाल देनी चाहिए।


अब नमी की आदर्श स्थिति की जांच करनी चाहिए। आदर्श स्थिति तब होती है जब मिट्टी पर पैर रखने से निशान तो बने लेकिन पैर गहराई तक यानी 1-2 सेंटीमीटर से ज्यादा न धंसे।

7. पंचायती राज विभाग द्वारा शुरू किए गए "5 क्लाइमेट स्मार्ट कृषि मॉडल क्या है?

पंचायती राज विभाग द्वारा ICAR और कृषि मंत्रालय के सहयोग द्वारा गिरते भूजल स्तर, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन प्रभावों से निपटने के लिए "5 क्लाइमेट स्मार्ट कृषि मॉडल" शुरू किया गया है।


इसमें रिले कृषि फसल मॉडल को शामिल किया गया है। इसमें ग्राम पंचायत विकास योजना के तहत "कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के सहयोग से किसानों को बीज और इनपुट सहायता और जागरूकता बढ़ाने का काम किया जाता है।

8. क्या रिले कृषि में बीज का अंकुरण कम होता है?

हां! रिले कृषि में फसल की बुआई में बीज खुले खेत में डाले जाते हैं जिससे जिसके कारण कई बीज मिट्टी और नमी के संपर्क में नहीं आते और कई बीजों को चिड़िया आदि चुग लेती है। इससे अंकुरण में कमी आ जाती है।


व्यवहारिक समाधान के तौर पर बीजों को बोने से पहले बीजोपचार और 4-6 घंटे तक पानी में भिगो देने से बीज भारी हो जाते हैं और खेत में डालने पर मिट्टी को पकड़ लेते हैं।


दूसरा कम से कम 25-30 प्रतिशत अधिक बीजों के उपयोग से इस अनिश्चितता को कम किया जा सकता है।


संबंधित विषय: 



📚 संदर्भ एवं प्रामाणिक स्रोत (References & Citations)
  1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR): Handbook of Agriculture (Agronomy & Resource Conservation Technologies), नई दिल्ली।
  2. अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI): Rice-Fallow Management and Crop Intensification in South Asia, Research Report Series.
  3. इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV), रायपुर: उतेरा खेती की उन्नत पैकेज एवं पद्धतियां - तकनीकी बुलेटिन।
  4. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा: धान-आधारित फसल प्रणालियों में पैरा कल्टीवेशन के वैज्ञानिक आयाम।
  5. खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO): Conservation Agriculture: Principles and Global Status of Relay Cropping Systems.
लेखक नोट: यह ब्लॉग आलेख ICAR, KVK, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और प्रतिष्ठित कृषि प्रकाशनों पर आधारित है। किसान भाई अपने स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विभाग के अधिकारियों से सलाह लेकर ही अपने खेत की परिस्थितियों के अनुसार रिले क्रॉपिंग शुरू करें।

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