ओल (सूरन)क्या है जिसे जिमीकंद भी कहते है?
- सूरन में पाए जाने वाले पोषक तत्व कौन कौन से है
- ओल के क्या क्या व्यंजन बनाए जाते है?
- ओल की मुख्य किस्में कौन कौन सी है
- खेती करने की स्टेप बाइ स्टेप विधि की जानकारी
- खर्च और लाभ के विवरण के साथ कमाई का गणित
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| ओल (सूरन) की खेती बिना रिस्क के कम लागत में भी लाखों का इंकम देनेवाला |
📑 Table of Contents
प्रस्तावना (Introduction)
भारत में कई ऐसी सब्जी की फसलें है जो कम लागत में अधिक मुनाफा देने की क्षमता रखती है,और 'ओल' या सूरन (Elephant Foot Yam) उन्ही में से एक महत्वपूर्ण कंद फसल है जिसे जिमीकंद भी कहा जाता है। बढ़ती जनसंख्या और बदलती खान-पान की आदतों नें सालोंभर सब्जियों की मांग को बढ़ा दिया है जिससे सूरन की खेती किसानों के लिए 'कैश क्रॉप" फसल बन गया है।
आजकल ओल की मांग घरेलू से लेकर होटलों,रेस्टूरेंट के साथ साथ आचार और चिप्स उद्योग में भी बनी हुई है।इसे 'किचन का राजा' भी कहा जाता है क्योंकि यह स्वाद के साथ 'सेहत' का भी खजाना है। इसका भंडारण लंबे समय तक किया जा सकता है जल्दी खराब नहीं होता,इसलिए और विशिष्ट बन जाता है।
आज के दौर में इस कम जोखिम और ज्यादा मुनाफा वाली 'ओल' की उन्नत खेती की पूरी प्रक्रिया,इसके फायदे,लागत और कमाई को सरलता से विस्तार में जानकारी हासिल करेंगे ताकि किसान भाई आसानी से इसका खेती कर सके और अपनी आय को बढ़ा सके।
ओल में कौन से पोषक तत्व पाए जाते है ?
- शरीर को धीरें धीरें ऊर्जा देते है और थकान कम करते है।
- किसान और मजदूर के लिए इसीलिए अच्छा माना जाता है।
- इसीलिए इसे नेचुरल एनर्जी फूड कहा जाता है।
- कब्ज दूर के पाचन को मजबूत करता है।
- पेट साफ रखने के साथ वजन घटाने में मदद करता है।
- ब्लडप्रेशर को कंट्रोल करता है एवं हार्ट अटैक का खतरा को कम करता है।
- शरीर में पानी के संतुलन को बनाए रखता है।
- याददाश्त को बढ़ाकर दिमाग को एक्टिव रखता है।
- साथ ही यह तनाव को कम करने में मदद करता है।
- शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
- सर्दी जुकाम से भी रक्षा करता है।
- त्वचा को स्वास्थ्य बनाता है।
- शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ता है और ये एनीमिया से बचाता है।
- महिलाओं के लिए विशेष रूप से फायदेमंद होता है।
- हड्डियों और दातों को मजबूत बनाता है।
- कैंसर का खतरा कम होता है।
- शरीर की कोशिकाओं की रक्षा करता है।
- उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है।
ओल से क्या क्या बनाए जाते है ?
- ओल की सुखी सब्जी: सबसे ज्यादा घरों में यही बनाया जाता है। ओल को टुकड़ों में काटकर फिर उसे उबालकर मसलों मे भूनकर खट्टा अमचूर या नींबू डालकर बनाया जाता है।
- ओल की ग्रेवी वाली सब्जी: रोटी और चावल दोनों के साथ बहुत स्वादिष्ट लगती है। यह बिल्कुल पनीर की सब्जी का टेस्ट प्रदान करती है।
- ओल के कोफ्ते: ये बहुत स्पेशल डिश है जो होटलों और शादी पार्टियों में भी बनाई जाती है।
- ओल के कवाब टिक्की: इसे टेस्टी स्नैक के रूप में चटनी के साथ चाव से खाया जाता है।
- ओल का भर्ता: ओल का भर्ता बहुत टेस्टी,हेल्दी और देशी स्वाद प्रदान करता है।
- ओल के चिप्स: लंबे समय तक स्टोर और उपयोग कर सकते है एवं बाजार में महंगी भी मिलती है।
- ओल का आचार: हर घर में खासकर सर्दियों में ज्यादा बनाया जाता है और लंबे समय तक उपयोग होता है। इसकी चटनी भी आचार जैसी होती है।
- ओल की कढ़ी: उत्तर भारत में बनाई जाती है जो स्वादिष्ट और पाचन में हल्की होती है।
- ओल का बिरियानी पुलाव: शाकाहारी लोगो के लिए बेहतरीन "वेज मीट" जैसा स्वाद प्रदान करता है। इसका चलन बढ़ता जा रहा है।
ओल की खेती क्यों करें ?
- यदि आप एक एकड़ में 70-80 हजार खर्च करते है, तो सही प्रबंधन से 3-4 लाख तक की फसल प्राप्त कर सकते है।
- इसका बीज थोड़ा महंगा आता है,लेकिन एक बीज के फसल को अगले साल भी बीज के रूप में इस्तेमाल कर सकते है।
- सभी फसलों में हमेशा बर्बादी का खतरा बना रहता है और ओल में बिल्कुल नहीं।
- गाय,नीलगाय,सूअर या अन्य जंगली पशु भी इसके पत्तों को नहीं खाते है।
- अन्य फसलों की तुलना में इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होता है और जल्दी कोई रोग नहीं लगता है,इसलिए कीटनाशकों का बचत हो जाता है।
- इसे खेत से निकालने के बाद तुरंत बेचनें का झंझट नहीं होता है। आप इसे कई महीनों तक ठंडी या सुखी जगह पर स्टोर कर सकते है।
- जब बाजार में भाव बढ़ जाए तब इसे बेच सकते है। और जब भाव न हो तो आसानी से स्टोर कर सकते है।
- ओल के पौधों को बढ़ने में समय लगता है और इसके पौधों के बीच दूरी और खाली जगह होती है।
- आप खाली जगह में अदरख,हल्दी या हरी सब्जियां भी साथ में ही उगा सकते है।
- ओल केवल एक सब्जी ही नहीं,बल्कि औषधि भी है क्योंकि यह बवासीर,कब्ज और पेट के रोगों में विशेष प्रभावी है।
- इसके आयुर्वेदिक महत्व के कारण दवा कंपनियां इसे थोक में खरीदती है।
- ओल एक ऐसी फसल है जो अत्यधिक गर्मी को भी सहन कर लेती है इसलिए बहुत ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है।
- अगर किसी साल बारिश कम भी पड़ती है तो इसके उत्पादन पर कोई फरक नहीं पड़ता है।
ओल की उन्नत किस्में कौन सी है ?
- आंध्र प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई है।
- इसमें खुजली बिल्कुल नहीं होती है। इसका गुदा पीला और स्वादिष्ट होता है।
- यह बहुत तेजी से बढ़ती है और एक एकड़ में 150 से 250 क्विंटल तक पैदावार दे सकती है।
- बुआई के 7-8 महिनें में तैयार हो जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों के लिए यह 'गोल्ड स्टैंडर्ड" किस्म है।
- इसके कंद का आकार बहुत ही सुडौल और गोल होता है।
- खाने में मुलायम और स्वादिष्ट एवं खरास न के बराबर होती है।
- इसकी औसत पैदावार 40-50 टन प्रति हेक्टेयर हो सकती है।
- यह किस्म रोगों और कीटों के प्रति काफी प्रतिरोधी होती है।
- इसके कंद थोड़े गहरे रंग के होते है और इसका गुदा ठोस पीला सफेद होता है।
- इसे सब्जी और कमर्शियल पाउडर बनाने बहुत उपयुक्त माना जाता है।
- ये बहुत तेजी से पकती है और अन्य किस्मों की तुलना में जल्दी तैयार हो जाती है।
- इसका स्वाद लाजवाब होता है इसीलिए व्यापारी इसे हाथों-हाथ खरीद लेते है।
- यह बहुत कम सिंचाई और खाद पानी में भी अच्छी होती है।
- इसके पौधे काफी मजबूत होते है।
ओल की खेती की स्टेप बाइ स्टेप गाइड
- समय: ओल की बुआई का सबसे सटीक समय अप्रैल से जून होता है। मानसून आने से पहले इसकी बुआई कर देनी चाहिए ताकि बारिश के पानी का पूरा लाभ इसे मिले।
- तापमान: 25 डिग्री सेल्सियस से ३५ डिग्री सेल्सियस तक का तापमान इसकी वृद्धि के लिए अच्छा माना जाता है।
- मिट्टी का चयन: ओल के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है।जल निकासी अच्छी होनी चाहिए ताकि सड़न होने का खतरा न रहे।
- जुताई: खेत को दो तीन बार गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। अंतिम जुताई के समय प्रति एकड़ १०-१५ टन सड़ी हुई गोबर की खाद जरूर डालें।
- टुकड़े का वजन: ओल के पूरे कंद को नहीं बोया जाता है। एक बड़े कंद को कई टुकड़ों में काटा जाता है। प्रत्येक टुकड़े का वजन ५०० ग्राम से 700 ग्राम के बीच होनी चाहिए।
- कालिका: ध्यान रहे की प्रत्येक कटे हुए टुकड़ों पर कम से कम एक 'आँख' या कालिका बिन्दु जरूर हो।
- कवाकनाशक घोल: इसके लिए आप २ ग्राम "कार्बेन्डाजिम"(Carbendazim) को १ लीटर पानी में घोल ले और कटे हुए टुकड़ों को इसमें १०-१५ मिनट के लिए डुबो दे।
- सुखाना और लेप: उपचार के बाद २४ घंटे के लिए इसे छाया में सुखाए। कई जगह इसके बाद गोबर का लेप भी लगाया जाता है जो कांड को सूखने से बचाता है।
- गड्ढे की खुदाई: आप ६०x60x45 सेंटीमीटर (लंबाईxचौड़ाईxगहराई) के गड्ढे तैयार कर ले।
- दूरी: कतार से कतार और पौधों से पौधों की दूरी 2 फिट (60 सेमी) रखे।
- खाद मिश्रण: गड्ढे भरते समय ऊपरी मिट्टी के साथ गोबर की खाद और नीम की खली मिलाए। नीम की खली दीमक से बचाती है।
- बुआई: कंद को गड्ढे में सीधा रखे और 10-15 सेमी मिट्टी से ढक दे।
- यह मिट्टी की नमी बनाए रखता है और खर पतवार रोकता है एवं अंकुरण में मदद करता है।
- सिंचाई: अगर बारिश समय पर न हो तो 15-20 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करे। बारिश के दौरान सिंचाई की जरूरत नहीं होती है।
- खाद: बुआई के 2 महीनों के बाद जब पौधे निकल आए प्रति एकड़ 40 किलो नाइट्रोजन यूरिया का टॉप ड्रेसिंग कर दे।
- संकेत: बुआई के 7-9 महीनों बाद जब पौधों की पत्तियां पीली होकर पूरी तरह से सुख जाए और जमीन पर गिर जाए तो समझे फसल तैयार हो गया है।
- सावधानी: खुदाई के समय ध्यान रखे की कंद कटे नहीं। फिर खुदाई के बाद कंदों से मिट्टी साफ कर ले।
- खुदाई के बाद ओल को 2-3 दिन छाया में सुखाएं ताकि ऊपरी नमी निकल जाय।
- अब आप इसे नजदीकी सब्जी मंडी या बड़े शहरों की थोक मंडी में बेच सकते है।
- यदि खुदाई के समय मार्केट में भाव कम हो तो इसे आप हवादार कमरें में रेत के ऊपर रखकर 3-4 महिनें तक स्टोर कर सकते है और जब भाव बढ़ तो आप जाए बेच सकते है।
ओल की खेती मे लागत और कमाई
- बीज: 1 एकड़ के लिए लगभग 30-40 क्विंटल बीज की आवश्यकता पड़ती है।
- औसत खर्च: इस तरह से बीज पर 40,000 से 60,000 के बीच औसत खर्च आएगा यदि बीज का मूल्य 15-20 रुपये किलो के भाव से माना जाय तो।
- जुताई-बुआई: इसमें 8,000 से 10,000 औसत खर्च आएगा।
- खाद और उर्वरक: इसमे 5000 से 7000 औसत खर्च आएगा।
- मजदूरी: मजदूरी में 10,000 से 15,000 औसत खर्च होगा।
- सिंचाई और अन्य: करीब 5000 से 7000 सिंचाई एवं अन्य खर्चा होगा।
- औसत उत्पादन: 1 एकड़ में 150 से 200 क्विंटल तक ओल आसानी से निकल सकता है।
- उन्नत: यदि उन्नत किस्म गजेन्द्र को लगाया जाय और अच्छे से प्रबंधन किया जाय तो उत्पादन 250 क्विंटल से भी अधिक जा सकता है।
- औसत मंडी भाव: करीब 20 रुपया से 40 रुपया किलो होता है। लेकिन यह शादियों के सीजन और दिवाली के आसपास और भी बढ़ जाता है।
- न्यूनतम भाव पर: यदि हम न्यूनतम 20 रुपये किलो का भाव माने तो -
- 150 क्विंटल x 2000 = Rs 3,00000.
- 200 क्विंटल x 2000 = Rs 4,00000.
- यदि भाव 40 रुपया किलो मिल जाय तो दुगुना आय हो जाएगा।
- न्यूनतम लाभ: 3,00000-80,000=2,20,000.
- अधिकतम लाभ: 4,00000-80,000=3,20,000.
- यदि भाव ज्यादा मिलेगा तो कमाई और शुद्ध मुनाफा इससे ज्यादा बढ़ जाएगा।
- खुद का बीज तैयार करें: पहले साल बीज खरीदना पड़ता है लेकिन अगले साल अपनी ही फसल के कंदों को बीज के रूप मे प्रयोग कर सकते है। इससे आपकी लागत अगले साल 50-60% तक कम हो जाएगी।
- सही समय पर बिक्री: ओल को खोदने के बाद आराम से 3-4 महीनों तक स्टोर किया जा सकता है। जब बाजार का भाव 40 रुपये से ऊपर जाए तो इसे बेचने पर अधिक मुनाफा हो सकता है।
- मिश्रित खेती: ओल के साथ-साथ आप अदरख और मिर्च जैसी फसल लगाकर अतिरिक्त 30,000 से 50,000 तक की कमाई कर सकते है।


