भारत में सहकारिता आंदोलन:1904 से 2047 तक का सफर कैसे बदलेगी ग्रामीण भारत को

📌 इस लेख में क्या है?

यह शोधपूर्ण लेख भारत में सहकारिता क्रांति, राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025, PACS के डिजिटलीकरण, तीन नई राष्ट्रीय सहकारी समितियों (NCEL, NCOL, BBSSL), 54 प्रमुख पहलों, सरकारी आँकड़ों, अंतरराष्ट्रीय तुलना, विशेषज्ञों की राय, चुनौतियों और विकसित भारत 2047 की संभावनाओं का विस्तृत एवं तथ्य-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। सभी महत्वपूर्ण जानकारी विश्वसनीय सरकारी एवं संस्थागत स्रोतों के आधार पर संकलित की गई है।

 

स्मार्ट ग्रेन स्टोरेज साइलो, आधुनिक ट्रैक्टर, डिजिटल प्रमाणपत्र दिखाता युवा भारतीय कृषि उद्यमी और भविष्य की स्मार्ट खेती का यथार्थवादी दृश्य।
राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 और डिजिटल कृषि तकनीकों के साथ विकसित हो रहे ग्रामीण भारत की एक संभावित झलक।


📚 विषय सूची (Table of Contents)

 

प्रस्तावना (Introduction) 

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले का एक छोटा सा गांव "धीना"।सुबह की पहली किरण के साथ लहलहाता हुआ हरा भरा खेत।खेत के ऊपर आसमान में एक "एग्री ड्रोन" (Agri-Drone) उड़ता हुआ नैनो यूरिया का छिड़काव कर रहा है।

खेत की मेड़ पर किसान "ललन सिंह" बैठकर अपने हाथ में टैबलेट को पकड़कर मुस्करा रहे हैं।तभी उनके टैबलेट की स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन आता है ---"PACS Crop Loan Approved -0% Intrest"। 

"वर्ष 2047---- स्वतंत्र भारत जब आजादी की 100वीं वर्षगांठ मना रहा है,तब दुनियां भारत को केवल एक सबसे बड़ी आबादी वाला देश के तौर पर नहीं देखती...... बल्कि दुनियां भारत को एक "आर्थिक महाशक्ति"(Economic Superpower) के रूप में देख रही है"। 

एक जमाना था जब देश आजाद हुआ था।वर्ष 1947 तक किसान कागजी रजिस्टरों के बीच बैठ कर साहूकार और महाजन के सामने सिर झुकाए खड़ा रहता था।

और एक ये जमाना है 2047 का जब किसान ललन सिंह खेत में काम करते हुए कृषि लोन को डिजिटल प्राप्त कर लेते हैं।

"लेकिन क्या आप जानते है!!...... भारत के इस डिजिटल और आर्थिक कायाकल्प के पीछे की असली ताकत क्या है ?क्या यह कोई बड़ी कार्पोरेट कंपनियों के चलते हुआ है ?.......नहीं!!...बल्कि इस क्रांति का असली कारण और नाम है ---"सहकारिता"(Cooperation)। 

"वही सहकारिता!..... जो वर्ष 1904 में महाजनों के शोषण से बचने के लिए एक छोटा सा बीज के रूप में अंकुरित हुआ था।आज 2047 के "विकसित भारत" में एक विशाल बटवृक्ष बन चुका है।एक ऐसा बटवृक्ष जिसकी छाया में देशी 8.5 लाख से ज्यादा "सहकारी समितियां" और 50 करोड़ से ज्यादा नागरिक एक साथ खड़े हैं "। 

आज वर्ष 2047 में "Bharat Organics" और "National Cooperative Export Limited" के जहाज समंदर को पार करके दुनियां भर के बाजारों में अपनी समान को ले जा रहे हैं।

"सहकार से समृद्धि" (Prosperity Through Cooperation)... यह केवल एक सरकारी नारा ही नहीं बल्कि 21वीं सदी के भारत की नई आर्थिक पहचान है।

जहां "अमूल" (Amul) ने श्वेत क्रांति की नींव रखी थी,"इफको" (IFFCO) ने नैनो तकनीक से खेतों को नई सांस प्रदान की......वही आज 2047 का कम्प्यूटरीकृत "PACS" गांव के अंतिम किसानों को सीधे "ग्लोबल ई कॉमर्स" (ONDC & GeM) से जोड़ रहा है।

ऊपर सहकारिता के बारे में वर्ष 2047 की एक परिकल्पना है। लेकिन यह परिकल्पना कैसे आगे बढ़ रही है और सच में साकार हो सकती है।इसी बात का विश्लेषण इस लेख में है।

"तो सवाल यह है कि  --कैसे 1904 का एक कानून,वर्ष 2025 की राष्ट्रीय नीतियों से आगे बढ़ता हुआ वर्ष 2047 के "विकसित भारत" का सबसे बड़ा इंजन बन गया ? और कैसे ERP सॉफ्टवेयर और AI ने भारत के ग्रामीण बैंकिंग तंत्र का चेहरा बदल दिया ? और कैसे आज का युवा सहकारिता से जुड़कर करोड़ों का उद्यम खड़ा कर सकता है ?" 

आज के इस विशेष लेख में गहराई से समझते हैं भारत में सहकारिता के अतीत, वर्तमान और 2047 के उस विजन की पूरी कहानी जो भारत को विश्वगुरु और आर्थिक रूप से पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना सकती है।

अध्याय 1: सहकारिता आंदोलन: अतीत से भविष्य तक 


सहकारिता क्या है ? 

सहकारिता (Cooperative) एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिसमें समान आर्थिक,सामाजिक या व्यवसायिक व्यवस्थाओं वाले लोग स्वेच्छा से मिलकर एक संस्था बनाते हैं।

इस संस्था का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना नहीं होता है,बल्कि अपने सदस्यों की सामूहिक आवश्यकताओं को पूरा करना होता है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर "International Cooperative Alliance"(ICA) के अनुसार -

"सहकारी संस्था उन व्यक्तियों का स्वायत्त संगठन है जो अपनी साझा आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं को एक संयुक्त स्वामित्व और लोकतांत्रिक नियंत्रण वाले उद्यम के माध्यम से पूरा करते हैं"।

इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि सहकारिता का आधार "एक सदस्य एक वोट" पारदर्शी और सामूहिक हित है।


भारत में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत 

भारत में आधुनिक सहकारिता आंदोलन की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान ही हो गई थी।सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को साहूकारों के अत्यधिक ब्याज से राहत दिलाने के उद्देश्य से "1904 में Cooperative Credit Societies Act को लागू किया गया था।

इस कानून के माध्यम से ही पहली बार "ग्रामीण ऋण सहकारी समितियों" के गठन को कानूनी आधार मिल गया।

इसके बाद "1912 का Cooperative Societies Act" को बनाया गया।इसने सहकारी संस्थाओं के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया और कृषि ऋण से आगे बढ़कर अन्य प्रकार की सहकारी समितियों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से सहकारिता को ग्रामीण विकास और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए एक प्रमुख साधन के रूप में अपनाया।

समय के साथ यह सहकारिता कृषि के अलावा डेयरी,चीनी उद्योग, उर्वरक,बैंकिंग, विपणन और उपभोक्ता सेवाओं तक विस्तार कर गया।

सहकारिता आंदोलन के प्रमुख पड़ाव 

भारत में इस सहकारिता आंदोलन ने अपना विकास पथ जारी रखा और वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने है और आगे विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों के साथ चल रहा है।

देश में सहकारिता के विकास यात्रा को इस प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है --
  • सहकारी क्रेडिट सोसाइटी अधिनियम 1904: भारत में सहकारिता का औपचारिक कानूनी ढांचा इसी कानून से शुरू हुआ। इसमें केवल साख समितियों को अनुमति प्रदान की गई थी।
  • सहकारी समिति अधिनियम 1912: इस अधिनियम ने गैर साख समितियों जैसे - विपणन,आवास और उपभोक्ता साख समितियों के गठन का रास्ता खोल दिया।
  • मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार 1919: इसके तहत सहकारिता को "प्रांतीय विषय" के रूप में घोषित कर दिया गया।यही वर्तमान संविधान की 7वीं अनुसूची में भी मौजूद है।
  • 97वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011: इस संशोधन में संविधान में "अनुच्छेद 19(1)(c)" के तहत सहकारी समिति बनाने के अधिकार को "मौलिक अधिकार" का दर्जा प्रदान किया गया और संविधान में एक नया "भाग IX -B" को जोड़ा गया।
  • अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन - जुलाई 2021: केंद्रीय स्तर पर प्रशासनिक,कानूनी और नीतिगत नीतियों को बनाने एवं उसे लागू करने के लिए इस नए मंत्रालय की स्थापना की गई।

वर्ष प्रमुख घटना महत्व
1904 Cooperative Credit Societies Act भारत में आधुनिक सहकारिता की शुरुआत
1912 Cooperative Societies Act गैर-ऋण सहकारी संस्थाओं को कानूनी मान्यता
1954 अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण कृषि ऋण में सहकारिता की भूमिका मजबूत
1965 NDDB की स्थापना श्वेत क्रांति की नींव
2002 Multi-State Cooperative Societies Act बहुराज्यीय सहकारी संस्थाओं को नया ढांचा
2021 सहकारिता मंत्रालय की स्थापना सहकारिता क्षेत्र के लिए समर्पित केंद्रीय मंत्रालय
2025 राष्ट्रीय सहकारिता नीति डिजिटल, पारदर्शी और आधुनिक सहकारिता का रोडमैप
भारत में सहकारिता क्यों महत्वपूर्ण है ? 

अभी भी भारत की बहुत बड़ी आबादी गांवों में ही रहती है और यह आबादी कृषि या उससे जुड़े हुए कार्यों पर निर्भर है। उसमें भी बहुत सारे छोटे एवं सीमांत किसान है।इनको आसानी से कोई बैंक लोन ही नहीं देते है।

इसीलिए इन किसानों के लिए व्यक्तिगत स्तर पर संसाधन को जुटाना बहुत कठिन हो जाता है।ऐसे में ही सहकारी संस्थाएं इनको कई प्रकार से मदद करती है - जैसे --
  • कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराना।
  • उन्नत बीज, उर्वरक और कृषि उपकरण उपलब्ध कराना।
  • फसल भंडारण और विपणन में सहायता करना।
  • दुग्ध,मत्स्य,बागवानी और अन्य ग्रामीण उद्यमों को संगठित करना।
  • महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देना।

यही कारण है कि सहकारिता का महत्व बढ़ जाता है और इसको "ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रीढ़" कहा जाता है।


🔮2047 की एक झलक 

यदि वर्तमान सुधार, डिजिटलीकरण और नीति सुधार सफलता पूर्वक लागू होते हैं तो 2047 तक सहकारिता की भूमिका "केवल कृषि ऋण" से आगे बढ़ जाएगी।

उस समय प्रत्येक PACS एक "डिजिटल ग्रामीण सेवा केंद्र" के रूप में विकसित हो सकता है जहां किसानों को ऋण,बीमा,भंडारण,ई कॉमर्स,ड्रोन सेवा,कृषि सलाह,डिजिटल भुगतान और सरकारी योजनाओं का लाभ एक ही जगह इसी केंद्र में मिलने लगेगा।

हालांकि यह एक भविष्य का संभावित परिदृश्य है। लेकिन वर्तमान में जारी नीति और प्रयासों के साथ किसानों की भी सक्रिय भागीदार हो जाता है तो ऐसा संभव है।

नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 और PACS डिजीटलीकरण के बाद सहकारिता में क्रांतिकारी बदलाव को दिखाती दृश्य
नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 और PACS डिजीटलीकरण कार्यक्रम का 2047 में प्रभाव को दिखाता दृश्य


अध्याय 2: भारत का सहकारिता सेक्टर कितना बड़ा है? 


भारतीय सहकारिता किसानों को ऋण देने वाली छोटी व्यवस्था ही नहीं है बल्कि यह दुनियां के सबसे बड़े सहकारी नेटवर्कों में से एक है।लाखों किसान,करोड़ों सदस्य और हजारों संस्थाएं कृषि एवं इससे संबंधित ग्रामीण उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में सक्रिय है।

यही कारण है कि अब भारत सरकार भी सहकारिता को केवल एक वित्तीय मॉडल के तौर पर ही नहीं बल्कि "विकसित भारत 2047" की आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण आधार मान रही है।


भारत में सहकारिता क्षेत्र की वर्तमान तस्वीर 

भारत में सहकारी समितियां लगभग हर राज्य और अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत है। इसमें किसान और दुग्ध उत्पादक से लेकर मछुआरा,बुनकर,स्वयं सहायता समूहों के साथ छोटे उद्यमी भी जुड़े हुए हैं और वित्तीय एवं व्यवसायिक सहायता प्राप्त करते हैं।

नीचे दिए गए टेबल से यह स्पष्ट हो जाता है -

📊 प्रमुख आँकड़े (नवीनतम उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार)

भारत के सहकारिता क्षेत्र की एक झलक

सूचकांक अनुमानित स्थिति
🏢 कुल पंजीकृत सहकारी समितियाँ 8.5 लाख से अधिक
👥 कुल सदस्य लगभग 30 करोड़
🌾 PACS
लगभग 65,000+
कंप्यूटरीकरण का लक्ष्य: 79,630
🥛 डेयरी सहकारी समितियाँ 2 लाख से अधिक
🏦 जिला केंद्रीय सहकारी बैंक 350+
🏛️ राज्य सहकारी बैंक 30+
🏭 सहकारी चीनी मिलें 250+
🌱 उर्वरक वितरण ✔ महत्वपूर्ण भागीदारी
📚 स्रोत: सहकारिता मंत्रालय (भारत सरकार), National Cooperative Database (NCD), NCDC, NABARD, NDDB एवं PIB की नवीनतम उपलब्ध रिपोर्टें।

किन किन क्षेत्रों में सहकारिता सबसे ज्यादा मजबूत है 

लगभग कृषि और ग्रामीण भारत एवं उससे जुड़े हुए सभी क्षेत्रों में सहकारिता की धमक है।इसको निम्न तालिका से समझते हैं -
🌿 किन-किन क्षेत्रों में सहकारिता सबसे मजबूत है?
भारत की सहकारी संस्थाएँ कृषि से लेकर बैंकिंग और डेयरी तक अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
क्षेत्र प्रमुख भूमिका
🌾 कृषि ऋण, बीज, खाद एवं कृषि सेवाएँ
🥛 डेयरी दूध संग्रहण, प्रसंस्करण एवं विपणन
🏦 बैंकिंग ग्रामीण वित्त एवं ऋण सुविधा
🏭 चीनी उद्योग उत्पादन एवं किसानों को भुगतान
🌱 उर्वरक उर्वरकों का वितरण
🐟 मत्स्य पालन विपणन एवं ऋण सहायता
🛒 उपभोक्ता सहकारी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति
🏠 आवास किफायती आवास परियोजनाएँ

भारत दुनिया में क्यों अलग है ? 

भारत की विशेषता केवल सहकारिता के संख्या के चलते ही नहीं है बल्कि उसका जो सामाजिक प्रभाव है उससे है।जैसे -
  • करोड़ों किसानों की भागीदारी वाला सहकारिता 
  • गांव स्तर के नेटवर्क वाला सहकारिता 
  • डेयरी क्षेत्र में विश्व नेतृत्व वाला सहकारिता 
  • उर्वरक वितरण में भूमिका निभाने वाला सहकारिता 
  • कृषि ऋण के बड़े आधार वाला सहकारिता 
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ाव वाला सहकारिता 

यदि भारत के सहकारिता को विश्व के प्रमुख सहकारिता से तुलना किया जाए तो इसका स्वरूप अलग अलग है।नीचे दिए गए तालिका में यह स्पष्ट हो जा रहा है --

🌍 भारत बनाम विश्व : सहकारिता की तुलना
दुनिया के विभिन्न देशों में सहकारिता मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ
देश प्रमुख सहकारी क्षेत्र
🇮🇳 भारत कृषि • डेयरी • बैंकिंग • PACS
🇳🇿 न्यूज़ीलैंड डेयरी (Fonterra)
🇳🇱 नीदरलैंड कृषि एवं बैंकिंग
🇫🇷 फ्रांस कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण
🇺🇸 अमेरिका कृषि • बिजली • क्रेडिट यूनियन
🇯🇵 जापान कृषि एवं उपभोक्ता सहकारी
📚 स्रोत: International Cooperative Alliance (ICA), ILO, संबंधित देशों की सहकारी संस्थाओं की आधिकारिक जानकारी एवं भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के संदर्भ।

आज यदि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है तो इसमें सहकारिता का ही महत्वपूर्ण योगदान और भूमिका रहा है।अमूल मॉडल ने बता दिया कि कैसे छोटे छोटे दुग्ध उत्पादकों को संगठित करके विश्व स्तरीय ब्रांड खड़ा किया जा सकता है।
इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों में लागू करने का प्रयास किया जा रहा है।


PACS क्यों महत्वपूर्ण है ? 

प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (PACS) ग्रामीण सहकारिता की सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है।यह समितियां किसानों और सहकारी व्यवस्था के बीच सबसे पहला संपर्क बिंदु के रूप में काम करती है।

इसीलिए सरकार अब इन्हें केवल ऋण की संस्था से आगे बढ़ाकर इसको "बहुदेशीय ग्रामीण सेवा केंद्र" के रूप में विकसित करने पर काम कर रही है।

हालांकि सच्चाई ये भी है कि इनमें से कई सारी समितियां निष्क्रिय पड़ी हुई है।डिजिटलीकरण की भारी कमी होने के साथ प्रशिक्षित मानव संसाधन की भी कमी है।अलग अलग राज्यों में अलग अलग कानून होने से तकनीकी अवसंरचना की कमी है।

और इन्हीं कमियों एवं चुनौतियों को पहचान कर इन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वर्ष 2047 के विकसित भारत में इनकी सकारात्मक भूमिका बनी रहे।


🔮वर्ष 2047 का झलक 

यदि वर्तमान सुधार सफलता पूर्वक लागू होते हैं तो 2047 तक भारत का सहकारिता क्षेत्र दुनियां का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा डिजिटलीकृत सरकारी नेटवर्क बन जाएगा।

संभावित बदलाव इस तरह के हो सकते हैं --
  • हर पंचायत में डिजिटल PACS 
  • AI आधारित ऋण मूल्यांकन 
  • ड्रोन सेवा केंद्र 
  • ब्लॉकचेन आधारित रिकॉर्ड
  • सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसानों की पहुंच
  • ग्रामीण ई कॉमर्स में सहकारिता 

अतः उम्मीद यही कि जा रही है कि 2025 की नई नीति और PACS का डिजिटलीकरण का कार्यक्रम 2047 तक ग्रामीण भारत को एक नई दिशा प्रदान कर सकते हैं।


अध्याय 3: सहकारिता मंत्रालय और नई सोच 


लंबे समय से भारत में सहकारिता को "कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय" के अंतर्गत एक विभाग के रूप में संचालित किया जाता रहा था। लेकिन समय के साथ सहकारिता के क्षेत्र का अधिक पारदर्शी विकास के लिए एक अलग से मंत्रालय की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।

इसी पृष्ठभूमि में "6 जुलाई 2021 को" भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए "सहकारिता मंत्रालय"(Ministry of Cooperation) का गठन कर दिया।इसका मुख्य उद्देश्य सहकारिता क्षेत्र के लिए अलग से प्रशासनिक,कानूनी और नीतिगत ढांचा तैयार करके "सहकार से समृद्धि" के विजन को गति प्रदान करना है।


सहकार से समृद्धि की नई सोच क्या है ? 

चूंकि पहले की अधिकतर सहकारी समितियां केवल कृषि, उर्वरक और बीज वितरण तक ही सीमित थी।नया सोच यह है कि ये संस्थाएं केवल "क्रेडिट सोसायटी" से आगे बढ़कर "ग्रामीण विकास के बहुउद्देशीय केंद्र" के रूप में अपने को स्थापित कर एक नया प्रतिमान बने।

इस नई सोच के प्रमुख स्तंभ इस प्रकार से है --
  • डिजिटल सहकारिता 
  • पारदर्शी प्रबंधन 
  • पेशेवर संचालन 
  • महिलाओं और युवाओं की भागीदारी 
  • नए व्यवसायों में प्रवेश 
  • ई कॉमर्स से जुड़ाव 
  • निर्यात क्षमता का विस्तार 
  • स्थानीय से वैश्विक बाजार तक पहुंच

राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 भी इसी सोच को आगे बढ़ाती है और अगले 10 वर्षों के लिए 16 उद्देश्यों तथा 6 रणनीतिक मिशन स्तम्भों का रोडमैप प्रस्तुत करती है।


सहकारिता मंत्रालय के प्रमुख सुधार 

वर्ष 2021 में सहकारिता मंत्रालय बनने के बाद सहकारिता के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार प्रारंभ किए गए है --
  • PACS को कंप्यूटरीकृत करने का काम शुरू किया गया है।
  • नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 को लाया गया है।
  • हर गांव तक सहकारिता को पहुंच प्रदान किया जा रहा है।
  • नए क्षेत्रों में विस्तार शुरू किया जा रहा है।
  • डिजिटल गर्वनेंस को लागू किया जा रहा है।

यदि ये सुधार प्रभावी ढंग से लागू होते हैं तो ग्रामीण में निम्नलिखित परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं --
  1. किसानों को सेवाएं एक ही स्थान पर मिलने लगेगी।
  2. ऋण प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो जाएगी।
  3. महिलाओं को अधिक अवसर मिलने लगेंगे।
  4. युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलना शुरू हो जाएगा।
  5. डिजिटल वित्तीय सेवाओं का गांवों में विस्तार होगा।
  6. कृषि उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग होने लगेगी।

उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में और विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहकारिता मंत्रालय अपना महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करेगा।


अध्याय 4: राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 


भारत की सहकारिता का इतिहास 120 वर्षों से भी अधिक पुराना है।यह समय के साथ अपने को विकसित करते आया है। लेकिन बदलती हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था,AI का बढ़ता प्रभाव, जलवायु परिवर्तन और डिजिटल तकनीक जैसी नई चुनौतियां इसे अपने आप में बदलाव एवं विकास का राह देख रहा था।

इसी राह को ध्यान में रखते हुए "24 जुलाई 2025" को एक नई "राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025"(National Cooperative Policy 2025) राष्ट्र को समर्पित किया गया।

भले ही पिछली राष्ट्रीय सहकारिता नीति वर्ष 2002 में ही बनाई गई थी। लेकिन उसके बाद देश और दुनियां में डिजिटल क्रांति, इंटरनेट और मोबाइल,UPI, ई कॉमर्स, स्टार्टअप संस्कृति,FPO,ONDC और डेटा आधारित कृषि जैसे अनेक परिवर्तन हो चुके हैं।

यह नीति इससे संबंधित चुनौतियों के समाधान का रास्ता प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।


राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 का विजन 

नीति का मूल उद्देश्य है --

"सहकारिता संस्थाओं को आधुनिक, आत्मनिर्भर, पारदर्शी,तकनीक - सक्षम और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना" 

इस प्रकार से यह नीति "केवल कृषि सहकारिता" तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे के पूरे सहकारिता परिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने का लक्ष्य रखती है।

इस नीति के 3 मुख्य राष्ट्रीय लक्ष्य है --
  1. वर्ष 2034 तक भारत की GDP में सहकारिता का योगदान तिगुना करना।
  2. देश के 50 करोड़ से अधिक नागरिकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहकारिता से जोड़ना।
  3. देश की प्रत्येक पंचायत में कम से कम एक जीवंत प्राथमिक सहकारिता समिति को स्थापित करना।

नीति का 6 प्रमुख रणनीतिक स्तंभ (Six Strategic Pillars)


🇮🇳 National Cooperative Policy 2025
⚖️
कानूनी सुधार
Legal Reforms
📈
व्यावसायिक विकास
Business Vibrancy
💻
डिजिटल स्टैक
Tech-Ready Stack
🤝
समावेशी विकास
Inclusivity
🚀
नए क्षेत्र
New Growth Areas
🎓
युवा व कौशल
Youth & Training
📌 राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के छह प्रमुख रणनीतिक स्तंभ, जिनका उद्देश्य सहकारिता क्षेत्र को अधिक आधुनिक, डिजिटल, समावेशी और प्रतिस्पर्धी बनाना है।


राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 छः प्रमुख स्तंभों पर आधारित है --

  1. कानूनी व संस्थागत ढांचा (Institutional Framework): इसमें मुख्य रूप से राज्य के कानूनों में एकरुपता लाना और "Ease of Doing Business" लाना है।साथ ही इनका बेहतर प्रशासन और लोकतांत्रिक चुनाव लागू करना है।
  2. व्यवसायिक जीवंतता (Business Vibrancy): आधुनिक व्यापार मॉडल के साथ मूल्य संवर्धन,बाजार का विकास और समितियों को बहुउद्देशीय बनाना है।
  3. तकनीक एवं डिजिटल स्टैक (Digital Transformation): "National Cooperative Database" और आधुनिक ERP सॉफ्टवेयर का एकीकरण।डिजिटलीकरण और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  4. समावेशी विकास (Inclusivity & Social Outreach): महिलाओं, युवाओं,SC अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना है।
  5. नए उभरते क्षेत्रों में प्रवेश (New Opportunity): ग्रीन एनर्जी,बायोगैस,कोल्ड स्टोरेज, ऑर्गेनिक फार्मिंग और ई कॉमर्स एवं अपशिष्ट प्रबंधन में सहकारिता को बढ़ावा देना।
  6. युवा और पेशेवर प्रबंधन (Youth & Professionalism): उच्च शिक्षा में सहकारिता पाठ्यक्रम, कौशल विकास और पेशेवर प्रबंधन प्रशिक्षण।

सहकारिता में समृद्धि की 54 प्रमुख योजनाएं 

सहकारिता मंत्रालय द्वारा जारी प्रमुख योजनाओं को चार मुख्य श्रेणियों में रखा गया है --
🇮🇳 सहकार से समृद्धि : 54 पहलों का वर्गीकरण
🌾
PACS सुदृढ़ीकरण
  • 63,000+ PACS का कंप्यूटरीकरण
  • मॉडल बाय-लॉ लागू
  • CSC सेवाओं की अनुमति
📈
व्यावसायिक विस्तार
  • विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना
  • पेट्रोल पंप एवं LPG वितरण
  • जन औषधि केंद्र संचालन
🏛️
संगठनात्मक सुधार
  • National Cooperative Database (NCD)
  • तीन नई राष्ट्रीय सहकारी समितियाँ
  • डिजिटल प्रशासन एवं पारदर्शिता
💻
राष्ट्रीय डेटाबेस
  • 8.5 लाख+ सहकारी समितियों का डिजिटल रिकॉर्ड
  • डेटा आधारित नीति निर्माण
  • राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत सूचना प्रणाली
📌 सहकार से समृद्धि अभियान के अंतर्गत प्रमुख पहलों को चार व्यापक श्रेणियों में समझाया गया है।


इस प्रकार से इस नई सहकारिता नीति में केवल नई समितियां बनाना लक्ष्य नहीं है बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करना मुख्य लक्ष्य है।

इसमें प्रत्येक गांव तक सहकारिता की पहुंच के साथ साथ निष्क्रिय समितियों को पुनर्जीवित करने,PACS को बहुद्देशीय सेवा केंद्र बनाने और डिजिटल गवर्नेंस को लागू करना है।

साथ ही जवाबदेही के लिए पारदर्शी लेखांकन और ऑडिट सुनिश्चित करना, सहकारी बैंकों को आधुनिक बैंकों के साथ जोड़ना और निर्यात एवं वैश्विक बाजार तक पहुंच प्रदान करना इसके उद्देश्यों में शामिल है।


अध्याय 5: PACS का डिजिटलीकरण एक नई क्रांति


यदि भारत के सहकारिता की रीढ़ की हड्डी किसी संस्था को कहा जाए तो वह "Primary Agriculture Credit Society"(PACS) ही है।अभी देश भर में 65,000 से अधिक सक्रिय PACS कार्यरत है।

इन्हें अधिक पारदर्शी,कुशल और बहुउद्देशीय बनाने के लिए भारत सरकार ने 79,630 PACS के कम्प्यूटरीकरण की महत्वकांक्षी परियोजना शुरू किया है।

इस परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने लगभग ₹2516 करोड़ की योजना को मंजूरी प्रदान कर दिया है। इसका उद्देश्य "PACS" को ERP (Enterprise Resource Planning) आधारित साझा सॉफ्टवेयर से जोड़ना है।

इससे सहकारिता का लेखांकन,सदस्यता,ऋण प्रबंधन,ऑडिट और अन्य सेवाएं डिजिटल रूप से संचालित किया जा सकेगा।


PACS क्या है ? 

PACS ग्रामीण स्तर की सबसे छोटी सहकारी ऋण संस्था है।इसके मुख्य कार्य है --
  • अल्पकालीन कृषि ऋण उपलब्ध कराना।
  • बीज, उर्वरक और कृषि आदानों का वितरण करना।
  • फसल ऋण प्रबंधन करना।
  • कई राज्यों में सरकारी राशन (PDS) का संचालन करना।
  • किसानों से उपज की खरीद और भंडारण करना।
  • बहुउद्देशीय ग्रामीण सेवा केंद्र के रूप में कार्य करना।

PACS, जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCB) और राज्य सहकारी बैंक (SICB)के साथ मिलकर भारत की त्रिस्तरीय सहकारी ऋण संरचना का आधार बनाती है।


PACS कंप्यूटरीकरण योजना की प्रमुख विशेषताएं 

सरकार द्वारा स्वीकृत परियोजना का प्रमुख बिंदु इस प्रकार से है --
  1. 79,630 PACS का चरणबद्ध कंप्यूटरीकृत करना।
  2. ERP आधारित Common National Software का उपयोग करना।
  3. सभी राज्यों के लिए आवश्यकतानुसार अनुकूलित समाधान उपलब्ध कराना।
  4. ऑनलाइन लेखांकन और ऑडिट।
  5. डिजिटल सदस्यता रिकॉर्ड।
  6. ऋण,जमा और अन्य सेवाओं का एकीकृत प्रबंधन।
  7. साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण पर विशेष ध्यान।

सहकारिता मंत्रालय के अनुसार अब इन PACS को जन औषधि,कॉमन सर्विस सेंटर (CSC),LPG वितरण,पेट्रोल पंप,कृषि उपकरण किराए पर उपलब्ध कराना,गोदाम संचालन,ड्रोन सेवा आदि गतिविधियों में भी काम शुरू करने के लिए विकसित किया जा रहा है।


नेशनल कोऑपरेटिव डेटाबेस (NCD) क्या है ? 

सरकार द्वारा National Cooperative Database (NCD) को विकसित किया गया है। इसमें देश भर की 8.5 लाख सहकारी समितियों के आंकड़ों का मैपिंग और डिजिटलाइजेशन किया गया है।

NDC की विशेषताएं --
  • देश भर के जिले या पंचायतों में किस प्रकार की सहकारी समिति सक्रिय या निष्क्रिय है इसकी रियल टाइम जानकारी को रखा गया है।
  • नीति निर्माताओं और क्षेत्रीय असमानता को दूर करने और नई सहकारी समितियों को खोलने में मदद करना।

GeM पोर्टल और ONDC से सहकारी समितियों का जुड़ाव -
  • GeM (Government e-Marketplace): सहकारी समितियों को GeM पोर्टल पर खरीददार और विक्रेता दोनों के रूप में पंजीकृत होने की अनुमति प्रदान किया गया है। इसमें PACS और अन्य समितियां सीधे सरकारी विभागों से सामान को खरीद और बेच सकती है।
  • ONDC (Open Network for Digital Commerce- ONDC): इससे जुड़ने के बाद छोटे गांव की महिला सहकारी समिति या किसान उत्पादक संगठनों (FPOs)द्वारा बनाए गए आचार,पापड़,हस्तशिल्प या ऑर्गेनिक उत्पाद पूरे देश में किसी भी ई कॉमर्स ऐप के माध्यम से सीधे बेचे जा सकते हैं।


चुनौतियां है मौजूद 

यह सहकारिता का एक बहुत बड़ी महत्वकांक्षी परियोजना है,इसलिए चुनौतियां भी होगी ही होगी।

सबसे पहली चुनौती ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी को लेकर है।आज भी नेटवर्क भाग जाते हैं।आंधी और बरसात में तथा फसल कटाई के समय भी गांवों में बिजली की दिक्कत रहती है।

साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण भी बड़ी चुनौती है।किस तरह से इसके लिए ढांचा विकसित किया जाए यह महत्वपूर्ण है।

साथ ही अभी राज्यों में एकरुपता नहीं है जिसके कारण परिचालन में दिक्कत हो सकती है साथ ही अलग अलग राज्यों में परिचालन करने की अलग अलग गति है।समन्वय सबसे बड़ी समस्या है।

भले ही पैक्स का डिजिटलीकरण तेजी से किया जा रहा है लेकिन तकनीकी सहायता की उपलब्धता की कमी है।इसे दूर करना बड़ी चुनौती है।

अंतर्राष्ट्रीय अनुभव से सीख 

विश्व के कई देशी ने अपने सहकारी संस्थाओं को डिजिटलीकरण से परिपूर्ण कर दिया है और वहां की संस्थाएं डिजिटल तकनीक का धड़ल्ले से उपयोग कर रही है।

हमें भी इनसे सीख कर आगे बढ़ना चाहिए।मुख्य रूप से इन तीन देशों से प्रेरित होना चाहिए --
  • न्यूजीलैंड: यहां की Fonterra सहकारी संस्था,डिजिटल चेन और डेटा आधारित डेयरी प्रबंधन अविस्मरणीय है।
  • नीदरलैंड: यहां की Rabobank सहकारी बैंकों में डिजिटल उपयोग की जाने वाली डिजिटल सेवाएं पूरे विश्व के लिए एक मिसाल है।
  • जापान: यहां की कृषि सहकारी संस्थाएं डिजिटल तकनीक का उपयोग करके किसानों को सलाह और विपणन सेवाएं प्रदान करती है।

फिर भी भारत का "PACS डिजीटलीकरण कार्यक्रम" एक महत्वकांक्षी परियोजना है जो International Cooperative Alliance के अनुसार दुनियां के सबसे बड़े सहकारी डिजिटल परिवर्तन कार्यक्रमों में से एक है।


तीन नई राष्ट्रीय स्तर की सहकारी समितियां  

केंद्र सरकार ने सहकारिता को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए "बहु - राज्य सहकारी समिति अधिनियम (Multi State Co-operative society Act -2002, MSCS) के तहत तीन नई शीर्ष राष्ट्रीय स्तर की समितियों का गठन किया है --

🏛️ 3 नई राष्ट्रीय सहकारिताएं
NCEL
National Cooperative Export Limited
🚢 निर्यात को बढ़ावा
NCOL
National Cooperative Organics Limited
🌱 जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग
BBSSL
Bharatiya Beej Sahkari Samiti Limited
🌾 प्रमाणित बीजों का संवर्धन

 

1. National Cooperative Export Limited (NCEL) 

इसका गठन सहकारी क्षेत्र के उत्पादों को विश्व के बाजारों में स्थापित करने के लिए किया गया है।

इसका मुख्य कार्य यह है कि यह -
  • सहकारी समितियों के कृषि उत्पादों को निर्यात करेगा और बढ़ाएगा।
  • यह किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य दिलवाने में सहयोग करेगा।
  • यह उत्पादों का ब्रांडिंग,गुणवत्ता प्रमाणन और निर्यात लॉजिस्टिक को भी मजबूत करेगा।
  • साथ ही यह छोटे किसानों और PACS को निर्यात के श्रृंखला से जोड़ेगा।

इसके प्रमुख प्रमोटर है --
  • IFFCO 
  • KRIBHKO 
  • NAFED
  • GCMMF (Amul)
  • NCDC 

सरकार के अनुसार NCEL सहकारी क्षेत्र के लिए एक "राष्ट्रीय निर्यात मंच"(National Export Platform) के रूप में कार्य करेगा।


2. National Cooperative Organic Limited (NCOL) 

NCOL का लक्ष्य भारत में प्रमाणिक जैविक उत्पादों (Oraganic Products) का उत्पादन बढ़ाना,ब्रांडिंग करना और विपणन एवं निर्यात में भागीदारी बढ़ाना है।

इसका मुख्य कार्य इस प्रकार से है --
  • जैविक उत्पादक किसानों को राष्ट्रीय बाजार से जोड़ना।
  • प्रमाणित ऑर्गेनिक उत्पादों का विपणन करना।
  • "Bharat Organics" ब्रांड के अंतर्गत उत्पादों का बिक्री करना।
  • गुणवत्ता परीक्षण और प्रमाणन में सहायता करना।
  • घरेलू और वैश्विक बाजारों तक पहुंच प्रदान करना।

सरकार के अनुसार यह संस्था भारत को पूरे विश्व के ऑर्गेनिक बाजार में मजबूत पहचान प्रदान कराने में महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान प्रदान करेगी।


3. Bharatiya Beej Sahakari Samiti Limited (BBSSL) 

इसका गठन मुख्य रूप से किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणिक बीज को उपलब्ध कराने और देश में बीज उत्पादन को मजबूत बनाने के लिए किया गया है।

इसके प्रमुख कार्यों में --
  • प्रमाणित बीजों का उत्पादन और वितरण करना।
  • अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग करना।
  • स्थानीय एवं देशी बीजों के संरक्षण को बढ़ावा देना।
  • एक समान राष्ट्रीय ब्रांड के तहत गुणवत्तापूर्ण बीज को उपलब्ध कराना।
  • PACS एवं अन्य सहकारी संस्थाओं के माध्यम से बीजों का वितरण करना।

यह संस्था किसानों की उत्पादकता को बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर शुरुआत है।


अध्याय 6: केस स्टडी और जमीनी धरातल की सफलता 


देश में एक नया "सहकारिता मंत्रालय" और एक नया नीति "राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025" और इसके साथ ही साथ "PACS का डिजिटलीकरण" एवं तीन नई राष्ट्रीय स्तर की सहकारी समितियां बना दी गई ! आखिर क्यों ?

क्योंकि इसके पीछे देश में सहकारिता आंदोलन और सहकारी संस्थाओं का सफलतम प्रभाव प्रदान करने वाला केस स्टडी और उसका जमीनी धरातल पर सफल होना है।

इसमें हम ज्यादा नहीं केवल दो विश्वस्तरीय राष्ट्रीय सहकारी संस्थाओं और डिजिटल PACS की विवेचना करेंगे --


1.अमूल (Amul): गुजरात को - ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन 

अमूल की शुरुआत आनंद (गुजरात) में सरदार वल्लभभाई पटेल और त्रिभुवनदास पटेल के मार्गदर्शन में स्थापित किया गया था।आज के समय में यह देश ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर अपनी पहचान को स्थापित कर चुका है।

यह त्रिस्तरीय मॉडल पर स्थापित सहकारी संस्था है।

गांव स्तर पर दुग्ध समिति ⇝⇝जिला स्तर पर दुग्ध संघ ⇝⇝राज्य स्तर पर फेडरेशन।

आज के वर्तमान समय में Amul से 36 लाख से अधिक दुग्ध उत्पादक जुड़े हुए हैं।सबसे बड़ी बात ये कि इनमें से अधिकतर महिलाएं है।Amul का वार्षिक कारोबार ₹80,000 करोड़ से भी अधिक है।

यह साबित करता है कि सहकारिता कॉर्पोरेट कंपनियों से भी अधिक सफल व्यवसायिक मॉडल बन सकती है।


2. इफको (IFFCO): विश्व की नं 1 सहकारी संस्था 

शहर के लोग भले की पढ़ कर जानते होंगे लेकिन गांव के लोग और यहां तक कि बच्चा भी IFFCO के नाम से परिचित है।इसका खाद, उर्वरक और कीटनाशक तो हर घर में मिल ही जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय संस्था "वर्ल्ड कोऑपरेटिव मॉनिटर"(World Cooperative Monitor) के अनुसार "प्रति व्यक्ति जीडीपी" कारोबार के अनुपात के आधार पर IFFCO विश्व की नं 1 सहकारी संस्था समिति है।

इफको ने विश्व का पहला "नैनो लिक्विड यूरिया"(Nano Liquid Urea) और नैनो डीएपी (Nano DAP) को विकसित किया था।इससे रासायनिक खादों पर भारत की विदेशों पर निर्भरता कम होने के साथ ही सब्सिडी का बोझ भी कम हुआ है।


3. डिजिटल PACS की सफलता: वारणा और अमरोहा मॉडल 

हम दो ऐसे PACS की चर्चा करेंगे जिन्होंने डिजीटल सिस्टम को अपनाया और उसका सकारात्मक प्रभाव पाया --
  1. वारणा नगर (महाराष्ट्र): महाराष्ट्र के वारणा कोऑपरेटिव कॉम्प्लेक्स ने चीनी,दूध और बैंकिंग के साथ साथ पूरे क्षेत्र को "वायरलेस विलेज" में बदल दिया। यहां किसान कंप्यूटर कियोस्क से अपने गन्ना का तौल एवं भुगतान का रियल टाइम डेटा को देखते हैं।
  2. अमरोहा और मध्य प्रदेश के डिजिटल PACS: उत्तर प्रदेश के अमरोहा और मध्य प्रदेश के भोपाल संभाग में जिन PACS का कंप्यूटरीकरण हो चुका है वहां के किसानों को अब केसीसी (KCC) का नवीकरण कराने के लिए बैंक का चक्कर नहीं लगाना पड़ता है।यह कम PACS के ERP पोर्टल से 5 मिनट में ही पूरा हो जाता है।

इन अध्ययनों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जो काम बड़ी बड़ी कार्पोरेट कंपनियों और सरकारी संस्थाओं के द्वारा संभव नहीं हो पाती है वह सहकारी संस्थाओं के द्वारा सफलतापूर्वक की जा रही है।

साथ ही पहले से सक्रिय सहकारी समितियों को यदि डिजिटलीकरण एवं अन्य तकनीकी सुधार कर दिया जाए तो ग्रामीण भारत के साथ पूरे देश को विकसित भारत 2047 की दिशा में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 और डिजिटल कृषि तकनीकों के साथ ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर ग्रामीण भारत की एक संभावित झलक।
नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 में ग्रामीण महिलाओं और युवाओं पर फोकस किया गया है जिसका एक संभावित दृश्य



अध्याय 7: युवाओं, महिलाओं और नए उद्यमियों के लिए अवसर 


किसी भी नीति की सफलता उसकी घोषणाओं दस्तावेजों और प्रचार से नहीं मापी जाती है।बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसका लाभ आम नागरिक तक कितना प्रभावी ढंग से पहुंच पाया है।

राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 और PACS का डिजिटलीकरण भी इसी उद्देश्य को ध्यान में रखता है कि इसमें सामाजिक समावेशन समाहित हो सके।


1.नई प्राथमिक सहकारी समिति का गठन 

यदि आप अपने क्षेत्र में किसानों और युवाओं को मिलाकर एक नई सहकारी समिति का गठन करना चाहते हैं तो इसकी चरणबद्ध प्रक्रिया नीचे के टेबल से स्पष्ट हो जाती है --
📝 सहकारी समिति गठन प्रक्रिया (Step-by-Step)
1
न्यूनतम 10+ व्यक्तियों का समूह (अलग-अलग परिवारों से)
2
प्रमोटर मीटिंग एवं अध्यक्ष/मुख्य प्रमोटर का चयन
3
उप-नियम (Model Bye-Laws) तैयार करना एवं नाम की स्वीकृति
4
शेयर पूंजी एकत्र करना एवं जिला सहकारी बैंक में खाता खोलना
5
निबंधक (RCS - Registrar of Cooperative Societies) के पास पंजीकरण हेतु आवेदन
6
पंजीकरण प्रमाण पत्र एवं PAN/TAN प्राप्ति ➔ व्यावसायिक संचालन प्रारंभ 🎉

 

2. वित्तीय सहायता,ऋण और NDCD की सब्सिडी योजना 

नए व्यवसाय को शुरू करने के लिए केंद्र सरकार और NDCD चल रही विभिन्न योजनाओं के तहत रियायती दरों पर सब्सिडी और ऋण प्रदान करती है --
  • युवा सहकार योजना: सहकारी क्षेत्र में नए स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए NCDC द्वारा 80% तक का रियायती वित्तपोषण कु सुविधा शुरू किया गया है।
  • नंदिनी सहकार योजना: महिला सहकारी समितियों के व्यवसायिक प्रस्तावों के लिए विशेष वित्तीय सहायता और सब्सिडी की व्यवस्था शुरु किया गया है।
  • सहकार से समृद्धि योजना: बुनियादी ढांचों को बनाने के लिए "कृषि अवसंरचना कोष"(Agriculture Infrastructure Fund -AIF) के तहत 3% तक ब्याज की छूट शुरु किया गया है।

साथ ही इस नई योजना में महिलाओं के लिए और भी कई तरह की सुविधा को शुरू किया गया है।जैसे कि महिला डेयरी सहकारी समिति का विस्तार,महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और सहकारी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय शामिल है।

इसके अलावा नेतृत्व एवं निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को सुनिश्चित किया गया है।


अध्याय 8: चुनौतियां और भविष्य का रोडमैप 


किसी भी बड़े इस तरह के सुधार के कार्यक्रम में कई व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना ही पड़ता है।अतः सहकारिता के इस महत्वपूर्ण सुधार एवं PACS के डिजिटलीकरण में भी कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं --
  • डिजिटल साक्षरता और मानव संसाधन: ग्रामीण क्षेत्रों में PACS के कई पुराने कर्मचारी कंप्यूटर संचालन का अनुभव ही नहीं रखते हैं।अतः सभी को डिजिटली साक्षर करना और स्किल कर्मचारी को हायर करना बड़ी चुनौती है।
  • इंटरनेट एवं कनेक्टिविटी: सुदूर गांवों और पहाड़ी क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बहुत खराब है और इनकी उपलब्धता कम है।सामान्य गांवों में भी इसकी कमी देखी जाती है।यह  ERP सॉफ्टवेयर के निर्बाध संचालन में बाधा बनता है।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: स्थानीय समितियों में कई जगह अभी भी गुटबाजी और राजनीतिक प्रभाव देखने को मिलते रहता है।यह निष्पक्ष चुनाव एवं पेशेवर प्रबंधन को प्रभावित करता है।
  • साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण: चूंकि स्किल कर्मचारियों की कमी होने के कारण साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण की चुनौतियां भी हमेशा बनी रहती है।

अतः बिना इन चुनौतियों का समाधान किए हुए अपेक्षित परिणाम की कल्पना भी नहीं किया जा सकता है।


भविष्य का राह क्या हो सकता है ? 

चुनौतियों और व्यवहारिक दिक्कतों को भांपते हुए सरकार भी अपना प्रयास कर रही है।उन प्रयासों के साथ विशेषज्ञों के अनुसार संभावित प्रयास ये करनी चाहिए --
  • निरन्तर कौशल प्रशिक्षण: "लक्ष्मणराव ईमानदार राष्ट्रीय सहकारिता अनुसंधान एवं विकास संस्थान"(LINAC) के माध्यम से कर्मचारियों का नियमित डिजिटल प्रशिक्षण किया जाना चाहिए।
  • पेशेवर सीईओ एवं प्रबंधकों की नियुक्ति: सहकारिता में और पैक्सों में भी प्रबंधकों की नियुक्ति स्वतंत्र एवं पेशेवर रूप से की जानी चाहिए।उनको राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
  • साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण: इसके लिए एक मजबूत सुरक्षा प्रोटोकॉल तय किया जाना चाहिए।साथ ही "डेटा रिकवरी सेंटर" की भी स्थापना किया जाना चाहिए।


निष्कर्ष (Conclusion) 

भारत में सहकारिता वर्ष 1904 से लेकर अभी तक अनवरत चलता आया है और यह समय के साथ विकसित होते हुए अपने में निरंतर सुधार भी करता आया है।

वर्ष 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना और उसके बाद राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 ने भी इस आंदोलन को नई दिशा प्रदान किया है।अब PACS का डिजिटलीकरण भी शुरू हो चुका है जो इसको और भी मजबूती प्रदान करेगा।

साथ ही राष्ट्रीय सहकारिता डेटाबेस,तीन नई राष्ट्रीय सहकारी समितियों की स्थापना एवं 54 प्रमुख सुधारात्मक पहल इस परिवर्तन की नींव को और भी मजबूती प्रदान कर रही है।

यदि वर्तमान सुधार समयबद्ध और प्रभावी ढंग से लागू होते हैं तो वर्ष 2047 तक भारतीय सहकारिता ग्रामीण वृहद सेवा और सामुदायिक आर्थिक विकास की एक नई गाथा बुन सकता है।

अंततः "सहकार से समृद्धि" की नारे के साथ सरकार के द्वारा किए जा रहे प्रयास तभी सफल हो सकते हैं जब एक जिम्मेदार नागरिक की तरह हम सब भी अपनी भूमिका का अपने सत्र पर निर्वहन करें।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)

1. PACS का पूर्ण रूप (Full Form) क्या है ?

PACS का पूर्ण रूप "Primary Agricultural Credit Society"(प्राथमिक कृषि साख समिति) है।

2. सहकारिता किस संवैधानिक अनुसूची के अंतर्गत आती है ?

भारतीय संविधान की 7वीं अनुसूची के अनुसार सहकारिता "राज्य सूची"(State List - Entry 32) का विषय है।हालांकि एक से अधिक राज्यों में काम करने वाली समितियों के लिए "बहु राज्य सहकारी समिति अधिनियम "(MSCS Act) लागू होता है।

3. राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 क्या है ?

राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 भारत सरकार द्वारा जारी एक दीर्घकालिक नीति दस्तावेज़ है, जिसका उद्देश्य सहकारी संस्थाओं को आधुनिक, डिजिटल, पारदर्शी, पेशेवर और प्रतिस्पर्धी बनाना है। यह नीति "सहकार से समृद्धि" और "विकसित भारत 2047" के विज़न को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

स्रोत: सहकारिता मंत्रालय, PIB

4. भारत में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत कब हुई थी ?

भारत में आधुनिक सहकारिता आंदोलन की शुरुआत 1904 में Cooperative Credit Societies Act के लागू होने से हुई थी।इसके बाद 1912 के Cooperative Societies Act ने गैर ऋण सहकारी समितियों को भी कानूनी मान्यता प्रदान कर दिया।

।स्रोत: सहकारिता मंत्रालय।

5. PACS के डिजिटलीकरण के क्या उद्देश्य है ?

PACS के डिजिटलीकरण का उद्देश्य लेखांकन, ऋण प्रबंधन, सदस्यता, ऑडिट और अन्य सेवाओं को डिजिटल बनाकर पारदर्शिता, दक्षता और सेवा गुणवत्ता में सुधार करना है। इसके लिए लगभग 79,630 PACS के कंप्यूटरीकरण की योजना स्वीकृत की गई है।

स्रोत: PIB, सहकारिता मंत्रालय

6. राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के प्रमुख लक्ष्य क्या है ?

इस नीति के प्रमुख लक्ष्य हैं—

  • सहकारी संस्थाओं का डिजिटलीकरण
  • किसानों की आय बढ़ाना
  • महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाना
  • नए क्षेत्रों में सहकारिता का विस्तार
  • पारदर्शी एवं पेशेवर प्रबंधन
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप सहकारी क्षेत्र का विकास

स्रोत: PIB

7. भारत में कितनी सहकारी समितियां है ?

नवीनतम उपलब्ध जानकारी के आंकड़ों के अनुसार भारत में वर्तमान में कुल "8.5 लाख से अधिक पंजीकृत सहकारी समितियां" है।जिनके सदस्यों की संख्या लगभग 30 करोड़ से अधिक है।

स्रोत:National Cooperative Database (NCD), सहकारिता मंत्रालय।

8. तीन नई राष्ट्रीय स्तर की सहकारी समितियां कौन कौन सी है ?

भारत सरकार ने तीन नई राष्ट्रीय बहु-राज्यीय सहकारी समितियों की स्थापना की है—

  • National Cooperative Exports Limited (NCEL)
  • National Cooperative Organics Limited (NCOL)
  • Bharatiya Beej Sahakari Samiti Limited (BBSSL)

इनका उद्देश्य निर्यात, जैविक कृषि और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्धता को बढ़ावा देना है।

स्रोत: PIB


संबंधित विषय:
 


📚 स्रोत एवं संदर्भ (References & Sources):
🏛 भारत सरकार के आधिकारिक स्रोत
🏦 राष्ट्रीय संस्थान
🌍 अंतरराष्ट्रीय स्रोत
📄 प्रमुख सरकारी दस्तावेज़
  • National Cooperation Policy 2025
  • PACS Computerization Scheme
  • Model Bye-laws for PACS
  • National Cooperative Database Report
  • Annual Report – Ministry of Cooperation
  • Cabinet & PIB Official Press Releases
  • World's Largest Grain Storage Plan in Cooperative Sector
✍ लेखक की टिप्पणी

यह लेख भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेज़ों, मंत्रालयों, संस्थागत रिपोर्टों तथा अंतरराष्ट्रीय सहकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित विश्वसनीय स्रोतों के अध्ययन पर आधारित है। लेख में जहाँ 2047 से संबंधित संभावित परिदृश्यों का उल्लेख किया गया है, वहाँ उन्हें विश्लेषणात्मक (Scenario Analysis) रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि किसी सरकारी घोषणा या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में।

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