प्रस्तावना (Introduction)
भारत बहुत लंबे समय से एक कृषि प्रधान देश तो रहा ही है और आज भी भारत की बहुत बड़ी आबादी के लोग ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, पशुपालन,डेयरी,मत्स्य पालन और अन्य कृषि से संबंधित उद्यम में लगे हुए हैं।
पहले इनको किसी भी प्रकार के आर्थिक सहायता के लिए साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता था जो बहुत ज्यादा ब्याज लेते थे।इससे किसान कर्ज के दलदल में फंसा ही रहता था।इन साहूकारों के इस दलदल से निकलने और इन किसानों का आर्थिक सहारा के रूप में देश में सहकारिता की नींव वर्ष 1904 में पड़ गई थी।
सहकारिता का मूल सिद्धांत ही यही था कि "एक अकेला कमजोर हो सकता है, लेकिन मिलकर काम करने वाले लोग बड़ी से बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकते हैं"।
सवाल ये है कि सहकारिता किसे कहते हैं ?
दरअसल सहकारिता एक ऐसी संस्था होती है जहां एक समान इच्छा और उद्देश्य रखने वाले लोग मिलकर स्वेच्छा से इसे बनाते हैं।इसका उद्देश्य केवल लाभ कमाना ही नहीं बल्कि अपने सदस्यों की आर्थिक,सामाजिक और व्यवसायिक उन्नति करना होता है।
यहां निर्णय केवल पूंजी के आधार पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक सिद्धांत "एक सदस्य एक वोट" के आधार पर लिए जाते हैं।
हम इस लेख में आगे देश में सहकारिता आंदोलन का इतिहास और टॉप 10 विश्वप्रसिद्ध सहकारी संस्थाओं के बारे में तथ्यपूर्ण जानकारी और विश्लेषण को रखेंगे।साथ ही इन सफल सहकारी संस्थाओं से क्या 10 बातें सीखनी है,इसकी भी चर्चा करेंगे।
[ सहकारिता का मूल दर्शन ]
[ आर्थिक स्वावलंबन ]
(बिचौलियों का उन्मूलन)
[ लोकतांत्रिक नियंत्रण ]
(एक सदस्य = एक वोट)
[ सामाजिक न्याय ]
(अंतिम व्यक्ति का विकास)
भारत में सहकारिता आंदोलन का इतिहास (1904 से 2026 तक)
सबसे पहले 1904 में "Cooperative Credit Societies Act 1904" के रूप में सहकारिता का अंकुरण हुआ था।इसके द्वारा सहकारी ऋण समितियों के गठन का रास्ता खुल गया था।इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए अब इसमें और विस्तार की आवश्यकता महसूस होने लगी।
और इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए 1 मार्च 1912 को "Cooperative Societies Act 1912" बनाया गया जिसमें अब सहकारिता को केवल कृषि ऋण बांटने से आगे बढ़ाकर "Non Credit Cooperative" और सहकारी संघों के विकास का भी रास्ता खोल दिया।
सहकारिता के विकास के लिए "Maclagan Committee" ने 1915 में भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियों के विस्तार पर बल देते हुए "एक गांव एक सहकारी समिति" की सोच को बल प्रदान किया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वर्ष 1954 में "All India Rural Credit Survey" के बाद देश में सहकारी संस्थाओं में राज्यों की अधिक भागीदारी एवं सरकारी ऋण ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
वर्ष 1964 में सहकारी क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर के संस्थान पर जोर दिया गया और 1967 में "Vaikunth Mehta National Institute of Cooperative Management"(VAMNICOM) का नींव रखा गया।
अब 1970 का महत्वपूर्ण दशक जिसमें 1970 में ही "Operation Flood" शुरू किया गया जिसने देश में दुग्ध क्रांति को जन्म दिया।इससे केवल दूध उत्पादन नहीं बढ़ा बल्कि ग्रामीणों की आय बढ़ी और यही से सहकारिता की "Amul Modal" की ताकत हम सभी के सामने आई।
वर्ष 1982 में NABARD -- "National Bank for Agriculture and Rural Devlopment" की स्थापना हुई जिसे सहकारिता के विकास के लिए मिल के पत्थर के रूप में भूमिका का निर्वहन किया।
अब 1990 का दशक आर्थिक उदारीकरण और सुधारों में निकल गया। लेकिन अगले दशक की शुरुआत में ही वर्ष 2002 में "Multi - State Co-operative Society Act 2002" को उन सहकारी संस्थाओं के लिए बनाया गया जिसका उद्देश्य एवं गतिविधियां एक से अधिक राज्यों में फैली हुई थी।
वर्ष 2012 में आधुनिक सहकारिता आंदोलन के 100 वर्ष पूरे हो गए।
भारत के सहकारिता के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक घटनाओं में से एक 2021 में अलग "Ministry of Cooperation" का गठन किया जाना था।और इस मंत्रालय का उदघोष था --"सहकार से समृद्धि"।
अब 2022 के 2 सितंबर को "श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु" की अध्यक्षता में देश में एक नई सहकारिता नीति को बनाने के लिए समिति का गठन किया गया।इस समिति ने 17 बैठके और चार क्षेत्रीय कार्यशालाओं का आयोजन करने के साथ साथ विभिन्न हितकारकों के सुझाव को भी प्राप्त किया।
यही प्रक्रिया आगे चलकर "राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025" की नींव बन गई।इसी बीच 2011 में 97वां संविधान संशोधन अधिनियम सहकारिता को संवैधानिक महत्व का विषय बना दिया।
अब 24 जुलाई 2025 को देश में नई "राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025" को लांच किया गया।यह नीति "विजन विकसित भारत @2047" पर आधारित है। वर्तमान में इसी नीति के तहत देश भर के PACS का डिजीटलीकरण कार्यक्रम चल रहा है।
और इस तरह से उम्मीद है कि भारत की सहकारिता देश को 2047 तक विकसित भारत की श्रेणी में लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा।
भारत में सहकारिता आंदोलन का इतिहास (1904 - 2026)
1904
प्रथम सहकारी साख समिति अधिनियम
लॉर्ड कर्जन के कार्यकाल में पारित। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण किसानों को साहूकारों के चंगुल से छुड़ाने के लिए सस्ते ऋण की व्यवस्था करना था। यह भारत में सहकारिता का पहला औपचारिक कानूनी ढाँचा था।
1912
सहकारी समिति अधिनियम
1904 के कानून की सीमाओं को दूर करते हुए क्रेडिट के अलावा गैर-साख (Non-credit) समितियों जैसे विपणन, खरीद और उत्पादन समितियों के गठन की अनुमति दी गई।
1919
मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार
सहकारिता को 'प्रांतीय विषय' (Provincial Subject) बना दिया गया, जिससे प्रांतीय सरकारों को अपने-अपने राज्य के अनुसार सहकारिता कानून बनाने का अधिकार मिला।
1946
अमूल की स्थापना
त्रिभुवनदास पटेल, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. वर्गीज कुरियन के मार्गदर्शन में आनंद (गुजरात) में अमूल की नींव रखी गई, जिसने भारत में 'श्वेत क्रांति' का मार्ग प्रशस्त किया।
1963
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) की स्थापना
संसद के एक अधिनियम द्वारा NCDC का गठन हुआ, ताकि देश में कृषि उपज के प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन के लिए सहकारी ढाँचे को वित्तीय सहायता दी जा सके।
1970
ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood) का शुभारंभ
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) द्वारा शुरू किया गया दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम, जिसने भारत को दूध की कमी वाले देश से दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना दिया।
2002
बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम
एक से अधिक राज्यों में काम करने वाली सहकारी समितियों के संचालन, स्वायत्तता और पारदर्शी प्रबंधन के लिए नया ढाँचा लागू किया गया।
2011
97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत सहकारी समितियां बनाने के अधिकार को मौलिक अधिकार (Fundamental Right) का दर्जा दिया गया और भाग IX-B जोड़ा गया।
2021
पृथक 'केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय' का गठन
भारत सरकार ने 'सहकार से समृद्धि' (Prosperity through Cooperation) के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए एक अलग सहकारिता मंत्रालय का गठन किया।
2023 - 2026
PACS का डिजिटलीकरण और राष्ट्रीय डेटाबेस
देश की 63,000 से अधिक प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को कंप्यूटरीकृत किया गया, 3 नई राष्ट्रीय स्तर की बहु-राज्यीय सहकारी समितियों (निर्यात, बीज और जैविक उत्पाद) का गठन हुआ और राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस का विस्तार किया गया।
भारत की 10 सबसे सफल सहकारी संस्थाएं
अब हम बात करेंगे भारत की सबसे सफल सहकारी संस्थाओं की जिसने भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में भी अपनी पहचान और अमित छाप छोड़कर रख दिया है।
International Cooperative Alliance (ICA), के "World Cooperative Monitor 2025" के अनुसार प्रति व्यक्ति GDP के मुकाबले कारोबार के अनुपात में भारत की "Amul और IFFCO" पूरी दुनियां में शीर्ष पर रही है।
हमने इस सूची में केवल बड़ा कारोबार को ही आधार नहीं बनाया है बल्कि इसमें उसके राष्ट्रीय प्रभाव,सदस्यता का आधार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर होनेवाला उसका असर,नवाचार और उसके वैश्विक प्रभावों को मिलकर इन सभी मानकों के आधार पर सबसे सफल 10 सहकारी संस्थाओं के बारे में बात करेंगे।
1.अमूल (Amul:Gujrat Cooperative Milk Marketing Federation)
[ अमूल का त्रि-स्तरीय ढाँचा ]
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[ प्राथमिक दुग्ध समितियां ]
(गांव स्तर: 18,000+)
[ जिला दुग्ध उत्पादक संघ ]
(जिला स्तर: 18 संघ)
▼
[ राज्य दुग्ध विपणन महासंघ (GCMMF) ]
ब्रांड: अमूल (AMUL)
Amul - किसी परिचय का मोहताज नहीं है।लगभग देश का हरेक व्यक्ति इसके नाम से भली भांति परिचित है।लोग जानते हैं कि अमूल एक कंपनी है। लेकिन यह कंपनी नहीं बल्कि एक सहकारी समिति है जिसके मालिक किसान ही होते हैं।
अमूल (Amul) की स्थापना 14 दिसंबर 1946 को आनंद,गुजरात में हुई थी।इसका स्थापना तीन लोग -- सरदार वल्लभभाई पटेल, त्रिभुवनदास पटेल और डॉ वर्गीज कुरियन जिन्हें श्वेत क्रांति के जनक के रूप में जाना जाता है -- ने मिलकर किया था।
अमूल का कार्यक्षेत्र -- मुख्य रूप से डेयरी उत्पादन,दुग्ध प्रसंस्करण,पैकेज्ड फूड्स,आइसक्रीम,पेय पदार्थों और वैश्विक डेयरी निर्यात में है।
"GCMMF" के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में --
- अमूल के साथ 18,600 गांवों की दुग्ध सहकारी समितियां कार्य कर रही थी।
- 3.6 मिलियन यानी 36.4 लाख दुग्ध उत्पादक इसके सदस्य है।
- यह प्रतिदिन लगभग 3.5 करोड़ लीटर दुग्ध का खरीददारी करता है।
- यह ₹65,911 करोड़ का वार्षिक कारोबार करता है।
असल में Amul की कहानी गुजरात के खेड़ा जिले से शुरू होती है जब 1940 के दशक में स्थानीय दुग्ध उत्पादकों को दूध के व्यापार में बिचौलियों और निजी व्यापार व्यवस्था के कारण उनको उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा था।
इसी पृष्ठभूमि में "Kaira District Co-Operative Milk Producers Union" की स्थापना 1946 में किया गया जो आगे चलकर Amul Dairy के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अमूल का ढांचा मोटे तौर पर इस प्रकार से है --
।।दुग्ध उत्पादक किसान ⭆Village Dairy Cooperative Society ⭆District Milk Union ⭆GCMMF ⭆Amul Brand ⭆देश विदेश के उपभोक्ता।।
इस व्यवस्था में किसान केवल Supplier ही नहीं बल्कि वह इस सहकारी व्यवस्था का सदस्य और मालिक भी है।
Amul की वैश्विक पहचान और योगदान
अमूल केवल देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपना पहचान स्थापित कर चुका है।World Cooperative Monitor 2025 में अमूल को कुछ विशेष मानदंडों पर दुनिया का नं 1 सहकारी संस्था (Cooperative) का स्थान मिला हुआ है --
- वर्ष 2023 की रैंकिंग के अनुसार प्रति व्यक्ति GDP के मुकाबले टर्नओवर के अनुपात में Amul दुनिया की नं 1 Cooperative रही है।
- GCMMF के अनुसार Amul प्रोडक्ट्स लंबे समय से 50 से अधिक देशों में निर्यात किए जाते हैं।
- Amul ने 2025 में Michigan Milk Producers Association (MMPA) जैसी अमेरिकी संस्था के साथ अपना पार्टनरशिप शुरू किया।
- इसी तरह से इसने 2025 में Spain और Portugal में भी Amul Milk को उपलब्धता शुरू कर दिया है।
इस प्रकार से अमूल अब वैश्विक ब्रांड के रूप में अपने को स्थापित कर चुका है।
Amul ने गांव की अर्थव्यवस्था को कैसे बदला ?
Amul Modal का ग्रामीण प्रभाव भी बहुत ही सराहनीय रहा है।इसने निम्न प्रकार से गांव की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया --
- दुग्ध उत्पादकों को नियमित आय प्रदान करना।
- छोटे किसानों की भागीदारी को बढ़ाया।
- महिलाओं की भूमिका और आय को बढ़ावा दिया।
- दुग्ध व्यवसाय और प्रोसेसिंग एवं ट्रांसपोर्टिंग से सम्बन्धित स्थानीय रोजगार को बढ़ाया।
- पशु स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान किया।
इस प्रकार से यदि देखा जाए तो यदि भारत 2047 में विकसित देश बनने की दिशा में अग्रसर होता है तो इसमें Amul जैसी सहकारी संस्थाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
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| गांव के ही अमूल के दुग्ध संग्रह केंद्र पर महिलाएं दूध जमा करती हुई |
2.इफको:(IFFCO:Indian Farmers Fertilizer Cooperative Ltd)
आज की वर्तमान सहकारिता की यात्रा में किसी ऐसी संस्था का नाम लिया जाए जिससे किसानों, उर्वरक उत्पादन,हरित क्रांति और आधुनिक कृषि तकनीक के साथ एक साथ जोड़ा जाए तो वह संस्था है -- IFFCO(इफको)।
IFFCO की स्थापना 3 नवंबर 1967 को किया गया था और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।इसका शुरुआत 57 प्राथमिक खेल और कृषि समितियों के साथ भारत सरकार के सहयोग से एक बहु-राज्यीय सहकारी समिति के रूप में हुआ था।
इसका कार्यक्षेत्र रासायनिक उर्वरक,बायो फर्टिलाइजर, नैनों - तकनीक,किसान बीमा और एग्री - डिजिटल सेवाओं को प्रदान करना है।
IFFCO के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में इसकी पहुंच 5.5 करोड़ से अधिक किसानों तक थी और इसका नेटवर्क 36,000 से अधिक सहकारी समितियों के माध्यम से काम कर रहा था।इसी वर्ष IFFCO का कारोबार ₹45,468 करोड़ रुपए का रहा है।
IFFCO की अपनी Timeline के अनुसार 1965 में भारत में हरित क्रांति को गति देने के लिए रसायनिक उर्वरक उत्पादन की आवश्यकता का पहचान किया गया। इसके बाद 1966 में भारत सरकार और US Cooperative League के बीच भारत में उर्वरक संयंत्र को स्थापना करने के लिए बातचीत हुआ।
इसी परिदृश्य में 3 नवंबर 1967 को IFFCO का जन्म हुआ और श्री Paul Pathen इसके पहले Managing Director बने थे।फिर 1968 में ही गुजरात के "Kalol" एवं "Kandla" में उर्वरक संयंत्र को लगाने का काम शुरू हो गया।
IFFCO के इतिहास में 1974 और इसकी गति बढ़ गई
यह अविस्मरणीय है IFFCO के लिए जब 1974 में उसके इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष के रूप में अमिट नाम अंकित हो गया।इसी वर्ष Kalol Plant को राष्ट्र को समर्पित किया गया।और दूसरा इसी वर्ष Kandla Plant में उत्पादन शुरू हो गया।
अब IFFCO रुकने वाला नहीं था और उसने अपना विस्तार बढ़ाना चालू कर दिया।इसी क्रम में इसने वर्ष 1976 में फूलपुर,इलाहाबाद, यूपी मे अपने नए संयंत्र की योजना को शुरू कर दिया।इसका उद्घाटन 1981 में हो गया।
- वर्ष 1981 में ही Aonla Plant की योजना बनाई गई।
- Phulpur में किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए "Cooperative Development Trust"(CORDET) को स्थापित किया गया।
- वर्तमान में वर्ष 2025-26 में "90.62 लाख मीट्रिक टन" का उर्वरक एवं संबंधित उत्पादों का उत्पादन अपने 5 संयंत्रों के माध्यम से किया है।
- इसी वर्ष 2025-26 में इसकी कुल बिक्री 120.02 लाख मीट्रिक टन की रही है और इसका लाभ Profit Before Tax ₹4107 करोड़ रुपए की रही है।
समय के साथ IFFCO ने केवल परंपरिक उर्वरकों तक अपने काम को सीमित नहीं रखा।इसकी आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसके काम का विस्तार --
जैसे क्षेत्रों में किया है।इसकी अपनी बीमा कंपनी Iffco Tokio General Insurance Co Ltd भी बीमा के क्षेत्र में अपना नाम कमा रही है।
विश्व का पहला "नैनो यूरिया"
IFFCO ने 2019 में दुनियां का पहला "नैनो यूरिया लिक्विड" और "नैनो डीएपी" को विकसित करके उसका पेटेंट करा लिया।इसके चलते जहां पारंपरिक यूरिया की 50 किलो की बोरी लगती थी उसके जगह पर मात्र 500 रुपए की एक नैनो यूरिया के बोतल से ही काम चल जाता है।
इसके अलावा IFFCO किसान कल्याण की दिशा में भी कई महत्वपूर्ण काम भी करता है।जैसे इसके इफको और उसके कर्मचारियों के संयुक्त योगदान से "IFFCO किसान सेवा ट्रस्ट" को बनाया गया है।
इसका उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक आपदा और संकट जैसी परिस्थितियों में आर्थिक सहायता प्रदान करना है।साथ ही इसने कृषि ज्ञान,साइल हेल्थ और Sustainable Farming पर भी कई अभियान को भी चलता है।
इसमें Save The Soil Campaign मिट्टी को पुनर्जीवन और कृषि उत्पादन को टिकाऊ तह पर्यावरण अनुकूल बनाने पर जोर दिया जाता है।
इस प्रकार से जब भारत "विकसित भारत 2047" की दिशा में आगे बढ़ रहा है तब IFFCO की भूमिका और भी बड़ी एवं महत्वपूर्ण रहने वाली है।
3.कृभको (KRIBHCO:Krishak Bharati Co-operative Ltd)
कृभको एक राष्ट्रीय स्तर की Multi State Co-operative Society है,जिसका स्थापना 17 अप्रैल 1980 को हुआ था।इसका मुख्यालय नोएडा,उत्तर प्रदेश में है।
इसका स्थापना भारत सरकार और विभिन्न सहकारी समितियों द्वारा बहु राज्यीय सहकारी समिति अधिनियम के तहत किया गया था।
इसका मुख्य कार्यक्षेत्र यूरिया उत्पादन,प्रमाणिक बीज(Certified Seeds), बायो फर्टिलाइजर,जैव ईंधन(Bio Ethanol), और एग्री इनपुट्स में है।
हाजिरा (Hazira) प्लांट से बनी कृभको का आधार
कृभको का पहला बड़ा औद्योगिक केंद्र Hazira जो सूरत के पास है गुजरात में स्थापित किया गया। वर्ष 1982 के 5 फरवरी को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हाजिरा में KRIBHCO Fertilizer Complex की आधारशिला रखी थी।
लगभग 5 वर्षों के भीतर नवंबर 1985 में इसका Trial Production शुरू हुआ और इसी समय Hazira Fertilizer Complex Comission का गठन भी किया गया। इसके बाद 1 मार्च 1986 को कृभको में कमर्शियल यूरिया प्रोडक्शन चालू हो गया।
कृभको सहकारी संस्थाओं का विशाल नेटवर्क
कृभको की सदस्यता में सामान्य व्यक्तिगत किसान सीधे इसके सदस्य नहीं बनते हैं।बल्कि इसकी सदस्यता मुख्यत कृषि से जुड़ी राष्ट्रीय और राज्य स्तर की सहकारी संस्थाओं को मिलती है।
इसको "Cooperative To Cooperative" नेटवर्क के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में इसके Paid Up Share Capital में देश भर की लगभग 9,650 सहकारी समितियों का योगदान है।
प्रमाणित बीजों की दिशा में कदम
कृभको प्रमाणित बीजों के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके लिए 1991 में कृभको ने "Seed Multiplication Program" शुरू किया।इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को गुणवत्तापूर्ण प्रमाणित बीज को उपलब्ध कराना था।
आगे चलकर 1992 में कृभको ने "Gramin Vikas Trust"(GVT) को कृभको की एक Division के रूप में शुरू किया।आगे चलकर 1999 में यह एक Trust के रूप में राष्ट्रीय स्तर की संस्था के रूप में स्थापित हो गया।
पिछले 25 वर्षों में इसने 25 राज्यों में 15 लाख लोगों के जीवन को प्रभावित करने का दावा किया है। इसमें प्रमुख रूप से ग्रामीण विकास,हेल्थकेयर,शिक्षा और Gender Equality का काम शामिल है।
कृभको का अंतरराष्ट्रीय धमक
वर्ष 1995 में कृभको ने हाजिरा में Bio Fertilizer Plant का स्थापना किया और उसी वर्ष उसने OMIFCO के लिए IFFCO और Oman Oil के साथ Joint Venture में प्रवेश किया।
Oman India Fertilizer Company (OMIFCO) में कृभको का 18.75%,IFFCO का 18.75%,OQ का 37.50% और Public Share का 25% की साझेदारी है।वर्ष 2003 में इसकी नींव रखी गई और वर्ष 2005 में इसने अपना कमर्शियल उत्पादन शुरु कर दिया था।
शाहजहांपुर में पूरी तरह सब्सिडियरी कंपनी
कृभको ने उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में "कृभको श्याम फर्टिलाइजर लिमिटेड"(KSFL) को ज्वाइंट वेंचर के रूप में शुरू किया था।
आगे चलकर 2016 में कृभको ने इसकी पूरी इक्विटी को खरीद लिया और KFSL उसकी 100% सब्सिडियरी कंपनी बन गई।इसके बाद इसका नाम बदल कर KRIBHCO Fertilizer Limited (KFL) कर दिया गया।
कृभको अपने नीम कोटेड यूरिया के लिए प्रसिद्ध है।इसने वर्ष 2013 से ही Neem Oil Coated Urea का उत्पादन और मार्केटिंग शुरू कर दिया था।बाद में सरकार के द्वारा यूरिया को नीम कोटेड करने को मैंडेट कर दिया गया था।
कृभको अपने सहकारी समितियों को प्रदान करने वाले सेवाओं और उनके माध्यम से किसानों को मिट्टी परीक्षण और अन्य सहयोग को देखते हुए वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।
4.नेफेड (NAFED: National Agricultural Cooperative Marketing Federation of India Ltd)
नेफेड जो किसानों की फसल को बाजार से जोड़ने वाली सहकारी संस्था है।इसकी स्थापना गांधी जयंती के दिन 2 अक्टूबर 1958 को किया गया था।इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है।
भारत में कृषि उत्पादों के विपणन को बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय विपणन महासंघों द्वारा मिलकर गठित किया गया।
इसका मुख्य कार्यक्षेत्र कृषि उपज की खरीद करना,न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का संचालन करना,दलहन और तिलहन का बफर स्टॉक प्रबंधन करना,जैविक खेती का विपणन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना है।
यह भारत सरकार की तरफ से दालों (Pulses),तिलहन,कपास और प्याज का राष्ट्रीय बफर स्टॉक बनाए रखने वाली नोडल एजेंसी है।
NAFED की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार उसका कुल Turnover लगभग ₹26946.59 करोड़ रुपए का रहा है। इसमें घरेलू व्यापार के साथ साथ विदेशी व्यापार भी शामिल रहा है।
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| राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ NAFED |
देश में जब भी प्याज,टमाटर और दालों का रेट अधिक बढ़ जाता है तब NEFED रियायती दरों पर सीधे उपभोक्ता को बिक्री करके बाजार को स्थिरीकरण करने का काम करता है।
यह बिचौलियों की मध्यस्थता को समाप्त करता है।देश में जब भी कृषि उत्पादों के दाम गिर जाते हैं तब यह MSP के दर पर खरीददारी करके किसानों को घाटा होने से बचाता है।
यह दुनियां के कई देशों में भारतीय कृषि उत्पादों जैसे बासमती चावल, दाल और मसालों का निर्यात भी करता है।
Annual Report के अनुसार NEFED ने 2024-25 में लगभग 40 Approved Jute Mills के साथ मिलकर काम करते हुए करीब 35,570 Bales यानी लगभग 177.85 लाख Gunny Bags की सप्लाई किया जिसका कुल मूल्य लगभग ₹162.30 करोड़ रुपया था।
यदि NEFED आगे चलकर AI आधारित Price Forecasting को करना शुरू कर दे तो यह एक मिल का पत्थर साबित होगा।इससे इसकी भूमिका और भी बढ़ जाएगी।
5.श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ (Lijjat Papad)
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| श्री महिला उद्योग लिज्जत पापड़ के नजदीकी केंद्र में महिलाएं पापड़ बनाती हुई |
लिज्जत पापड़ की स्थापना 15 मार्च 1959 को जसवंदीबेन जमनादास पोपट और 6 अन्य गुजराती महिलाओं द्वारा सर्वोदय कार्यकर्ता छगनलाल करमसी पारेख के मार्गदर्शन में हुआ था।
लिज्जत पापड़ का मुख्य कार्यक्षेत्र FMCG, पापड़,मसाले, डिटर्जेंट और बेकरी उत्पाद के क्षेत्र में है।केवल ₹80 रुपए के शुरुआती कर्ज से शुरू हुई यह संस्था आज वर्तमान में ₹1600 से ₹1800 करोड़ का वार्षिक कारोबार कर रही है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें कोई पुरुष शेयर धारक या मालिक नहीं है।प्रत्येक महिला कर्मचारी संस्था की "सह-मालिक" होती है। दुनियां के 25 से अधिक देशों में लिज्जत पापड़ का निर्यात किया जाता है।
सात महिलाएं →
₹80 →
पापड़ →
सामूहिक मेहनत →
महिला आर्थिक सशक्तिकरण →
राष्ट्रीय ब्रांड
Lijjat का विकेंद्रीकृत मॉडल (Decentralized Model)
Lijjat की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण Operational Secret है:
Decentralised Production
(एक बहुत बड़ी factory में हजारों महिलाओं को बैठाकर पापड़ बनाने के बजाय काम को महिलाओं के घरों और स्थानीय केंद्रों में वितरित किया गया।)
🔄 मॉडल का चरणबद्ध प्रवाह (Step-by-Step Flow)
📦 कच्चा माल (Raw Material)
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🏢 स्थानीय केंद्र (Local Branch)
⬇️
👩🍳 बहनें पापड़ बनाती हैं (Home Production)
⬇️
🏠 पापड़ वापस केंद्र पर आते हैं
⬇️
🔍 Quality Checking (गुणवत्ता जाँच)
⬇️
🎁 Packaging (पैकेजिंग)
⬇️
🚚 Distribution (वितरण)
⬇️
🛒 Market (बाज़ार एवं ग्राहक)
💡 मुख्य प्रभाव: इससे महिलाओं को घर के पास या घर से ही काम करने का सम्मानजनक अवसर मिला।
लिज्जत पापड़ यानी Shri Mahila Griha Udyog (SMGU) की शुरुआत 7 महिलाओं ने मिलकर किया था। इनके नाम है --
- दिवालीबेन लक्ष्मीदास लखानी
शुरुआत में इस संस्था का उद्देश्य केवल पापड़ बनाना ही नहीं था बल्कि महिलाएं एक ऐसा व्यवसाय चाहती थी जिसमें --
- परिवार की जिम्मेदारियों के साथ काम किया जा सके
- महिलाओं को नियमित आय मिले
- और संस्था पर बाहरी नियंत्रण न हो
इसी सोच के साथ आगे बढ़ती हुई ये संस्था लिज्जत पापड़ के रूप में भारत की एक ब्रांड बन गई।
लिज्जत पापड़ "हम सब मालिक हैं" का सिद्धांत क्या है ?
लिज्जत मॉडल की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें महिलाओं को केवल वर्कर के रूप में नहीं देखा जाता है।वे संस्था की "बहने"(Sister) कहलाती है।संस्था का संचालन सामूहिक भावना पर आधारित है।
भारत में लाखों महिलाएं परिवार,बच्चों और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण Full Time Factory या Office Work नहीं कर पाती है।लिज्जत ने इस समस्या का अनोखा समाधान दिया --
"काम को महिला के पास ले आओ"
लेकिन लिज्जत को केवल घर से काम होने वाला या घर पर पापड़ बनाने वाला संस्था की भूल मत कीजिएगा।इसका उत्पादन विकेन्द्रीकृत है लेकिन इसका ब्रांड और गुणवत्ता का नियंत्रण सामूहिक है।यही संतुलन इसकी सफलता की कुंजी है।
समय के साथ संस्था केवल पापड़ बनाने से आगे निकलते हुए अन्य घरेलू उत्पादों में भी शुरुआत किया है।
इस प्रकार से भारत की नई सहकारिता नीति में लिज्जत पापड़ एक महत्वपूर्ण सीख प्रदान करता है कि सहकारिता केवल -- दूध, उर्वरक या कृषि उपज तक ही सीमित नहीं है।बल्कि "सहकारिता महिला उद्यमिता,घरेलू उद्योग,फूड प्रोसेसिंग,ब्रांडिंग और डिजिटल कॉमर्स को भी जोड़ सकती है"।
6.एनसीसीएफ (NCCF: National Cooperative Consumer Federation of India Ltd)
भारत की सहकारिता की व्यवस्था में यदि NAFED को किसानों की कृषि उपज के विपणन की बड़ी सहकारी शक्ति कहा जाता है तो NCCF को उपभोक्ता सहकारिता और कृषि बाजार के बीच एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कड़ी कहा जा सकता है।
NCCF की स्थापना 16 अक्टूबर 1965 को देश में Consumer Cooperative की एक Apex Body के रूप में किया गया था। वर्तमान में यह Multi State Co-operative Societies Act 2002 के तहत पंजीकृत राष्ट्रीय सहकारी संस्था है और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। वर्तमान में इसके 29 ब्रांच ऑफिस है।
इसका स्थापना उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के तहत देश में उपभोक्ता सहकारी समितियों को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था।
इसका कार्यक्षेत्र है -- आवश्यक वस्तुओं का वितरण करना,खुदरा बाजार हस्तक्षेप करना, ई कॉमर्स सप्लाई करना और केंद्र सरकार की रियायती योजनाओं का कार्यान्वयन करना प्रमुख है।
इसकी प्रमुख उपलब्धियों को इस प्रकार से देखा जा सकता है --
- भारत (Bharat): इसके द्वारा आम नागरिकों को महंगाई से राहत प्रदान करने के लिए "भारत आटा"(Bharat Atta),"भारत दाल"(Bharat Dal), और "भारत चावल"(Bharat Rice), का रियायती दरों पर देशव्यापी वितरण किया गया।
- इसके द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और केंद्रीय भंडारों को खाद्यान्न की पारदर्शी आपूर्ति करना शामिल है।
- यह सीधे किसानों से खाद्यान्न खरीद कर उसे प्रसंस्कृत करता है और फिर उपभोक्ताओं तक पहुंचा देता है।इससे खाद्यान्नों की कालाबाजारी रुकती है।
- NCCF ने समय के साथ साथ खुद को भी आधुनिक बनाते हुए मोबाइल वैन के जरिए डिजिटल जीपीएस ट्रैकिंग के साथ रियायती दरों पर खाद्य सामग्री की बिक्री शुरू किया है।
NCCF - यानी "भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ" की कहानी में "किसान" और "उपभोक्ता" दोनों महत्वपूर्ण है।यह कई सरकारी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए एक नोडल एजेंसी के रूप में भी काम करती है।
वर्तमान में यह निम्न सरकारी योजनाओं का संचालन कर रही है --
- कृषि संबंधित सरकारी योजनाएं
- State Agriculture Department
इससे पता चलता है कि NCCF केवल अपने कमर्शियल बिजनेस तक ही सीमित नहीं है।उम्मीद है कि PACS के डिजिटलीकरण होने के बाद इसकी भूमिका और भी बढ़ने वाली है।
7.एनसीडीसी (NCDC: National Cooperative Development Corporation)
NCDC का स्थापना 13 मार्च 1963 को हुआ था और इसका मुख्यालय भी नई दिल्ली में ही है।यह अपने आप में सहकारी संस्था तो नहीं है लेकिन यह सहकारी संस्थाओं को वित्तपोषण करती है।
संसद के एक विशेष अधिनियम NCD Act 1963 के माध्यम से इको स्थापित किया गया था जो एक वैधानिक विकास वित्त संस्थान है।
इसका मुख्य कार्यक्षेत्र सहकारी समितियों को वित्तीय सहायता करना,ऋण प्रदान करना,उनके बुनियादी ढांचे का विकास करना,कोल्ड स्टोरेज निर्माण और क्षमता का निर्माण करना है।
अपने उद्देश्यों के अनुरूप इसने कार्य करना प्रारंभ किया और इसकी कुछ उपलब्धियां निम्न प्रकार से है --
- NCDC भारत में सहकारी क्षेत्र का मिनी बैंक या फाइनेंसर है। इसने अपनी स्थापना से लेकर अब तक सहकारी विकास योजनाओं के लिए लाखों करोड़ रुपए का ऋण और अनुदान को वितरित किया है।
- इसके द्वारा "सहकार मित्र योजना"(Sahakar Mitra) और प्राथमिक सहकारी समितियों (PACS) के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान किया गया है।
- डेयरी,चीनी मिलों, कताई मिलों, पोल्ट्री फार्म,मत्स्य पालन और हस्तशिल्प के क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का इसके द्वारा वित्त पोषण किया गया है।
इसका ग्रामीण क्षेत्रों में अद्भुत काम और प्रभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में कोल्ड चेन, वेयरहाउस और प्रोसेसिंग यूनिट्स बनाने के लिए NDCD ही सहकारी समितियों को सस्ता ऋण प्रदान करता है।इससे गांव स्तर पर रोजगार और इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होता है।
रोचक तथ्य यह है कि NCDC बैंक नहीं होते हुए भी सहकारी समितियों को ऋण देने में NPA यानी गैर निष्पादित संपति को 1% से भी नीचे बनाए रखने के लिए जाना जाता है।यह इसकी कुशल रिकवरी प्रणाली का पहचान है।
आगे भी यह संस्था देश में सहकारिता और सहकारी समितियों के विकास के लिए वित्तपोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेगा।
8.ट्राइफेड (TRIFED:Tribal Cooperative Marketing Development Federation of India)
TRIFED (Tribal Cooperative Marketing Development Federation of India) यानी "भारतीय जनजातीय विपणन विकास महासंघ" भारत सरकार के "जनजातीय कार्य मंत्रालय" के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करने वाली राष्ट्रीय स्तर की संगठन है।
इसका स्थापना 6 अगस्त 1987 को हुआ था।इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है।
इसका मुख्य कार्य "लघु वन उपज"(MFP - Minor Forest Produce) का संग्रह और मूल्य संवर्धन करना,जनजातीय हस्तशिल्प,Tribes India, रिटेल आउटलेट और प्रधानमंत्री वन धन योजना का क्रियान्वयन करना मुख्य है।
जनजातीय क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में ऐसी उलझ होती है जिसको किसान की तरह खेत में पैदा करने के बजाय इसको जंगल से ही संग्रह किया जाता है।इसी को "Minor Forest Produce"(MFP) या "Non Timber Forest Produce"(NTFP) कहा जाता है।
समस्या यह होती है कि इन उत्पादों को संग्रहकर्ता के पास बाजार की कम जानकारी होने,प्रोसेसिंग की सुविधा नहीं होने,स्टोरेज की कमी और पैकिंग एवं ब्रांडिंग नहीं होने के चलते सीधे बाजार तक नहीं पहुंच कर बिचौलियों के माध्यम से बाजार तक जाता था।TRIFED इसी समय का समाधान करता है।
यह वन उत्पादों को बाजार योग्य बनाने के साथ साथ जनजातीय हस्तशिल्प और कला को भी ब्रांडिंग और मार्केटिंग करके प्रमोट करता है।
TRIBES India -- जनजातीय उत्पादों का राष्ट्रीय बाजार
TRIFED द्वारा संचालित Tribes India एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसके माध्यम से जनजातीय समुदायों से सोर्स प्रोडक्ट्स को बाजार में प्रस्तुत किया जाता है और ब्रांड के रूप में स्थापित किया जाता है।
🌿 TRIBES India का मॉडल (Market Linkage Model)
इसे आसान चरणबद्ध प्रवाह में समझें:
🎨 जनजातीय Artisan (आदिवासी कारीगर)
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🍯 हस्तशिल्प / प्राकृतिक उत्पाद (Forest Produce)
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🏛️ TRIFED Sourcing (सरकारी खरीद/संग्रह)
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✨ Quality / Presentation (गुणवत्ता व पैकेजिंग)
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🏷️ TRIBES India Brand (ब्रांडिंग)
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🏪 Retail / Exhibition / E-commerce
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🛒 Customer (राष्ट्रीय एवं वैश्विक बाज़ार)
💡 प्रभाव: इससे सुदूर ग्रामीण व जनजातीय इलाकों के स्थानीय उत्पाद National Market और E-commerce में दिखाई देने लगते हैं।
दरअसल TRIFED के द्वारा तीन तरीकों से आदिवासी उत्पादों को प्रमोट किया जाता है --
- Tribes India Retails Outlets
- Adi Mahotsava और अन्य Exhibitions
Tribes India के देश भर में कुल 120 आउटलेट खोले गए है।
Aadi Mahotsav - जनजातीय उत्पादों का बड़ा बाजार
TRIFED के माध्यम से आयोजित Aadi Mahotsav जैसे आयोजन से जनजातीय उत्पादों और उपभोक्ताओं के बीच सीधा संबंध बनाने का प्रयास किया जाता है।
इसका दूसरा फायदा यह होता है कि इसके माध्यम से ग्राहक केवल उत्पाद ही नहीं खरीदता बल्कि उसके पीछे की संस्कृति को भी जानने का प्रयास करता है।
Van Dhan Vikas Kendra सबसे महत्वपूर्ण मॉडल
TRIFED की सबसे महत्वपूर्ण मॉडल में से एक है "वन धन विकास केंद्र"(VDVK)।इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों को केवल जंगली उत्पादों के संग्रहकर्ता के रूप में ही नहीं बल्कि उन्हें Entrepreneurs के रूप में विकसित करना है।
एक "वन धन विकास केंद्र" में 15 Tribal SHGs (Self Help Group) होते है।और प्रत्येक SHGs में लगभग 20 Tribal MFP समुदाय होते हैं।यह MFP समुदाय 10 लोगों का एक समूह होता है।इस तरह से एक क्लस्टर यानी वन धन विकास केंद्र में 300 लोग होते हैं।
- ₹15 लाख का सहायता: TRIFED एक 300 सदस्यों वाले इस वन धन विकास केंद्र को ₹15 लाख तक का केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- इसका उपयोग जनजातीय उत्पादों के लिए मशीनरी,प्रोसेसिंग,ट्रेनिंग, मूल्य संवर्धन और बिजनेस डेवलपमेंट जैसे कामों में किया जाता है।
वन धन विकास केंद्र योजना के माध्यम से 50 लाख से अधिक आदिवासी संग्रहकर्ताओं और कारीगरों को स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया गया है।
🌳 TRIFED का पूर्ण Value Chain Model
जंगल के संग्रहकर्ता से लेकर ग्लोबल मार्केट तक का सफ़र
🏹 1. जनजातीय परिवार (Tribal Collectors)
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🍯 2. वन-उपज (MFP) एवं हस्तशिल्प संग्रह
▼
👩👩👧👧 3. SHG (स्व-सहायता समूह एकीकरण)
▼
🏭 4. Van Dhan Vikas Kendra (VDVK)
▼
🔍 5. Sorting & Grading (छँटाई व ग्रेडिंग)
▼
⚙️ 6. Processing & Value Addition (प्रसंस्करण)
▼
📦 7. Modern Packaging (सुरक्षित पैकेजिंग)
▼
🏷️ 8. Branding (TRIBES India पहचान)
▼
🏪 9. Retail, Exhibition & E-Commerce
▼
🌐 10. राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ग्राहक
💡 TRIFED Model की असली ताकत:
बिचौलियों (Middlemen) का उन्मूलन + स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान + आदिवासियों की आय में सीधी वृद्धि।
रोचक तथ्य:
"TRIFED द्वारा आयोजित "आदि महोत्सव"(Aadi Mahotsav) भारत का सबसे बड़ा जनजातीय शिल्प और संस्कृति मेला बन चुका है,जिसका उद्घाटन स्वयं देश के प्रधानमंत्री करते हैं"।
इस प्रकार से TRIFED ने जनजातीय अर्थव्यवस्था को सहकारिता से जोड़कर उन्हें और उनके उत्पादों एवं संस्कृत को पूरे देश विदेश में स्थापित करने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।यह वाकई में सराहनीय है।
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| TRIFED का आदि महोत्सव में स्टाल |
9.कर्नाटक मिल्क फेडरेशन - नंदिनी(KMF -Karnataka Cooperative Milk Producer Federation Ltd)
भारत की सहकारिता की सबसे बड़ी सफल कहानियों में यदि Amul का नाम आता है तो उसी प्रकार से दक्षिण भारत में "Karnataka Milk Federation" (KMF) और उसका लोकप्रिय ब्रांड Nandini का है।
इसकी स्थापना भले ही 1974 में हुई थी लेकिन इसकी भूमिका का शुरुआत 1955 से ही हो गया था।
कर्नाटक में डेयरी सहकारिता क्रांति की शुरुआत 1955 में Kodagu के Kudige क्षेत्र में Primery Dairy Cooperative Societies की शुरुआत हुई थी।
इसके बाद राज्य में Dairy Development को संस्थागत रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और इसी क्रम में Karnataka Dairy Development Corporation (KDDC) की स्थापना हुई।कर्नाटक डेयरी विकास परियोजना के रूप में यह शुरुआत मुख्य रूप से विश्व बैंक की सहायता से शुरू हुआ था।
आगे चलकर 1984 में KDDC का पुनर्गठन कर दिया गया और इसका नाम - "Karnataka Cooperative Milk Producers Federation"(KMF) कर दिया गया जो वर्तमान मे है।
नीचे दिए गए डायग्राम चित्र के माध्यम से इसकी संरचना स्पष्ट हो जाती है --
🥛 'नंदिनी' (KMF) का त्रि-स्तरीय आनंद मॉडल
गाँव के दुग्ध उत्पादक से लेकर बाज़ार तक का संगठित ढाँचा:
🏠 प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियाँ (VDCS)
(24,000+ ग्राम स्तरीय समितियाँ)
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🏭 जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ
(16 जिला दुग्ध संघ एवं चिल्लिंग प्लांट्स)
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🏛️ कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (KMF - शीर्ष निकाय)
(मार्केटिंग, ब्रांडिंग व राज्यव्यापी नीतियां)
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🏷️ 'नंदिनी' (Nandini) ब्रांड वैल्यू
(दूध, घी, मिठाइयाँ, आइसक्रीम, फ्लेवर्ड मिल्क)
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🛒 उपभोक्ता व निर्यात (देश-विदेश में बाज़ार)
💡 मुख्य प्रभाव: 26 लाख से अधिक किसान परिवारों को प्रतिदिन सुनिश्चित आय और राज्य में दुग्ध क्रांति।
इसका मुख्यालय बेंगलुरु,कर्नाटक में है।गुजरात के आनंद मॉडल के तर्ज पर इसे कर्नाटक सरकार और राज्य के दुग्ध उत्पादक किसानों के सहयोग से स्थापित किया गया था।
इसका मुख्य कार्य दुग्ध संग्रहण,कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास,डेयरी प्रोसेसिंग,पशु आहार निर्माण, और Nandini ब्रांड के तहत 65 से अधिक डेयरी उत्पादों की मार्केटिंग करना है।
प्रमुख उपलब्धियां और आंकड़े
Karnataka Cooperative Milk Producers Federation Ltd यानी KMF की प्रमुख उपलब्धियां इस प्रकार से है --
- भारत का दूसरा सबसे बड़ा दुग्ध संघ: गुजरात के Amul के बाद KMF भारत की दूसरी सबसे बड़ी दुग्ध सहकारी संस्था है।
- विशाल टर्नओवर: वित्त वर्ष 2023-24 तक कर्नाटक मिल्क फेडरेशन का कुल वार्षिक कारोबार ₹21,000 करोड़ से ₹24,000 करोड़ को पार कर गया।इससे ओटा चलता है कि यह कितना महत्वपूर्ण है।
- रिकॉर्ड दुग्ध संग्रहण: KMF प्रतिदिन औसतन 85 लाख से लेकर 90 लाख लीटर दूध को एकत्रित कर लेता है।जबकि पिक सीजन में यह संग्रहण 95 लाख लीटर को भी पार कर जाता है।
- व्यापक उत्पादन रेंज: एक केवल पैकेज्ड दूध ही नहीं बल्कि नंदिनी ब्रांड के तहत घी,मक्खन,पनीर,दही,फ्लेवर्ड मिल्क,आइसक्रीम, पेड़ा और नंदिनी बेकरी उत्पाद का बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री किया जाता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों पर प्रभाव
KMF केवल व्यावसायिक उत्पादन और बिक्री तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों को इंपावरमेंट का काम भी करता है।
इसके ग्रामीण और किसानों पर प्रभाव को इस प्रकार से देख सकते हैं --
- 26 लाख+ किसान परिवारों का सहारा: पूरे कर्नाटक के 24,000 से अधिक गांवों में फैले 26 लाख से अधिक दुग्ध उत्पादक किसान परिवार KMF के पंजीकृत सदस्य हैं।वे इस संस्था से जुड़कर आय का अर्जन करते हैं और इससे अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं।
- प्रत्यक्ष एवं पारदर्शी भुगतान: गांव स्तरीय प्राथमिक दुग्ध समितियों में स्वचालित दुग्ध परीक्षण मशीनों के माध्यम से वसा और SNF के आधार पर दूध का मूल्य तय होता है।इसका भुगतान सीधे किसानों के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
- महिला सशक्तिकरण: KMF के तहत हजारों "विशेष महिला दुग्ध सहकारी समितियां"(All Women Dairy Cooperatives) को गठन करके चलाया जा रहा है।इसके माध्यम से ग्रामीण महिलाओं के हाथ में सीधे वित्तीय स्वायत्तता प्राप्त हो गई है।
- मुफ्त पशु चिकित्सा और सब्सिडी: KMF केवल दूध ही नहीं खरीदता बल्कि दुग्ध किसानों को कई तरह से निःशुल्क सहायता भी करता है।यह किसानों को सस्ती दरों पर संतुलित पशु आहार, पशुओं को मुफ्त कृत्रिम गर्भधान और डोर स्टेप पशु चिकित्सा सेवाएं भी उपलब्ध कराता है।
🌟KMF के रोचक एवं विशेष तथ्य
KMF के और भी कई Interesting Facts भी है।जो इस प्रकार से है --
- तिरुपति बालाजी के लड्डुओं का स्वाद: विश्व प्रसिद्ध "तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर" के दिव्य लड्डू "प्रसादम" को बनाने के लिए लगने वाले कईयों सौ टन शुद्ध देशी घी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा दशकों से ही नंदिनी ब्रांड(KMF) द्वारा ही किया जाता रहा है।
- क्षीर भाग्य (Ksheera Bhagya) योजना: कर्नाटक सरकार के महत्वाकांक्षी योजना के तहत KMF द्वारा राज्य के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लगभग 65 लाख से अधिक स्कूली बच्चों को पोषण प्रदान करने के लिए प्रतिदिन मुफ्त दूध और फ्लेवर्ड मिल्क पाउडर का आपूर्ति किया जाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय स्पोर्ट्स स्पॉन्सरशिप: Amul की तरह Nandini ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी ब्रांड पहचान को बनाते हुए आईसीसी टी 20 वर्ल्ड कप में स्कॉटलैंड और आयरलैंड क्रिकेट टीमों को आधिकारिक तौर पर स्पांसर किया था।
- सस्ती दरों पर शुद्धता: नंदिनी भारत के प्रमुख मेट्रो शहरों में अन्य प्राइवेट बैंडों की तुलना में सबसे किफायती और गुणवत्तापूर्ण दूध उपलब्ध कराने के लिए जानी जाती है।
इस प्रकार से यदि देखा जाए तो KMF और Nandini की असली कहानी उसके दूध के पैकेट से नहीं बल्कि उस पैकेट के पीछे खड़े लाखों किसानों और उनकी सहकारी व्यवस्था से शुरू होती है।
आने वाले वर्षों में और भारत को विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों को प्राप्त कराने में KMF की भूमिका और भी महत्वपूर्ण रहे वाली है।
10. इंडियन कॉफी हाउस(Indian Coffee House-worker Cooperatives)
भारत में सहकारिता की चर्चा होते ही हमारे आंखों के सामने किसान,दूध, उर्वरक,कृषि विपणन या उपभोक्ता सहकारी समितियों का तस्वीर उभरने लगता है।
लेकिन Indian Coffee House की कहानी बिल्कुल ही अलग है।
यह कहानी शुरू होती है ऐसे समय से जब Coffee Board द्वारा चलाए जा रहे Coffee Houses बंद होने लगे और वहां काम करने वाले कर्मचारियों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया।
इसके बाद कर्मचारियों ने नौकरी मांगने के बजाए एक अलग रास्ता को चुना --
और उन्होंने अपना Cooperative बना लिया।
और यही प्रयोग आगे चलकर Indian Coffee House के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
☕ Indian Coffee House क्या है?
Indian Coffee House भारत की प्रसिद्ध रेस्टोरेंट श्रृंखला (Restaurant Chain) है।
इसकी सबसे खास बात इसका मेन्यू नहीं, बल्कि इसका Ownership Model है।
विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग Worker Cooperative Societies इसके Outlets संचालित करती हैं। आधिकारिक ICH वेबसाइट भी इसे इसी रूप में परिभाषित करती है।
🔄 इसका अनूठा स्वामित्त्व ढाँचा (Ownership Model):
👥 Workers (कर्मचारी ही इसके असली मालिक हैं)
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🏛️ Cooperative Society (कर्मचारी सहकारी समिति)
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☕ Indian Coffee House Outlets / Network
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🍽️ Customers (ग्राहक व समाज)
💡 इसलिए Indian Coffee House को भारत में Worker-Owned / Worker Cooperative Tradition का सबसे प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
इंडियन कॉफी हाउस की स्थापना 1957-58 में हुई थी।
इसका कोई एक केंद्रीय मुख्यालय नहीं है बल्कि यह "स्वतंत्र प्रांतीय बोर्ड सहकारी कर्मचारी समितियों" के महासंघों द्वारा संचालित होता है।जैसे -- त्रिशूर, कुनूर,कोलकाता,जबलपुर और दिल्ली आदि।
इसके संस्थापकों और मार्गदर्शी में मुख्य रूप से दिग्गज कम्युनिस्ट नेता ए.के. गोपालन और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समर्थन से छंटनीग्रस्त कर्मचारियों द्वारा किया गया।
इसका मुख्य कार्य -- आतिथ्य सेवा,रेस्तरां श्रृंखला,खाद्य एवं पेय पदार्थ और बौद्धिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों का संचालन है।
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| Indian Coffee House का केंद्र |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और जन्म की कहानी
1930 के दशक में ब्रिटिश शासन के दौरान "इंडियन कॉफी सीलिंग बोर्ड" ने भारत में कॉफी की खपत को बढ़ावा देने के लिए बांबे,कलकत्ता और मद्रास जैसे शहरों में "इंडिया कॉफी हाउस" की शुरुआत किया था।
1950 के दशक के मध्य में सरकारी नियंत्रण वाले कॉफी बोर्ड ने घाटा होने और प्रबंधन में बदलाव होने के कारणों का हवाला देते हुए देश भर में फैले इस कॉफी हाउस को बंद करने और सैकड़ों कर्मचारियों को नौकरी से बाहर निकालने का फैसला किया।
इसके बाद प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता और सांसद ए. के. गोपालन ने इन निष्काषित कर्मचारियों को संगठित किया। उन्होंने कर्मचारियों को सलाह दिया कि वे अपनी नौकरी की मांग करने के बजाए खुद की सहकारी समिति को बना ले और बंद हो रहे कॉफी हाउसों के स्वामित्व को अपने हाथों में ले ले।
वर्ष 1957 में बंगलौर और दिल्ली से पहली कर्मचारी सहकारी समितियों का पंजीकरण शुरू हुआ और 1958 तक बंद पड़े अधिकतर कॉफी हाउसों को कर्मचारियों ने फिर से खोल दिया।
💼अनूठा कार्य मॉडल
इसका सबसे बड़ा खूबी इसका अनूठा कार्य मॉडल है जो इस प्रकार से है --
- कर्मचारी ही मालिक: इसमें कोई भी कॉर्पोरेट इंवेस्टर या निजी मालिक या प्रमोटर नहीं होता है।संस्था का हर वेटर और रसोईया या चाहे मैनेजर इस सहकारी समिति का सामान शेयर धारक होता है।
- लोकतांत्रिक प्रबन्धन: संस्था का बोर्ड ऑफ डायरेक्टर पूरी तरह से कर्मचारियों में से ही लोकतांत्रिक चुनाव द्वारा चुना जाता है।
- लाभ का न्यायसंगत वितरण: संस्था से होने वाला वार्षिक लाभ किसी बाहरी शेयर धारकों के पास जाने के बजाए कर्मचारियों के वेतन वृद्धि,पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और बोनस के रूप में वितरित किया जाता है।
📊प्रमुख उपलब्धियां और पहुंच
इंडियन कॉफी हाउस की उपलब्धियों की चर्चा किए बिना यह विश्लेषण अधूरा ही रह जाएगा।इसकी मुख्य उपलब्धियों को निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है --
- 400 से अधिक शाखाओं का नेटवर्क: इंडिया कॉफी हाउस का नेटवर्क पूरे भारत में विभिन्न प्रांतीय समितियों के तहत 400 से अधिक इंडियन कॉफी हाउस काम कर रहे हैं।
- केरल मॉडल की मिशाल: अकेले केरल में "Indian Coffee Workers Cooperative Society"(ICWC,Thrissur & Kannur) 50 से अधिक शाखाएं चलाती है जिसका टर्नओवर करोड़ो में है।
- किफायती दरें और सुविधा: कॉर्पोरेट फास्ट फूड चैन की तुलना में इंडियन कॉफी हाउस आज भी बहुत कम दाम पर पारंपरिक फिल्टर कॉफी,दौसा,कटलेट और भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्रसिद्ध है।
इस प्रकार से इंडियन कॉफी हाउस प्राइवेट कॉर्पोरेट फूड नेटवर्क और रेस्टोरेंट को भी मात दे रहा है।
इंडियन कॉफी हाउस का सांस्कृतिक और बौद्धिक महत्व
इंडियन कॉफी हाउस केवल खाना खाने की जगह के रूप में ही काम नहीं करता है।बल्कि यह भारत की राजनीतिक,सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों एवं इतिहास का गवाह भी रहा है।
इस महत्व को इस प्रकार से समझा जा सकता है --
- कोलकाता का कॉलेज स्ट्रीट कॉफी हाउस: यहां नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ अमर्त्य सेन,फिल्मकार सत्यजीत रे,मृणाल सेन, और क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस जैसी प्रसिद्ध हस्तियों की चर्चाएं होती आ रही है।
- दिल्ली (कनॉट प्लेस) कॉफी हाउस: देश के स्वतंत्रता से लेकर आपातकाल के दौर में भी देश के जाने माने पत्रकारों,लेखकों,राजनेताओं और बुद्धिजीवियों का एक महत्वपूर्ण अनौपचारिक अड्डा के रूप में कार्य करता आ रहा है।
अतः यह कहा जा सकता है कि इंडियन कॉफी हाउस अपने ऐतिहासिक गर्भ से लेकर वर्तमान में भी बौद्धिक और सांस्कृतिक लोगों के लिए सुकून प्रदान करने वाला जगह बना हुआ है।
📊 किसान सहकारिता vs Indian Coffee House
विभिन्न सहकारी समितियों का तुलनात्मक स्वामित्त्व ढाँचा (Ownership Model)
| सहकारी संस्था |
मुख्य सदस्य / स्वामित्त्व |
| Amul |
दूध उत्पादक किसान |
| KMF – Nandini |
दूध उत्पादक किसान |
| NAFED |
कृषि उत्पादक / सहकारी संस्थाएं |
| KRIBHCO |
किसान सहकारी संस्थाएं |
| TRIFED |
जनजातीय उत्पादक / समुदाय |
| ☕ Indian Coffee House |
Worker members (कर्मचारी) |
💡 इससे महत्वपूर्ण बातें पता चलती हैं:
- सहकारिता (Cooperation) केवल किसानों या कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
- कर्मचारी (Workers) भी Cooperative Ownership के आधार पर एक सफल व्यावसायिक उद्यम चला सकते हैं।
इंडियन कॉफी हाउस की कहानी हमें बताती है कि "सहकारिता केवल किसान की ही ताकत नहीं बल्कि कामगार की भी आर्थिक ताकत बन सकती है"।
सच कहा जाए तो वर्तमान समय में जब कॉर्पोरेट कंपनियों में कर्मचारियों की नौकरी का कोई भरोसा नहीं रहता है कि कब नौकरी चली जाएगी।ऐसी परिस्थितियों में इस प्रकार का सहकारिता की जरूरत महसूस होती है।
सरकार को चाहिए कि देश में माहुल बनाकर ऐसी ही सहकारी संस्थाओं का स्थापना करवाया जाए।
"जिसे बंद होने वाला सरकारी प्रतिष्ठान समझा गया उसे कर्मचारियों ने मिलकर सहकारिता के बल पर एक जीवित संस्था में बदल दिया"
तुलनात्मक सारांश: शीर्ष 10 सहकारी संस्थाएं
नीचे जो तालिका दिया गया है उसमें भारत की इन 10 दिग्गज संस्थाओं के मुख्य विवरण को एक नजर में ही देखा जा सकता है --
📊 तुलनात्मक सारांश: शीर्ष 10 सहकारी संस्थाएँ
नीचे दी गई तालिका में भारत की इन 10 दिग्गज संस्थाओं का मुख्य विवरण एक नज़र में देखा जा सकता है:
| क्र.सं. |
संस्था का नाम |
स्थापना |
मुख्य क्षेत्र |
सदस्य / लाभार्थी |
वार्षिक टर्नओवर / प्रभाव |
| 1 |
Amul |
1946 |
डेयरी एवं पैकेज्ड फूड |
36 लाख+ किसान |
₹80,000+ करोड़ |
| 2 |
IFFCO |
1967 |
उर्वरक एवं नैनो तकनीक |
5.5 करोड़+ किसान |
₹45,000+ करोड़ |
| 3 |
KRIBHCO |
1980 |
यूरिया, बीज एवं बायो-फ्यूल |
9,000+ समितियां |
₹12,000+ करोड़ |
| 4 |
NAFED |
1958 |
कृषि विपणन व बफर स्टॉक |
देश भर के किसान |
₹20,000+ करोड़ (व्यापार) |
| 5 |
Lijjat Papad |
1959 |
एफएमसीजी एवं हस्तनिर्मित खाद्य |
45,000+ महिला सदस्य |
₹1,600+ करोड़ |
| 6 |
NCCF |
1965 |
उपभोक्ता वस्तुएं व राशन |
आम उपभोक्ता / नागरिक |
₹3,000+ करोड़ |
| 7 |
NCDC |
1963 |
सहकारी वित्तपोषण |
हज़ारों सहकारी समितियां |
₹30,000+ करोड़ (ऋण) |
| 8 |
TRIFED |
1987 |
जनजातीय उत्पाद व MFP |
50 लाख+ आदिवासी |
₹300+ करोड़ (बिक्री) |
| 9 |
KMF (Nandini) |
1974 |
डेयरी उत्पाद |
26 लाख+ किसान |
₹21,000+ करोड़ |
| 10 |
Indian Coffee House |
1957 |
रेस्तरां व हॉस्पिटैलिटी |
400+ शाखाएं / कर्मचारी |
स्व-संचालित वर्कर्स मॉडल |
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इन 10 संस्थाओं की सफलता से मिलने वाली 10 बड़ी सीख
इन 10 दिग्गज संस्थाओं का अध्ययन करने के बाद यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि सहकारिता केवल एक सामाजिक सेवा ही नहीं है बल्कि यह एक "उच्च व्यवसायिक मॉडल"(Hingh - Performance Business Modal) भी है।
इनसे मिलने वाली 10 सीख निम्नलिखित है --
📌 इन 10 सीखों को एक नज़र में (Key Takeaways)
| क्रम |
बड़ी सीख |
इसका अर्थ |
| 1 |
संगठन की शक्ति |
छोटे उत्पादक मिलकर बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकते हैं |
| 2 |
सदस्य को वास्तविक लाभ |
Cooperative से Measurable Economic Benefit मिले |
| 3 |
Value Addition |
कच्चे माल की बजाय Processed Product बेचें |
| 4 |
Brand बनाइए |
Product को Consumer Trust और पहचान दें |
| 5 |
Professional Management |
लोकतांत्रिक Ownership के साथ विशेषज्ञ Management |
| 6 |
Transparency |
Accounts और Decisions में पारदर्शिता व भरोसा |
| 7 |
Financial Independence |
केवल Subsidy पर निर्भर न रहकर आत्मनिर्भर बनें |
| 8 |
Technology |
Digital, Data और AI तकनीकों को अपनाएं |
| 9 |
Market Expansion |
गांव से National और Global Market तक पहुंचें |
| 10 |
Continuous Innovation |
समय की आवश्यकता के अनुसार Cooperative Model बदलें |
💡 मूल मंत्र: इन 10 सिद्धांतों को अपनाकर ही कोई भी सहकारी समिति वैश्विक स्तर पर सफल हो सकती है।
1. अकेले किसान या कामगार से ज्यादा ताकतवर है सामूहिक संगठन
यह सहकारिता की पहली सबसे बड़ी सीख है कि छोटे लोगों को बड़े बनने के लिए अपनी पहचान को छोड़ने की जरूरत नहीं होती है बल्कि उन्हें संगठित होने की जरूरत होती है।
एक किसान अकेले --
- कम मात्रा में उत्पादन करता है
- बाजार में भी कम पहुंच रखता है
- प्रोसेसिंग में निवेश नहीं कर पाता है
- बड़े खरीददारों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता है
लेकिन जब वह संगठित हो जाता है तब Amul या IFFCO चाहे Lijjat Papad जैसा संगठन को खड़ा कर देता है।
2.केवल सदस्य बनाना काफी नहीं है बल्कि सदस्यों को वास्तविक आर्थिक लाभ देना जरूरी है
किसी भी सहकारी समिति के सदस्यों के लिए पहला सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होता है कि "मुझे इससे क्या मिलेगा ?"
अतः सफल Cooperative वही होता है जो सदस्यता बढ़ाने से ज्यादा अपने सदस्य को वास्तविक आर्थिक वैल्यू प्रदान कराता है।
इसीलिए तो भारत सरकार भी PACS को केवल Credit संस्था के रूप में नहीं बल्कि क्रेडिट,इनपुट,मार्केट और वैल्यू एडिशन से किसानों को जोड़ने वाली जमीनी संस्था के रूप में देखना या स्थापित करना चाहती है।
3. कच्चा मॉल बेचने के बजाए उसका मूल्य संवर्धन करना चाहिए
यह इन सभी सफल बिजनेस मॉडल वाली सहकारिता संस्थाओं में देखा गया है।इन संस्थाओं ने दूध को पनीर,घी, आइसक्रीम और अन्य डेयरी प्रोडक्ट के रूप में प्रोसेस करके अपना बढ़िया ब्रांडिंग किया।
इसी तरह से जनजातीय उत्पादों को प्रोसेस,ग्रेडिंग और वैल्यू एडिशन करके मार्केटिंग किया गया।अतः वैल्यू एडिशन जितनी लंबी और मजबूत होगी उसके सदस्यों के लिए वैल्यू क्रिएशन की संभावना उतनी ही अधिक होगी।
4. Cooperative को अपना मजबूत ब्रांड बनाना चाहिए
एक सिख अमूल ,लिज्जत पापड़ और नंदिनी जैसे संस्थाओं से विशेष रूप से मिलती है।किसान अपने दूध का नेशनल ब्रांड भी बन जाता और Lijjat Papad की पहचान केवल महिलाओं के समूह के रूप में ही नहीं रही है।
बल्कि इसको एक संगठित ब्रांड का रूप प्रदान किया गया था।अतः सहकारिता संस्थाओं को केवल प्रोसेस करने वाला संगठन बनने के बजाए कंज्यूमर फेस ब्रांड भी बनना चाहिए।
5. प्रोफेशनल मैनेजमेंट और सहकारिता मूल्य दोनों जरूरी है
यह एक महत्वपूर्ण सीखने वाला अध्याय है।
वास्तव में ये सभी बड़ी सहकारी संस्थाओं में --
- प्रोफेशनल मैनेजर
- अकाउंटेंट
- मार्केटिंग एक्सपर्ट
- टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट
- सप्लाई चेन विशेषज्ञ
- लीगल एक्सपर्ट
- स्किल्ड एम्प्लॉय
को रखा गया और इनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। लेकिन अंतिम निर्णय सदस्यों के पास ही रखा गया।यही कोऑपरेटिव गवर्नेंस का मूल संतुलन है।
"सहकारी" का अर्थ "अव्यवसायिक" नहीं होना चाहिए
6. पारदर्शिता और विश्वास के बिना सहकारिता टिक नहीं सकता
सहकारिता का सबसे बड़ा पूंजी पैसा नहीं होता है बल्कि सहकारिता की सबसे बड़ी है "विश्वास"। और सदस्यों के बीच यह विश्वास डगमगाना नहीं चाहिए।यह विश्वास आता है पारदर्शिता से।
यदि सदस्यों को लगने लगेगा कि संस्था में कुछ ही लोगों का नियंत्रण हो गया है तो सहकारिता की भावना कमजोर हो सकती है।अतः सहकारिता में पारदर्शिता कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं है बल्कि यह उसके विकास के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।
7. Cooperative केवल सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए
सरकार भले ही -- टेक्नोलॉजी ,पॉलिसी,फाइनेंस,ट्रेनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और मार्केट सपोर्ट प्रदान कर सकती है लेकिन अपने बिजनेस मॉडल को टिकाऊ बनाने का काम खुद सहकारिता को ही करना होता है।
अतः सहकारिता को सरकारी मदद शुरुआत में आसान बना सकती है लेकिन लंबे समय की सफलता अपनी बिजनेस की विश्लेषणात्मक उत्पादकता और ही निर्भर करती है।
8. Techonology को सहकारिता का दुश्मन नहीं बल्कि अगला हथियार बनाना चाहिए
पुराने जमाने में सहकारिता में अधिकतर काम मैन्युअली ही होता था। लेकिन आज वर्तमान में अधिकतर काम डिजिटल,AI आधारित और ई कॉमर्स के माध्यम से हो रहा है।
इसीलिए तो पूरे देश में PACS को भी डिजिटलीकरण किया जा रहा है ताकि समय के साथ ये अपने को स्थापित कर सके।
भविष्य में भी सहकारिता टिकेगा जो टेक्नोलॉजी को अपनाएगा।
9. स्थानीय ताकत को राष्ट्रीय और विश्व बाजार से जोड़ना चाहिए
कोई भी सफल सहकारिता केवल अपने गांव अपने जिले और अपने राज्य तक ही सीमित नहीं रहती है।जब तक उनकी यात्रा अपने राज्य से बाहर नहीं निकलेगी उसकी पूरी सफलता सुनिश्चित नहीं हो सकेगी।
और आजकल तो ई कॉमर्स और डिजिटल जमाना है जिससे ये काम और भी आसान हो जाता है।अतः सहकारिता का काम केवल सामूहिक उत्पादन ही नहीं होनी चाहिए बल्कि सामूहिक मार्केट पहुंच भी होनी चाहिए।
10. Cooperative को समय के साथ अपने में बदलाव करना चाहिए
आज का उपभोक्ता 1960-70 के दशक वाला उपभोक्ता नहीं है।इसको भली भांति इन 10 सहकारिता संस्थाओं ने समझा और इसीलिए ये सफल हुई।
आज का उपभोक्ता क्वालिटी, कन्वेंस,डिजिटल पेमेंट,होने डिलीवरी, अट्रैक्टिव पैकेजिंग, ऑनलाइन प्लेटफार्म, सस्टेनेबिलिटी जैसे मूल्य पर अधिक ध्यान देता है।
अतः आज के कॉपरेटिव को भी अपने को समय के साथ यह बदलाव करके उपभोक्ता के कंधे से कंधा मिला लेनी चाहिए।
वर्ष 2047 तक भारत में सहकारिता का भविष्य
आजादी के बाद से लेकर अब तक के सहकारिता के भारतीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण भारत में दिए गए योगदान को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि "विकसित भारत 2047" में भी यह अपना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इसीलिए तो सरकार ने पूरे देश में सहकारी समितियों को डिजिटलीकरण कर रही है और तीन नई राष्ट्रीय सहकारिता संस्थाओं की स्थापना भी कर चुकी है।
सहकारिता 2.0
अब सहकारिता मंत्रालय और नई राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के बाद हो रहे सहकारिता के विकास के प्रयास को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अब "सहकारिता 2.0" की शुरुआत होने वाली है।
इस सहकारिता 2.0 में -- गांव का किसान --
- Digital Cooperative
- Processing
- Branding
- E -Commerce
- AI
- National & International Markets
तक जुड़ सकेंगे।
निष्कर्ष (Conclusion)
इन 10 सहकारी संस्थाओं के विश्लेषण से यह महत्वपूर्ण बात साबित होता है कि --
"सहकारिता गरीबों की मजबूरी नहीं,बल्कि सामूहिक आर्थिक शक्ति का मॉडल हो सकती है"।
सच कहा जाए तो सहकारिता की असली ताकत संख्य में नहीं बल्कि सदस्यों को मालिक बनाने में है,और उसकी असली सफलता तब होती है जब सामूहिक स्वामित्व को बाजार की प्रतिस्पर्धा,तकनीक और पेशेवर प्रबंधन के साथ जोड़ दिया जाता है।
हमें यह भी सीखने और जानने को मिलता है कि प्राइवेट और कॉरपोरेट कंपनियों के साथ साथ देश में सहकारिता मॉडल को और भी अधिक बढ़ावा देना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions - FAQs)
1. भारत की सबसे सफल सहकारी संस्थाओं में कौन कौन सी शामिल है ?
भारत की सबसे सफल सहकारी संस्थाओं में Amul,IFFCO,KRIBHCO,Shri Mahila Griha Udyog --Lijjat Papad,NCCF,TRIFED,Karnatka Milk Federation-Nandini, और Indian Coffee House जैसी संस्थाएं है।ये भारत के अलग अलग सहकारी मॉडल को दर्शाती है।
2. सहकारी संस्था और सामान्य कंपनी में क्या अंतर है ?
सामान्य कमानी में Ownership मुख्यत Shareholders के पास होती है जबकि सहकारी संस्था में सदस्य ही संस्था के मालिक और प्रमुख Stakeholder होते हैं। सहकारी व्यवस्था में लोकतांत्रिक सदस्य नियंत्रण और सदस्य हित को विशेष महत्व दिया जाता है।
3. Amul (अमूल) इतना सफल सहकारी मॉडल कैसे बना ?
Amul ने छोटे दुग्ध उत्पादकों को एक संगठित dairy value chain से जोड़ा। दूध collection से लेकर processing, branding और marketing तक की व्यवस्था विकसित करके किसानों को बड़े बाजार से जोड़ा गया। इसी कारण Amul को भारत के सबसे प्रसिद्ध cooperative success models में गिना जाता है।
4. क्या Lijjat Papad भी एक सहकारी संस्था है ?
हाँ। Shri Mahila Griha Udyog–Lijjat Papad महिलाओं के सामूहिक उद्यम और सहकारी भावना का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसकी खासियत यह है कि महिलाओं ने मिलकर उत्पादन, गुणवत्ता और व्यवसाय को संगठित किया और इसे एक मजबूत consumer brand बनाया।
5. Indian Coffee House को सहकारी संस्था क्यों कहा जाता है ?
Indian Coffee House सामान्य private restaurant chain से अलग है। इसके विभिन्न outlets अलग-अलग worker cooperative societies द्वारा संचालित होते हैं। इसका इतिहास इस बात का उदाहरण है कि कामगार सामूहिक ownership और सहकारी प्रबंधन के आधार पर अपना enterprise चला सकते है।
6. सहकारी संस्था किसानों की आय बढ़ाने में कैसे मदद करती है ?
सहकारी संस्था किसानों को सामूहिक खरीद, बेहतर बाजार पहुंच, processing, storage, branding और value addition जैसी सुविधाओं से जोड़ सकती है। इससे छोटे उत्पादकों की bargaining power बढ़ सकती है और उनकी उपज को बड़े बाजार तक पहुंचाना आसान हो सकता है।
7. वर्ष 2047 तक भारत की सहकारिता में तकनीक की क्या भूमिका हो सकती है ?
Digital payments, mobile apps, online accounting, AI-based demand forecasting, digital supply chains, e-commerce और data analytics सहकारी संस्थाओं को अधिक पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं। PACS के computerisation जैसी पहल इसी व्यापक digital transformation की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
8. भारत की सफल सहकारी संस्थाओं से सबसे बड़ी सीख क्या मिलती है ?
सबसे बड़ी सीख यह है कि छोटे किसान, महिलाएं, कारीगर, उपभोक्ता और कामगार सामूहिक स्वामित्व के माध्यम से बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकते हैं। लेकिन दीर्घकालिक सफलता के लिए केवल सदस्य संख्या पर्याप्त नहीं है—पारदर्शिता, लोकतांत्रिक नियंत्रण, professional management, value addition, मजबूत branding, technology और market access भी जरूरी हैं।
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