📑 Table of Contents
- ➤ प्रस्तावना (Introduction): जलती पराली और मरती जमीन
- ➤ पराली क्या है और क्यों जलाते है किसान ?
- ➤ पराली जलाने से मिट्टी के सूक्ष्म जीव विज्ञान पर प्रभाव (Soil Microbiology)
- ➤ पराली जलाने के स्वास्थ्य पर प्रभाव (Health Impacts)
- ➤ पराली जलाने पर अब लगेगा दोगुना जुर्माना (New Rules 2026)
- ➤ पराली प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकें (Scientific Methods)
- ➤ सरकार की ओर से आर्थिक सहयोग और सब्सिडी
- ➤ बिहार मे पराली प्रबंधन की नीतियां
- ➤ पराली से कमाई के मॉडल (Business Opportunities)
- ➤ वैश्विक उदाहरण (Global Success Stories)
- ➤ निष्कर्ष
- ➤ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQ
जलती पराली और मरती जमीन
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पराली जलाना अब किसानों के लिए न तो सुरक्षित है और न ही फायदेमंद। 2026 में सरकार ने इसपर सख्त नियम लागू कर दिए है। क्योंकि पराली जलाना मिट्टी, वायु और स्वास्थ्य पर विपरीत और नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसीलिए वैज्ञानिक तकनीक इस समस्या के लिए कई समाधान निकाले है जिसे सरकार का समर्थन और सब्सिडी भी प्राप्त हो रही है।
इस लेख में इन सभी बातों का विश्लेषण करेंगे ताकि अलग-अलग जगह इन जानकारियों के लिए भटकना न पड़े।
हम देखते है की हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत में धुंध और प्रदूषण की समस्या गहराने लगती है। इसका एक मुख्य कारण 'पराली जलाना' माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते है कि जिसे हम कचरा समझ कर जला देते है वह वास्तव मे 'सोना है' ?
वैज्ञानिक तरीके से पराली का प्रबंधन न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाता है,बल्कि किसानों को भारी जुर्माने से भी बचाता है।
अब समय आ गया है कि किसान भाई पराली को समस्या नहीं,संसाधन के रूप में देखे !!
पराली क्या है और क्यों जलाते है किसान ?
धान की कटाई के बाद खेत मे बचा हुआ सूखा डंठल और अवशेष ही पराली कहलाता है। इसे पुआल भी कहा जाता है। इसी तरह से गेहूं की कटाई के बाद बचे हुए डंठल को भी जला दिया जाता है। लेकिन ये कम मात्रा में जलाया जाता है।
किसान पराली को इसलिए जलाते है क्योंकि -
- अगली फसल (गेहूं) बोने के लिए समय बहुत कम होता है।
- मजदूरी और मशीन का खर्च ज्यादा होता है।
- जल्दी खेत साफ करना जरूरी होता है।
लेकिन अब यह सब तरीका नुकसानदायक साबित हो चुका है।
पराली जलाने से मिट्टी के सूक्ष्म जीव विज्ञान पर प्रभाव (Soil Microbiology)
जब एक किसान पराली को जलाता है, तो उसे लगता है कि वह सिर्फ कचरा साफ कर रहा है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से वह मिट्टी की जीवित संरचना को नष्ट कर रहा होता है। मिट्टी केवल धूल का ढेर नहीं है,यह अरबों सूक्ष्मजीवों का घर है,जो फसलों को पोषक तत्व पहुंचाने का काम करते है।
1. मित्र कीटों और सूक्ष्मजीवों का सामूहिक विनाश:
मिट्टी की ऊपरी 6 से 10 इंच की परत में सबसे अधिक जैव गतिविधियां होती है। पराली जलाने से मिट्टी का तापमान 50°C से 70°C तक पहुंच जाता है। जबकि मिट्टी के लाभदायक बैक्टीरिया केवल २५°C से 35°C तक ही सुरक्षित रह सकते है।
- केचुओं का मरना: केंचुए 'मिट्टी के इंजीनियर' कहे जाते है। आग की गर्मी से या तो वे मर जाते है या मिट्टी की बहुत गहरी परतों मे चले जाते है,जिससे मिट्टी का वायु संचार रुक जाता है।
- राइजोबियम और एजोटोबैक्टर: ये बैक्टीरिया हवा से नाइट्रोजन लेकर पौधों को देते है। आग लगने से इनकी संख्या मे भारी गिरावट आती है,जिससे अगले सीजन मे यूरिया की खपत बाढ़ जाती है।
2 मृदा कार्बन (Soil Organic Carbon) का संकट:
मिट्टी की उर्वरता का सबसे बड़ा पैमाना Organic Carbon (OC) है।आदर्श रूप से यह ०.५% से ऊपर होना चाहिए।
- पराली मे प्रचुर मात्र में कार्बन होता है। जब हम इसे जलाते है,तो वह कार्बन CO२ बनकर हवा में उड़ जाता है। जबकि वैज्ञानिक तरीके से इसे जलाने पर यह ह्यूमस (Humus) में बदल जाता है।
- लगातार पराली जलाने से मिट्टी 'रेतीली' या 'बंजर' होने लगती है क्योंकि कार्बन की कमी से मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता(Water Holding Capacity) कम हो जाती है।
3. पोषक तत्वों का भारी नुकसान (N,P,K,S):
वैज्ञानिक शोधों (जैसे IARI की रिपोर्ट) के अनुसार, 1 टन पराली जलाने पर मिट्टी को निम्नलिखित पोषक तत्वों का नुकसान होता है -
- नाइट्रोजन: लगभग 5.5 किलोग्राम।
- फास्फोरस: 2.3 किलोग्राम ।
- पोटेशियम: 25 किलोग्राम।
- सल्फर: 1.2 किलोग्राम।
- सूक्ष्म पोषक तत्व: जिंक,कापर और आयरन का भारी नुकसान।
यदि आप इन अवशेषों को खेत मे ही मिला देते है,तो अगली फसल जैसे गेहूं में आपको खाद पर कम खर्च करना पड़ता है।
4. कवक (Fungi)और रोगजनकों का संतुलन बिगड़ना:
मिट्टी में अच्छे और बुरें दोनों तरह के कवक पाए जाते है।
- आग लगने से लाभदायक "ट्रैकोडर्मा" नामक कवक नष्ट हो जाते है,जो पौधों को बीमारियों से बचाते है।
- कुछ हानिकारक कीटों के अंडे मिट्टी की गहरी परतों के अंदर जाकर सुरक्षित हो जाते है। और मित्र कीटों की अनुपस्थिति में वे फसलों पर एकतरफा हानिकारक प्रभाव डालते है।
उदाहरण के तौर पर :
पंजाब के संगरुरु जिलें के किसान जगजीत सिंह ने पिछले 5 वर्षों से पराली नहीं जलाई। उनके अनुसार,पहले उन्हें प्रति एकड़ 3कट्टा यूरिया डालना पड़ता था,लेकिन अब उनकी मिट्टी इतनी उपजाऊ हो गई है कि मात्र 1.5 काटते में ही उतनी ही पैदावार हो जाती है।
पराली जलाने के स्वास्थ्य पर प्रभाव (Health Impacts)
पराली को एक अदृश्य हत्यारा कहा जाता है। क्योंकि जब हम खेत मे पराली जलाते है,तो वह धुआं सिर्फ हवा में नहीं घुलता, बल्कि हमारे और हमारे परिवार के फेफड़ों में जहर बनकर उतरता है। और यह 'स्लो पाइजन' की तरह कम करता है।
1. पीएम 2.5 (PM 2.5) का जानलेवा स्तर:
पराली जलने से निकलने वाले कणों में सबसे खतरनाक PM 2.5 (पार्टीकुलेटर मैटर) होते है। इसका आकार मानव बाल के 30 वें हिस्से के बराबर होता है।
- फेफड़ों मे प्रवेश: इतने सूक्ष्म होने के करण ये नाक के फिल्टर को पार कर सीधे फेफड़ों की गहराई और रक्त प्रवाह में पहुच जाते है।
- हृदय रोग: रक्त में इन कणों के मिलने से खून गाढ़ा हो सकता है,जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा 20-30% अधिक बाढ़ जाता है।
2. श्वसन तंत्र पर प्रहार (Respiratory Issue):
सर्दियों के मौसम में हवा भारी होती है,जिससे धुआं जमीन के करीब ही जमा रहता है। इसे स्माग (Smog) कहा जाता है।
- अस्थमा और ब्रोंकाइटिस: जो लोग पहले से सांस की बीमारी से पीड़ित है,उनके लिए यह धुआं जानलेवा होता है।
- COPD का खतरा: लंबे समय तक इस धुएं के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता हमेशा के लिए कम हो सकती है।
3. बच्चों और बुजुर्गों पर असर:
समाज के ये दो वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते है।
- बच्चों का विकास: छोटे बच्चें के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते है। पराली का धुआं उसके फेफड़े के विकास को रोक सकता है, जिससे उसे जीवन भर सांस की समस्या हो सकती है।
- बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता: बुजुर्गों के लिए यह धुआं छाती में निमोनिया और संक्रमण का कारण बनता है।
4. जहरीली गैसों का मिश्रण:
पराली जलाने से सिर्फ धुआं नहीं निकलता,बल्कि इसमे गैसों का एक जहरीला काकटेल निकलता है।
- कार्बन-मोनोआक्साइड (CO): यह गैस खून में आक्सीजन ले जाने की क्षमता कम कर देती है,जिससे चक्कर आना और थकान जैसी महसूस होने लगती है।
- मिथेन (CH4) और नाइट्रोजन डाइ आक्साइड (NO2): ये गैस आँखों में जलन,गले मे खराश और त्वचा की एलर्जी का करण बनती है।
- कार्सिनोजेनिक तत्व: धुएं मे बेन्जीन जैसे तत्व होते है,जो लंबे समय में कैंसर के करण बन सकते है।
वैज्ञानिक तुलना :
एक रिसर्च के अनुसार,दिल्ली और आसपास के इलाकों में पराली के चरम सीजन के दौरान सांस लेना एक दिन में 40 से 50 सिगरेट पीने के बराबर हानिकारक हो सकता है। यह आंकड़ा डरावने वाला है,लेकिन यही सच्चाई है।
पराली जलाने पर अब लगेगा दोगुना जुर्माना (New Rules 2026)
भारत सरकार और राज्य सरकारों ने पराली जलाने को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए है। संबंधित नीतियां बनाने में भारत सरकार और Indian Council of Agriculture Research की यहां भूमिका रही है। अब पराली जलाना आपके जेब पर भारी पड़ सकता है -
इसके अलावा पराली जलाने वाले किसानों को "राजस्व रिकॉर्ड" में 'रेड एंट्री' भी कर सकती है जिससे -
इसलिए अब पराली जालना केवल वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से ही नुकसान देने वाली नहीं, बल्कि सीधे आर्थिक दंड और कानूनी नुकसान देने वाला भी बन गया है।
पराली जलाने पर दंडात्मक कार्रवाई और नियम (तुलनात्मक)
पराली प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकें (Scientific Methods)
वैज्ञानिकों ने पराली को बिना जलाए निबटाने के मुख्य रूप से दो तरीकें बताए है।
1. इन सीटू प्रबंधन (खेत के अंदर समाधान):
- पूसा डीकंपोजर (Pusa Decomposer): यह एक सस्ता और असरदार तरीका है। इस घोल का छिड़काव करने से पराली 20-25 दिनों मे सड़कर खाद बन जाती है। खासकर गेहूं के पराली के लिए सबसे बेस्ट है क्योंकि उसके बाद तुरंत फसल नहीं बोया जाता।
- हैपी और सुपर सीडर: इन मशीनों की मदद से किसान धन के अवशेषों के बीच में ही गेहूं की बुआई कर सकते है। इससे जुताई का खर्चा बचता है और पराली मल्व(खाद) का कम करती है।
2. एक्स सीटू प्रबंधन (खेत के बाहर समाधान):
- बायोफ्यूल और सीएनजी : पराली को फैक्ट्रियों में भेजकर इससे बिजली,बायो-सीएनजी और एथेनॉल बनाया जा रहा है।
- पशु चारा और मशरूम खेती: धान की पराली का उपयोग मशरूम उगाने और पशुओं के चारे के रूप में भी किया जा सकता है।
वैज्ञानिक प्रबंधन के लाभ -:
आधुनिक कृषि यंत्र:पराली प्रबंधन की रीढ़ (Details Machinery Guide)
पराली को बिना जलाए गेहूं की बुआई करना अब वैज्ञानिकों ने इन मशीनों के जरिए आसान बना दिया है। समझते है की ये मशीनें कैसे काम करती है और इनमें क्या अंतर है।
1. हैपी सीडर (Happy Seeder):पुरानी तकनीक का आधुनिक अवतार:
हैपी सीडर एक ऐसी मशीन है जो ट्रैक्टर के पीछे छोड़ी जाती है। यह सीधे खड़े हुए धान के अवशेषों के बीच ही गेहूं की बुआई कर देती है।
- कार्यविधि: इसके आगे लगे कटर पराली को काटते है और पीछे की मशीन मिट्टी में बीज और खाद डालती है। कटी हुई पराली वापस जमीन पर गिर जाती है जो मल्च(खाद) का काम करती है।
- फायदा: इससे मिट्टी की नमी बरकरार रहती है और खर-पतवार बहुत कम उगते है।
- कमी: इसके लिए धान की कटाई के समय कम्बाइन हार्वेस्टर में SMS(Strow Management System) लगा होना जरूरी है।
2. सुपर सीडर (Super Seeder):"वन-स्टॉप-सोल्यूशन":
आजकल किसान सुपर सीडर को सबसे ज्यादा पसंद कर रहे है क्योंकि यह एक ही बार में कई काम कर दे रहा है।
- कार्यविधि: यह मशीन एक ही चक्कर में पराली को छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिला देती है। साथ में जमीन को समतल करती है,और गेहूं की बुआई भी कर देती है।
- फायदा: किसान को अलग से जुताई करने की जरूरत नहीं पड़ती,यह मिट्टी में पराली मिलने की सबसे अछि मशीन है।
- पावर: इसके लिए कम-से-कम 50-60 HP की शक्तिशाली ट्रैक्टर की आवश्यकता होती है।
3. हैपी सीडर VS सुपर सीडर:दोनों में कौन सा है बेहतर:
4. मल्चर और रोटावेटर (Mulcher and Rotavator):
अगर किसान गेहूं की बुआई सामान्य ड्रिल मशीन से करना चाहता है,तो उसे पहले मल्चर का प्रयोग करना चाहिए।
- मल्चर: यह पराली को बारीक काटकर पूरे खेत मे बिछा देता है।
- रोटावेटर: इसके बाद रोटावेटर चलाकर उस बारीक पराली को मिट्टी में मिलाया जाता है।
5. स्ट्रां बेलर (Straw Baler):
यह मशीन उन किसानों के लिए बेस्ट है जो खेत में पराली रखना ही नहीं चाहते।
- यह मशीन पराली को इकठ्ठा करके उसका बंडल बना देती है।
- इन बंडलों को किसान बिजली संयंत्रों,पेपर मिलों या गौशालाओं को बेचकर 500 रुपया से 1000 रुपया प्रति एकड़ अतिरिक्त कमा सकते है।
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| हैप्पी सीडर चलाकर पारली समस्या का समाधान करता किसान |
सरकार की ओर से आर्थिक सहयोग और सब्सिडी
नियमों के साथ साथ सरकार किसानों को आधुनिक मशीनरी और तकनीक अपनाने के लिए भारी आर्थिक मदद भी दे रही है।
मशीनरी पर सब्सिडी: सरकार "फसल अवशेष प्रबंधन"(Crop Residue Management-CRM) के तहत किसानों को दो तरह से मदद कर रही है।
- व्यक्तिगत किसान: यदि कोई किसान अकेले ही मशीन खरीदता है,तो उसे लागत का 50% अनुदान मिलता है।
- कॉस्टम हायरिंग सेंटर (CHCs): सहकारी समितियों या किसान समूहों को इन मशीनों का बैंक बनाने के लिए 80% तक सब्सिडी दी जाती है। इसमें छोटे किसान कम किराया पर मशीन ले सकते है।
मुफ़्त डीकम्पोजर किट: कई राज्य सरकारें कृषि विभाग के माध्यम से मुफ़्त मे पुस डीकम्पोजर कैप्सूल या घोल वितरित कर रही है।
सरकारी पराली खरीद केंद्र: सरकार अब पराली को पॉवर प्लांट तक पहुचानें के लिए बुनियादी ढांचा तैयार कर रही है ताकि किसानों को उनके अवशेषों का सही दाम मिल सकें।
बिहार मे पराली प्रबंधन की नीतियां
बिहार में सरकार ने 'जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत पराली प्रबंधन को एक मिशन मोड में लिया गया है। यहां मुख्य रूप से धान की कटाई के बाद गेहूं की बुआई में कम समय मिलने के कारण पराली को जला दिया जाता है। इसे रोकने के लिए राज्य सरकार ने 'फसल अवशेष प्रबंधन योजना' लागू की है -
1. कृषि यंत्रों पर सब्सिडी:
बिहार सरकार ने 'कृषि यंत्रीकरण योजना' के तहत पराली प्रबंधन की मशीनों पर अधिक सब्सिडी देने वाले राज्यों मे से है -जहां इन पर 80% तक सब्सिडी 'कस्टमर हायरिंग सेंटर' के लिए मिल सकता है। साथ ही इन मशीनों पर व्यक्तिगत सब्सिडी 50% से लेकर 75% तक उपलब्ध है।
- बिहार में "रिपर-कम-बाइंडर" मशीन ज्यादा लोकप्रिय है,जो पराली को काटकर सीधे बंडल बना देती है।
2. लाल कार्ड और सख्त नियम:
बिहार के कृषि विभाग ने पराली जलाने को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है और -
- उसे 3 वर्षों के लिए सभी सरकारी योजनाओं से वंचित किया जा सकता है।
- बिहार सरके इसरो की मदद से सेटेलाइट से पराली जलाने वाले खेतों की निगरानी कर रहा है।
3. पराली से जैविक खाद और मशरूम का मॉडल:
बिहार में छोटे किसानों के लिए सरकार मुख्य रूप से दो विकल्पों पर जोर दे रही है -
- पूसा डीकम्पोजर: डॉ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय (Pusa) द्वार विकसित 'पूसा डीकम्पोजर' का बिहार के गांवों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया जा रहा है।
- वर्मिकम्पोस्ट इकाइयां: सरकार किसानों को पराली को सड़ाकर केंचुआ खाद बनाने के लिए 5,000 से 10,000 अतिरिक्त सहायता प्रदान करती है।
👉सफल मॉडल उदाहरण: नालंदा और रोहतास के किसानों नें 'स्ट्रा रीपर' के जरिए पराली से भूसा बनाकर उसे 400 से 600 रुपया प्रति क्विंटल की दर से बेचा है। इससे उन्हें गेहूं की बुआई का खर्चा निकलने में मदद मिली।
पराली से कमाई के मॉडल (Business Opportunities)
यदि कोई किसान या ग्रामीण उद्यमी पराली को खेत में नहीं जलाना चाहता,तो वह इसे एक संसाधन के रूप में बेच कर अच्छा मुनाफा कमा सकता है। यहां कुछ प्रमुख तरीकें दिए गए है। -
1. मशरूम की खेती (Mushroom Farming):
धान की पराली (जिसे पुआल कहा जाता है) मशरूम उगानें के लिए सबसे अच्छा आधार है।
- प्रक्रिया: पराली को काटकर,भिगोकर और उपचारित करके उसे बिस्तरों के रूप में तैयार किया जाता है। इसपर बटन मशरूम या आयस्टर मशरूम की अच्छी पैदावार होती है।
- कमाई: करीब 1 एकड़ की पराली से तैयार मशरूम से किसान अपनी लागत निकलने के बाद 50,000 से 80,000 रुपया तक का अतिरिक्त लाभ कमा सकता है।
2. बायो सीएनजी और एथेनॉल उत्पादन:(Bio-CNG एण्ड Ethanol):
भारत सरकार की SATAT(Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) योजना के तहत अब पराली से बायोगैस बनाई जा रही है।
- कैसे काम करती है: पराली को 'एनरोबिक डाइजेशन' प्रक्रिया के माध्यम से कम्प्रेस्ड बायोगैस में बदला जाता है।
- किसानों को लाभ: रिलायंस और एचपीसीएल जैसे बड़े समूह पंजाब और हरियाणा मे प्लांट लगा रहे है,जो सीधे किसानों से पराली खरीदते है। किसानों को इंकम होती है।
3. पराली के पैलेट्स और ब्रिकेट्स(Pellets and Briquettes):
थर्मल पॉवर प्लांट में कोयलें के साथ पराली के पैलेट्स जलाने का नियम(Co-Firing) अनिवार्य कर दिया गया है।
- बिजनेस आइडिया: एक छोटी पैलेट्स मैकिंग मशीन लगाकर ग्रामीण युवा पराली को कैप्सूल की आकार की गोलियों मे बदल सकते है।
- बाजार: इन पैलेट्स की मांग इट-भठों,फैक्ट्रियों मे बहुत अधिक है। ये कोयले की तुलना में सस्ता और कम प्रदूषणकारी है।
वैश्विक उदाहरण (Global Success Stories)
1. चीन का मॉडल:पूर्ण उपयोग और औद्योगिक कलस्टर:
चीन ने 2025-26 तक अपने 95% पराली के पुनर्चक्रण (Recycling) का लक्ष्य रखा है। उन्होंने इसे "5 तरफा उपयोग नीति" के तहत विभाजित किया है -
- उर्वरक के रूप में: चीन में लगभग 60% पराली को मशीनों के जरिए सीधे मिट्टी में वापस मिला दिया जाता है। इसके लिए किसानों को 'मशीन सेवा सब्सिडी' प्रदान की जाती है।
- पशु चारा: चीन ने 'साइलेज' तकनीक को उन्नत किया है। वे पराली को विशेष रसायनों के साथ उपचारित करते है जिससे उसकी पोषक क्षमता बढ़ जाती है और फिर पशुओं के चारा के रूप में इस्तेमाल करते है।
- बायो एनर्जी: चीन मे बड़े पैमानें पर 'बायोमास पॉवर प्लांट' लगाए गए है जो पूरी दुनियां में उदाहरण है। किसान पराली जमा करते है और बदले में उन्हें मुफ़्त बायो गैस मिलती है।
- औद्योगिक कच्चा माल: चीन दुनियां का सबसे बड़ा 'स्ट्रा-बोर्ड' उत्पादक देश है। वहां पराली का उपयोग प्लाइवुड बनाने में किया जाता है जिसका उपयोग फर्नीचर उद्योग में होता है।
- बायो-डिग्रेडेबल प्लास्टिक: चीन की कई कंपनियां पराली के सेलुलोज का उपयोग करके डिस्पोजेबल बर्तन और पैकेजिंग सामग्री बना रही है,जो प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने में मदद करती है।
2. वियतनाम का मॉडल:मशरूम और जैविक खाद का चक्र:
वियतनाम (विशेषकर मेकांग डेल्टा क्षेत्र) ने पराली को 'नगद फसल' में बदल दिया है। उनका मॉडल 'सर्कुलर इकोनॉमी' का बेहतरीन उदाहरण है -
- मशरूम उत्पादन की चेन: वियतनाम में लोग पराली को जलाते नहीं है,बल्कि वे उसका उपयोग 'स्ट्रा-मशरूम' उगाने के लिए करते है। मशरूम उगाने के बाद जो अवशेष रह जाता है वो और भी ज्यादा कीमत पर बेच दिया जाता है जो जैविक खाद के रूप मे काम आता है।
- प्रीमियम जैविक खाद: मशरूम उत्पादन से बचे हुए पराली को वियतनाम में किसानों द्वारा 'वर्मिकम्पोस्ट' के रूप में बदल दिया जाता है। क्योंकि इस खाद की मांग वहां के बगीचों और कॉफी बागानों मे ज्यादा होती है।
- निर्यात का अवसर: वियतनाम अब 'प्रसंस्कृत पराली'(Processed Parali) और उससे बनी जैविक खाद को निर्यात भी करने लगा है।
- सरकारी ग्रीन क्रेडिट: सरकार के द्वारा उन किसानों को 'ग्रीन कार्ड' सर्टिफिकेट प्रदान किए जाते है जो पराली जलाने के बजाय उसका औद्योगिक उपयोग करते है साथ ही उन्हें कम ब्याज पर ऋण भी उपलब्ध कराया जाता है।
👉भारत के लिए सीख:(Key Takeaways for India):
- भारत को भी वियतनाम की तरह प्रति 10 से 15 गावों के बीच एक 'पराली बैंक' या पराली कलेक्शन सेंटर खोलना चाहिए।
- पीपीपी: प्राइवेट-पब्लिक-पार्टनरशिप के तहत निजी कंपनियों को पराली से प्रोडक्टस बनाने में छूट प्रदान करनी चाहिए।
- किसानों को जागरूक करना चाहिए की अब "पराली जालना मतलब पैसा जालना" है।
निष्कर्ष: (Conclusion)
पराली प्रबंधन केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं है,बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने का एक सुनहरा अवसर है।
पूरा जानकारी हासिल करने के बाद तो यही लग रहा है कि .. ..
"किसान भाईयों, पराली जलाना अपनी ही जमीन की किडनी जलाने जैसा है। आधुनिक तकनीक और सरकारी सहयोग का हाथ थामकर आपलोग 'वेस्ट टू वेल्थ " (Waste to Wealth) के साथ अपनी खेती को टिकाऊ बनाए।"
अतः किसान भाईयों, क्या आप भी अपने खेत में आधुनिक मशीनों का उपयोग करना चाहते है ?
या पराली से मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग लेना चाहते है ? हमें कमेन्ट बॉक्स में जरूर बताए और इस जानकारी को अपने परिचित किसान भाईयों को जरूर शेयर करें। (CrackersUpTop )
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: क्या पराली को खेत में मिलने से अगली फसल की पैदावार हो जाती है? ▼
उत्तर: बिल्कुल नहीं! बल्कि और बाढ़ जाती है। शुरुआत के दो साल समान पैदावार होती है लेकिन तीसरे साल से जमीन में ह्यूमस बढ़ जाने के कारण पैदावार में 5-10% की वृद्धि हो जाती है और यूरिया का खपत कम हो जाता है।
प्रश्न 2: पूसा डीकम्पोजर का उपयोग कैसे करे और ये कहां मिलेगा? ▼
उत्तर: यह कैप्सूल और तरल दोनों रूपों में आता है। 4 कैप्सूल को गुड़ और बेसन के घोल में मिलाकर 25 लीटर का घोल तैयार किया जाता है जो 1 एकड़ के लिए पर्याप्त होता है। इसे आप नजदीकी किसान विज्ञान केंद्र या IARI Pusa की वेबसाइट से प्राप्त कर सकते है।
प्रश्न 3: अगर मैं पराली जलता हूं तो क्या मेरा किसान सम्मान निधि रुक सकती है? ▼
उत्तर: हां! पंजाब,हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में नियम सख्त है। यदि सेटेलाइट इमेज में आपके खेत की आग पकड़ी जाती है,तो प्रशासन आपके राजस्व रिकार्ड में रेड एंट्री कर सकता है,जिससे पीएम किसान निधि और अन्य सब्सिडी रुक सकती है।
प्रश्न 4: व्यक्तिगत किसान के बजाय 'कस्टमर हायरिंग सेंटर' से मशीन लेना क्यों बेहतर है? ▼
उत्तर: क्योंकि महंगी मशीनें छोटे किसान को लेने में दिक्कत हो सकती है और उसपर सब्सिडी 50% से 70% तक ही मैलती है,जबकि कस्टमर हायरिंग सेंटर से लेने से आप इन्हे 500 से 800 प्रति एकड़ के मामूली किराया पर आसानी से उपयोग कर सकते है और आपकी बचत हो जाती है।
प्रश्न 5: क्या धान की पराली का पशु चारे के रूप में उपयोग सुरक्षित है? ▼
उत्तर: धान की पराली में सिलिका और अक्सलेट्स की मात्र अधिक होती है इसलिए इसे सीधे खिलना थोड़ा कम पौष्टिक होता है। अगर इसे उपचारित करके खिलाया जय तो यह एक सुरक्षित और अच्छा चारा बन जाता है।
प्रश्न 6: पराली प्रबंधन की मशीनों पर सब्सिडी के लिए ऑनलाइन आवेदन कहां करे? ▼
उत्तर: इसके लिए आप अपने राज्य के कृषि विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर जा सकते है। बिहार: brp.agriculture.bihar.gov.in
हरियाणा: agriharyana.gov.in
उत्तर प्रदेश: upagriculture.com
पंजाब: agrimachinerypb.com
प्रश्न 7: पराली जलाने पर जुर्माना क्या लगता है ? ▼
उत्तर: पराली जलाने पर जुर्माने में 2026 में भारी वृद्धि कर दी गई है जो प्रति 2 एकड़ पर 5,000 रुपया (पहले 2,000 ही था) 2 से 5 एकड़ भी पर जुर्माना 10,000(जो पहले 5,000 ही था) और 5 एकड़ से अधिक भूमि पर जुर्माना 30,000 हो गया है।
प्रश्न 8: क्या पराली से बायोगैस बनाया जा रहा है? ▼
उत्तर: हां!भारत सरकार की SATAT (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) योजना के तहत अब पराली से बायोगैस बनाई जा रही है।
प्रश्न 9: क्या पराली बेचना संभव है? ▼
उत्तर: हां! भारत में कई निजी कंपनियां अब खेत से पराली उठानें के लिए 1500 से 2500 रुपया प्रति टन का भुगतान कर रही है।

