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| भारतीय खेलों का वैश्विक मंचों पर बढ़ता गौरव |
भारत के गांव सदियों से ही केवल कृषि और श्रम के केंद्र नहीं रहे है बल्कि ये सांस्कृतिक अभिव्यक्ति,सामूहिक चेतना और शारीरिक कौशल के लिए भी एक सशक्त मंच प्रदान करने वाले केंद्र रहे है। इसीलिए भारत को इसकी समृद्ध संस्कृति और परम्पराओं के लिए जाना जाता है। इसी सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है ग्रामीण जीवन मे जन्मे हमारे पारंपरिक खेल-जैसे कबड्डी,खो-खो और कैरम।
इन खेलों की मुख्य विशेषता उनकी सादगी,मानवीय क्षमता बढ़ाने वाली संरचना और सामूहिक भागीदारी रही है। गावों से निकल कर अब 'भारत के देशी खेल ग्लोबल स्टार' के रूप मे आज वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत पहचान बना चुके है।
कबड्डी का अंतर्राष्ट्रीय सफर
कबड्डी की जड़े प्राचीन भारत के बहुत ही गहराई से जुड़ी हुई है।विद्वानों ने इसका उद्गम वैदिक काल(लगभग 1500-500 ईसा पू) मानते है। प्राचीन भारतीय संस्कृत साहित्य और पौराणिक ग्रंथों मे इसका उल्लेख मिलता है। साथ ही यह भारत का सबसे लोकप्रिय पारंपरिक खेल रहा है। यही कबड्डी अब गांवों से निकलकर अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुकी है-
- एक समान नियम: पहले कबड्डी के नियम पूरे देश मे अलग-अलग थे। बीसवीं शताब्दी के शुरू मे कबड्डी के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों को एक समान नियमों मे बांधने का प्रयास किया गया।
- संगठित प्रतियोगिता: आगे चलकर 1920 के दशक मे भारत मे पहली बार कबड्डी की संगठित प्रतियोगिता को आयोजित की जाने लगी।
- ओलंपिक मे प्रदर्शन खेल: कबड्डी को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर झलक देखने को मिल वर्ष 1936 के 'बर्लिन ओलंपिक खेलों' मे जब कबड्डी को एक प्रदर्शन खेल के रूप मे जगह मिली। भले ही यह केवल सांकेतिक उपस्थिति थी लेकिन विश्व समुदाय का ध्यान इस खेल की ओर गया।
- अखिल भारतीय कबड्डी महासंघ: कबड्डी के उभरते हुए स्वरूप को देखकर वर्ष 1950 मे "अखिल भारतीय कबड्डी महासंघ" की स्थापना की गई जिसने इस खेल को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।
- एशियाई खेलों मे पाया स्थान: अब कबड्डी मजबूत बन चुकी थी। और इसका प्रतिफल हुआ की वर्ष 1990 मे कबड्डी ने एशियाई खेल मे स्थान पाया और उस समय से लेकर अभी तक एशियाई खेलों मे नियमित खेल के रूप मे कबड्डी शामिल रही है। इसने कबड्डी को वैश्विक स्वीकार्यता प्रदान करने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- प्रो कबड्डी लीग: वर्ष 2014 मे शुरू हुई प्रो कबड्डी(Pro Kabaddi League) लीग ने एक निर्णायक मोड़ प्रदान किया जिसने इसको आधुनिक परिवेश,प्रसारण तकनीक,पेशेवर प्रबंधन और अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों से जोड़ दिया। और यह खेल भारत के सबसे अधिक देखे जाने वाले खेलों की लिस्ट मे शामिल हो गया।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता: अब कबड्डी भारत से बाहर निकल चुका था। इसका विस्तार एशिया,अफ्रीका,यूरोप और अमेरिका सहित 50 से अधिक देशों मे हो चुका था।इसीलिए अब 'कबड्डी विश्व कप' और अन्य क्षेत्रीय अंतर्राष्ट्रीय लीग प्रतियोगिता कबड्डी के स्थापित हो गए।
- प्रवासी भारतीयों की बड़ी भूमिका: कबड्डी अंतरराष्ट्रीय प्रसार और स्थान दिलाने मे प्रवासी भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अब तो वैश्विक कबड्डी लीग मे विश्व के विभिन्न देशों के खिलाड़ी शामिल हो रहे है। यह खेल अब बहु-सांस्कृतिक खेल का रूप ग्रहण कर रहा है।
- सांस्कृतिक महत्व: सबसे सरल कबड्डी सबके मन को भाती।बिना किसी महंगे उपकरण के खेले जाने वाला यह खेल आज परंपरा और आधुनिकता का संयोजन करके सांस्कृतिक महत्व के लिए गर्व का प्रतीक बन चुका है।
आज कबड्डी के नियमन और विकास के लिए International Kabaddi Federation की स्थापना हो चुकी है जो पूरे विश्व मे कबड्डी खेलने वाले देशों और इसके आयोजन का प्रबंधन करता है।
खो-खो की बढ़ती लोकप्रियता
खो-खो भारत की एक प्राचीन खेल रही है जिनका उत्पति और विकास महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों मे मानी जाती है।यह खेल खुले मे खेलता जाता है जिसमे टीम वर्क,चपलता और गति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह खेल भी अब अंतर्राष्ट्रीय पहचान और लोकप्रियता की ओर तेजी से बढ़ रही है -
- संगठित खेल स्वरूप: वर्ष 1914 मे पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब ने इसके नियमों को व्यवस्थित कर इसको संगठित स्वरूप प्रदान किया।
- खो-खो फेडरेशन ऑफ इंडिया: खो-खो ने जब पूरे देश मे पहचान बनाने की ओर अग्रसर थी उसी समय वर्ष 1955 मे खो-खो फेडरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना हुई जिसने इसको राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।
- दक्षिण एशियाई खेल मे स्थान: मजबूत खो-खो को वर्ष 1987 मे 'दक्षिण एशियाई खेलों' मे स्थान मिला और इसने अपना वैश्विक सफर शुरू किया।इसने 1982 मे एशियाई खेलों मे भी शानदार प्रदर्शन किया था।
- अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप: आगे चलकर वर्ष 2018 मे "अंतर्राष्ट्रीय खो-खो महासंघ"(International Kho-Kho Federation-IKKF)की स्थापना हुआ जिसने इसको अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। आज यह खेल 60 से अधिक देशों मे खेला जा रहा है।
- अल्टीमेट खो-खो लीग: वर्ष 2022 मे शुरू हुई इस लीग ने खो-खो के पारंपरिक खेल को आधुनिक मनोरंजन के रूप मे नए तरह से पेश किया जिसे बहुत ही समर्थन मिला।
- खो-खो विश्व कप: अब बारी थी खो-खो को पूरे विश्व मे प्रभाव जमाने की जिसे वर्ष 2025 मे भारत की अगुआई मे दिल्ली मे "खो-खो विश्व कप 2025"(Kho-Kho World Cup) के आयोजन ने पूरा कर दिया। इस विश्व कप मे 6 महाद्वीपों के 23 से अधिक देशों ने भाग लिया था।जिसने इसको वैश्विक स्तर पर बड़ी उपलब्धि प्रदान किया।
अब खो-खो को वर्ष 2030 मे आयोजित होने वाले एशियाई खेलों और वर्ष 2032 मे आयोजित होने वाले ओलंपिक खेलों मे शामिल करने के प्रयास किए जा रहे है।
कैरम का विश्व मंच पर स्थान
कैरम की भी उत्पति बीसवीं शताब्दी मे भारत मे हुई थी। शुरू मे यह खेल सामाजिक मेल जोल बढ़ाने और मनोरंजन के रूप मे थी। लेकिन आगे चलकर इसने प्रतिस्पर्धी खेल के रूप मे अपने को विकसित कर लिया। यह भारत के घर घर मे खेल जाने वाला एक इंडोर गेम है। जो अब अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने लगा है -
- प्रवासी भारतीयों ने फैलाया: कैरम को प्रवासी भारतीयों द्वारा एशिया,मध्य-पूर्व,यूरोप और अमेरिका तक पहुंचाया गया।
- कैरम महासंघ की स्थापना: वर्ष 1956 मे ही "अखिल भारतीय कैरम महासंघ"(Carrom Federation of India) की स्थापना की गई। जिसने धीरे धीरे कैरम को पूरे देश मे व्यवस्थित किया और आकार प्रदान किया।
- अंतरराष्ट्रीय मान्यता: वर्ष 1988 मे भारत के चेन्नई मे भारत,श्रीलंका,मालदीव,मलेशिया,जर्मनी और स्विट्जरलैंड के प्रतिनिधियों ने मिलकर इंटरनेशनल कैरम फेडरेशन(International Carrom Federation) की स्थापना की जिसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख मे है।
- विश्व कप का आयोजन: विश्व के 17 से अधिक देशों की भागीदारी के साथ वर्ष 2024 अमेरिका मे "कैरम विश्व कप"(Carrom World Cup 2024) का आयोजन किया गया। जिसने इसके वैश्विक उपस्थिति को झलक प्रदान किया।
यही कारण है वर्तमान मे कैरम भारतीय उपमहाद्वीप के साथ साथ यूरोप मे भी लोकप्रिय होता जा रहा है।
अन्य खेल जो आकर्षित कर रहे वैश्विक ध्यान
भारत के कुछ अन्य पारंपरिक खेल जो वैश्विक ध्यान को आकर्षित कर रहे है और धीरे धीरे लोकप्रियता और अपनी उपस्थिति को दर्ज कर रहे है -
- लागोरी: लागोरी को सात पत्थर वाला खेल भी कहा जाता है। जो अत्यंत प्राचीन है और हजारों सालों से भारत मे खेली जा रही है। इसके आधुनिक लीग प्रतियोगिता होने लगे है।
- अट्टाया पट्टाया: यह खेल भी भारत मे प्राचीन काल से खेला जाता रहा है जो सरकारी मान्यता प्राप्त पारंपरिक खेलों मे अपना स्थान प्राप्त कर चुका है।
सरकारी नीति और समर्थन
भारत सरकार ने पारंपरिक खेलों के संरक्षण और वैश्वीकरण के लिए कई नीतियां बनाई है और उनके माध्यम से समर्थन प्रदान कर रही है। जिनमे महत्वपूर्ण है -
- खेलों इंडिया कार्यक्रम: यह कार्यक्रम जमीनी स्तर पर प्रतिभाशाली खिलाड़ियों का पहचान और पारंपरिक खेलों के विकास पर केंद्रित है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: भारत की "राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020"(National Education Policy 2020) के अंतर्गत विद्यालयों मे 75 पारंपरिक खेलों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। जिससे पारंपरिक खेलों का विकास और संवर्धन बढ़ेगा।
- भारतीय खेल प्राधिकरण: भारतीय खेल प्राधिकरण(Sport Authority of India)पारंपरिक खेलों के लिए प्रशिक्षण,वित्तीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं मे भागीदारी के लिए सहयोग प्रदान करता है।
भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप मे ये पारंपरिक खेल सरकार के सहयोग और लोगों के समर्थन से विश्व मंच पर अपनी पहचान बनाने लगे है। यदि इसी तरह से संगठित प्रयास,आधुनिक मंच और नीतिगत समर्थन मिलती रहे तो पूरे विश्व मे एक अलग पहचान बनाने मे देर नहीं लगेगी। ये पारंपरिक खेल हमे बताती है की गांव की परंपराएं भी विश्व मंच पर अपनी अमित छाप छोड़ सकती है।
निष्कर्ष
निःसंदेह पारंपरिक भारतीय खेलों ने खासकर कबड्डी, खोखो और कैरम ने विश्व के खेल मंचों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है और साथ ही ए खेल विभिन्न देशों मे लोकप्रिय भी हो गई है।ये प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व की बात है।साथ ही बाकी अन्य पारंपरिक खेलों ने भी लोकप्रियता के पायदान पर आगे की ओर बढ़ रही है।
जहां तक सरकार की बात है नई शिक्षा नीति मे भी पारंपरिक खेलों को स्थान दिया गया है। साथ ही कई तरह के प्रयास इन पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है जैसे खेलों इंडिया,अस्मिता आदि के माध्यम से। यह सभी प्रयास सराहनीय है।
हमे भी देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इन खेलों मे और इन खेलों को बढ़ावा देने मे बढ़-चढ़ कर भाग लेना चाहिए। अपने आसपास देखे यदि कोई प्रतिभाशाली खिलाड़ी इन पारंपरिक खेलों का दिखे तो उन्हे समर्थन जरूर करे।
और आप भी इन खेलों का आयोजन स्थानीय स्तर पर करे क्योंकि ये केवल एक खेल नहीं है बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न FAQ
प्रश्न 1.पारंपरिक खेल किसे कहते है?
उत्तर: पारंपरिक खेल भारत मे सदियों से खेले जाने वाले खेल है जो भारतीय संस्कृति की अमिट पहचान है,ये खेल शारीरिक चपलता,ताकत और टीम भावना को बढ़ावा देने वाले होते है।
प्रश्न 2. खो-खो मे एक टीम मे कितने खिलाड़ी कोर्ट पर खेल सकते है?
उत्तर: 9 खिलाड़ी।
प्रश्न 3. कबड्डी के एक टीम मे कुल कितने खिलाड़ी होते है?
उत्तर: 7 खिलाड़ी।
प्रश्न 4. दक्षिण भारत की कौन सी मार्शल आर्ट है जो 3,000 साल पुरानी है?
उत्तर: कालारीपयट्टु।
प्रश्न 5. पारंपरिक खेलों के पुनरुद्धार के लिए कौन सी सरकारी पहल योजना प्रमुख है?
उत्तर: खेलों इंडिया (Khelo India)
प्रश्न 6. राष्ट्रीय शिक्षा नीति मे कितने पारंपरिक खेलों को स्थान दिया गया है?
उत्तर: भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मे 75 पारंपरिक खेलों को पाठ्यक्रम मे स्थान दिया गया है।
प्रश्न 8. पारंपरिक खेलों का हमारे जीवन मे क्या महत्व है?
उत्तर: यह हमे स्थिरता,धैर्य,ध्यान और टीमवर्क कौशल विकसित करने मे मदद करता है। खेल मन की चिंताओ और तनावों को कम करके मन को सकारात्मक बनता है। साथ ही सामाजिक संबंधों का भी विकास होता है।

WOWWWWWW 👍 BAHUT ACHCHA HAI 🥰🥰
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